Radha-krsna in Vallabha style

त्रिविधा अलौकिकी शृङ्गार-रति की परिभाषाओं व दृष्टान्तों के उपर विवेचन + माधुर्य एवं ऐश्वर्य की परिभाषा + पञ्चमुख्यभक्तिरसों में शृङ्गार का श्रेष्ठत्व / Elucidation on the definitions and examples of the triple divinely aesthetic erotic rati + the definitions of Mādhurya & Aiśvarya + the pre-eminence of Śṛṅgāra among all the five primary mellows of devotion (Only the first part is in Sanskrit, English & Hindi; 2nd & 3rd parts are in Hindi & Sanskrit only)

 

 

 

१/1) आद्यभक्तिरसप्रस्थानप्रतिष्ठापकाचार्य श्रील रूपगोस्वामिपाद ने श्रीउज्ज्वलनीलमणि: १४.४३-५८ में (स्थायिभावप्रकरणम्) अलौकिक शृङ्गार की त्रिविधा रतियों का उल्लेख इस प्रकार से करते हुए उन्हें परिभाषित व श्रीमद्भागवतीय पद्यों से दृष्टान्तित किया है (यहाँ केवल उज्ज्वलनीलमणि: से मूल अंश को उद्धृत किया गया है – उस पर संस्कृत में प्रणीत गौडीयवैष्णवाचार्य श्रील जीवगोस्वामिपाद + श्री विश्वनाथ चक्रवर्त्तिपाद आदि की लोचनरोचनी व आनन्दचन्द्रिका टीकाओं को एवं श्रील विष्णुदासगोस्वामि की संस्कृत टीका को सम्मिलित नहीं किया गया है ।) / Ādya-bhakti-rasa-prasthāna-pratiṣṭhāpakācārya Śrīla Rūpa Gosvāmipāda has enumerated, defined and exemplified the triple rati(s) of divine aesthetics in Ujjvala-nīlamaṇiḥ 14.43-58 (Sthāyi-bhāva-prakaraṇam – the below portion contains, only, the originals of the Ujjvala-nīlamaṇīḥ and not the Locana-rocanī and Ānanda-candrikā Sanskrit commentaries by Gauḍīya-vaiṣṇavācāryas Śrī Jīva Gosvāmipāda and Śrī Viśvanātha Cakravarttī and neither the Sanskrit commentary by Śrī Viṣṇudāsa Gosvāmī) –

 

 

कारिका: / kārikāḥ

साधारणी निगदिता समञ्जसाऽसौ समर्था च । कुब्जादिषु महिषीषु च गोकुलदेवीषु च क्रमतः ॥ / sādhāraṇī nigaditā samañjasā ‘sau samarthā ca / kubjādiṣu mahiṣīṣu ca gokula-devīṣu ca kramataḥ //  

मणिवच्चिन्तामणिवत्कौस्तुभमणिवत्त्रिधाऽभिमता । नातिसुलभेयमभित: सुदुर्लभा स्यादनन्यलभ्या च ॥/ maṇi-vac cintā-maṇi-vat kaustubha-maṇi-vat tridhā ‘bhimatā / nāti-sulabheyam abhitaḥ sudurlabhā syād ananya-labhyā ca //

 

(कारिकाएँ — अलौकिकी शृङ्गार-रति-आविर्भाव के प्रकार का दिग्दर्शन करा कर इस रति का तारतम्यपूर्ण भेद दिखला रहे हैं । साधारणी, समञ्जसा और समर्था – ये तीन प्रकार की भगवद्रति/भक्ति-रति होती है । साधारणीरति – कुब्जादि में मणि की भाँति दुष्प्राप्या और समञ्जसारति – रुक्मिणी आदि महिषियों में चिन्तामणि की भाँति अत्यन्त दुष्प्राप्या और समर्थारति गोकुलदेवीयों/व्रजगोपीयों में कौस्तुभमणि के सदृश अनन्यलभ्या होती है – यहाँ तक कि वैकुण्ठ की महालक्ष्मी के द्वारा भी अलभ्या है जो कि प्रमाणित है श्रीमद्भागवतम् १०.४७.६० में यथा – “नाऽयं श्रियोऽङ्ग उ नितान्तरतेः प्रसाद:…”  । / Author’s propositions —  Three kinds of divinely aesthetic/erotic sthāyi-bhāva  are manifested among Kubjā, the queens at Dvārakā, and the goddesses of Gokula – Vraja-gopīs, respectively. These three kinds of sthāyi-bhāva viz., Sādhāraṇī, Samañjasā & Samarthā – are like a jewel, a cintāmaṇi/touchstone jewel, and a Kaustubha jewel, respectively. The first is not easy to attain; the second is very difficult to attain, and the third may be attained, only, by the Vraja-gopīs and no one else – not even by Mahālakṣmī of Vaikuṇṭha as verified in Śrīmad-bhāgavatam 10.47.60 – “nā ‘ayaṁ śriyo ‘aṅga u nitānta-rateḥ prasādaḥ…”.)

 

 

कारिका — तत्र साधारणी / kārikā —  tatra sādhāraṇī

नातिसान्द्रा हरेः प्रायः साक्षाद्दर्शनसम्भवा । सम्भोगेच्छानिदानेयं रतिः साधारणी मता ॥ / nāti-sāndrā hareḥ prāyaḥ sākṣād-darśana-sambhavā / sambhogecchā-nidāneyaṁ ratiḥ sādhāraṇī matā //

 

(कारिका — अब साधारणीरति व्याख्यायिता होगी । जो रति अत्यन्त गाढी नहीं होती, श्रीकृष्ण के दर्शन करने पर ही आविर्भूत होती है और उसमें सम्भोग की इच्छा ही आदिकारण होती है, उसे साधारणीरति कहते हैं । Author’s statement — Now the Sādhāraṇī-rati shall be elucidated upon. Sādhāraṇī love for Kṛṣṇa is, generally, not very intense. It is inspired by, directly, beholding Śrī Kṛṣṇa and it is aroused by the desire to have a physically erotic communion with Him.)

 

यथा श्रीमद्भागवतस्य दशमस्कन्धे (१०.४८.९) / yathā śrīmad-bhāgavatasya daśama-skandhe (10.48.9) –

सहोष्यतामिह प्रेष्ठ दिनानि कतिचिन्मया । रमस्व नोत्सहे त्यक्तुं सङ्गं तेऽम्बुरुहेक्षण ॥ / sahoṣyatām iha preṣṭha dināni kati-cin mayā / ramasva notsahe tyaktuṁ saṅgaṁ te ‘amburuhekṣaṇa //

 

(जैसे के श्रीमद्भागवतम् १०.४८.९ में कथित है – कुब्जा के घर में उपस्थित हो कर उस के सहित विहार के अन्त में अपने घर प्रत्यावर्त्तन करने के इच्छा करने वाले श्रीकृष्ण से कुब्जा ने प्रार्थना कि – “हे प्राणनाथ ! मेरे साथ यहाँ कुछ दिनों तक निवास करो । क्रीडा करो । हे पद्मलोचन ! तुम्हारे सङ्ग का त्याग करने की इच्छा नहीं होती ।“ / As it is narrated in Śrīmad-bhāgavatam 10.48.9 – Kubjā addressed Śrī Kṛṣṇa Who was desiring to return to His home after sporting with Her at her quarters – “My dear friend, kindly remain with me here, at least, for few days. Enjoy with me, O Lotus-like eyed friend! I cannot desire to leave you, immediately. Please grant my request.”)

