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आर्यसमाज के द्वारा श्रीमद्भागवतादि पुराणों में वर्णित नन्दनन्दन व्रजस्थ/गोकुलस्थ गोप-गोपीवृन्द के साथ रमण करने वाले श्रीश्यामसुन्दर कृष्ण के ऊपर किये गए आक्षेपो का आमूलचूल ध्वंस । (This article was, originally, published in BRVF’s WhatsApp groups around 19th of June 2016 AD. But, due to plagiarism, it is being published here to show its true authorship.)

 

 

 

दयानन्दीयों का पूर्वपक्ष –

 

श्री कृष्ण कौन थे? कैसे थे ?? कौन थी राधा??

देखो देखो कुछ लोगो की एक और मूर्खता।
मूर्खता यह कि श्री कृष्ण भगवान् को राधा के साथ जोड़ना ,अश्लीलता भरा वर्णन करना, प्रेम लीला रास लीला दिखाना,16108 गोपियों से शादी करना।

अरे कृष्ण के साथ राधा का नाम जोड़के आप खुद ही श्रीकृष्ण को गाली दे रहे हो। और गर्व महसूस करते हो ।

योगिराज धर्म संस्थापक श्रीकृष्ण के जीवन चरित्र में कहीं भी कलंक नहीं है।

वे संदीपनी ऋषि के आश्रम में शिक्षा दीक्षा लिए तो रास लीला रचाने गोपियों और राधा के बीच कब आ गए ?।

अपनी बुद्धि खोलो और विचारो।श्री कृष्ण जी वेदों और योग के ज्ञाता थे। उनके जीवन पर कलंक मत लगाओ । जागो। कब तक सोते रहोगे??।

श्री कृष्ण भगवान् सम्पूर्ण ऐश्वर्य के स्वामी थे, दयालु थे, योगी थे,वेदों के ज्ञाता थे। वेद ज्ञाता न होते तो विश्वप्रसिद्ध “गीता का उपदेश ” न देते।

जो श्री कृष्ण जी मात्र एक विवाह रुक्मिणी से किये और विवाह पश्चात् भी 12 वर्षों तक ब्रह्मचर्य का पालन किया । तत्पश्चात प्रद्युम्न नाम का पुत्र रत्न प्राप्त हुआ।

ऐसे योगी महापुरुष को रास लीला रचाने वाले ,छलिया चूड़ी बेचने वाला, 16 लाख शादियां करने वाला आदि लांछन लगाते शर्म आनी चाहिए। अपने महापुरुषों को जानो । कब तक ऐसी मूर्खता दिखाओगे।

जिस श्री कृष्ण का नाम तुम लोग राधा के साथ जोड़ते हो जान लो राधा क्या थी…

राधा का नाम पुराणों में आता है। सम्पूर्ण महाभारत में केवल कर्ण का पालन करने वाली माँ राधा को छोड़कर इस काल्पनिक राधा का नाम नहीं है,

भागवत् पुराण में श्रीकृष्ण की बहुत सी लीलाओं का वर्णन है, पर यह राधा वहाँ भी नहीं है.

राधा का वर्णन मुख्य रूप से ब्रह्मवैवर्त पुराण में आया है. यह पुराण वास्तव में कामशास्त्र है, जिसमें श्रीकृष्ण राधा आदि की आड़ में लेखक ने अपनी काम पिपासा को शांत किया है,

पर यहाँ भी मुख्य बात यह है कि इस एक ही ग्रंथ में श्रीकृष्ण के राधा के साथ भिन्न-भिन्न सम्बन्ध दर्शाये हैं, जो स्वतः ही राधा को काल्पनिक सिद्ध करते हैं.

देखिये- ब्रह्मवैवर्त पुराण ब्रह्मखंड के पाँचवें अध्याय में श्लोक 25,26 के अनुसार राधा को कृष्ण की पुत्री सिद्ध किया है. क्योंकि वह श्रीकृष्ण के वामपार्श्व से उत्पन्न हुई बताया है.

