Ideological fallacies of Abrahamic/Semitic+Vaisnava conglomerate pseudo-Vedic institutions.

 

 

Certain statements of Bhaktirasāmṛtasindhu of Śrīla Rūpa Gosvāmipāda show the reality of those neo-Gauḍīya organizations which try to establish their spirituality/devotion on the basis of the strength of wealth and followers + philosophical deviance in the ISKCON organization which verifies its contradictory beliefs to the conventional Gaudiya Vaisnava philosophy  + non-Vedic alignment permeated in ISKCON —

 

1) dhana-śiṣyādibhir dvārair yā bhaktir upapādyate |

vidūratvād uttamatā-hānyā tasyās ca nāṅgatā ||

 

– BRS 1.2.259 & BRS 1.2.113 and its commentaries clarify that the bhakti which is established on the grounds of wealth and followers – is not to be considered part of uttamā-bhakti because it destroys the creeper of uttama-bhakti or ‘uttamata-hani’ (even if obtained) — (it cannot be considered sādhana-bhakti and when it is not sādhana-bhakti, it cannot give rise to bhāva or prema, irrespective of vaidhī or rāgānugā types; it can, however be considered to be the gateway or dvāra-svarūpa for acquiring the sukṛti needed to gain the prathama-sādhu-saṅga needed for obtaining the pāramārthikī-śraddhā or the bhakti-latā-bīja).

 

***

 

2) इस्काँन संस्था के वे महत्त्वपूर्ण सैद्धान्तिक दोष जो कि उसे पारम्परिक गौडीय वैष्णव सिद्धान्त के प्रतिकूल प्रमाणित करते है —

 

क) उपर्युक्त अपधर्मी संस्थान के नेतालोग सोचते हैं कि रागानुगा-भक्ति, सिद्ध-देह, रस-तत्त्व, तथा मंजरी-भाव  — इनकी गौडीय वैष्णव सिद्धांतों के मत्त्वपूर्ण पहलू के रूप में तनिक भी आवश्यक्ता नही है। इसके अलावा, वे मानते हैं कि इन विषयों पर कोई भी चर्चा सभी के लिये अप्रासंगिकी तथा अहितकारिणी है। पर हाय! इन बिन्दुओं को बाहर निकालना अथवा उपेक्षित करना, सम्पूर्ण सम्प्रदाय को असम्बद्ध तथा चैतन्य चरितामृत १.१.४ एवं विदग्ध-माधव-नाटकम् १.१ में दर्शाये हुए श्री चैतन्य महाप्रभु के अद्वितीय योगदान को उपेक्षित करना होगा। उपर्युक्त अपधर्मी संस्थान में ऐसा भी माना जाता है कि केवल वैधी-भक्ति के अभ्यास से ही श्री कृष्ण को व्रज-लीला में प्राप्त किया जा सकता है, तथा रागानुगा-भक्ति एकमात्र घटक नहीं है और वस्तुतः वैकल्पिक होने के कारण अनावश्यक है – यह सब ऐसा कुछ है कि जो पूर्वाचार्यों द्वारा प्रस्थापित सिद्धांतों के पूर्णतः विपरीत है। देखिये: श्री.भा. १०.४७.६०, चै.च. १.३.१५-१७. चै.च. २.२४.८७, चै.च. २.२२.१५६-१५७, चै.च. २.२२.१५८ अथवा भ.र.सि. १.२.२९५, चै.च. २.२२.१५९, चै.च. २.२२.१६० अथवा भ.र.सि. १.२.२९४ तथा चै.च. २.२२.१६१-१६६ । अतः यह सिद्ध होता है कि ऐसे अपधर्मी ‘साधना’ के वास्तविक पथ से अवगत ही नहीं हैं जो गौडीय वैष्णवों के लक्ष्य तक ले जाता है। इस अवस्था को साधन-संबंधि-भ्रम’ कहा जाता है।