 

कारिके / kārike

असान्द्रत्वाद्रतेरस्या: सम्भोगेच्छा विभिद्यते । एतस्या ह्रासतो ह्रासस्तद्धेतुत्वाद्रतेरपि ॥ / a-sāndratvād rater asyāḥ sambhogecchā vibhidyate / etasyā hrāsato hrāsas tad dhetutvād rater api //

 

(कारिका – साधारणीरति में रति की गाढता के अभाव में पृथक् रूप से सम्भोग की इच्छा देखी जा रही है । सम्भोगेच्छा के ह्रास होने पर रति का भी ह्रास हो जाता है । क्योंकि इस साधारणीरति में सम्भोग की इच्छा ही तो श्रीकृष्ण के प्रति रति के उत्पन्न होने का हेतु है । / Author’s assertion – In Sādhāraṇī-rati, due to lack of intensity, a separate desire to hold a physically erotic communion with the lover is perceived. When the desire of erotic communion fades away, this rati (love), too, dwindles. This is do because, in this Sādhāraṇī-rati, the desire of erotic communion is the sole impetus cause for the rati (love) to be manifest.)

 

कारिका — अथ समञ्जसा / kārikā — atha samañjasā

पत्नीभावाभिमानात्मा गुणादिश्रवणादिजा । क्वचिद्भेदितसम्भोगतृष्णा सान्द्रा समञ्जसा ॥ / patnī-bhāvābhimānātmā guṇādi-śravaṇādijā / kvacid-bhedita-sambhoga-tṛṣṇā sāndrā samañjasā //

 

(कारिकावचन – अब समञ्जसा व्याख्यायिता होगी । ‘मैं इनकी पत्नी हूँ, ये हमारे पति हैं ।‘ अपने विषय में आरोपित यह सम्बन्धविशेषरूप अभिमान ही इसका स्वरूप है । रूप, गुण, चरित्र और कीर्त्तिसमूह के श्रवण से ही इसका उद्भव होता है । कभी कभी सुरतलालसा जिसमें पृथक् रूप में प्रतीतिगम्या होती है एवं यः रति कभी कभार ही अन्य कारणों से बाधित होती है । यह रति निश्चल, निबिड व प्रगाढ होती है, उसी को समञ्जसारति कहते हैं । / Author’s proposition – Now, Samañjasā shall be explained. ‘I am His wife; He is my husband’ – Such self-imposed egoistic perception in a specific relation to Kṛṣṇa as His wedded spouse is the very identity of this rati. This rati is manifest by the stimulants like hearing about the countenance, attributes, deeds and glory of Bhagavān. On occasions, the desire of erotic communion is perceived, distinctly, in this rati. The thirstful love in this rati  is very stable, condensed and profound and is only, slightly, weakened by other factors at rare.)

 

यथा तत्रैव श्रीमद्भागवते दशमे (१०.५२.३८) / yathā tatraiva śrīmad-bhāgavate daśame (10.52.38) –

का त्वा मुकुन्द महती कुलशीलरूपविद्यावयोद्रविणधामभिरात्मतुल्यम् । धीरा पतिं कुलवती न वृणीत कन्या काले नृसिंह नरलोकमनोभिरामम् ॥ / kā tvā mukunda mahatī kula-śīla-rūpa-vidyā-vayo-draviṇa-dhāmabhir ātma-tulyam / dhīrā patiṁ kula-vatī na vṛṇīta kanyā kale nṛsiṁha nara-loka-manobhirāmam //

 

(जैसे के श्रीमद्भागवतम् १०.५२.३८ में कथित है – रुक्मिणीदेवी ब्राह्मण के द्वारा प्रेमपत्र भेज रही हैं – “हे मुकुन्द ! हे पुरुषसिंह ! अपने विवाह के समय कौन कुलवती, सुशीलवती, परमोदार और बुद्धिमती कन्या होगी, जो कुल, गुण, रूप, शील, विद्या, वयस्, धनसम्पत्ति तथा प्रभाव-प्रतिपत्ति में अनुपम एवं जीवमात्र के मनोभिरमणीय तुम को पति के रूप में वरण करने की इच्छा नहीं करेगी ?” / As it is described in Śrīmad-bhāgavatam 10.52.38 – Queen Rukmiṇī is dispatching the love-letter through a Brāhmaṇa – “O Mukunda ! You delight the heart of all people. No one is Your equal in noble birth, gentle nature, good character, handsomeness, knowledge, youthful vigour, wealth and might. O lion among men! Which intelligent, sober and noble girl would not want to choose You as her husband?”)

 

कारिका / kārikā

समञ्जसात: सम्भोगस्पृहाया भिन्नता यदा । तदा तदुत्थितैर्भावैर्वश्यता दुष्करा हरे: ॥ / samañjasātaḥ sambhoga-spṛhāyā bhinnatā yadā / tadā tad utthitair bhāvair vaśyatā duṣkarā hareḥ //

 

(समञ्जसारति से सम्भोगेच्छा की पृथकता को दिखला रहे हैं – समञ्जसारति से सम्भोग की इच्छा जब पृथक् रूप में प्रतीत होती है, तब उस सम्भोगेच्छा से उत्पन्न हाव, भाव, हेलादि के द्वारा अथवा स्वाभियोग-प्रकाश के द्वारा श्रीहरि को अंशत: वशीभूत करना दुस्साध्य होता है । / The distinction between the erotic desire of communion and Samañjasā-rati is described. When the desire of erotic communion or sambhogecchā is felt separate from the love of Samañjasā-rati, then the exhibition of feminine characteristics by smiling and moving eyebrows etc. can, partially, subjugate Śrī Hari, only, with great difficulty.)

 

तथाहि तत्रैव श्रीमद्भागवते दशमे (१०.६१.४) / tathāhi tatraiva śrīmad-bhāgavate daśame (10.61.4) –

स्मायावलोकलवदर्शितभावहारिभ्रूमण्डलप्रहित सौरतमन्त्रशौण्डै: । पत्न्यस्तु षोडशसहस्रमनङ्गबाणैर्यस्येन्द्रियं विमथितुं करणैर्न शेकु: ॥ / smāyāvaloka-lava-darśita-bhāva-hāri-bhrū-maṇḍala-prahita saurata-mantra-śāuṇḍāiḥ / patnyastu ṣoḍaśa-sahasram anaṅga-bāṇāir yasyendriyaṁ vimathituṁ karaṇair na śekuḥ //

 

(जैसे कि श्रीमद्भागवतम् १०.६१.४ में प्रमाणित है – श्रीशुकदेव महामुनि कह रहे हैं – सोलह हजार महिषियाँ गूढस्मितयुक्त और चकित दर्शन के द्वारा ज्ञापित अपने स्वाभिप्रायसूचक मनोहर कटाक्ष के द्वारा मनोवाञ्छित सुरतविषय की रहस्ययुक्ति-सुनिपुण अनङ्ग/काम-बाणों के द्वारा एवं कामशास्त्र में प्रसिद्ध कान्तवशीकरण-उपायस्वरूप हाव, भावादि के प्रकाश द्वारा भी श्रीकृष्ण को वशीभूत करने में समर्थ नहीं हो सकीं । / As it is described in Śrīmad-bhāgavatam 10.61.4 – Mahāmuni Śukadeva asserts – The sixteen thousand queens of Dvārakā used to exhibit their feminine charms by displaying an array of smiles conveying deep indications, by short-timed side-long glances and making their eyebrows dance, thus thrusting sharpened arrows of erotic love of Cupid just to stimulate Kṛṣṇa’s desire of physical communion with them. Still, they could not arouse the mind of Kṛṣṇa for such an erotic communion.)