ब्रह्मवैवर्त पुराण प्रकृति खण्ड अध्याय 48 के अनुसार राधा कृष्ण की पत्नी (विवाहिता) थी, जिनका विवाह ब्रह्मा ने करवाया.

इसी पुराण के प्रकृति खण्ड अध्याय 49 श्लोक 35,36,37,40, 47 के अनुसार राधा श्रीकृष्ण की मामी थी. क्योंकि उसका विवाह कृष्ण की माता यशोदा के भाई रायण के साथ हुआ था.

गोलोक में रायण श्रीकृष्ण का अंशभूत गोप था. अतः गोलोक के रिश्ते से राधा श्रीकृष्ण की पुत्रवधु हुई.

क्या ऐसे ग्रंथ और ऐसे व्यक्ति को प्रमाण माना जा सकता है? हिन्दी के कवियों ने भी इन्हीं पुराणों को आधार बनाकर भक्ति के नाम पर शृंगारिक रचनाएँ लिखी हैं.

ये लोग महाभारत के कृष्ण तक पहुँच ही नहीं पाए. जो पराई स्त्री से तो दूर, अपनी स्त्री से भी बारह साल की तपस्या के बाद केवल संतान प्राप्ति हेतु समागम करता है,

जिसके हाथ में मुरली नहीं, अपितु दुष्टों का विनाश करने के लिए सुदर्शन चक्र था, जिसे गीता में योगेश्वर कहा गया है.

जिसे दुर्योधन ने भी पूज्यतमों लोके (संसार में सबसे अधिक पूज्य) कहा है,

जो आधा पहर रात्रि शेष रहने पर उठकर ईश्वर की उपासना करता था, युद्ध और यात्रा में भी जो निश्चित रूप से संध्या करता था.

जिसके गुण, कर्म, स्वभाव और चरित्र को ऋषि दयानन्द ने आप्तपुरुषों के सदृश बताया, बंकिम बाबू ने जिसे सर्वगुणान्ति और सर्वपापरहित आदर्श चरित्र लिखा,

जो धर्मात्मा की रक्षा के लिए धर्म और सत्य की परिभाषा भी बदल देता था. ऐसे धर्म-रक्षक व दुष्ट-संहारक कृष्ण के अस्तित्त्व पर लांछन लगाना मूर्खता ही है।

 

 

 

उत्तरपक्ष व सत्सिद्धान्त की परिस्थापना गौडीयवैष्णवसम्प्रदायी भक्तिरसवेदान्तपीठाधीश्वर के द्वारा –

 

क) जिन वेदों की आर्यसमाजी दुहाई देते हैं, उन्हीं ऋग्वेद के आरण्यक (वेद प्रमुखतया तीन भागों में विभक्त माने गए हैं — संहिता, ब्राह्मण व आरण्यक/उपनिषद्/श्रुति/वेदान्त) विभाग के अन्तर्गत स्थित श्रीराधिकोपनिषद् का कथन यों है –

 

“एवं हि तस्य शक्तयस्त्वनेकधा । आह्लादिनीसन्धिनीज्ञानेच्छाक्रियाद्या बहुविधा शक्तयः । तास्वाहलादिनी वरीयसी परमान्तरङ्गभूता राधा कृष्णेन आराध्यते इति राधा कृष्णम् समाराधयति सदेति राधिका गान्धर्वेति व्यपदिश्यते इति । अस्या एव कायव्यूहरूपा: गोप्यो महिष्य: श्रीश्चेति । येयं राधा यश्च कृष्णो रसाब्धिर्देहेनैकः क्रीडनार्थम् द्विधा’भूत् ।”