 

ख) उपर्युक्त अपधर्मी संस्थान के नेतालोग सोचते हैं कि गोलोक-धाम ही सर्वोच्च/उच्चतम गंतव्य है, किंतु अहो! गौडीय गोस्वामिप्रणीत ग्रन्थों यथा लघु-भगवतामृत इत्यादि के अनुसार भौम-व्रज अथवा गोकुल-वृंदावन ही शुद्ध-माधुर्यमयी-रागानुगा-भक्ति के साधकों का शाश्वत गंतव्य है। गोलोक-धाम निम्बार्क सम्प्रदाय के अनुयायीयों का अभिलाषित गंतव्य है, जो श्रीश्रीराधा-कृष्ण को वैधी-भक्ति मार्ग से स्वकीय भाव में पूजते हैं। ल.भा. १.५.४९७-५४० देखिये। अतः यह सिद्ध होता है कि ये अपधर्मी निश्चित ही भ्रम में हैं अपने अंतिम गंतव्य स्थल के विषय में। इस अवस्था को ‘साध्य-संबंधी-भ्रम’ कहते हैं।

 

ग) उपर्युक्त संस्थान से हमारे पृथक होने का तीसरा कारण यह है कि उस परम्परा विरोधी संस्थान के वर्तमान GBC बद्ध-जीवों के सीधे श्री कृष्ण की नित्य-लीला से पतन की परिकल्पना का समर्थन करते हैं तथा उसे स्वीकृति देते हैं, साथ ही यह प्रचार भी करते हैं कि सारे बद्ध जीव अनादि काल से ह्लादिनी-वृत्ति-स्वरूप-कृष्ण-प्रेम-युक्त हैं- धारणायें जो शास्त्रों, पूर्वाचार्यों, तथा अन्य सभी प्रामाणिक वैष्णव सम्प्रदायों को कदापि स्वीकृत नहीं। उपर्युक्त संस्थान के वरिष्ठ अधिकारियों के द्वारा परिगृहीत यह सिद्धांत शांकर-मतावलम्बियों के प्रतिबिम्ब वाद तथा ‘परिच्छेद वाद’ के सिद्धांतों की श्रेणी में ही आता है, जिसकी कड़ी निंदा श्रील जीव गोस्वामी ने अपने तत्त्वसंदर्भ में की है। अतः उस परम्परा विरोधी संस्थान के वर्त्तमान GBC की बद्ध-जीवों के सीधे श्री कृष्ण की नित्य-लीला से पतन की परिकल्पना तथा अनादि काल से उनका कृष्ण-प्रेम युक्त होना, यह वास्तव में मायावादी सिद्धांतों के समर्थन का प्रतीक है। श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर की ‘माधुर्य कादम्बिनी’ से यह सिद्ध होता है कि यदि कोई व्यक्ति कृष्ण-प्रेम को प्राप्त है, वह कभी भी भौतिक संसार में गिर नहीं सकता अथवा पतन को प्राप्त नही हो सकता। यदि उसका पतन होता भी है, तब उसे वैसा ही अवास्तविक पतन मानना होगा जैसा कि जय, विजय या चित्रकेतुइत्यादि का हुआ। अतः यह सिद्ध होता है कि ऐसे अपधर्मी जो मूल सिद्धांतों को विकृत, विपरीत तौर से प्रतिपादित करते हैं, वे न केवल मायावादियों को प्रतिबिम्बित करते हैं, बल्कि वे भक्तिदेवी (श्री कृष्ण भगवान की अंतरंगा शक्ति) की महिमा को भी घटाते हैं,तथा मायादेवी (श्री कृष्ण भगवान की बहिरंगा शक्ति) का वर्चस्व स्थापित करते हैं। इतना ही नहीं. वे अपने स्वरूप तथा इतिहास को लेकर भी पुर्णतः हैरानी में हैं। इस अवस्था को स्व-स्वरूप-भ्रम’ कहते हैं।