 

कारिके – अथ समर्था – / kārike – atha samarthā —

कञ्चिद्विशेषमायान्त्या सम्भोगेच्छा यथाऽभित: । रत्या तादात्म्यमापन्ना सा समर्थेति भण्यते ॥ / kañcid-viśeṣam āyāntyā sambhogecchā yathā ‘bhitaḥ / ratyā tādātmyam āpannā sā samartheti bhaṇyate //

स्वस्वरूपाद्तदीयाद्वा जातो यत्किञ्चिदन्वयात् । समर्था सर्वविस्मारिगन्धा सान्द्रतमा मता ॥ / sva-svarūpād tadīyād vā jāto yat-kiñcid anvayāt / samarthā sarva-vismāri-gandhā sāndra-tamā matā //

 

(कारिकाएँ – अब समर्थारति व्याख्यायिता होगी – स्व-स्वरूपोत्थ होने के कारण साधारणी और समञ्जसारतियों से भी अनिर्वचनीय वैशिष्ट्ययुक्त अर्थात् श्रीकृष्ण को वशीभूत करने वाली दो रतियों के सहित, सम्भोगेच्छा का सर्वथा अपने अन्दर तादात्म्य कर लेती है, जो ललनानिष्ठ-स्वरूप से अथवा ‘श्रीकृष्णनिष्ठस्वरूप’ शब्द आदि में से किसी भी एक के प्रति यत्सामान्य (नाममात्र) सम्बन्ध लाभ करके ही आविर्भूत होती है, जिसके उदय की गन्धमात्र से ही कुलधर्म, धैर्य, लज्जादि सभी विघ्नबाधाएँ विस्मृत हो जाती हैं, व जो अन्त्यन्त घनीभूता होती है, अर्थात् उसमें अन्य कोई भी भाव प्रवेश नहीं कर पाते, उसी को रसशास्त्र में समर्थारति कहते हैं । अर्थात् साधारणी और समञ्जसा से भी कुछ विशेष सम्भोगेच्छा जिस रति में तादात्म्यप्राप्त करती है, अर्थात् नायक-नायिका में ऐक्यभाव को प्राप्त करा देती है, उसी का नाम समर्था है । / The propositions made by the author – Now, Samarthā-rati shall be expounded upon. Due to the emergence from its own self-identity, that which is endowed with indescribable peculiarity in contrast to the Sādhāraṇi and Samañjasā-rati(s) and that which submerges within itself the Sādhāraṇī + Samañjasā-rati(s) along with their sambhogecchā, and that which is stimulated/manifested by even the nominal connection with either the lalanā-niṣṭha-svarūpa or the śrī-kṛṣṇa-niṣṭha-svarūpa – is known as Samarthā-rati. In its slightest manifestation, all obstructions like the kula-dharma, dhairya/patience befitting a chaste woman, and lajjā/shyness befitting a chaste woman etc. are all forgotten, and that which is, highly, condensed/in it, no other extraneous emotions can peep – such is known as Samarthā-rati in the bhakti-rasa-darśanam. A peculiar type of sambhogecchā not even present with the former two ratis viz., Sādhāraṇī and Samañjasā – unites with the Samarthā and thus, produces one-ness between the hero/nayaka and the heroine/nāyikā.)

 

यथा / yathā

प्रेक्ष्याशेषे जगति मधुरां स्वां वधूं शङ्कया ते तस्या: पार्श्वे गुरुभिरभितस्त्वत्प्रसङ्गो न्यवारि । श्रुत्वा दूरे तदपि भवत: सा तुलाकोटिनादं हा कृष्णेत्यश्रुतचरमपि व्याहरन्त्युन्मदासीत् ॥ / prekṣyāśeṣe jagati madhurāṁ svāṁ vadhūṁ śaṇkayā te tasyāḥ pārśve gurubhir abhitas tvat-prasaṅgo nyavāri / śrutvā dūre tad api bhavataḥ sā tulā-koṭi-nādaṁ hā kṛṣṇety aśruta-caram api vyāharanty unmadāsīt //

 

(जैसे कि कहा गया है – कोई नयी नवेली व्रजसुन्दरी अदृष्टचर, अश्रुतचर श्रीकृष्ण की नूपुरध्वनि को दूर से सुनते ही उन्मादिनी हो गयी । वृन्दासखी श्रीकृष्ण के समीप उसके वृतान्त को निवेदन कर रही है – “हे कृष्ण ! सास-ससुरादि गुरुजनों ने अपनी वधू को निखिल व्रजमण्डल में परमा सुन्दरी देख कर तुम्हारे भय से चारों ओर तुम्हारे सम्बन्ध में किसी को भी कुछ कहने के लिये निषेध किया । तथापि दूर से तुम्हारे अदृष्टचर एवं अश्रुतचर नूपुरों कि ध्वनि को सुन कर यह कुलवधू ‘हा कृष्ण’ कह कर उन्मत्त हो उठी ।“ – उक्त उदाहरण में ‘अदृष्टचर और अश्रुतचर होने पर भी तुम्हारी नूपुरध्वनि को सुन कर’ – इन पदों के द्वारा यहाँ किञ्चिन्मात्र सम्बन्ध को ही सूचित किया गया है  । श्रीकृष्ण के सहित परिचय ललनानिष्ठस्वरूप (व्रजगोपी का श्रीकृष्ण से विशिष्टसम्बन्ध का प्रतिपादक स्वरूप) हेतु सम्पन्न हुआ और गुरु-गौरव-विस्मरणपूर्वक उन्मादग्रस्त होने से रति की गाढता भी सूचिता हुई । / As it has been expressed – Some newly arrived young married Gopī in Vṛndāvanam was intoxicated upon hearing the tinkling music of the ankle-bells of Kṛṣṇa from a far distance especially, when such sound was never heard or felt by her any time prior. Sakhī Vṛnḍā is narrating the account of this Gopī towards Kṛṣṇa – “Considering the arrival of their most beautiful daughter-in-law, the elders of her husband’s family did not disclose any information about You to her and barred other kith and kin from doing so, as well, upon their mere apprehension caused due to the effects of the supposed attraction for You – lest she might become enamoured by it. Nevertheless, upon unprecedentedly, hearing your ankle-bell’s tinkling from far, this Gopī turned into a madwoman and started shouting in fervour – ‘O Kṛṣna! O Kṛṣna!’.” – In this example, the phrase – ‘upon hearing such sound which was never heard or felt by her any time prior’ – denotes the nominal relation with the ‘lalanā-niṣṭha-svarūpa’ (identity of a Vraja-gopī which ascertains a peculiar relation of Her with Kṛṣna) and the familiar acquaintance of her with Kṛṣṇa was caused by the emergence of this ‘lalanā-niṣṭha-svarūpa’; while, the intoxicated state of her coupled with her total forgetfulness of the prestigious relation which she has with her husband’s parents – all indicate the condensed nature of the Samarthā-rati.)

 

कारिका: / kārikāḥ

सर्वाद्भुतविलासोर्मिचमत्कारकरश्रिय: । सम्भोगेच्छा विशेषोऽस्या रतेर्जातु न भिद्यते । इत्यस्यां कृष्णसौख्यार्थमेव केवलमुद्यम: ॥ / sarvādbhūta-vilāsormi-camatkāra-kara-śriyaḥ / sambhogecchā viśeṣo ‘syā rater jātu na bhidyate / ity asyāṁ kṛṣṇa-saukhyārtham eva kevalam udyamaḥ //

पूर्वस्यां स्वसुखायापि कदाचित्तत्र सम्भवेत् ॥ / pūrvasyāṁ sva-sukhāyāpi kadācit tatra saṁbhavet //

इयमेव रतिः प्रौढा महाभावदशां व्रजेत् । या मृग्या स्याद्विमुक्तानां भक्तानाञ्च वरीयसाम् ॥ / iyam eva ratiḥ prauḍhā mahā-bhāva-daśāṁ vrajet / yā mṛgyā syād vi-muktānāṁ bhaktānāñ ca varīyasām //

 

