Shalivahana - 1st

Unearthing the True History of Emperor Śālivāhana Pramara (Only in Hindi) / सम्राट् शालिवाहन प्रमर के सत्य इतिहास का उद्घाटन

 

 

 

©Copyright इतिहासकार कुमारी सुश्री मनीषा अथवा मणिकर्णिका सिंह ‘आर्या क्षात्रकन्या’ (मेडता, राजपूताना/मरुधर/राजस्थान + कालिकाता, पश्चिम बङ्गाल/गौडदेश + बनारस हिन्दु विश्वविद्यालय, वाराणसी/काशी, पूर्वाञ्चल, आर्यावर्त्त, उत्तरप्रदेश, भारत) की कलम से लिखे गए ग्रन्थ विश्वविजेता सम्राट् शालिवाहन परमार का कुछ अंश यहाँ प्रस्तुत किया जा रहा है । इतिहासविदुषी मनीषा सिंह भक्तिरसवेदान्तप्रतिष्ठानम् के अध्यक्ष भक्तिरसवेदान्तपीठाधीश्वर गुरुपादाचार्य स्वामी श्री की अनुगृहीत शिष्या है ।

 

विदुषी की कलम से –

 

एक अनुरोध हैं कि इस निबन्ध को पढने के पश्चात् कृपया कुतर्क न करें क्योंकि मैं प्रमाण सहित लिखी हूँ और कुतर्क देना हैं तो राष्ट्रीय इतिहास मञ्च पर मुझसे वाद कर लीजियेगा । इतिहासपरक शास्त्रार्थ के लिए सादर आमन्त्रित हैं । परन्तु यदि कोई नेक जिज्ञासा उठती है मेरे इस निबन्ध के अध्ययन के पश्चात् तो अवश्य उसे यहाँ प्रस्तुत किया जा सकता है । मैं अपने विद्यार्थिनी वाले जीवन से व्यस्त समय निकाल कर उसका यथासम्भव उत्तर देने का प्रयास करुँगी श्रीगुरुचरणों की कृपा से ।

 

 

पश्चिमी इतिहासकारों की मूर्खता से रचे गये झूठे इतिहास से प्रमरवंशीय (परमारवंशीय) राजपूत सम्राट् शालिवाहन को इतिहास में जानबूझकर  ‘शक’ के रूप में घोषित किया । परमारवंशी राजा विक्रमादित्य प्रमर/परमार ने ८२ ई.पू. – १९ ईसा पश्चात् (82 B.C. – 19 A.D.) तक शासन किया एवं उन के प्रपौत्र शालिवाहन ७८-१३८ ईसा पश्चात् (78 A.D.- 138 A.D.) को शक से जोड़ कर परमारवंश का नाम उड़ा दिया । मूर्ख इतिहासकारों ने शालिवाहन को शक बना तो दिया, परन्तु, इतिहास में दर्ज किये ऐतिहासिक अभिलेखों को पढना भूल गये । शालिवाहन ने शकों की हत्या कर अपने परदादा विक्रमादित्य की तरह “शकारि” (शकों के शत्रु) कहलाये थे और ये बात उन पश्चिमी इतिहासकारों ने भी मानी हैं जो ये मानते हैं, किन्तु फिर भी इतिहास में शालिवाहन को शकवंशीय कहा हैं । उन्होंने यह भी कहा हैं कि शालिवाहन ‘शक अश्शूरों’ का नाश करके “शकारि” कहलाये थे (शकारि का अर्थ होता हैं शक को हरानेवाला) – ऐसा है पश्चिमी इतिहासकार का लिखा हुआ इतिहास जिन्हें खुद ही नहीं पता कि वास्तव में शालिवाहन थे कौन ।

 