 

घ) हमने उपर्युक्त संस्थान की वर्त्तमान विपथगामी प्रणाली का भी विरोध किया, जिसके अंतर्गत कोई भी ४ आर्य-वर्णों मे से एक में जन्मे पूर्ववासी – oriental (भारतीय) भक्त को — पाश्चात्य तथा अन्य अनार्य-वर्णों यथा म्लेच्छ, यवन  इत्यादि निम्न कूलों में जन्में गोमांसभक्षण करने वाले, मदिरापान तथा अन्य नशीले पदार्थों का सेवन करने वाले, तथा जन्म से ही व्यभिचार करने वाले परिवर्तित किये हुए वैष्णवों/भक्तों  के समतुल्य माना जाता है। इस प्रकार की विचारधारा, वैचित्र्ययुक्त कर्मों के सिद्धांतों को पूर्णतः असंबद्ध कर देती है।

यह धारणा कि सभी मनुष्य जन्मतः समान हैं, तथा ईश्वर ने उनकी रचना समान रूप से की है, पूर्णतः पाश्चात्य धारणा है, जिसका न केवल गौडीय वैष्णव सम्प्रदाय में, बल्कि समूचे सनातन धर्म में कोई अस्तित्व या स्थान नही है। क्यों? क्योंकि यह स्वीकार करना कि सभी मनुष्य जन्मतः समान हैं अर्थात् विभिन्न कर्म, तथा विभिन्न कर्मफल तथा विभिन्न पूर्व-जन्म-कर्म-फल-अनुसारी-वर्तमान-जन्म-प्राप्ति — इन सब वैदिक सिद्धांतों को नकारना होगा। ईसाई धर्म, यहूदी धर्म तथा मुसलमान धर्म/इस्लाम — पुनर्जन्म के सिद्धांत में विश्वास नहीं रखते क्योंकि वे कर्म-फल-सिद्धांत में ही विश्वास नहीं रखते।

उपर्युक्त संस्थान की अपधर्मी नीतियों के मुताबिक समस्त मनुष्य जो कि ४ आर्य-वर्णों में जन्म लेते हैं, वे सभी जन्मतः शूद्र हैं, तथा जो निम्न-कुलों, यथा म्लेच्छ-यवन कुलों में जन्मे हैं, उन्हें जन्मतः शुद्र-वर्ण में ऊर्द्ध्वगत (promoted to śūdravarṇa from the very birth) कर दिया गया है। उस संस्थान में दीक्षा लेते ही निम्न-कुल के भक्त तत्काल ही ब्राह्मण बन जाते हैं एवम् उसके पूर्व-संचित संस्कार पूरी तरह से तुरंत ही नष्ट हो जाते हैं (कुछ ऐसा जो निचले स्तर पर व्यावहारिक रूप से देखा नहीं गया तथा उस संस्थान की म्लेच्छकुलजात सन्न्यासी/गुरु-पतन की गाथा इसके ठीक विपरीत ही सिद्ध करती है) एवं तब तक सभी शूद्र हैं। कितनी हास्यास्पद बात है। ये चतुश्श्रेणी/चार स्तरीय प्राचीन वर्णाश्रम प्रणाली पर स्पष्ट रूप से आघात है, इस कारण भी क्योंकि यह नवीन प्रणाली अन्य २ आर्य-वर्णो यथा क्षत्रियों तथा वैश्यों के समावेश की कोई गुंजाइश ही नहीं रखती। यह स्पष्ट उल्लंघन है सनातन-धर्म के परम्परागत मानदंडों का तथा प्राचीन चतुःश्रेणीय वर्णाश्रम प्रणाली का जिसकी स्थापना स्वयं भगवान श्री कृष्ण ने की है — (भगवद्गीता ४.१३) तथा वेदों के द्वारा भी इस तथ्य की पुष्टि हुई है। “कलौ शूद्र सम्भवाः ‘’ इस श्लोक का तात्पर्य भी अप्रासंगिक रूप से गलत समझा गया है।