(कारिकावचनसमूह – यहाँ जिज्ञासा है – समर्थारति के भीतर हृदय में सम्भोग की इच्छा रहती ही है । फिर भी समञ्जसारति से इसका पार्थक्य क्या है ? इसके समाधान के लिये कह रहे हैं – रति के साथ सब प्रकार से तादात्म्य होने के कारण समर्थारति से यह विशिष्टा सम्भोगेच्छा कभी भी अलग नहीं होती । इस रति में पृथक् रूप से सम्भोग की इच्छा कभी नहीं रहती । क्योंकि समर्थारति वह है जो सर्वापेक्षा अद्भुत, श्रीकृष्ण को वशीभूत करने वाली होने के कारण आश्चर्यजनक, लीलातिशय के द्वारा महाविस्मयोत्पादनकारिणी शोभा-विशिष्टा होती है । इसीलिये समर्थारति में कायमनोवाक्य से निष्पन्न समस्त व्यापार ही श्रीकृष्ण के सुख के लिये अनुष्ठित हुआ करता है । इसमें अपनी सुखेच्छा की लेशमात्र गन्ध भी नहीं होती, अर्थात् सर्वापेक्षा अद्भुत, श्रीकृष्णवशीकारित्व के रूप में विस्मय को प्रकाश करने वाली जो विलास लहरी है एवं उसके द्वारा जिसकी चमत्कारकारिणी श्री/शोभा है, वह रति कभी भी सम्भोगेच्छा विशेष से पृथक् नहीं होती — पृथक् भाव से उसकी प्रतीति भी गोचर नहीं होती । इसलिये उल्लिखिता रति में केवल श्रीकृष्णसुख के लिये ही सभी उद्यम होते हैं । समञ्जसारति में पृथक् रूप में कभी कभी निजसुख के लिये सम्भोगेच्छारूप उद्यम देखा जाता है, क्योंकि उसमें पत्नी का अभिमान सदासर्वदा व्याप्त रहता है । किन्तु समर्थारति में वह कहीं नहीं है । अधिकन्तु समर्थारति ही प्रौढावस्था को प्राप्त कर महाभाव-दशा को प्राप्त करती है । इसलिये विमुक्तगुण और प्रधान प्रधान भक्तजन इस समर्थारति का ही अन्वेषण करते हैं, किन्तु प्राप्त नहीं कर पाते । / Propositions by the author – Query – In Samarthā-rati, ‘sambhogecchā’  or the desire of erotic communion remains within the heart of a Gopī. If so, what it the tangible difference prevailing between Samarthā-rati and Samañjasā-rati? Following explanation is given to answer this query – Despite whole unification with Samarthā-rati, this peculiar type of ‘sambhogecchā’ never separates from it/Samarthā-rati. In this Samarthā-rati, sambhogecchā never remains, essentially, separate. Because this Samarthā-rati is as such that it is most astonishing of all ratis due to it, fully, subjugating Kṛṣṇa and thus it is, greatly, endowed with beatific lustre characterised as the cause of great astonishment felt through the agency of the bliss-condensed pastimes. Hence, all endeavours initiated through the oral, physical and mental faculties in this Samarthā-rati do, solely, target the satisfaction of Śrī Kṛṣṇa. In it, there is not a scent of a Gopī’s desire for her own pleasure. This means that Samarthā-rati displayed as a sporty wave and which is most eminent of all ratis and which spreads wonder by, thoroughly, captivating/subjugating Kṛṣṇa, thereby, which is, miraculously, resplendent – such Samarthā-rati is never separate from that peculiar grade of sambhogecchā and thus, such rati is never perceived as a distinct emotion from such peculiar sambhogecchā. Therefore, in this described rati, all efforts strive, only, for the content of Kṛṣṇa. However, at times, in Samañjasā-rati there is marked a distinct endeavour aiming at one’s own pleasure because, such Samañjasā-rati is, always, pervaded by the egoistic feeling of the marital relation/of being a wedded wife. But, such egoistic mood of being a marital spouse is found nowhere within Samarthā-rati. Additionally, this Samarthā-rati manifests itself into the stage of Mahābhāva. For this reason, herds of liberated figures and the primary devotees – all yearn to obtain this rati, but with fail.)

 

श्रीमद्भागवते यथा श्रीदशमे श्रीमदुद्धवोक्तौ (१०.४७.५८) / śrīmad-bhāgavate yathā śrī-daśame śrīmad-uddhavoktau (10.47.58) –

एता: परं तनुभृतो भुवि गोपवध्वो गोविन्द एवमखिलात्मनि रूढभावा: । वाञ्छन्ति यद्भवभियो मुनयो वयञ्च किं ब्रह्मजन्मभिरनन्तकथारसस्य ॥ / etāḥ paraṁ tanu-bhṛto gopa-vadhvo govinda evam akhilātmani rūḍha-bhāvāḥ / vāñchanti yad-bhava-bhiyo munayo vayañ ca kiṁ brahma-janmabhir ananta-kathā-rasasya //

 

(जैसे के वर्णित हुआ है श्रीमद्भागवतम् १०.४७.५८ में श्रीउद्धव की उक्तियों में – व्रज से लौट कर मथुरा जाते समय श्रीउद्धव व्रजदेवियों के अदृष्टचर और अश्रुतचर महाभाव का दर्शन कर चमत्कृत हो उठे और उनको प्रणाम कर कहने लगे – “इस धरणीतल पर एकमात्र व्रजवधूओं का ही जन्म सब प्रकार से सफल है  । क्योंकि व्रज में आने के दिन से आज तक मैंने विशेष रूप में अनुभव किया है कि इन्होंने रूप, गुण, लीलादि के अनुशीलन की चरम पराकाष्ठारूप निरुपाधिक प्रेमयोग से श्रीगोकुलचन्द्र के प्रति उस महाभाव को प्राप्त कर लिया है, जिस भाव को पाने की वाञ्छा भवभीत मुमुक्षु, मुनि और हम सभी भक्त करते हैं, किन्तु कोई भी इसका सन्धान नहीं जानते । माधुर्य और ऐश्वर्य से अपार श्रीकृष्ण की लीलाकथा में जिनकी आसक्ति हुई है, उनके लिये क्रमश: अनेक बार ब्राह्मण-योनि में अथवा चतुर्मुख ब्रह्मा के जन्म की क्या आवश्यकता है ? वे जहाँ तहाँ यत्र तत्र जन्म लेने पर भी सर्वोत्तम हैं अथवा जिनकी श्रीकृष्णकथा में आसक्ति नहीं है, उनको पुनः पुनः परमेष्ठी-देह (ब्रह्मा का शरीर) या पुनः पुनः ब्राह्मण-शरीर की उपलब्धि से ही क्या प्राप्त हो जाने वाला है ?” अतः जिस व्यक्ति का हृदय अनन्त भगवान् की कथा में ही निरन्तर सरस रहता है, उनका चतुर्मुख ब्रह्मा के रूप में जन्म लेने से या ब्राह्मण के रूप में जन्म लेने से ही क्या प्रयोजन है ? / As it is depicted in Śrīmad-bhāgavatam 10.47.58 in the prostrating statements issued by Śrī Uddhava after that he, miraculously, envisioned the never before experienced unprecedented Mahābhāva within the Vraja-gopīs during his revert sojourn from Vraja to Mathurā – “On Earth, only the births taken by the cowherd damsels of Vṛndāvanam are, truly, successful. Such is so, because since the very first day I am in Vraja, I have realized in particular about the Gopis’ obtainment of the paramount Mahābhāva unto Śrī Gokulacandra Kṛṣṇa through the self-less prema-yoga transcending all mundane and supra-mundane adjuncts/sarva-laukikālaukiky-upādhy-atīta. Such premā-bhakti is the ultimate culmination of the cultivation of the divine names, forms and pastimes of Bhagavān. Such Mahābhāva is strived after by the mumukṣus who aspire after liberation fearing the dread of saṁsāra, by the liberated munis, as well as, by all the bhaktas like us – but, none are able to factually understand it/this Mahābhāva. Those who have developed attraction for the lilā-kathās of Nanda-nandana which are permeated with the concepts of Aiśvarya and Mādhurya and whose hearts are surcharged with the succulent mellows oozing from such bhagavat-kathās, for them, what need arises to, sequentially, undergo repeated births in the bṛāhmaṇa-kula and to obtain birth in the form of Four-faced Brahmā? Such devotees as the Gopīs are best of all despite taking births hither and thither. Those not devoted to the cultivation of kṛṣṇa-kāthāmṛtam, for them, what par-excellent destination is achieved even by, repeatedly, obtaining births in the brāhmaṇa-kula and/or by being born as Caturmukha Brahmā?”