अब प्रश्न ये हैं कि यदि शालिवाहन शक होते तो क्या वें अपने ही वंश का नाश कर देतें ? कई पश्चिमी इतिहासकार सताकरनी एवं सातवाहन को सम्मिलित कर खिचड़ी इतिहास बनाते हुए सम्राट् शालिवाहन परमार को शातकर्णी राजा बना देते हैं — जब कि ईसवी सन् ७८ (78 A.D.) में प्रपौत्र सम्राट् शालिवाहन ने शकों को हराया एवं शालिवाहन शक का प्रारम्भ किया । इन्होंने अश्वमेधयज्ञ भी किया और फारस/पारसीक/पर्शिया/ईरान तक सभी देशों को जीत लिया  । पर आंध्र सातवाहन के राजा मगध (बिहार, सीमाञ्चल, नेपाल – तलाई, बङ्गाल, झारखण्ड, मध्यदेश/मद्देश, छत्तीसगढ, मिथिला व पूर्वाञ्चल) के शासक थे जिन्होंने ईसा पूर्व ८३३ (833 B.C.) से ईसा पूर्व ३२७ (327 B.C.) तक शासन किया तथा उनकी राजधानी थी गिरिवज्र (राजगीर, बिहार) । तथा इनकी हिमालय से तो सेतुबन्ध तक (रामेश्वरम्, द्रविड/तमिलनाडु) प्रसिद्धि थी । लिखने को कुछ भी लिख दिए भारत के इतिहास को विकृत करने के उद्देश्य से ये पश्चिमी इतिहासकार, पर तथ्यहीन व प्रमाण के बिना — और इसी झूठ को अवैदिक नास्तिक तथाकथित धर्मनिरपेक्ष वामपंथियों/साम्यवादियों (atheistic anti-Hindu so-called secularist communists) ने प्रमाण बना लिया । अज्ञानमुण्ड पश्चिमी इतिहासकारों ने ऐसे इतिहास का निर्माण किया कि जिनमें सत्य को स्वीकार करने का साहस नहीं था । इतिहास का विरूपण कर भारत के महान् राजा विक्रमादित्य एवं शालिवाहन को उपेक्षित कर काल्पनिक घोषित कर दिया व इन युगनिर्माताओं के अस्तित्व पर प्रश्न खड़े कर दिये ।

 

