​प्रश्नोत्तरमाला – ५  (१६ प्रश्नों का उत्तर) / Question + Answer Series – 5 (16 Queries Answered)
Various theological queries + replies + feedbacks + testimonials (in Hindi, Sanskrit & English languages) from ‘BRVF – Vedanta – 1st + 2nd + 3rd + 4th + Very Last Chance’ groups on the WhatsApp cyber platform —
Section A — Interactions from followers —
1) [04/12, 00:41 as per PST] Mr. Aryan Paladin — Srilankan Tamilian lands & Singapore (‪+65 9060 3615)‬: 
“Many thanks to Swamiji for clearing up many errors due to the prevalence of Neo-Gaudiya groups & errors today. 🙏🏼🙏🏼🙏🏼”
2) [04/12, 00:51 as per PST] College Student Mr. Mohit Sharma – Panipat, HR, IN (+91 8929686619): 
“जय हो महाराज जी–अति उत्तम समाधान– आपके चरणो मे मेरा बारंबार प्रणाम 🌺🙏
महाराज जी अगर पुराणो मे किसी बात मे  विरोधाभास  हो तो किस पुराण को प्रमाण मानना चाहिये ओर क्यो??–अगर भागवत पुराण को प्रमाण माना जाए तो फिर अन्य पुराणो मे लिखी विरोधाभास की बाते गलत कैसे कही जा सकती हैं?? क्योकि पुराण तो सब शुद्ध ओर नित्य है–

     ओर एक जगह भगवान महाभारत मे अर्जुन से कहते है की जब अर्जुन ने महाभारत के बाद दोबारा गीता सुनाने को कहा तो भगवान ने कहा की मुझे याद नही है की मैने क्या कहा था–मैने वो ज्ञान योगयुक्त होकर दिया था–तुम श्रद्धाहीन हो— महाराज जी भगवान गीता ज्ञान कैसे भूल सकते है??”
3) [04/12, 11:15 as per PST] Entrepreneur (Brand Sparrow) Mr. Shishir Katote R – Pune, MH, IN (+91 9765730977): 
“Hare Krishna. Dabdavat. What is the difference between jati and varna and caste?”
4) [04/12, 17:50 as per PST] Sankarshandas Adhikari / Gaudiya Mutt — Srilankan Tamilian lands & Singapore (+65 92731954): 
“According to our understanding. When we say first deserve than desire, it is only reference to Vaidhi Bhakti in a general sense. Raganuga Bhakti is completely independent and Vaidhi Bhakti cannot produce it.
Dear respected Acarya Sri, when you mentioned “scholarship” is a required element in entering or progressing in Bhakti, does it refers to everyone or towards the Guru ( having scholarship requirements ) is able to guide a disciple thru?”
5) [04/12, 19:08 as per PST] Mrs. Kuheli / Sudevi Mukherjee Chatterjee — West Bengal & New Delhi, IN (+91 9650916060): 
“Dandavat pranām acharyashree. Kindly accept my sincere respect for clearing my doubts.

Hare Krishna! 💐
🙏🏽ji acharyashree ! Without the presence of alternatives or options world will seem robotic to me
Dandavat pranām acharyashree! Kindly shed some light on the topic ” Lord’s eight fold deity form”. 