 

Closing remarks –

 

Due to the divine advent of Kṛṣṇa both in Vraja and in Pura (Mathurā), concurrently, (as verified by Śrīmad-bhāgavatam 10.5.1, 10.14.1 & 10.31.1 verses – “nandas tu ātmaja-utpanne…” + “…paśu-pa-aṅga-jāya”  + jayati te ‘dhikaṁ janamnā vraja śrayata indirā śaśvad atra hi…” (along with the Padma-puṛāṇa & Brahma-yāmala-tantram statements – “vṛndāvanaṁ parityajya sa kvacin naiva gacchati” + “vṛndāvanaṁ parityajya pādam ekam na gacchati”) and as accepted by Gauḍīya-vaiṣṇava theologians, ultimately, there are, only two divisions – viz., Vraja (Gokula Vṛndāvanam) and Pura (Mathurā, Dvārakā in the prakaṭa and aprakaṭa līlās and to some extent Hastināpura/Indraprastha – only, in the prakaṭa-līlā). Though, the birth pastime in prakaṭa-līlā occurs both in Vraja and Pura (Mathurā) and because of this reason, both Vraja and Pura are greater than Vaikuṇṭha (where janma-līlā and bāla-līlas never occur) in their devotional importance as verified by Śrīla Rūpa Gosvāmipāda in his Upadeśāmṛtaikādaśakam 9th verse – “vaikuṇṭhāj janitor varā madhupurī tatrāpi rāsotsavād….”, Vraja has its par-excellent edge over Pura (both Mathurā and Dvārakā) because of containing the viśuddha-mādhurya-maṇḍitā-līlās of pañca-bhakti-rasas. Dvārakā is termed lower than Mathurā, only, because it does not contain birth-pastime. But nevertheless, Dvārakā is higher than Vaikuṇṭha due to the comparative superior hierarchy of Dvārakādhīśa vs. Vaikuṇṭhanātha (despite their ontological or tāttvika oneness) in terms of ‘rasa’ as verified in Bhakti-rasāmṛta-sindhuḥ“siddhāntatas tv abhede ‘pi śrīśa-kṛṣṇa-svarūpayoḥ / rasenotkṛṣyate rūpaṁ krṣṇam eṣā rasa-sthitiḥ //”  — solidly, backed by the evidences of Śrīmad-bhāgavatam. Despite Mathurā being superior to Dvārakā, only, in the context of janma-līlā, Dvārakā is superior to Mathurā due to having the samañjasā-rati prevailing in the hearts of the bhagavan-mahiṣīs (Queens of Kṛṣṇa) – not seen in Mathurā. Hence, both Mathurā and Dvārakā have plus and minus points making them equal, ultimately, and thus, they are placed under one category of ‘Pura’ in the Gauḍīya Vaiṣṇava literary canon.

 

 

२/2) श्रीपाद रूपगोस्वामी के श्रीलघुभागवतामृतम् १.५.१८२-१८५ (खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन – वेङ्कटेश्वर प्रेस – मुम्बई से देवनागरी अक्षरों मे प्रकाशित सानुवाद हिन्दी व संस्कृत मूल + तदुपरि श्रीमद्बलदेवविद्याभूषण की संस्कृत टीका से उपेत + मुरादाबाद, उत्तरप्रदेश के निवासी स्वर्गीय पण्डित ज्वालाप्रसाद मिश्र जी के द्वारा सम्पादित संस्करण) में कारिकावाक्यों तथा उद्धृतवाक्यों को मिला कर साङ्गोपाङ्ग वर्ण हुआ है ऐश्वर्य व माधुर्य का । सम्मोहनतन्त्रम्, ब्रह्माण्डमहापुराणम्, गोपालपूर्वतापन्युपनिषद् पद्ममहापुराणम्, बृहद्वामनपुराणम् एवं श्रीमद्भागवतम् में से अनेकानेक साक्ष्यों को देकर ऐश्वर्य व माधुर्य परिभाषित किये गयें हैं । वहाँ मुख्या परिभाषाकारिका है – “तत्रापि गोकुले तस्य माधुरी सर्वतोऽधिका…..चतुर्द्धामाधुरीस्तस्य व्रज एव विराजते । ऐश्वर्यक्रीडयोर्वेणोस्तथा श्रीविग्रहस्य च ॥“ अर्थात् गोकुल में उन श्रीभगवान् हरि की माधुरी/माधुर्य अन्य समस्त धामों/स्थानों व उन धामस्थित भगवत्स्वरूपों से अधिक है । चार प्रकार की असाधारण माधुरी तो ऐसी है कि जिनका व्रज की परिधि से बाहर अन्य कहीं अवस्थान है ही नहीं  यथा – ऐश्वर्यमाधुरी, क्रीडा/लीला-माधुरी, वेणु-माधुरी एवं श्रीविग्रह/रूप-माधुरी । श्रीबलदेवविद्याभूषण टीका में ऐश्वर्य को परिभाषित करते हैं ब्रह्माण्डपुराण के वचनों के आधार पर – “ऐश्वर्येति – ब्रह्माद्याभिमानिपरिभावक: प्रभावो हि ऐश्वर्यम्” अर्थात् – “चतुर्मुख ब्रह्मा आदि देवताओं के अभिमान को परिभूत/पराजित करने वाला प्रभाव ही ऐश्वर्य कहलाता है  । ध्यातव्य है कि ऐसा पराकाष्ठा को प्राप्त ऐश्वर्य व्रजलीला में है तथा उस ऐश्वर्य पर आधारित भगवदैश्वर्य का ज्ञान भी व्रजाङ्गनाओं को है जो कि श्रीमद्भागवतम् के दशमस्कन्ध के गोपीगीतम् के “…अखिलदेहिनामन्तरात्मदृक्…” से प्रमाणित है  । परन्तु उस ऐश्वर्य के ज्ञान के होने के अनन्तर भी व्रजवासिपरिकरों का श्रीहरि के प्रति जो प्रेमभावमय सम्बन्ध है, वह ऐश्वर्यभाव के द्वारा प्रभावित होकर लुप्त या शिथिल नहीं हो जाता क्योंकि व्रजलीला में माधुर्य की ऐश्वर्य के उपर विजय है तथा इस कारण से गौडीयवैष्णवाचार्यों ने मुक्तकण्ठ से उद्घोषित किया – “माधुर्य-भगवत्ता-सार व्रजे कैल परचार ताँहा शुक व्यासेर नन्दन । स्थाने स्थाने भागवते वर्णियाछे जानाईते ताँहा शुनि माते भक्तगण ॥“ / “মাধুর্য-ভগবত্তা-সার ব্রজে কৈল পরচার তাঁহা শুক ব্যাসের নন্দন । স্থানে স্থানে ভাগবতে বর্ণিয়াছে জানাইতে তাঁহা শুনি মাতে ভক্তগণ ।।” – (चैतन्यचरितामृतम् २.२१.११०) – कि माधुर्य ही भगवत्ता का सार है, ऐश्वर्य नहीं, क्योंकि माधुर्य ऐश्वर्य का अतिक्रमणकारी है जो कि व्रजलीलाओं से स्पष्ट विदित है  ।