साथ ही, अन्य उदाहरण जो इनके मिथ्या चरित्र/दोहरेपन को दर्शाता है, वह यह कि उस संस्थान के पाश्चात्य सदस्य स्वयं को आडंबरपूर्ण ढंग से ब्राह्मण कहलवाते हैं तथा अन्य अवसरों पर अथवा समय की आवश्यक्तानुसार वे समयानुवर्तीयता (opportunistically) से स्वयं को उच्चस्तरीय वैष्णवों कि पदवी देते हैं। अगर वे यह मानते हैं वैष्णवत्व ब्राह्मण बनने से उच्चस्तरीय है, तब वे ब्राह्मण बनना ही क्यों चाहते हैं? कृत्रिम रूप से ब्राह्मण बनने की यह तृष्णा/इच्छा वास्तव में अन्य-अभिलाषा अर्थात् बाह्य इच्छा अथवा मनोकामना में परिणत होती है, जो शुद्धा-भक्ति की लता को क्षति पहुँचाती हैं, जहाँ कि मोक्ष या मुक्ति की अभिलाषा को भी निकाल फेंकना चाहिये।

उपर्युक्त संस्थान का अपधर्मी नेतृत्व प्राचीन आर्यन (आर्य समाज यहां अभिप्रेत नहीं है) प्रणाली, जो चार  वर्णों को गुण, कर्म, स्वभाव, जन्म — इन गुणन खंडों/तत्त्वों के आधार पर सुनिश्चित करती है (मुख्यत: जन्मना, गौणत: गुणस्वभावकर्मेभ्यो) – कि  पूर्णतः उपेक्षा करता है — जन्म इस सर्वमुख्य तत्त्व को निष्कासित कर के तथा केवल अन्य तीन तत्त्वों पर आधारित होकर । यह स्पष्ट उल्लंघन है जीव गोस्वामी, श्री विश्वनाथ चक्रवर्ती तथा श्रील बलदेव विद्याभूषण (सभी गौडीय  पूर्वाचार्य) के भक्तिरसामृतसिंधु, श्रीमद्भागवतम व श्रीमद्भगवदगीता आदियों पर की हुई टीका तथा टिप्पणीयों में निर्धारित किये तत्त्वों तथा सिद्धांतों का । केदारनाथ दत्त भक्तिविनोद जी भी (जो कि इस्कान के पूर्वगुरु हैं) अपने ग्रन्थ जैवधर्म में स्पष्ट करते हैं कि म्लेच्छ/यवन/चांडाल कुल में जन्मे दीक्षित वैष्णव ४ आर्य-वर्णों में जन्मे वैष्णवों से वैवाहिक अथवा किसी भी प्रकार का शारीरिक सम्बंध स्थापित नही कर सकते। पूर्वाचार्यों द्वारा प्रस्थापित इस प्रतिबंध का उल्लंघन करना अब एक समान्य नित्य-नियम हो चुका है तथा उपर्युक्त संस्थान का अपधर्मी नेतृत्व तथा उनके द्वारा स्थपित की हुई नीतियाँ इस विकृति को बढ़ावा भी देती है तथा अंतर-प्रजातीय (inter-ethnical/racial) विवाहों को प्रोत्साहन भी देती हैं इस तथ्य पर आधारित होके कि सभी मनुष्य जन्मतः समान हैं- ऐसा तथ्य जिसका समर्थन ना तो वैदिक धर्म करता है, न ही पूर्वाचार्य। अंतर-प्रजातीय विवाहों को प्रोत्साहन देना वास्तव में वर्ण-संकर जैसी अवैदिक-प्रणाली को प्रोत्साहित करना है जिसका वर्णन भगवद्गगीता के १.४०-४२ इन श्लोकों से होता है तथा जैव धर्म के ६वें अध्याय से भी जो कि स्पष्ट रूप से म्लेच्छ/यवन/चांडाल कुल में जन्मे दीक्षित वैष्णवों का ४ आर्य-वर्णो में जन्मे वैष्णवों से अंतर-प्रजातीय विवाहों को निषेध करते हैं।

 

Philosophical deviance in the ISKCON organization which verifies its contradictory beliefs to the conventional Gaudiya Vaisnava philosophy.