Hare Krishna!”
6) [04/12, 20:17 as per PST] Mr. Ajay Soni – East UP & Mumbai, MH, IN (+91 9167561570): 
“आचार्य श्री दंडवत प्रणाम पुस्टि मार्ग क्या है इसे किसने स्थापित किया इसके मूल सिद्धांत और उपासना पद्धति के बारे में प्रकाश डाले तथा “नित्यसिद्ध कृष्ण प्रेम साध्य कभू नय” इस चैतन्य चरितामृत वाक्य पे आचार्यो की टिपण्णी क्या है कृपया बताइये”
7) [05/12, 03:36 as per PST] ‪Mr. Aryan Paladin — Srilankan Tamilian lands & Singapore (+65 9060 3615‬): 
“I find your replies to these queries to be deeply enlightening, Swamiji. I love reading & listening to expositions of Vaishnava Vedantic Truths. I’m most Fortunate to be able to access this Wisdom! Pranams Swamiji! 😊🙏🏼”
8) [05/12, 04:25 as per PST] College Student Mr. Aditya Sharma – Mohali/Chandigarh, PB, IN (+91 9878624575): 
“श्री राम कृष्ण गौरहरि आचार्य श्री. दण्डवत स्वीकार करें. आचार्य श्री, आप व्यस्त रहने के बावजूद भी समय-समय पर हमारी अज्ञानता दूर करते रहते हैं और हमारा मार्गदर्शन करते हैं. आपके मार्दर्शन में रहकर आवश्य ही मैं शास्त्रों को सही से समझ सकूंगा, ऐसा मुझे विश्वास है. आपके लेख हमारी बंद  आँखे खोल देते है. आपको मेरा कोटि-कोटि प्रणाम.  🙏🏼🙏🏼😊”
9) [05/12, 23:38 as per PST] ‪Mr. Sumit Parashar — Mandi, HP, IN (+91 70182 87926 & +91 9805214869)‬: 
“Swamy  ji Pranaam..!!
Bhagwan ka aakaar hai ya nir-aakaar”
10) [06/12, 07:39 as per PST] Engineer Mr. Rahul Kambhampati – Hyderabad, TL + Pune, MH + Tennessee, USA (+91 9849789300): 
“Can you tell me what’s the real nature of hare Krishna maha mantra and how the happiness derived from chanting is greater than happiness derived from bodily platform”
11) [06/12, 07:42 as per PST] Mr. Aryan Paladin — Srilankan Tamilian lands & Singapore ‪(+65 9060 3615‬): 
“Swamiji, which is more important in Raganuga Sadhana, chanting the Mahamantra or chanting the deeksha mantras?”
12) [06/12, 08:56 as per PST] HMA EC Secretary Mrs. Soma Nair – Kerala, IN & Laxminarayan Mandir in Burbank, QLD, Australia (+61 478056800): 
“My Guruji had given me a mantra that I recite but I  find I cannot concentrate on that much whereas simple mantras that we chant and hear everyday are more peaceful to me.. Please advise

What if you can’t concentrate on Dikhsha mantra”
13) [05/12, 00:21 as per PST] Mr. Anuraag Burman – Kolkata, WB, IN (+91 8017055069): 
“🌺🌺🙏🏻🌺🌺”
14) [05/12, 06:03 as per PST] Retired ‪Sr. Mr. Vijay Kumar Shangari — Jalandhar, PB, IN & Washington DC, USA (+1 301 641 8741‬): 
“🙏🕉🙏”
15) [05/12, 21:24 as per PST] Mr. Kishor Pathak – Maharashtra, IN (+91 9890495045): 
“🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻”
16) [05/12, 22:26 as per PST] Mr. Vasu – Karnataka, IN (+91 9743599954): 
“🙏”
17) [04/12, 11:52 as per PST] Mr. Mudit Mishra ‘Kanyakubja’ Bilaspur, Chattisgarh, IN (+91 9806309043): 
“👏👏आचार्य जी क्या ये कथन पूर्णतः शास्त्रसम्मत है  – “गम्भीर रूपसे विचार करनेपर यह देखा जाता है कि कृष्णप्रेमकी

प्राप्तिके केवल दो ही मार्ग हैं-विधि और राग। राग दुर्लभ है। रागके

उदय होनेपर विधिकी अपेक्षा नहीं रह जाती। जब तक रागका उदय

नहीं होता, तब तक विधिका अवलम्बन करना ही मनुष्योंका प्रधान

कर्तव्य है। अतएव शास्त्रोंमें दो मार्गोंका उल्लेख है-विधिमार्ग और

रागमार्ग। रागमार्ग बिलकुल स्वतन्त्र है, अतएव उसके लिए कोई

विशेष व्यवस्था या विधि नहीं है। अत्यन्त भाग्यवान और

उच्चाधिकारी साधक ही इस मार्गका अवलम्बन करनेमें समर्थ हैं” ???”
18) [04/12, 17:26 as per PST] Mrs. Pratibha Modi — Vadodara, GJ & Mumbai, MH, IN (+91 9820129858): 
“हरि:ॐ तत्सत् !

‘श्रीगुरुपादाचारयजी’

कोटिश: प्रणमामि !

आप को मै विनंति करती हुँ की 

मेरा प्रश्न का उत्तर आप दो |
ये भागवत नाम क्युं है ?

अौर भागवत के दस लक्षण 

क्या है ?

मैं आप की आभारी रहुँगी |

🌺🙏🙏🙏🙏🙏🌺”
19) [04/12, 20:41as per PST] Mr. Shailendra Singh / Vishnu Dev Chandravanshi / Er. Shubham Mukherji — Bandel, Chinsurah, Hooghly, WB, IN (+91 9831255918): 
“परन्तु मै तो ऐसा समझता हूँ की विकल्प ही मार्ग को दर्शाता है जहाँ विकल्प नही वहां रास्ता भी बन्द”
20) [05/12, 04:27 as per PST] Central Govt. Bureaucrat Officer Mrs. Anita Vashisht (Income Tax Dept. – Ministry of Finance — Govt. Of India — New Delhi, IN (+91 9899974846): 
“👌🏻👌🏻👍🏼👍🏼”
21) [06/12, 00:12 as per PST] Ms. Kaushalya Ramchandani aka Komalasundaridevidasi – ISKCON/GKG —  Sindh, British India + Jabalpur, MP + Mumbai, MH, IN + Barsana, MTJ, West UP, IN (+91 9769458345): 
“आचार्य श्री आपके चरणों में मेरा भक्तिमय प्रणाम