ये तो असम्भव है कि पश्चिमी मूर्ख इतिहासकागण सम्राट् विक्रमादित्य और शालिवाहन के विषय में भविष्यमहापुराण में दिये गए उल्लेख से अनजान थे । उन्होंने ज्ञानसहित (जानबूझकर) क्षत्रिय-अग्निवंश के उन चार राजवंशों को उपेक्षित किया कि जिन्होंने ईसा पूर्व १०१ (101 B.C.) से  ईसा पश्चात् ११९३ (1193 A.D.) तक पूरे १३०० वर्षों तक शासन किया अर्थात् सम्राट् विक्रमादित्य से सम्राट् पृथ्विराज चौहान/चपहानि तक, परमार (पंवार) राजवंश की सूची से केवल भोजराज को इतिहास में लिया गया और इस युग (संवत् का आरम्भ करने वाले) का प्रारम्भ करने वाले सम्राट् विक्रमादित्य और सम्राट् शालिवाहन को मध्यवर्ती अवधी में (medieval era) इतिहास के पृष्ठों से हटा दिया गया । यहाँ तक कि सम्राट् विक्रमादित्य से पहले भी अग्निवंश के चार राजवंशों ने कलियुगाब्द २७१० (2710 Kaliyugābda) (ईसा पूर्व ३९२) (392 B.C.) से कलियुगाब्द ३००१ (3001 Kaliyugābda) (ईसा पूर्व १०१) (101 B.C.) तक अर्थात् २९१ (291 years) वर्षों तक शासन किया । ये जानबूझकर किया गया घपला आवश्यक था – सिकंदर/अलक्ष्येन्द्र यवन (Alexandar of Greece) को चन्द्रगुप्त मौर्य के समकालीन बनाने के लिए । चन्द्रगुप्त मौर्य और सिकंदर की समकालीनता अनुरूप हो सके इसलिए प्राचीन भारतीय इतिहास का कालक्रम महाभारत युद्ध (ईसा पूर्व ३१३८) (3138 B.C.) से तो गुप्त (चन्द्रवशी क्षत्रिय) राजवंश (ईसा पूर्व ३२७) (327 B.C.) के प्रारम्भ तक का समय — १२०७ वर्षों (1207 years) से संकुचित कर दिया गया अर्थात् १३०० (1300 years) वर्षों में केवल ९७ (97 years) वर्षों का हमें पढाया जाता है — वो भी विकृत कर के । चार अग्निवंश के राजवंशों को इतिहास के पृष्ठों से लुप्त कर दिया गया । यह आश्चर्य की बात है कि उन्होंने चार राजवंशों के राजाओं की सूची भी नहीं — दी हैं यहाँ तक कि विक्रमादित्य एवं शालिवाहन – इन दोनों का उल्लेख भी नहीं किया है । इसके अतिरिक्त इन पश्चिमी मूर्ख इतिहासकारों ने अपने इतिहास में विक्रमादित्य और शालिवाहन को पौराणिक गप्प/किंवदन्ती की श्रेणी में रखा है — यह एक खेदपूर्ण तथ्य है कि काले अंग्रेजों (पश्चिमी विचारों से प्रभावित बदामी भारतीयों ने) ने अपने नमक का ऋण चुकाते हुए अपने गोरे अंग्रेज़ स्वामियों के प्रति अपनी नेकता दिखाई एवं स्वर्णिम इतिहास को कभी सामने नहीं आने दिया । अब समय आ गया हैं कि इतिहास का पुनर्लेखन किया जाए । पुराणों में लिखा गया सत्य इतिहास सब के समक्ष प्रस्तुत कर झूठ की पट्टी बांधे लोगों के आँखों से पट्टी उतारकर सत्य की प्रकाशमयी किरणों को उन तक पहुँचने दिया जाये ।

 

सम्राट् शालिवाहन परमार कौन थे ? परमार सम्राट् विक्रमादित्य के ५९ वर्षों के पश्चात् सम्राट् शालिवाहन परमार का राज्याभिषेक ७८ ईसा पश्चात् (78 A.D.) में हुआ था एवं वें सम्राट् विक्रमादित्य परमार के प्रपौत्र थे । अम्बावती (वर्त्तमान् उज्जैन/उज्जयिनी/अवन्तिका) के राजा सम्राट् शालिवाहन परमार ७८ ईसा पश्चात् (78 A.D.) में राजगद्दी पर आसीन हुए । युगप्रतिष्ठापक शालिवाहन – ने अपनी राजधानी को धार सेलरा मोलेरा पहाडीयों पर स्थापित किया एवं भारतवर्ष के सम्पूर्ण भूमंडल पर अपना आधिपत्य स्थापित किया हिमालय से लेकर कन्याकुमारी तक व अपने परदादा सम्राट् विक्रमादित्य जैसे शूरवीर द्वितीय विश्वविजेता बने शालिवाहन परमार ।
(The Panwar/Paramāra dynasty in which Vikramāditya and Śālivāhana were born was the most important of the four Agnivaṁśas. Vikramāditya and Śālivāhana conquered the whole Bhārata from Himālayas to Cape Comorin/Kanyākumārī — became emperors and established eras under their names. Śālivāhana, also, performed the Aśvamedha sacrifice.  — Prof. Dr. Sarvapalli Radhakrishnan)

 