 

a) The heretic leadership of that institution thinks that topics concerning raganuga-bhaktisiddha-deharasa-tattva, and manjari-bhava are not needed as the core aspects of the Gaudiya Vaisnava philosophy. Moreover, it considers any discussion on these topics as irrelevant and even detrimental for all. But alas, taking them out would make the whole Sampradaya irrelevant and the unique contribution of Caitanya Mahaprabhu as seen in CC 1.1.4 and Vidagdha-madhava-natakam 1.1 – fully ignored. It also considers that only by the practice of vaidhi-bhakti alone, one can attain Krsna in Vraja-lila and that raganuga-bhaktiis not the sole factor and not really required – something in clear violation with the purvacaryas‘ siddhanta. Vide SB 10.47.60, CC 1.3.15-17, CC 2.24.87, CC 2.22.156-157, CC 2.22.158 or BRS 1.2.295, CC 2.22.159, CC 2.22.160 or BRS 1.2.294 & CC 2.22.161-166. Hence, it is proved that such heretics are not aware of the actual path or ‘sadhana’ leading to the objective of Gaudiya Vaisnavas. This is called ‘sadhana-sambandhi-bhrama’.

 

b) The heretic leadership of that institution thinks that Golokadhama is the supreme destination. But, alas, according to the Gaudiya Gosvami literature like Laghu-bhagavatamrta etc. Bhauma Vraja or Gokula Vrndavana is the eternal destination for the sadhakas of the suddha-madhurya-mayi-raganuga-bhakti. Golokadhama is the aspired destination of Nimbarkis who worship Radha and Krsna through vaidhi-bhakti and with the mood of ‘svakiya’. Vide LB 1.5.497-540. Hence, it is proved that such heretics are certainly in confusion about their final destination place! This is called ‘sadhya-sambandhi-bhrama’!

 

c) Third reason of separation is that the current Governing Body Commission of that heterodox institution is accepting the baddha-jivas’fall down theory directly from the nitya-lilaof Krsna and also propagates that all baddha-jivasare containing the ‘hladini-vrtti-svarupa-krsna-prema‘ from time without beginning – notions which are not acceptable according to sastraspurvacaryas and all other bona fide vaisnava sampradayas. Present theory accepted by the top leadership of that organization is almost on par with the criticism of the pratibimba-vada and pariccheda-vada theories of the Sankarite Mayavadi philosophy heavily criticized by Srila Jiva Gosvami in his Tattva-Sandarbha. Hence, the present theory of those heretics on jivas containing krsna-prema from anadi-kala and their fall-down from the nitya-lila of Sri Hari – is supporting the Mayavada theory in allusion. VCT’s Madhurya Kadambini proves that anybody having ‘bhagavat-prema’ cannot actually fall down in the material world. If he falls, it can only be considered equivalent to the not actual fall down of Jaya, Vijaya and Citraketu. Hence, it is proved that heretics propounding opposite to the actual siddhanta are not only resembling Mayavadis, but are also offenders unto the Lotus Feet of Bhakti Maharani – for they are minimizing the glories of Bhaktidevi (the internal potency of Krsna) and establishing the glories of Maya to be greater! Moreover, they are in total perplexity about their own svarupa and itihasa (i.e. identity and history). This is called ‘sva-svarupa-bhrama’.

