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करपात्रानुरागयोर्मतनिरसनम् / करपात्री स्वामी एवं कथावाचक अनुरागकृष्ण शास्त्री के मत का विखण्डन   / Confutation of the views of   Svāmī Karapātrī & Anurāgakṛṣṇa Śāstrī Kathāvācaka (Only Hindi and Sanskrit version)

 

 

 

यह निबन्ध (अन्तर्जालीय पृष्ठसूत्र — https://goo.gl/xoZlpZ) स्वामी करपात्री के लिये सनातनी समाज को दिये नारे ‘अधर्म का विनाश हो’ – उसके उपर शृङ्खला में द्वितीय लेख है – प्रथम लेख का अन्तर्जालीय सूत्र नीचे दिया है ।

 

‘विनाश’ शब्द की संस्कृत में व्युत्पत्ति इस प्रकार से है – “वि + नश्-भावे घञ्” जिसका मुख्य अर्थ है सम्यक् या पूर्ण नाश । पर यदि ‘विनाश’ का गौण अर्थ ‘लोप’/’अदर्शन’/’तिरोभाव’ के आशय से लिया जाता है {पाणिनि की अष्टाध्यायी १.१.६० – “अदर्शनं लोपः” व उसपे कात्यायन का वार्त्तिक – “प्रसक्तस्य (विद्यमानस्येत्यर्थ:) अदर्शनं लोपसंज्ञं स्यात्”} जैसा कि महाकवि राजर्षि शूद्रक के नाटककाव्य मृच्छकटिका में ‘नाश’ का जो अर्थ लोप या अदर्शन/अनुपलब्धि के अर्थ में हैं (यथा मृच्छकटिकायां ५.२५) – “गता नाशं तारा उपकृतमसाधाविव जने” (टीका – “गता इति । असाधौ जने उपकृतमिव तारा अदर्शनं गताः ।) – “जैसे असाधुजन के प्रति किया हुआ उपकार अदृश्य हो जाता है, वैसे ही तारें अदृश्य हो गयें ।“ – तो इस ‘अदर्शन/तिरोभाव’ के अर्थ में भी ‘अधर्म’ का ‘विनाश’ कहना उचित नहीं क्योंकि अधर्म का दर्शन इस जगत् मे सदैव रहता है समस्त चतुर्युगों में  न्यूनाधिक्य परिमाण में एवं वह परमात्मा में तिरोहित (सूक्ष्मावस्था को प्राप्त) तो केवल महाप्रलय के समय ही होता है, वह भी धर्म के साथ-साथ । अतः इस अर्थ में यदि अधर्म का तिरोभाव को माना जाये तब तो धर्म का भी तिरोभाव मानना पडेगा – पर वह भी महाप्रलयानन्तर, न कि सृष्टि की प्रवर्त्तमान दशा में ।

 

कहीं कहीं संस्कृत साहित्य में ‘विनाश’ शब्द का अर्थ अत्यन्त गौण उपचार के साथ ‘ह्रास/ग्लानि/हानि/लाघव’ के अर्थ में प्रयुक्त है तो वहाँ उसका अर्थ न तिरोभाव, न ही अदर्शन लिया गया है  और वहाँ प्रसङ्ग/सन्दर्भ/पूर्वापरप्रकरण देखने से स्पष्ट किया होता है वैसे ‘लाघव’ के अर्थ में प्रयुक्त ‘विनाश’ को । अतः ब्रह्मलीन स्वामी करपात्री के द्वारा प्रयुक्त घोषवाक्य जो कि जनसाधारण के लिये तैयार किया गया (जनसाधारण जो कि रूढी अर्थ से ही प्रायः परिचित होता है व्याकरण/कोष आदि के ज्ञान के अभाव से) – “अधर्म का नाश हो” – स्पष्टता के अभाव में {यह नादघोष कोई प्रकरण नहीं कि जिसके उपर व्याख्या लिखकर उसे स्पष्ट कर दिया गया हो, अतः उस घोषवाक्य में प्रयुक्त ‘नाश’ का मुख्य/रूढी अर्थ – प्रकृष्ट नाश वाला (रूढिर्योगमपहरति) या अधिक से अधिक अवान्तर अर्थ (लोप/तिरोभाव के आशय वाला) ही लेना पडेगा और वैसे अर्थ लेने से युक्ति और शास्त्र के आशय बाधित होत हैं ।} तो अपने मुख्य अर्थ — प्रकृष्ट नाश अथवा तो अवान्तर अर्थ — तिरोभाव/अदर्शन/लोप के अर्थ में ही लिया जा सकता है,  परन्तु तिरोभावादि के अर्थ में लेने से महाप्रलय में ही वैसा अर्थ घटित है,

