​Query & reply from  ‘BRVF – Vedanta – 1’ group on WhatsApp —

[10/16, 11:59 AM PST] 
Collegian Mr. Mohit Sharma (Panipat, Haryana, Bharata): 
महाराज जी एक जिज्ञासा है की भागवत  के माहात्म मे लिखा है की भागवत रस बैकुण्ठ मे भी नही है लेकिन जिज्ञासा ये है की ये भागवत तो स्वयं नारायण ने बैकुण्ठ मे  ब्रह्मा को सुनाई थी  तो एसा क्यो लिखा है की भागवत बैकुण्ठ मे नही है?? भागवत ही कृष्ण है तो कृष्ण के धाम मे स्वयं कृष्ण रुप मे भागवत ही तो विराजमान होगा–????

Reply by Bhakti-rasa-vedanta-pithadhishvara —

क) श्रीमद्भागवत का जो माहात्म्य (६ अध्यायों में) पद्मपुराण में वर्णित हुआ है, उसमे एक कथन प्राप्त होता है —
“स्वर्गे सत्ये च कैलासे वैकुण्ठे नास्त्ययं रसः । अतः पिबन्तु सद्भाग्या मा मा मुञ्चत कर्हिचित् ।।”
अर्थ —
“इन्द्रदेव के स्वर्गलोक में, ब्रह्मा के सत्यलोक में, शिव के कैलास में व विष्णु के वैकुण्ठ में — यह श्रीमद्भागवतरूपी रस विद्यमान नहीं है । (केवल पृथ्वीलोक या भूलोक पर ही विद्यमान है) । अतः, हे सद्भाग्यशाली जन! आप सभी इस रस के आस्वादन के अवसर को कभी भी न छोंडे ।”
यही बात श्रीमद्भागवत के १.१.३ में कही गयी —
“निगम….पिबत भागवतम् रसमालयं मुहुरहो रसिका भुवि भावुका: ।।” 
अर्थ —
“मोक्षप्राप्ति के अनन्तर भी तथा, विशेषतः पृथ्वीलोक पर रसिक तथा भावुक जन बार बार भागवतरस का पान करते रहें ।”
ख) दूसरी ओर, पुराणों में उल्लेख हुआ है कि कैसे श्रीमद्भागवत वैकुण्ठ/गोलोक धाम में श्रीभगवान् के द्वारा कही गयी ।
ग) यहाँ दोनों कथनों में बाह्य-दृष्टि से विरोध प्रतीयमान होने पर भी वास्तविक विरोध नहीं है । कैसे? 
श्रीमद्भागवत के  ऊपर दिए १.१.३ में उल्लेख है कि रसिक व भावुक जन श्रीमद्भागवतरस का भूर्लोक या पृथ्वीलोक पर स्थित हो पान करेंगे । ‘पिबत’ शब्द पान (रस का) को सूचित करता है । 
तात्पर्य यह है कि ऊपर दिए पद्मपुराण के भागवत-माहात्म्य के श्लोक में जो कहा गया कि यह भागवतरस वैकुण्ठ(गोलोक) में प्राप्त नहीं — उसका अर्थ है कि श्रीमद्भागवत के ह्रदयस्वरूप दशम स्कन्ध के पूर्वार्ध में वर्णित जो प्रकटव्रजलीला का वर्णन है, उस व्रजरस का अनुभव व पान तो केवल पृथ्वीलोक स्थित भौम गोकुल व्रज में ही ‘सिद्धदेह’ या ‘साधकदेह’ एवं कालान्तर में ‘पार्षददेह’ के द्वारा प्रवेश कर सम्भव है न! गोलोक/वैकुण्ठ में तो ऐसी लीलाएं सम्भव नहीं! 
अतः श्रीमद्भागवत भले ही वैकुण्ठ/गोलोक में प्रवचन को प्राप्त हुई हों, तथापि उसमें वर्णित व्रजरस का आस्वादन/अनुभव/पान तो केवल भौम व्रज का ही किसी न किसी प्रकार से आश्रय ग्रहण कर (ऊपर बताये ३ प्रकार के देहों द्वारा) ही तो सम्भव है न! 
व्रजरसपान यहाँ अभिप्रेत है, केवल व्रजरस का विवरण नहीं । विवरण तो गोलोक/वैकुण्ठ में प्राप्त है, उसका अनुभव भौम व्रज (पृथ्वीस्थित) का शारीरिक/मानसिक आश्रय ग्रहण किये बगैर सम्भव नहीं । 
तभी तो गौडीयवैष्णवाचार्य श्रील रूप गोस्वामी प्रभुपाद निज कृति ‘उपदेशामृतैकादशकम्’ में कहते हैं —
“तन्नाम-रूप-चरितादि……तिष्ठन् व्रजे तदनुरागि-जनानुगामी कालं नयेदखिलमित्युपदेश-सारम् ।।” 
अर्थ — 
“श्रीराधा-व्रजेन्द्र-किशोर के नाम-रूप-चरित आदियों का जो श्रवण, कीर्त्तन व स्मरण करता है…..मन अथवा शरीर से व्रज में निवास कर तथा रागमार्गीया साधनापरायण रसिक/भावुक वैष्णव गुरु के आनुगत्य में — यह समस्त शिक्षाओं का सार है ।”
यही बात पुनः भक्तिरसामृतसिन्धु में कही गयी —
“सेवा साधक-रूपेण सिद्ध-रूपेण चात्र हि । तद्भाव-लिप्सुना कार्या व्रज-लोकानुसारत: ।।”
अर्थ —
“रागमार्गीया सेवा साधक व सिद्ध देहों से रागमार्ग-लिप्सु/लोभी साधक के द्वारा व्रज के नित्यसिद्ध परिकरों के आनुगत्य में करनी चाहिए ।”
पुनः श्री जीव गोस्वामी कहते हैं श्रीरंगम् स्थित रामानुजीय वैष्णवविप्रकुलप्रसूत श्री गदाधरभट्ट गोस्वामी के प्रति पत्र में कि —
“अनाराध्य राधापदाम्भोज-रेणुमनाश्रित्य वृन्दाटवीम् तत्पदाङ्काम् । असम्भाष्य तद्भाव-गम्भीर-चित्तान् कुतः श्याम-सिन्धो: रसस्यावगाह: ।।
अर्थ —
“श्रीराधा के पदकमलों की रेणु की आराधना किये बिना + वृन्दावन/भौम व्रज का शारीरिक/मानसिक रूप से आश्रय ग्रहण किये बिना + व्रज के भाव/रस में डूबे हुए गम्भीर (दार्शनिक प्रकृति) चित्त वाले (उपर ऊपर से व्रज रस में पगलाने का नाटक करने वाले छिछरे चित्त वाले चुलबुले लोग नहीं) रसिक/भावुक जनों से संभाषण किये बिना — कैसे कोई श्यामरससागर में अवगाहन कर सकता है (अर्थात् नहीं) ।”
— गुरुपादाचार्य

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