 

d) The ISKCONite system set by the currently deviant policies of that institution are objectionable, in which, any oriental Bharatiya devotee born in any one of the 4 arya-varnas was considered on an equal plane with the mleccha/yavana born in Western and other non-Aryan countries and eating Mother Cow’s flesh, drinking wine, and committing adultery since birth before becoming a devotee and member of that institution. Thinking as such makes the law of variegated karma totally irrelevant.

 The notion that all men are created equal is a Western concept and has no place in Sanatana Dharma (not just Gaudiya Sampradaya). Why? Because accepting that all humans are created equally – means that the variegated karma and the variegated karma-phala and the variegated purva-janma-karma-phala-anusari-varttamana-janma-prapti – is negated
Christianity, Judaism & Islam don’t believe in ‘punar-janma-vada’ or the theory of reincarnation because they don’t believe in karma-phala-siddhanta.

According to the heretic policies of that organization, all born in 4 arya varnas are literally sudras and even those lower than sudras like mlecchas/yavanas are also promoted as sudras merely by birth! By taking  diksa in that organization, one becomes a brahmin instantly and all his previous samskaras are instantly wiped off (something not seen practically on the ground-level and the fall-down history of that organization also proves vice versa) and till then all are sudras. What a joke! This is clearly hurting the four tier classical varnasrama system, as it leaves no space for the inclusion of the other two varnas like ksatriyas and vaisyas. This is clear contravention of the four-tier varnasrama system set by the Vedic scriptures and general conventional norms of age-old Sanatana Dharma. The “kalau sudra sambhavah…” verse is also wrongly interpreted out of context.

Also, another example of hypocrisy is that many times, generally, members of that organization pompously call themselves as brahmins and promote themselves a such, but on other times, when opportunistically needed, they minimize the position of brahmins and call themselves higher as ‘vaisnavas‘. And if they consider Vaishnavism to be higher than becoming a brahmana, why do they want to become a brahmana at all? Their desire to become a brahmana artificially only culminates in the ‘anya-abhilasa’ or external desires harming the creeper of suddha-bhakti – wherein, even the desire of moksa or liberation have to be discarded.

The heretic leadership of that organization completely ignores the Aryan (not to be confused with Arya Samaj) system of ascertaining four varnas based on all factors like guna, karma, svabhava, and janma, (and preliminarily, by janma and secondarily by other factors) by eliminating the factor of janma and keeping the rest three. This is in clear violation of Jiva Gosvami’s, Visvanatha Cakravarti Thakura’s, Baladeva Vidyabhusana’s (all Gauḍīya purvacaryas’) comments on certain passages of Bhaktirasamrtasindhu, Srimad Bhagavatam and Srimad Bhagavad Gita. Even according to a neo-Gauḍīya master like Bhaktivinoda Kedarnath Dutt in his Jaiva Dharma, even an initiated vaisnava born in mleccha/yavana/candala family cannot keep any marital or other type of bodily relations with the vaisnavas  born in the four arya varnas. Transgressing these customs laid by purvacaryas, it has become a normal routine and is actually promoted by the current policies set by the heretic leadership of that organization to have inter-racial marriages on the plane of social/spiritual equality – something not accepted even by BVT (ISKCON’s earlier guru) and by the normal customs of Vedic culture. Allowing inter-racial marriages is actually considered promoting the anti-Vedic system of ‘varna-sankara’ as also seen depicted in BG 1.40-42 and Jaiva Dharma’s 6th Chapter prohibits the interracial marriage of vaisnavas born in contaminated families on par with those born in the arya-varnas.

 

***

 

3) Non-Vedic faiths are equivalent to atheism/agnosticism.