सम्राट् शालिवाहन परमार ने राजगद्दी पर आसीन होते ही कलियुगाब्द वर्ष ३१७९ (3179 of the Kaliyugābda era ) अर्थात् ७८ ईसा पश्चात् (78 A.D.) में विशाल सेना के साथ शक अश्शूरों पर आक्रमण कर आर्यावर्त के टुकड़े कर बनाये गये अवैदिक  मलेच्छस्थानों को ध्वस्त कर आर्यावर्त को मलेच्छ-मुक्त करके शुद्ध करने के लिए शक, चीन, तार्तर (तार्तर — अश्शूरों का बृहत्तम भूभाग राज्य था जहाँ शक अश्शूरों का आधिपत्य था । इस भूभाग के टुकड़े होकर वर्त्तमान् में कई देश बने जैसे कि रूस, उज़्बेकिस्तान, युक्रेन, क़ज़ाख़स्तान, यूरेशिया , तुर्क, तुर्कमेनिस्तान ,किर्ग़िज़स्तान, बुल्गारिया व रोमानिया इत्यादि अन्य १८ देशों को मिला कर तार्तर/तैत्तिररि राज्य बना था), रोम, खोरासन/खुरज (ईरान में), बाह्लीक (उत्तरी अफ़गानिस्तान) — इन सब म्लेच्छदेशों एवं अनार्य-राज्यों पर आक्रमण कर दिया जिसमें कि ९२ करोड़ से अधिक शक एवं अश्शूरों का संहार किया एवं अश्शूरों/शकों को न केवल दण्डित कर सम्पूर्ण आर्यावर्त से खदेड़ा, अपितु अश्शूरों द्वारा लुटे गये प्रजाधन को भी वापस लाये एवं खण्डित किये गये आर्यावर्त को फिर से अखंड किया । राज्य की सीमाओं पर करोड़ो सैन्यबल से घेड़ा किया गया जिससे मलेच्छ — आर्यावर्त की सीमा लांघ कर आक्रमण ना कर पायें एवं आर्यावर्त्त की सीमा को मनुस्मृति आदि शास्त्रों में वर्णित रूप से सिन्धुनदी के पूर्व में स्थापित करते हुए म्लेच्छदेशों की सीमा को सिन्धुनदी के पश्चिम में स्थापित किया । (Reference taken from Bhaviṣyapurāṇam 3.3.2.17th-21st verses.) दिग्विजय के पश्चात सम्राट् शालिवाहन परमार ने सम्पूर्ण प्रजा को ऋणमुक्त कर कलियुग में सत्ययुग की स्थापना की  । विक्रमसंवत् के पश्चात् शालिवाहन संवत् का आरंभ हुआ ।

 

परमार/प्रमर राजवंश की सूची देखते हैं परमार-राजाओं के शासनकाल सहित । Name Of The Kings Regnals in B.C.E Years —

 

१) परमार ३९२-३८६ ईसा पूर्व 392-386 B.C.

 

२) महामार ३८६-३८३ ईसा पूर्व 386-383 B.C.

 

३) देवापि ३८३-३८० ईसा पूर्व 383-380 B.C.

 

४) देवदत्त ३८०-३७७ ईसा पूर्व 380-377 B.C.

 

५) Defeated by Śakas. Left Ujjain and had gone to Śrī-śailam. Inefficient and nameless kings. Their names are not mentioned in the Purāṇas. Their period was from 375-182 B.C. (३७५-१८२ ईसा पूर्व) for 193 years in between.

 

६) गन्धर्वसेन ने पहली बार शकों को पराजित कर अम्बावती (उज्जैन) को मुक्त करवाया एवं ५० वर्ष तक शासन किया; १८२-१३२ ईसा पूर्व — 182-132 B.C.

 