 

श्रीमद्भागवतम् १०.१२.११ के उपर श्रीमज्जीवगोस्वामिपाद की लघुवैष्णवतोषिणी संस्कृत टीका में ऐश्वर्य तथा माधुर्य इस प्रकार परिभाषित हुए हैं – “…अत्र श्रीमन्मुनीन्द्रचरणानामिदं विवक्षितं भगवान्स्तादसाधारणस्वरूपैश्वर्यमाधुर्यस्तत्त्वविशेष: तत्र स्वरूपं परमानन्द ऐश्वर्यमसमोर्द्धानन्तस्वाभाविकप्रभुता माधुर्यमसमोर्द्ध्वतया सर्वमनोहरं स्वाभाविकरूपगुणलीलादिसौष्ठवं तत्तदनुभवसाधनञ्च क्रमेण ज्ञानं ज्ञेयं भक्त्याख्यगौरवमिश्रा प्रीतिः शुद्धप्रीतिश्चैतत्त्रिविधसाध्यसाधन….”अर्थात् – “जैसे कि यहाँ मुनीन्द्र श्रीशुकदेवचरणों के द्वारा कथित हुआ है ‘भगवान्’ एक तत्त्वविशेष हैं जो कि असाधारण स्वरूप, ऐश्वर्य तथा माधुर्य से मण्डित हैं । इस सन्दर्भ में भगवत्स्वरूप परमानन्दमय है । ऐश्वर्य उन की असमोर्ध्व (जिससे अन्य किसी की प्रभुता उत्कृष्ट अथवा समान न हो), अनन्त (सीमारहित एवं अमर्याद), स्वाभाविकी (कृत्रिम उपायों से तथा अपने स्वरूप से बाहर के स्रोतों से तपस्यादि के प्रभाव से जो प्राप्त न हों, अपितु नैसर्गिकी हो) प्रभुता (अन्यों के उपर पूर्ण वशीकारित्व व नियन्त्रण की सामर्थ्य) ही है । अरु (और) माधुर्य उनका असमोर्ध्वरूप से सर्वमनोहरणकारी (यहाँ तक कि श्रीमद्भागवतम् के दशमस्कन्धवर्णित ब्राह्मणबालक के विलोप प्रसङ्ग में प्रमाणित जिन कारणार्णवशायि प्रथमपुरुषावतार श्रीमहाविष्णु जो कि समष्टिजगज्जीवों के परमात्मा हैं – उनके मन का आहरण तथा श्रीमद्भागवतीय “नाऽयं श्रियोऽङ्ग उ नितान्तरतेः प्रसाद:…” पद्य से प्रमाणित जिन महावैकुण्ठ की महालक्ष्मी आदियों का मन भी जिन श्रीकृष्ण के द्वारा अपहृत हुआ है – और तो क्या श्रील रूपगोस्वामिपाद के श्रीललितमाधवनाटकम् आदि के “अपरिकलितपूर्व: कश्चमत्कारकारी…..” वाक्य से प्रमाणित स्वयं जिन द्वारकेश का निज मन तक जिनके निज माधुर्य से अपहृत हुआ है । और तो और, ब्रह्मरुद्रेन्द्रादि देवताओं के मन को मथ डालने वाले लौकिक कामदेव के मन को जिन्होंने मथ डाला जो कि श्रीमद्भागवतीय पद्य –“..साक्षान्मन्मथमन्मथ:…” से विदितव्य है, वैसे श्रीकृष्ण । गर्गसंहिता, पद्मपुराण एवं श्रीमद्भागवत के अनेकानेक प्रमाणों से प्रमाणित जिन दण्डकारण्यवासी ऋषियों/तापसों ने रामावतार में प्राप्त वरदान के फलस्वरू व जिन श्रुतियों ने मूर्तिमती होकर जिनको रासलीला में प्राप्त किया श्रुतिचरी व ऋषिचरी गोपीयों के रूप में, वैसे श्रीगोविन्द ।) तथा स्वाभाविकता से रूप, गुण, लीलादि के सौष्ठव को ही माना गया है । भगवत्स्वरूप, भगवदैश्वर्य तथा भगवन्माधुर्य – इन तीनों साध्यों के अनुभव करने के साधन क्रमश: हैं – अद्वयतत्त्ववस्तु का ज्ञान, ऐश्वर्यभाव/गौरवभाव से शिथिल हुई प्रेमाभक्ति, तथा केवल विशुद्ध माधुर्यभावमण्डिता प्रेमलक्षणा भक्ति जो कि केवल व्रजवासी भगवत्परिकरों में द्रष्टव्या है ।“

 

श्रीउज्ज्वलनीलमणि: ११.१९-२० में भी माधुर्य परिभाषित हुआ है यथा – “माधुर्यं नाम चेष्टानां सर्वावस्थासु चारुता ।….” अर्थात् “चेष्टाओं की सर्वावस्था में चारुता/रमणीयता को माधुर्य कहते हैं ।“

 

व्रजवासीयों की भक्ति व व्रजबहिर्भूत भक्तों की भक्ति का अन्तर — “अर्जुन की सख्य-रति (भक्ति) भगवदैश्वर्य-ज्ञान के द्वारा प्रभावित थी, इसीलिये उसे ऐसा लगा कि उसने गलती की है कृष्ण को अपना सखा, दास, सारथी, भाई इत्यादि मानकर (गीता ११.४१-४२), जबकि व्रज की लीला में कृष्ण के सखा तो कृष्ण को घोडा बनाने से भी नहीं हिचकिचाते और उनके भाग्य की शुकदेव मुनि भूरि भूरि प्रशंसा ही करते हैं (उन व्रज के सखाओं ने तो कभी भी भगवान् के विराट्रूप के दर्शन नहीं किये है एवं श्रृङ्गारभाव वाली गोपीयों ने भी भगवान के विराट्रूप के दर्शन नहीं किये है, तो भी वे गोपीयाँ कह रहीं हैं कि हम जानती हैं कि तुम अखिलदेहधारीयों की अन्तरात्मा हो) — प्रमाण – यथा –

क) भा.पु. १०.१८.२४ — “उवाह कृष्णो भगवान् श्रीदामानं पराजितः। वृषभं भद्रसेनस्तु प्रलम्बो रोहिणीसुतम् ॥”

ख) भा.पु. १०.३१,४ — “न खलु गोपिकानन्दनो भवानखिलदेहिनामन्तरात्मादृक् । विखनसार्थितो विश्वगुप्तये सख उदेयिवान् सात्वतां कुले ॥”

ग) भा.पु. १०१४.३२ — “अहो भाग्यमहो भाग्यं नन्दगोपव्रजौकसाम् । यन्मित्रम्परमानन्दम्पूर्णब्रह्म सनातनम् ॥”

दूसरा प्रमाण यह है कि युधिष्ठिर आदि पाण्डवों के सौभाग्य को नारद मुनि ने अधिक माना है अन्य प्रह्लाद आदि भक्तों की तुलना में क्योंकि (युधिष्ठिर को नारद ये वाक्य सुना रहे हैं महाभारत युद्ध से बहुत पहले राजसूययज्ञ के समय कि जब अर्जुन को विराट्रूप दर्शन का सौभाग्य नहीं मिला था),

प्रमाण –

घ) भा.पु. ५.६.१८ — “राजन्पतिर्गुरुरलम्भवतां यदूनां दैवम्प्रियः कुलपतिः क्व च किङ्करो वः । अस्त्वेवमङ्ग भगवान् भजताम्मुकुन्दो मुक्तिं ददाति कर्हिचित् स्म न भक्तियोगम् ॥”

