dharma-adharma

 

मनुस्मृतावधर्मनाशोल्लेखः? / मनुस्मृति में अधर्मनाश का उल्लेख है? / Destruction of adharma elucidated in Manu-smṛti? (In Hindi & Sanskrit)

 

 

 

१) “नाधर्मश्चारितो लोके सद्यः फलति गौरिव । शनैरावर्त्तमानस्तु कर्त्तुर्मूलानि कृन्तति ।।मनुस्मृति: ४.१७२ ।।“

 

महर्षिः मेधातिथिः — “आवर्त्त्यमानः कालेनोपचीयमानः कर्त्तुः प्रतिषिद्धानुष्ठातु: मूलाकृन्तति छिनत्ति । मूलकर्त्तनेन सर्वेण सर्वविनाश उपलक्ष्यते ।“ – यहाँ मूलोच्छेदन (मूल से विनाश होना) का तात्पर्य अधर्मी का सर्वविनाश है, न कि अधर्म का ।

 

कुल्लूकभट्ट: — “किन्तु क्रमेणावर्तमानः फलोन्मुखी भवन्नधर्मककर्त्तुर्मूलानि छिनत्ति मूलछेदेन सर्वनाशो लक्ष्यते देहाधनाद्यन्वितो नश्यति ।“—अधर्मी के नाश की बात कही है उसके देह, धन आदि के साथ; परन्तु अधर्म के नाश की बात का उल्लेख नहीं है ।

 

सर्वज्ञनारायण: — “तथाऽधर्म आवर्त्यमानः पुनः पुनः क्रियमाण: मूलानि भोगस्य साधनानि कर्माणि कृन्तति छिनत्ति तच्छैदानन्तरन्तु स्वफलं दुःखं करोतीत्यपि द्रष्टव्यम् ।“ – जिस जडमूलोच्छेदन का प्रसङ्ग है वह भोगसाधनात्मक है, न कि अधर्मोच्छेदनात्मक ।

 

राघवानन्दस्वामिनः – “आवर्त्त्यमानोऽभ्यस्यमान: मूलानि देहधनादीनि निकृन्तति छिनत्ति ।“ – पूर्ववत् यहाँ भी देहधनादि ऐहिक क्षणिक पदार्थों को छेदनयोग्य मूल माना गया है, न कि अधर्म को ।

 

रामचन्द्र: — “आवर्त्तमानस्तु प्रवर्त्तमान अधर्मकर्त्तुर्मूलानि भोगसाधनानि कृन्तति छिनत्ति ।“ – अधर्म जिसका कारक है (कारण है – अर्थात् जो भोगसाधन अधर्म के कार्यरूप हैं) – उन भोगसाधनों के उच्छेदन की यहाँ चर्चा हुई है, न कि तद्धेतुभूत अधर्म की ।

 

 

२) “अधर्मेणैधते तावत्ततो भद्राणि पश्यति । ततः सपत्नान्जयति समूलस्तु विनश्यति ।।मनुस्मृतिः ४.१७४।।“

 

महर्षिः मेधातिथि: — “समूलञ्च कियन्तं कालमेवं भूत्वा सपुत्रज्ञातिधनबान्धवा उच्छिद्यन्ते ।“ – समुच्छिन्न (विनष्ट वा विनाश को प्राप्त) होने वाले पुत्र, ज्ञाति, धन एवं बान्धव यहाँ माने गये हैं, न कि अधर्म ।

 

सर्वज्ञनारायण: — “…भोगमूलेन सह नश्यति” – यहाँ भी अधर्म से प्राप्त सुखभोग को वह उच्छेदनीय मूल माना गया है, साक्षात् अधर्म को नहीं ।

 

राघवानन्दस्वामिन: — “अधर्मेण तावद्वर्धती पुत्रपौत्रादिना” – पूर्ववत् ही मत है ।

 

रामचन्द्र: — “समूलं सपुत्रज्ञातिधनबान्धवादिरूपशर्मसहितो विनश्यति ।“ – समूल अर्थात् पुत्र, ज्ञाति, धन, बान्धवादियों के साथ अधर्माचरणकारी का विनाश होता है ।

 

 

 

अन्तर्जालीय पृष्ठतन्तु: — https://goo.gl/S3zO4F

 

 

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