 

 

{तो क्या स्वामी करपात्री जी महाप्रलय की अवस्था को आहूत कर रहें हैं ताकि अधर्म एवं उसके साथ साथ धर्म का भी तिरोभाव हो जाये? +“अधर्म भगवान् का पृष्ठभाग है, अतः अधर्म का नाश (अदर्शन) हुए बिना भगवान् की सन्मुखता सिद्ध नहीं हो सकती” – यह अनुरागकृष्ण शास्त्री कथावाचक वृन्दावनीय का कुतर्क अस्थिर है क्योंकि यदि अधर्म का अदर्शन ही भगवदसाम्मुख्य (भगवत्बहिर्मुखता) का हेतुभूत हो, तब तो अधर्म के लक्षणों इत्यादि का जो विस्तारित वर्णन/निरूपण/दर्शन शास्त्रों में हुआ है लोककल्याणार्थ वह भी अनुचित सिद्ध होगा! केवल जीव के हृदय में अधर्म का धर्म के उपर हावी होकर बैठना ही समस्या का कारक है, अधर्म का दर्शन नहीं! रही बात अज्ञानरूपी ध्वान्त (कुहक) के विध्वंस (विनाश की) (श्रीमद्भागवतमाहात्म्य पद्मपुराणोक्त – प्रथमाध्याय का श्लोक – ‘अज्ञानध्वान्तविध्वंसकोटिसूर्यसमप्रभ’ + पुराणों का श्लोक – ‘अज्ञानतिमिरान्धस्य….’) की, तो वहाँ भी केवल जीव के हृदय में ज्ञान की अनुपस्थिति में स्थित अज्ञान को ही विदुरित करने की बात कही गयी है, न की ज्ञानप्राप्त के अनन्तर अवबोधन में आने वाला अज्ञान का स्वरूप! यदि अज्ञान का सर्वथा नाश हो जाता तब तो अज्ञान के स्वरूप को भी ज्ञानप्राप्त जीव समझ न पाता! जैसे आलोकदर्शन के अनन्तर पुनः तिमिर का दर्शन होने पर दृष्टि भ्रान्त नहीं होती एवं तिमिर की वास्तविकता को समझ जाती है, वैसे! परन्तु कभी आलोक का दर्शन हुआ ही न हो (आलोकदर्शन का प्रागभाव), तब तो वैसा तिमिरदर्शन मोहकारी होता है, तथैव!} +

 

और सृष्टि अवस्था में समष्टि अधर्म के ‘नाश’ का मुख्य/रूढी अर्थ (अस्तित्वशून्यता/सर्वथा अभाव/प्रध्वंसाभाव) लेने से तो श्रीमद्भगवद्गीता के ४.७+८ की समस्त टीकाओं का आशय बाधित होता है, अतः वैसा अर्थ अनुपपन्न है  यथा (और रही बात व्यष्टि अधर्म के नाश की, तो जैसे हमने पहले बताया व्यष्टि अधर्म अथवा समष्टि अधर्म – दोनों का ही दर्शन होना अधार्मिक नहीं बनाता; अतः व्यष्टि अधर्म का जीव के आचरण से केवल अपगम अभीष्ट है, न कि उस अधर्म का दर्शनलोप) —

 

 

 

 

क) श्रीमद्भगवद्गीता ४.८ शाङ्करभाष्य –

 

“…विनाशाय च दुष्कृतां पापकारिणाम्….” – “और दुष्कृत अर्थात् पापाचारियों के विनाश के लिये” – यहाँ भी ‘विनाश’ का अर्थ केवल पापाचारियों के विनाश के लिये व्यवहृत है (वह विनाश भी कैसा है – उसके लिये नीचे की टीका देखिये) और न ही ‘पाप-तत्व’ के लिये और न ही पाप के मूलभूत अधर्म के लिये ।

 

 

ख) श्रीमद्भगवद्गीता ४.८ रामानुजभाष्य –

 

“….तद्विपरीतानां विनाशाय च…” – “और उनसे (साधुओं से) विपरीतों के (दुष्कृतियों के) विनाश के लिये”

 

 

