Woman in Vedic art

नारी नरक का द्वार है – किस आशय से इस शास्त्रकथन को समझना चाहिये ? How to comprehend the scriptural proposition claiming woman to be the gateway to hell ? (Only Hindī version)

शास्त्र पुरुषप्रधान दृष्टि से लिखे गये हैं । नारी नरक का द्वार नहीं है । यहाँ अर्थ ‘रूढिवृत्ति’ एवं ‘योगिकवृत्ति’ से भी न लेकर ‘गङ्गायां घोषः’ (गङ्गा जल के मध्य/भीतर ग्वालों की बस्ती है – शाब्दिक अर्थ यौगिक एवं रूढी से लिया गया) की तरह ‘लक्षणावृत्ति’ (गङ्गाजल के तटस्थ किनारे पर गोपों की गोष्ठी है – लक्षणा से लिया गया) से लेना है । अतः लौकिकी नारी में आसक्ति (भगवद्भक्ता नारी में भी लौकिक भाव से आसक्ति इसी श्रेणी के अन्तर्गत है) निवृत्तिमार्गीय अध्यात्मवादि मुमुक्षु (चतुर्थ वैदिक पुरुषार्थ) अथवा भगवत्प्रेमपिपासु (पञ्चम वैदिक पुरुषार्थ) साधक पुरुष (यथा गोस्वामी तुलसीदास व बिल्वमङ्गल ठाकुर का दृष्टान्त) के लिये नरक का द्वार है , वैसा आशय ही सुसङ्गत है । वैसे ही अध्यात्मवादिनी निवृत्तिमार्गपरायणा नारी के (यथा भक्तिमती मीराबाई व कर्मैतिबाई आदियों का दृष्टान्त) लिये लौकिक पुरुष में (भगवद्भक्त पुरुष में भी आसक्ति इसी श्रेणी के अन्तर्गत है) आसक्ति नरक का द्वार है । यहाँ नरक का अर्थ भी लक्षणावृत्ति से लेना है, जिसका अर्थ होगा ‘मोक्ष-प्राप्ति-बाधकत्व’ — कुम्भीपाक आदि नरकगमनत्व नहीं ! अन्यथा, तो गृहस्थ-आश्रम में स्थित प्रवृत्तिमार्गीय पुरुष भी नरक प्राप्त करेगा केवल नारी में आसक्त होने के कारण – जो कि असङ्गत है क्योंकि वैदिक प्रवृत्तिमार्ग का तो लक्षण ही काम्यकर्म, स्वर्गप्राप्ति व देहगेहादि में आसक्ति है — जो कि नरक का द्वार तो नहीं, पर मोक्षप्राप्ति का बाधक अवश्य है ! इसी प्रवृत्तिमार्गीय गृहस्थाश्रम को गृहमेधित्व से संसूचित किया गया है अध्यात्मवादियों की द्वारा ।

 

अन्यथा, ऐसा न मानने पर तो प्रवृत्तिमार्गपरायणा सती पतिव्रता स्त्री की अपने पति के साथ जन्मजन्मान्तरों तक सहगति व उस पतिव्रता स्त्री का अपने पति में अनन्यासक्ति का भाव – ये दोनों ही कुम्भीपाकादि नरक के द्वार जो माने जायेङ्गे ! तब तो परस्पर अत्यन्तासक्त सत्यवान्/सावित्री आदियों का भी कुम्भीपाकादि नरकगमन होना चाहिये था – स्वर्गप्राप्ति नहीं ! और गृहस्थाश्रम में सन्तानोत्पत्ति निमित्त व कामभोगविलाससुखादि तो कर्त्तव्य माने गयें है प्रवृत्तिमार्गीय गृहस्थाश्रमीयों के लिये । अन्यथा तो देवहूति व कर्दम ऋषि को भी केवल सन्तानोत्पत्ति निमित्त ही समागम करना चाहिये था – पर उन्होंने तो तदतिरिक्त बहुकालपर्यन्त भोगविलासादि कार्य किये जो कि श्रीमद्भागवतोक्त प्रमाणित हैं ।

 

रूढी/लक्षणा/व्यञ्जना/अभिधा/मुख्या/जहत्/अजहत्/जहदजहत् (व्याकरण) आदि के भेद को जानने के लिये पहले संस्कृत व्याकरणादि/निरुक्त व श्लेषोपमा तथा ध्वनित आशय का समधिगम करने के लिये छन्द/अलङ्कार/नाट्यादि शास्त्रों का अध्ययन करना पडेगा ! तत्पश्चात् न्याय/मीमांसादि दर्शनों का एवं अन्त में शास्त्रों का आशय पूर्वापरसङ्गति व परस्परबलाबलप्रामाण्य से ज्ञात होता है प्रकरणसङ्गता व्याख्या के सम्पन्न होने से षड्लिङ्गतात्पर्यनिर्णय (मीमांसा) + पञ्चाङ्गि-न्याय (नव्य-न्याय) + पञ्चाङ्गि-अधिकरण-प्रक्रिया (वेदान्त) के द्वारा । अतः सनातनपरम्परा के शास्त्रों के परोक्षकथित कूट-मर्मार्थों का अर्थघटन कोई अर्भकों की क्रीडा कदापि नहीं !

 

 

— भक्तिरसवेदान्तपीठाधीश्वर गुरुपादाचार्य स्वामी

(भारत व यु.एस.ए.)

Leave a Reply

Please log in using one of these methods to post your comment:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s