अनुवाद — “इस प्रकार से उसकी (“कृष्णो वै परमम् दैवतम्” — इत्यादि अथर्ववेदीया गोपालतापन्युपनिषद् व कृष्णोपनिषद् में वर्णित परतत्त्व श्रीगोपाल की) अनेकविधा शक्तियाँ हैं । आह्लादिनी, सन्धिनी, ज्ञानमयी, इच्छामयी तथा क्रियामयी आदि बहुतेरी शक्तियाँ हैं । इन सब में सर्वप्रमुखा आह्लादिनी (परतत्त्व गोपाल की) परमान्तरङ्गभूता है । वें ही श्रीकृष्ण के द्वारा आराधित होने से ‘श्रीराधा’ हैं तथा श्रीकृष्ण की निरन्तर सम्यक् आराधना करने वाली होने के कारण ‘राधिका’ तथा ‘गान्धर्वा’ (श्रीगोपालतापनी श्रुति से प्राप्त संज्ञा) संज्ञाओ से सम्बोधिता होती हैं । इन्हीं की कायव्यूहरूपा (व्रज की) गोपियाँ, (द्वारका की) पट्टमहिषीयाँ तथा (श्रीवैकुण्ठ की) रमादेवी (महालक्ष्मी) हैं । यद्यपि रससागरस्वरूप जो श्रीराधा हैं, वें ही श्रीकृष्ण हैं — तथापि वें लीलासम्पादन हेतु द्विविध रूप में प्रकट हुए हैं ।”

 

ख) अथर्ववेदीया राधिकातापन्युपनिषद् -९ — श्रुतय ऊचु: — “यस्या अङ्के विलुण्ठन् कृष्णदेवो गोलोकाख्यम् नैव सस्मार धामपदम् । सांशा कमला शैलपुत्री ताम् राधिकां शक्तिधात्रीम् नामामः ।।”

 

अनुवाद — श्रुतियों/उपनिषदों की अधिष्ठात्रीणी देवीयों ने कहा — “देवदेव श्रीकृष्ण जिनकी अङ्करूपी शय्या के ऊपर विलुण्ठन (लेटना) करते हुए अपने गोलोकरूपी धाम का भी स्मरण नहीं करते (इससे व्रजलीला का गोलोकलीला से उत्कर्षमूलक गौडीय मत प्रमाणित होता है ।) तथा लक्ष्मी, पार्वती आदि देवियाँ भी जिनकी अंशरूपा हैं, उन शक्तियों की जननी श्रीराधा को हम प्रणाम करतीं हैं ।”

 

ग) अतः परम अन्तरङ्गभूता नित्य स्वीया स्वरूपभूता शक्ति होने के कारण श्रीराधिका के साथ श्रीमाधव का रमण व उन श्रीराधा की कायव्यूह/स्वांशरूपा गोपियों के साथ उन मुरारी का रमण — श्रुति व अध्यात्म — उभय के सम्मत हैं । यदि आदि शक्तिमान् परब्रह्म निज स्वरूपभूता शक्ति के साथ रमण नहीं करेगा तब तो सामवेदीया छान्दोग्योपनिषद् ८.१२.३ में वर्णित — “…आत्मक्रीड: आत्ममिथुन आत्मानन्द: स्वराड् भवति…” अर्थात् “….परब्रह्म अपनी आत्मा के साथ क्रीड़ा करता है, निज आत्मा के साथ मैथुन अर्थात् रतिक्रीड़ा करता है……..” + अथर्ववेदीया मुण्डकोपनिषद् ३.१ — “आत्मक्रीड आत्मरतिः क्रियावानेष….” अर्थात् “वह आत्मा के साथ खेलता है एवं आत्मा से ही रतिक्रीड़ा करता है…” + नारदपरिव्राजकोपनिषद् ५.१७ –“आत्मक्रीड आत्मरतिरात्मवान्….” अर्थात् “वह आत्म से क्रीड़ा करने वाला व आत्मा से रति करने वाला..”  + “स एकाकी न रमते स द्वितीयमैच्छत्” (श्रीमद्वल्लभाचार्य के द्वारा श्रीमद्भागवत की सुबोधिनी व्याख्या में उद्धृत श्रुतिवचन) ।

 