ग) श्रीमद्भगवद्गीता ४.८ रामानुजभाष्योपरि वेदान्तदेशिक की तात्पर्यचन्द्रिका –

 

“…..’रिपूणामपि वत्सलः’ ‘मच्छरैस्त्वं रणे शान्तस्तत: पूतो भविष्यसि’ इतिवद्दुष्क्रुतामपि विनाशो नात्यन्तविनाशः, किन्तु वैपरीत्यहेतुभूतराक्षसप्रभृतिशरीरग्रन्थ्यादिनिवर्त्तनम्…” – “…दुष्कृतियों के विनाश का अर्थ अत्यन्त विनाश नहीं है, किन्तु उन दुष्कृतियों के धर्मवैपरीत्य के कारणभूत जो राक्षसादि योनियों की ग्रन्थि हैं, उनका निवर्त्तनमात्र” । श्रीवेदान्तदेशिकस्वामी कि इन उक्तियों से स्पष्ट हो जाता है कि मूल कारणरूप अधर्म का विनाश अभिप्रेत नहीं हैं, और न ही अधर्म के कार्यस्वरूप दुष्कृतस्वरूप पापसमूह (मूलभूत पापतत्त्व) का नाश अभिप्रेत है, बल्कि उन अधर्म के कार्यभूत पापसमूह के आचरणकारी जो दुष्कृतिजन हैं, उनका भी विनाश न होकर केवल उनकी जो राक्षसादि आसुरी योनियाँ हैं, केवल उनका ही विनाश अभिप्रेत है – वो भी निवर्त्तन के अर्थ में अर्थात् कि उन राक्षसादि योनियों का भी अस्तित्व समाप्त नहीं होता, अपितु केवल उन योनियों का निवर्त्तन/निवारण मात्र होता है उन दुष्कृतिजनों के पक्ष में । अतः स्वामी करपात्री का ‘अधर्म’ के लिये नाश शब्द का व्यवहार अत्यन्त अशास्त्रीय है – यह सिद्ध हुआ ।

 

Even Śrī Kṛṣṇa in Śrīmad-bhagavad-gītā does never talk about the ‘nāśa’ or destruction of adharma/irreligion. In the ‘yadā yadā hi dharmasya……’ and the ‘paritrāṇāya sādhūnāṁ vināśāya ca duśkṛtāṁ…’ verses of ŚBG, Śrī Kṛṣṇa only talks about destruction of the ‘duṣkṛtis’ or the irreligious {And that, also, according to commentators like Vedānta Deśika Svāmī of Rāmānuja Sampradāya and his Tātparya-candrikā on the Śrī-bhāṣya of Bhagavatpāda Rāmānuja on the Śrīmad-bhagavad-gītā 4.8 – only, the rākṣasa-yonis or the demoniac species acquired by such duṣkṛti demons (asuras) is removed (not even destroyed). Hence, vināśa of ‘duṣkṛti’ (irreligious people) does not mean their own destruction (for souls or jīvas can never be destroyed) and neither does it indicate the destruction (vināśa) of the rākṣasa-yoni (demoniac species undertaken by such duṣkṛti sinful people), but rather, ‘vināśa’ denotes the ‘nivarttanam’ or removal of the demoniac species acquired by such duṣkṛtis. Such is the import.} Hence,  Śrīmad-bhagavad-gītā does not talk about the destruction of the ‘irreligion/adharma’ itself.

 

 

घ) श्रीमद्भगवद्गीता ४.८ श्रीहनुमान् के पैशाचभाष्यम् के उपर श्रीवेङ्कटनाथ का ब्रह्मानन्दगिर्याख्यानम् –

 

“…तत्राह – विनाशायेति । दुष्टं कर्म कुर्वन्तीति दुष्कृतः पापिष्ठा: तेषां वधेन….” – “विनाश का अर्थ है दुष्ट कर्म करने वाले पापिष्ठ (पाप में निष्ठा रखने वाले) जनों का वध करना ।“ – यहाँ भी विनाश का अर्थ केवल पापिष्ठों के लिये लिया गया है न कि मूलभूत अधर्म के लिये ।

 

 

ङ) श्रीमद्भगवद्गीता ४.८ – श्रीवल्लभाचार्य की तत्वदीपिका –

 

“…तत्प्रतिपक्षाणां दुष्कृतां दुष्टं कर्म कुर्वतां विनाशाय च…” – “उन साधुजनों के प्रतिपक्षी दुष्कृतियों के अर्थात् दुष्ट कर्म करने वालों के विनाश के लिये भी…” ।