ङ) भा.पु. ७.१०.५० की श्रीधरस्वामी की भावार्थदीपिका टीका — “न तु प्रह्लादस्य गृहे परम्ब्रह्म वसति न च तद्दर्शनार्थम्मुनयस्तद्गृहानभियन्ति न च तस्य ब्रह्म मातुलेयादिरूपेण वर्त्तते न च स्वयमेव प्रसन्नमतो यूयमेव ततोऽप्यस्मत्तोऽपि भूरिभागा इति भावः ।”

 

निष्कर्ष –

 

अतः व्रजलीला में दृष्ट समस्त पञ्चभक्तिरस विशुद्ध माधुर्य-मण्डित हैं, तथा व्रजेतर अन्य भगवद्धामों की लीलाओं में विद्यमान पञ्चमुख्यभक्तिरसनिचय गौरवमय ऐश्वर्यभाव से शिथिलता को प्राप्त है । व्रज की शृङ्गाररति ही सर्वातिशायिनी मधुर होने के कारण (द्वारका, मथुरा, अयोध्या, चित्रकूट व वैकुण्ठ आदि स्थानों की शृङ्गाररति व्रज की तरह सर्वातिशायिनी मधुर नहीं हैं – उन उन स्थानों में समर्थारति के न होने से एवं केवल समञ्जसा व साधारणी रतियों व उनके विभिन्न प्रकारों के होने से – परकीयाभाव ही समर्थारति का द्योतक है जो कि केवल व्रज में विद्यमान हैं, अन्य धामों की लीलाओं में दृष्ट शृङ्गाररति में स्वकीयाभावमय सम्बन्ध होने से वहाँ समर्था का कतही अवस्थान नहीं, अतः उन धामों की शृङ्गाररति सर्वातिशायिनी मधुर न होने से उसे मधुररति आख्या से विभूषित नहीं किया गया है भक्तिरसदर्शनम् में । यह श्रीमद्भागवतीय आधार पर प्रणीत ‘सार-संग्रह:’ में उल्लिखित हुआ गौडीय वैष्णव सिद्धान्त है ।) ।

 

 

३/3) श्रील रूपगोस्वामिपाद के भक्तिरसामृतसिन्धुः (श्रीमद्भागवत के आधार पर प्रणीत ग्रन्थ) के आधार पर गौडीयवैष्णवाचार्य श्रील कृष्णदासकविराजगोस्वामिपाद ने निजकृति चैतन्यचरितामृत में विश्लेषित किया है शृङ्गार के अन्य समस्त चार मुख्य भक्ति-रसों से उत्कर्ष को सिद्ध करते हुए जिसमें यह प्रमाणित किया है कि कैसे शान्त-रति में केवल एक गुण, दास्य-रति में दो गुण, सख्य-रति में तीन गुण, वात्सल्य-रति में चार गुण तथा शृङ्गार(मधुर)रति में पूरे पञ्चगुण विद्यमान होने के कारण शृङ्गाररति सर्वश्रेष्ठा है तथा व्रज की शृङ्गाररति तो समर्थारति की पर्याया होने के कारण (परकीयाभाववती होने से) अत्युत्तमा है  (यह परकीयाभाववती समर्थारति श्रेणी की शृङ्गाररति तो गोलोक में भी अवस्थिता नहीं है, केवल भौमव्रज की प्रकट व अप्रकट लीलाओं में परिलक्षित होती हैं) ! अतः श्रीचैतन्यचरितामृत २.१९.२१४,२१७-२२७,२३०-२३३ आदि के अवलोकन से यह विषय सुस्पष्ट हो जाता है । शान्तरति में भगवन्निष्ठा, दास्यरति में भगवत्सेवा, सख्यरति में असङ्कोच/अगौरव व वात्सल्यरति में ममताधिक्य के कारण पालक-पाल्य-सम्बन्ध होने से श्रीभगवान् के प्रति भक्त का ताडन-भर्त्सनादि व्यवहार – ये चार गुण इन पूर्ववर्तिनी चार रतियों में तथा शृङ्गाररति का अपना विशेष अभूत्पूर्व पञ्चम गुण – कान्तभाव/प्रिया-प्रियतमभाव से निजाङ्ग (समस्त देह को) को समर्पित करते हुए के द्वारा श्रीभगवान् का आराधन । इस तथ्य को समझाने के लिये श्रीमद्भागवतादि शास्त्रों से प्रमाणों को उद्धृत किया गया है चैतन्यचरितामृत में ।

 

 

 

 

 

 

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— भक्तिरसवेदान्तपीठाधीश्वर गुरुपादाचार्य स्वामी / Bhakti-rasa-vedānta-pīṭhādhīśvara Gurupādācārya Svāmī

 

3 thoughts on “त्रिविधा अलौकिकी शृङ्गार-रति की परिभाषाओं व दृष्टान्तों के उपर विवेचन + माधुर्य एवं ऐश्वर्य की परिभाषा + पञ्चमुख्यभक्तिरसों में शृङ्गार का श्रेष्ठत्व / Elucidation on the definitions and examples of the triple divinely aesthetic erotic rati + the definitions of Mādhurya & Aiśvarya + the pre-eminence of Śṛṅgāra among all the five primary mellows of devotion

  1. j) Therefore, a gauḍīya rāgānuga sādhana-siddha obtains perpetual entrance in both prakaṭa and aprakaṭa līlās as his final destination. Gaining entrance into aprakaṭa-līlā is essential, too, because the nitya-aṣṭayāma-sevā in aprakaṭa-vraja remains ever unhampered due to a typical static nature of the aprakaṭa-līlā. Whereas, the aprakaṭa-līlās are dynamic and include naimittika-līlās (not found in the prakaṭa-līlās). Many times, in prakaṭa-līlās, the aṣṭayāma-līlās do not take place in their intended form due to occasional interference of demons etc. (like the arrival of Keśī, Dhenuka, Ariṣta etc.). Therefore, both the static and dynamic (nitya and naimittika) have their own charm and hence, both līlās (prakaṭa and aprakaṭa) together form an essential final destination.

    k) Bhauma-vraja is one in essence. It expands into many in proportion to the quantity of the mundane universes (māyika-brahmāṇḍa-samūha).

    l) Entrance into aprakaṭa-līlā can never be had without first going through the prakaṭa-līlā. Prakaṭa-līlā occurs in the prakaṭa-prakāśa of Vraja. There are three prakāśās (stages of existence of Vraja) viz., māyika-prakāśā (the ordinary mundane existence of Vraja experienced through mundane sensual perception) + prakaṭa-prakāśa (divine but ordinarily visible supra-mundane existence of Vraja accessible to both eligible and non-eligible with limited scope) + aprakaṭa-prakāśa (divine and only divinely experienced supra-mundane existence of Vraja accessible, only, to eligible who have first been on the prakaṭa-prakāśa platform). After obtaining siddha-deha by completing rāgānugā-sādhanā by physically (even for some time) residing in the māyika-prakāśa of Vraja and thus, after obtaining siddha-deha (while the mundane birth has not yet ceased), after death, such a sādhana-siddha rāgānuga-sādhaka gains entry into the prakaṭa-prakāśa. Why? Because, prakaṭa-prakāśa has an inherent capability to remain compatible with even the slightest māyika existence. Such compatibility is not there in the aprakaṭa-prakāśa. After entering into prakaṭa-prakāśa for the very first time, a sādhana-siddha prāpta-bhagavat-pārṣada-deha bhakta, still continues to retain subtle imperfections which can, only, be dissipated by, physically, associating with the nitya-siddha-bhagavat-pārṣadas in the prakaṭa-līlā. Moreover, bhakti-rasa stages beyond prema/prīti like the sneha, māna, praṇaya etc. can be obtained, only, after associating with nitya-siddhas in the prakaṭa-prakāśa. Aprakaṭa-prakāśa is not compatible with any slightest trace of imperfection in a bhakta.