 

Non-Vedic faiths are not true religion (not at least, in the classical Gaudiya Vaishnava perspective) —

 

In the beginning of the 1st Chapter, Verse 1st of Siddhānta Darpaṇaḥ, Gauḍīya-vedāntācārya Śrīla Baladeva Vidyābhūṣaṇapāda (17th Century Gauḍīya Vaiṣṇavism) and his mantra-śiṣya Śrī Nanda Miśra Prabhu (the commentator) define atheism as unbelief in the Vedic scriptures and not as mere unbelief in the existence of God. So, all other heterodox religious traditions not following Vedic Dharma and who have self-confessed themselves as the non-Vedic path-treaders in their classical sectarian texts (this includes the Indigenous non-Vedic denominations like Buddhism, Jainism, Sikhism, Vira-shaivism/Lingayatism, Pashupatism/Kashmira-shaivism, Natha sect, Aghora/Vama-marga/Kapalika, non-Vedic Shaktism etc. along with all variants of perverted neo-Hinduism like the Brahma-kumaris, Nirankaris, Radhasoamis, Sai Baba, Kabirapantha, Dadupantha etc. + ISKCON (because, ISKCONites consider Abrahamic faiths to be one form of Vaiṣṇavism and have invented works like Vedic Christianity and Vedic Islam) the non-Vedic Occidental & Mid-eastern Abrahamic denominations like Christianity, Islam, Judaism, Zoroastrianism/Baha’i etc.) are strictly and technically speaking various forms of atheism only. Why? Because, only Vedas are the eternal scriptures guiding the religion revealed by Lord Nārāyaṇa. In this perspective, if anyone claims to perform Kṛṣna-bhakti without Vedic Dharma/saṁskṛti, he is a ‘nāstika’ (atheist) or an ‘ardha-nastika’ (semi-atheist). Evidence —

 

“vedaṁ tad-vācyaṁ pareśañ ca durdhiyo nāstikā na manyante. kecic ca āstikābhāsāḥ saṁśrayanty ardha-kukkuṭīyam.”

 

Rendition –

 

“Vedas and the God who is propounded by those Vedas are not accepted by the atheists of contaminated intelligence. Some theist-like (āstika-ābhāsa or ardha-nāstika) people take shelter of the half-chicken logic (like we believe in God or His devotion but not in the Vedic scriptures’ dictums or vice versa).”

The same notion finds affirmation in the classical Sanskrit commentaries on Maharsi Badarayana Krsnadvaipayana Vedavyasa’s Brahmasutram (Vedanta-darsanam) – “iksateh na asabdam”  – where ‘pradhana/material nature/prakriti has been differed between Vedic and non-Vedic categories (especially, in Śrīla Baladeva Vidyabhusana’s Govinda-bhasyam commentary on it). The Patanjala-yoga-sutra’s maxim – “isvara-pranidhanad va” has been interpreted in the same light to distinguish between the Vedic and non-Vedic concepts of ‘isvara/God’ – thus holding non-Vedic concepts of God on par with atheism or nastikya-vada.

 

 

 

— Bhaktirasavedantapithadhisvara Acarya Sri Gurupada

2 thoughts on “Ideological fallacies of Abrahamic/Semitic+Vaisnava conglomerate pseudo-Vedic institutions.

  1. Additional note —

    For all the ideological deviance seen in the philosophy of the organization targeted in the above article, directly, its Founder-Acarya and his guru are, ultimately, responsible and not just the current central managerial administrative body of that institution — for most of the institutional ideology comes directly from the founder and his printed works and not from the latter managers. Managerial body implements the said ideology designed by the institutional founder.

    — Gurupadacharya Svami

    Liked by 1 person

  2. If the uncompromising propagation and defense (and offense, too, if needed) of the Vedic orthodoxy is termed as ‘jealousy’, perhaps, the labellers have forgotten that it is not ‘मात्सर्यं’ nor jealousy — but, ‘शास्त्रवर्त्मानुवार्त्तनम्’ or a strict abide by the scriptures and traditions and not doing so, would result in a gravely heinous crime as substantiated by the Shrimad-bhagavad-gita verses of 16.23-24.

    Liked by 1 person

Leave a Reply

Please log in using one of these methods to post your comment:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s