 

 

च) श्रीमद्भगवद्गीता ४.८ के वल्लभाचार्य की तत्त्वदीपिका के उपर श्रीपुरुषोत्तमलालगोस्वामी की अमृततरङ्गिणी –

 

“..दुष्कृतां धर्मप्रतिपक्षिणां नाशाय” – “दुष्कृतों के नाश का अर्थ है धर्म के प्रतिपक्षी जनों के नाश के लिये” – यहाँ भी पापिष्ठजनों का नाश ही स्पष्ट अभिप्रेत है ।

 

 

छ) श्रीमद्भगवद्गीता ४.८ के उपर श्रीनीलकण्ठाचार्य का भारतभावदीप –

 

“….दुष्कृतां दुष्टं कर्म कुर्वतां पापिनाम्” – “दुष्कृत का अर्थ है दुष्ट कर्म करने वाले पापियों का विनाश” -– यहाँ भी पापिष्ठजनों का नाश ही स्पष्ट अभिप्रेत है, सर्वदुष्टताकारणभूत अधर्म का नहीं ।

 

 

ज) श्रीमद्भगवद्गीता ४.७ के उपर शाङ्करभाष्य के टीकाकार स्वामी शङ्करानन्द यति की तात्पर्यबोधिनी –

 

“….धर्माधर्मयोस्तद्वतां चानुग्रहनिग्रहयोग्यं…” – “धर्म एवं अधर्म तथा उनके आचरणकारियों के अनुग्रह एवं निग्रह के लिये” – यहाँ भी निग्रह का अर्थ  अधर्म के पक्ष में विनाश न होकर केवल उसके अभ्युदय को थामना मात्र है ।

 

 

झ) श्रीमद्भगवद्गीता ४.८ के उपर निम्बार्कसम्प्रदायाचार्य श्रीकेशव काश्मीरी भट्टाचार्य की तत्वप्रकाशिका टीका –

 

“…दुष्कृतां भक्तिविरोधिनां हिरण्यकशिपुकंसमगधपौण्ड्रकचैद्यशाल्वादीनां विनाशाय च…” – “दुष्कृत का अर्थ हैं भक्तिविरोधी जनों के यथा हिरण्यकशिपु, कंस, जरासंध, पौण्ड्रक वासुदेव, चेदिराज शिशुपाल व शाल्वादि असुरों के विनाश के लिये ।

 

 

ञ) श्रीमद्भगवद्गीता ४.८ के उपर श्रीमधुसूदनसरस्वती की गूढार्थदीपिका टीका –

 

“…तथाऽधर्मवृद्ध्या वर्द्धमानानां दुष्कृतां पापकारिणां वेदमार्गविरोधिनां विनाशाय च…..धर्मस्य सम्यगधर्मनिवारणेन स्थापनम् वेदमार्गपरिरक्षणं धर्मस्थापनम्…” – “और अधर्म की वृद्धि होने से वर्द्धमान दुष्कृतियों के अर्थात् पापकारीयों के अर्थात् वेदमार्गविरोधीयों के विनाश के लिये……धर्म का सम्यक् स्थापन अर्थात् वेदमार्ग का परिरक्षण — अधर्म के निवारण से…” – यहाँ भी केवल अधर्म के निवारण वा निग्रह की बात कही गयी है, उसके विनाश की नहीं; विनाश भी केवल पापकारीयों का अभिप्रेत है यह स्पष्ट हुआ है ।

 

 

ट) श्रीमद्भगवद्गीता ४.८ के उपर श्रीधरस्वामी की सुबोधिनी टीका –

 

“दुष्टं कर्म कुर्वन्तीति दुष्कृतस्तेषां वधाय च….दुष्टवधेन च” – “दुष्ट कर्म करने वाले दुष्कृतों के वध के लिये…..” ।

 

 

ठ) श्रीमद्भगवद्गीता ४.८ के उपर श्रीसदानन्द का भावप्रकाश –

 

“पापिनां वर्धमानानामधर्मस्योद्भवेन च । विध्वंसनाय दुष्टानां वेदमार्गविरोधिनाम् ।।“ – “अधर्म के उद्भव के द्वारा वृद्धि को प्राप्त पापियों के विध्वंस (विनाश) के लिये जो कि वेदमार्गविरोधी लोग हैं ।“ – यहाँ भी अधर्म का विनाश कहीं भी नहीं कहा गया ।

 

 