    m) Both the ‘sukhaiśvaryottaṛa-mukti’ (of the four saviśeṣa-muktis) type and the ‘prema-sevottarā-mukti’ type (of the four saviśeṣa-muktis) – are considered to be sub-categories of the fourth puruṣartha, only, and not of the pañcama-purṣārtha-prema unadulterated with the aiśvarya-bhāva.

    n) Vaikuṇtha is achieved through vidhi-mārga by Śrī-vaiṣanvas by obtaining prema-sevottarā-mukti (any one of the four saviśeṣa-muktis falling in this category). Their destination forms the fourth purusārtha.

    o) The gopīs who had guṇa-maya-dehas and who had entered the prakaṭa-līlā of Vraja during the Śāradīya-rāsa described in Śrīmad-bhāgavatam – have been treated with different opinions by Śrī Vallabhācārya and by Śrī Rūpa Kavīśvara in his Sāra-saṅgrahaḥ.

    p) Another reason why an initial entrance into prakaṭa-vraja-līlā is considered a pre-requisite before entering into the aprakaṭa-līlā is that a physical divine birth from the womb of a nitya-siddhā gopī (sometimes, even from a sādhana-siddhā gopī) is compulsory before moving an inch forward. Otherwise, Lakṣmīdevī who is not able to obtain such gopī-janma due to Her not doing bhajana through rāga-mārga (as verified by the Śrīmad-bhāgavatam verse – “nā ‘yaṁ śriyo ‘aṅga u nitānta rateḥ prasādaḥ..”) is not able to enter Vrajalīlā. So, also the Nāradīyā and Mahādevī Gopīs (whose accounts are mentioned in Brahma-vaivartta-purāṇa and Garga-saṁhitā) were not able to stay long in Vraja-līlā – despite their gaining a gopī-deha in a mystical way after taking a dip at Brahma-kuṇḍaṁ in Vṛndāvanam. Why? Because, their gopī-deha was not generated from a physical birth taken from a gopī’s womb. Therefore, Śiva and Nārada did not obtain the spontaneous gopī-abhimāna.

    — Gurupādācārya Svāmī

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  2. Ānanda-vṛndāvana-campūḥ 1.118 by Gauḍīya-vaiṣṇavācārya Śrīla Kavi-kaṛnapūra Gosvāmī states as follows – “go-gopa-gopī-nikarair-vilāso ‘loke ‘pi tasmin bhavitṁ kṣameta / bālyādi-līlā ‘sura-nāśa-līle lokaṁ vinā nārhata eva śobhām //” / “गोगोपगोपीनिकरैर्विलासोऽलोकेऽपि तस्मिन्भवितुं क्षमेत । बाल्यादिलीलाऽसुरनाशलीले लोकं विना नार्हत एव शोभाम् ॥“. This, solidly, substantiates the Caitnayaite view asserting the absence of janma-līlā etc. in the aprakaṭa-līlā of Bhauma-vraja and, also, the same absence in the Goloka-līlā. According to the majoritarian Gauḍīya view, in the aprakaṭa-līlā there are rumours of demons rather than actual demons – which serve to intensify the vīra-rasa in the līlā. The physical presence of demons it not, graphically, manifest in the aprakaṭa-līlā because in that līlā, the asura-uddhāra does not occur. Asura-uddhāra and asura-vadha occurs, only, in the prakaṭa-līlā. For the sake of enhancing vīra-rasa, the demoniac presence is felt, only through subjective perception of the vrajavāsī bhagavat-pārṣadas and such subjective perception is created by Yogamāyā. Moreover, asura-vadha in the prakaṭa-līlā is done by Viṣṇu and not by Nanda-nandana.

    — Gurupādācārya Svāmī

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  3. Resolving the apparent contradiction between the mainstream Gauḍīya stand on the relation of Vraja with Goloka and the one propounded by Bṛhad-bhāgavatāmṛtam

    In the orthodox Gauḍīya viewpoint of Śrīla Rūpa Gosvāmī as seen in his Laghu-bhāgavatāmṛtam (last section of the Fifth Chapter of the 1st Canto of Laghu-bhāgavatāmṛtam), ‘Vraja’ is considered to be the Bhauma-Vṛndāvana or Bhauma-Gokula, only. Goloka is never designated as Vraja either in Laghu-bhāgavatāmṛtam, or in other Gauḍīya texts like the Ānanda-vṛndāvana-campūḥ of Kavi-karṇapūra Gosvāmī, Gopāla-campūḥ of Jīva Gosvāmī, Govinda-līlāmṛtam by Kṛṣṇadāsa Kavirāja Gosvāmī and Sāra-saṅgrahaḥ of Rūpa Kaviśvara Gosvāmī etc. In the various writings of Viśvanātha Cakravarttī, a clear demarcation between Vraja (Bhauma) and Goloka is seen. Even in the last sections of Kṛṣṇa-sandarbhaḥ, Jīva Gosvāmī never employs the term ‘Vraja’ to denote Goloka. Though Goloka (considered as highest planet in Vaikuṇṭha of Cidākāśa/tripāda-vibhūtiḥ/prapañcātīta) is considered ‘vaibhava-prakāśa’ of Gokula/Vraja/Bhauma-vṛndāvanam (of ekapāda-vibhūtiḥ or prapañca), the term ‘Vraja’ has, exclusively, remained associated with the Bhauma-Vṛndāvanam, only, so far as the classical Gauḍīya literary canon is concerned.

    However, Śrīla Sanātana Gosvāmī, in his Bṛhad-bhāgavatāmṛtam (especially, the 6th Chapter of the 2nd Canto of Bṛhad-bhāgavatāmṛtam), uses the term ‘Vraja’ to denote Goloka and the Vṛndāvana chamber within Goloka. This is against the mainstream set convention found in the Gauḍīya literature. How to reconcile? Using the ‘arthāpatti’ technique of mīmāṁsā, it is derived that Gopakumāra was beholding Vraja (Bhauma-vraja), ditto, in the Goloka without any slightest difference. Now, according to the views of all classical Gauḍīya Ācāryas, there exists a huge lot of difference in the setting, mood and līlās of Goloka and Vraja (Bhauma). Contrary to this mainstream Gauḍīya belief, Śrī Sanātana asserts that Gopakumāra beheld the very same Bhauma Vraja in the ‘Vraja’ present within Goloka. The solution to this dilemma is that a special subjective appearance of Vraja was displayed by Yogamāyā for an extremely rarest of the rare case among sādhakas (the Gopakumāra is considered to be the rarest of the rare exceptions among sādhakas – 99.9 percent of vaidhī or rāgānugā sādhakas do not obtain their destination in the way Gopakumāra obtained) viz., Gopakumāra. Thus, the very same Bhauma-vraja appeared within one chamber of Goloka, solely, for Gopakumāra and this was coordinated by Yogamāyā in the same way as how the same Bṛhad-bhāgavatāmṛtam mentions the ditto appearance of Bhauma-Vraja in the Dvārakā by the name of Nava-vṛndāvanam for a specific purpose. Since, the very same Bhauma-Vraja manifested in Goloka (solely, for Gopa-kumāra), even if the 6th Chapter of the 2nd Canto of Bṛhad-bhāgavtāmṛtam mentions a physical presence of demons like Keśī and Kāliya – it should be understood to be their presence in the prakaṭa-prakāśa of Vraja – since, the prakaṭa-prakāśa of Vraja had ditto re-emerged in Goloka for Gopakumāra’s sake. If this explanation is not accepted, all the Gauḍīya views describing severe differences prevalent between the settings of Bhauma-Vraja and Goloka (like Ānanda-vṛndāvana-campūḥ 1.118, for example – to just name one such evidence) will be contravened – which cannot be accepted.

    — Gurupādācārya Svāmī

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