७) सम्राट् गन्धर्वसेन अपने ज्येष्ठ पुत्र शंखराज को राजपाठ सौंप कर सन्यास लेकर तप करने चले गये थे । शंखराज ने ३० वर्षों तक शासन किया १३२-१०२ (132-102 B.C.) ईस्वी पूर्व तक । शंखराज की अकालमृत्यु होने के पश्चात् महाराज गन्धर्वसेन को राज्य की सुरक्षा के लिए तप छोड़कर फिर से राजपाठ संभालना पड़ा व १०२-८२ (102-82 B.C) ईस्वी पूर्व तक शासन किये । गंधर्वसेन परमार ने अपने पुत्र सम्राट् भर्तृहरि को (जो कि विक्रमादित्य से बडे थे) शासन सौंपा तथा तपस्या के लिये चले गये । इधर भर्तृहरि ने अपनी रानी पिङ्गला को अश्वशालाध्यक्ष के प्रति आसक्त देखा कर संसार से वैराग्ययुक्त होकर सिद्ध गोरक्षनाथ को गुरुरूप में अङ्गीकार कर अपने अनुज विक्रमादित्य को ८२ (sometime after 82 B.C.) ईस्वी पूर्व के कुछ काल पश्चात् राजपाठ सौंपकर सन्यास ले लिए एवं तपस्या करने चले गये ।

 

८) सम्राट् विक्रमादित्य ने १०० वर्षों तक शासन किया था सम्पूर्ण विश्व पर — ८२ ईस्वी पूर्व से कुछ काल पश्चात् से लेकर १९  ईस्वी पश्चात् तक (sometime from 82 B.C. onward to 19 AD).

 

९) सम्राट् देवभक्त १९-२९ ईस्वी पश्चात् (19-29 A.D.) तक मात्र १० वर्ष तक शासन किये थे ।

 

१०) Nameless king(s) (names not given in the Purāṇas) who ruled for 49 years in between from 29 to 78 A.D. (२९ से ७८ ईसा पश्चात्).

 

११) शालिवाहन ६० वर्षों तक शासन किये थे ७८-१३८ (78-138 A.D.) ईस्वी पश्चात् तक ।

 

१२-२०) शालिहोत्र, शालिवर्धन, सुहोत्र, हाविहोत्र, इन्द्रपाल, मलयावन, शम्भुदत्त, भौमराज व वत्सराज — इन सभी राजाओं ने कुल मिलाकर ५० वर्षों तक १३८-६३८ ईस्वी (138-638 A.D) पश्चात् तक शासन किया था ।

 

२१) भोजराज ५६ वर्षोंतक शासन किये थे ६३८-६९३/९४ (638-693/94 A.D.) ईस्वी पश्चात् तक ।

 

२२-२८) शम्भुदत्त, बिन्दुपाल, राजपाल, माहिनार, सोमवर्मा, कामवर्मा, भूमिपाल (वीरसिंह) आदियों ने ३०० वर्षों तक शासन किया था ६९३-९९३/९४ (693-993/94 A.D.) ईसा पश्चात् तक ।

 

२९-३०) रङ्गपाल व कल्पसिंह २०० वर्षों तक शासन किये थे ९९३-११९३/९४ (993-1193/94 A.D.) ईस्वी पश्चात् तक ।

 

३२) गंगासिंह (King Gaṅgā Siṁha reigned from 1113 to 1193 A.D. In the battle of Kurukṣetra, the 90 year-aged Gaṅgā Siṁha died on the field along with Prīthvīrāja Chapahāni/Chauhan etc. (see Agnivaṁśa Kings’ section in Bhaviṣya-purāṇam).

 

परमार/प्रमर- राजवंश के अन्तिम राजा थे गंगा सिंह परमार । शालिवाहन परमार द्वारा किये गए युद्ध अभियानों की के विषय में अगले भाग में बताऊँगी ।

 

जय क्षात्र-धर्म ! 🚩🚩 जय एकलिंग जी 🙏🙏🚩🚩 श्रीकृष्णो जयति !

 

 

 

(URL — https://goo.gl/ipWimG)

 

— Message prepared by Deputy Administrator (of BRVF WhatsApp groups) Kumārī Maṇikarṇikā/Manīṣā Siṁha Bāī Sā Jī ‘Ārya Kṣātra-kanyā’ (Mewar & Medta, Rajputana/Rajasthan/Marūdhara & Kolkata/Kalikata, West Bengal/Gauḍadeśa/Paścima Baṅga, Eastern Bhārata) & directly, permitted by Gurupādācārya Svami Jī of BRVF.

 

 

 

 

 

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