ड) श्रीमद्भगवद्गीता ४.८ के शाङ्करभाष्य के टीकाकर्ता श्रीधनपति सूरी की भाष्योत्कर्षदीपिका –

 

“…विनाशाय च पापिष्ठानां..पापिनां नाशस्य….कंसादिमारणेन दुष्कृतां विनाश इति…..दुष्टवधेन च….कंसादिवधेन च..” – “पापिष्ठों के विनाश के लिये….पापीयों के नाश का…..कंसादियों के मारण/वध के द्वारा दुष्कृतों का विनाश होना….दुष्टवध के द्वारा….कंसादियों के वध द्वारा…” – यहाँ भी केवल पापिष्ठों का वध अभिप्रेत है ‘विनाश’ से, न की अधर्म का विनाश ।

 

 

ढ) श्रीमद्भगवद्गीता ४.८ के उपर श्रीदैवज्ञपण्डितसूरी की परमार्थप्रपा टीका –

 

“दुष्टं कर्म कुर्वन्ति ते दुष्कृतस्तेषां विनाशाय…खलनिर्बहणं…” – “दुष्टकर्म करने वाले दुष्कृतों के विनाश के लिये – ऐसे खलों का वध/निबर्हण” — यहाँ भी अधर्म के विनाश की गन्ध तक का उल्लेख नहीं है ।

 

 

ण) श्रीमद्भगवद्गीता ४.७ व ४.८ के उपर  गौडवैष्णवसंप्रदायाचार्य श्रीविश्वनाथ चक्रवर्ती –

 

“धर्मस्य ग्लानिर्हानिरधर्मस्याभ्युत्थानं वृद्धिस्ते द्वे सोढुमशक्नुवन्तयोर्वैपरीत्यं कर्त्तुमिति भावः ।…… तथा दुष्कृतां मद्भक्तलोकदुःखदायिनां मदन्यैरवध्यानां रावणकंसकेश्यादीनां विनाशाय ।“ – “धर्म की ग्लानि वा हानि (न्यूनता का होना – “यथा हानिः क्रमप्राप्ता तथा वृद्धिः क्रमागता” – हरिवंशे) + अधर्म का अभ्युत्थान वा वृद्धि – इन दोनों के सहने में असमर्थ होने के कारण इनकी अवस्था को विपरीत करने के लिये (अर्थात् प्रवर्द्धमान् अधर्म को लाघव प्राप्त करवाने के लिये एवं न्यूनता प्राप्त धर्म की प्रवृद्धि के निमित्त) मेरा (श्रीभगवान् का) आविर्भाव होता है ।….और दुष्कृतां अर्थात् मेरे अतिरिक्त किसी अन्य के द्वारा नहीं मारे जाने योग्य (अवध्य) व मेरे भक्तों के दुःख देने वाले रावण, कंस, केशी आदि असुरों के विनाश के लिये (अधर्म के विनाश के लिये नहीं) मैं आविर्भूत होता हूँ ।“ – यहाँ भी केवल दुष्टों के विनाश का उल्लेख है, अधर्म के विनाश का नहीं ।

 

 

त) श्रीमद्भगवद्गीता ४.८ के उपर गौडवैष्णवसम्प्रदायाचार्य श्रीपाद बलदेव विद्याभूषण का गीताभूषणभाष्यम् –

 

“तथा दुष्कृतां दुष्टकर्मकारिणां मदन्यैरवध्यानां दशग्रीवकंसादीनां तादृग्भक्तद्रोहिणां विनाशाय” – “और दुष्कृत आर्थात दुष्टकर्मकारीयों के जो कि मेरे अतिरिक्त अन्य किसी के द्वारा अवध्य हैं – उन रावण, कंसादियों के विनाश के लिये जो कि मेरे भक्तों के द्रोही हैं” — यहाँ भी केवल दुष्टों के विनाश का उल्लेख है, अधर्म के विनाश का नहीं ।

 

 

थ) श्रीमद्भगवद्गीता ४.८ के उपर संत ध्यानेश्वर/ज्ञानेश्वर भावार्थदीपिका या ज्ञानेश्वरी में लिखते हैं मराठी भाषा में –

 

“दैत्यांचीं कुळे नाशीं” – “दैत्यों के कुल का नाश करता हूँ ।“ (अधर्म के नाश की बात का कोई उल्लेख नहीं है) ।

 

 