अतः ऋग्वेदीया राधिकोपनिषद् के कथनानुसार (येयं राधा यश्च कृष्णो रसाब्धिर्देहेनैकः क्रीडनार्थम् द्विधाभूत्…) अर्थात् जो श्रीराधा है वहीं श्री कृष्ण है परस्पर एकात्मा होने के कारण व केवल ‘क्रीड़ा’ या ‘लीला’ या ‘रति’ या ‘आत्ममैथुन’ के अभिप्राय से यही एकात्मा दो रूपों में प्रकट है ।

 

इससे स्पष्ट हो जाता है कि परब्रह्म श्रीकृष्ण निजात्मभूता शक्ति श्रीराधा व राधा की अंशस्वरूपा गोपीवृन्द के साथ चाहे किसी भी रूप में लीलाविहार/क्रीड़ा क्यों न करें — वह सब केवल पुराणसम्मत ही नहीं, अपितु उपनिषत्सम्मत भी है ! चाहे श्रीकृष्ण राधा से विवाह करें या न करें — उससे कोई तात्त्विक अन्तर नहीं पड़ता क्योंकि दोनों तत्वतः एकात्मा हैं । और श्रीकृष्ण लीला में रोमाञ्चक रसवैचित्र्य के (इस बात को समझने के लिए मूर्ख , शुष्क व विकृतमति वाले आर्यसमाजीयों को भक्तिरसशास्त्रों का अध्ययन करना पडेगा) उत्पादनार्थ राधा आदि व्रजांगनाओ में अपने प्रति परकीया श्रृंगार भाव के उद्रेक निमित्त उनका विवाह बाह्य दृष्टि से अन्य गोपों से करवाकर आन्तरिक रूप से स्वयम् ही उन गोपों के रूप में स्वांश विस्तार के द्वारा आत्मप्रकाशित होतें हैं । श्रीभगवान् की नित्यशक्ति को श्रीभगवान् के अतिरिक्त अन्य कोई स्पर्श नहीं कर सकता । अतः कूर्मपुराण स्पष्ट करता है कि कैसे रावण केवल छाया सीता (वेदवती नामक ब्राह्मण कन्या पूर्वजन्म में) का अपहरण कर पाया और कैसे मूलसीता (श्रीभगवान् की नित्यशक्तिस्वरूपा महालक्ष्मी साक्षात्) तक पहुँच ही नहीं पाया !

 

घ) यदि धूर्त्त आर्यसमाजी म्लेच्छ इतने पर भी व्रजस्थ श्रीकृष्ण को व्यभिचार का दोषी मानते हैं और ऐसे गोपीनाथ कृष्ण को योगेश्वर मानने से इंकार करतें हैं तो उनकी धूर्तता की लिए श्रीमद्भागवत में वर्णित शुकदेव मुनि का यह वचन पर्य्याप्त है (श्रीमद्भागवतम् १०.३३.२९) –

 

श्रीशुक उवाच — “धर्मव्यतिक्रमो दृष्ट ईश्वराणां च साहसम् । तेजीयसां न दोषाय वह्ने: सर्वभुजो यथा ।।” अर्थात् “(साधारण मायाबद्ध प्राणियों के लिए विधान किया गया वैदिक वर्णाश्रम धर्म) धर्म का साहसपूर्ण अतिक्रमण करने पर भी ईश्वरस्वरूपों (भगवत्स्वरूपों/श्रीहरि के स्वांशों) की तेजस्विता (त्रिगुणात्मिका माया से सर्वदा असंस्पृष्टता या नित्यशुद्धबुद्धमुक्तस्वभाव होने के कारण) के कारण उन्हें कोई दोष नहीं लगता जैसे की सर्वभक्षी अग्नि को अशुभपदार्थों के भक्षण से कोई अपवित्रता नहीं लगती ।”

 

 

 

— Bhaktirasavedantapithadhishvara Gurupadacharya Svami of BRVF

 

 

URL – https://goo.gl/pn57eI

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