द) “अजस्य जन्मोत्पथनाशनाय” – श्रीमद्भागवतम् ३.१.४४ का भी आशय समस्त टीकाकारों के मत में वेदमार्ग के अननुयायियों क नाश अथवा तो उत्पथगतिरूप नरकादि यातना का नाश माना गया है – न कि वेदमार्गविरोधी ‘अधर्म’ का नाश । यथा श्रीधरस्वामिपाद की भावार्थदीपिका के टीकाकार श्रीवंशीधरशर्मा के भावार्थदीपिकाप्रकाश में – “उत्पथानां वेदमार्गाननुयायिनां नाशनाय यद्वोत्पथो नरकादिस्तन्नाशनाय.. ।“ + गौडवैष्णवाचार्य श्रीराधारमणदासगोस्वामि की दीपिनी व्याख्या में से —  “अपराधानन्तरमेव तेषां कुरूणाम्” + रामानुजसम्प्रदाय के श्रीवीरराघवाचार्य की व्याख्या में से – “अन्यथा दुष्कृतविनाशाद्यर्थं ….अपितूत्पथनाशाद्यर्थमित्यर्थ:” + माध्वसम्प्रदाय के श्रीविजयध्वजतीर्थकृता पदरत्नावली में – “त्रिमदाद्विद्याधनाभिजननिमित्तान्मदादुत्पथानां सन्तपन्थानमपहाय वर्तमानानाञ्च भूमिरनेकाक्षौहिणीगणिताभिर्मुहुर्महीं चालयतां  नृपाणां कंसादीनां वधाद्धेतो:…” + गौडवैष्णवाचार्य श्रीविश्वनाथचक्रवर्त्तिपाद की सारार्थवर्षिणीटीका में से – “उत्पथानां सन्मार्गच्छिदामसुराणां नाशनाय…” + निम्बार्कसम्प्रदाय के श्रीशुकदेव के द्वारा रचित सिद्धान्तप्रदीपः में – “त्रिभिर्विद्याधनाभिजनहेतुकैर्मदैरुत्पथानामुद्धतानां महीं चमूभिर्मुहुश्चालयतां भूभारभूतानां नृपाणां वधाद्धेतो: प्रपन्नानां तत्तदुष्टनृपहेतुकीर्त्तिजिहीर्षयैश: प्रथमापराधसमय एव निगृहीतुमीश: समर्थोऽपि कुरूणां दुर्योधनादीनामघमपराधमुपैक्षत प्रथमापराधे दुर्योधनादिनिग्रहे पाण्डवानामेवार्त्तिनिवृत्ति: स्यान्नान्येषां प्रपन्नानां तस्मात्सर्वदुष्टनृपनिग्रहार्थं कुरूणामघमुपैक्षतेति फलितार्थ: ।“ + श्रीवल्लभाचार्य की सुबोधिनी से – “उत्पथानां दुष्टानां नाशाय…अतो दुष्टनिग्रह…” + श्रीवल्लभाचार्य की सुबोधिनी के उपर श्रीगिरिधरलालगोस्वामिकृत बालप्रबोधिनी से – “उत्पथानां वेदविरुद्धमार्गवर्त्तिनां नाशनाय” – इन सब प्रमाणों से सुस्पष्ट है कि उत्पथ अर्थात् वेदविरुद्धमार्गानुवलंबियों के नाश के लिये (परन्तु वेदविरुद्धमार्गरूप अधर्म का कभी विनाश नहीं होता – केवल ह्रास होता है – अन्यथा श्रीभगवान् के द्वारा की हुई अधर्म की उत्पत्ति निरर्थक सिद्ध होगी – पूर्ववर्ती निबन्ध में विस्तारित आलोचना हुई है) अजस्वरूप परमात्मा इह लोक में जन्म ग्रहण करते हैं ।

 

सार –

 

अतः वर्त्तमान निबन्ध से पूर्व में इस लिखित में (https://brvf.org/2016/06/08/why-any-entity-belonging-to-any-one-sect-of-sanatana-dharma-cannot-be-righteously-entitled-as-dharma-samra%E1%B9%AD/) निर्दिष्ट अनेकानेक युक्तिओं व शास्त्रप्रमाणों से स्वामी करपात्री जी का मत निरस्त होता है । अस्तु ।

 

 

 

— भक्तिरसवेदान्तपीठाधीश्वरा: गुरुपादाचार्या: स्वामिनः / Bhakti-rasa-vedānta-pīṭhādhīśvara Gurupādācārya Svāmī

 

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