मेरी जिज्ञासा ये है कि मैं जानना चाहती हूँ की प्रह्लाद महाराज कितने समय तक गर्भ में रहे।

आपकी सेविका

कमलसुंदरी दासी
आचार्य श्री मेरी जिज्ञासा जान्ने किये भी है कि

जब बलराम का देवकी माता के गर्भ से संकर्षण कर रोहिणी माता के गर्भ में प्रतिष्ठित किया तब वहां के ब्रजवासियों या नंदबाबा यशोदा मैया ने संशय नही किया कि ये गर्भवती कैसे हैं जबकि इनका पति 7 साल से जेल में है। क्योंकि त्रेता युग में सीता मैया पर तो बहुत आरोप लगे उस काल में,और ये तो द्वापर युग था। ये मेरी जिज्ञासा है संशय नही आचार्य श्री क्योंकि साधु शास्त्र गुरु और भगवान् पे मेरा पूर्ण विश्वास है। आपको शास्त्रों का अत्यधिक ज्ञान है इसलिए जिज्ञासा की।

आपकी सेविका

कमलसुंदरी दासी”
22) [06/12, 07:23 as per PST] Mr. Shailendra Singh / Vishnu Dev Chandravanshi / Er. Shubham Mukherji — Bandel, Chinsurah, Hooghly, WB, IN (+91 9831255918): 
“सादर प्रणाम आचार्य श्रेष्ठ 

मेरी एक जिज्ञाषा है कृपया उनका समाधान करिये

श्रुतियो में प्रजा की उत्पति नारायण से हुआ है ब्राह्मण मुख से क्षत्रिय बाहु से 

वैश्य जंघा से और शूद्र चरण से 

जबकि पुराण में प्रजा की उत्पती महर्षि मनु से प्रजा की सृष्टि कही गई है और महर्षी मनु क्षत्रिय कुल से है 

तो क्या महर्षी मनु ब्राह्मण आदि के भी पिता हुए ?

इसका मार्गदर्शन करे”
23) [05/12, 04:28 as per PST] Mr. Amar Deep Tiwari — Jaipur & Ajmer, RJ, IN (+91 9414003017): 
“🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻 Param shri acharya ji”
24) [05/12, 06:19 as per PST] Mr. Harsh Sharma — New Delhi, IN (+91 9911200099): 
हर्ष शर्मा: “जय श्री हरि। प्रणाम। कृष्ण जी ने, उनके पुत्र ने और अर्जुन ने अपने माम की पुत्रियों से ब्याह क्यों किया ?”
25) [07/12, 22:36 as per PST] Mahant Guru Premanand — Varanasi/Kashi/Benares, East UP, IN (+91 9589320827): 
“सदगुरुदेव भगवान के श्री चरणों में 

दास युवराज महंत प्रेमानन्द दास का 

दण्डवत स्वीकार हो
महाराज श्री से कर बध्य एक शंका का समाधान के लिये प्रथना है
शास्त्रोक्त प्रमाण किस शास्त्र श्रीमद्भगवत गीता या श्रीमदभागवत महापुराण

के अनुशार
प्रश्न   पाप या अधर्म का प्रत्यक्ष या परोक्ष समर्थन 
समर्थक को समान पाप का भागी बनाता है 
उत्तर आशिर्बाद की आशा में
चरण सेवक 

🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻”
26) [07/12, 21:30 as per PST] Entrepreneur (Brand Sparrow) Mr. Shishir Katote R- Pune, MH, IN (+91 9765730977): 
“Hare Krishna. Dandavat. Kindly go through the following and see if I am right.
What morality (niti) has got to do with bhakti and dharma? Bhakti is not supposed to make us moral. Morality weakens bhakti. Didn’t Yudhishtira weaken his devotion by trying to be moral’truthful instead of submissive to Lord’s order in Kuruksetra? So, being truthful is not right and being untruthful is not wrong. It is highly relative. Just do anything that gets your work done without collateral damage.
Few people said that bhakti never gives rise to immorality. But I feel, they think that there is something inherently wrong with immorality. So they try to propound that morality is must in bhakti. Kindly tell me, is it moral for Krishna to have relationship with thousands of unmarried women? According to me, no. But is Krishna wrong, no. Being moral is not right and being immoral is not wrong always. It depends on time time, place and circumstance. For example, lying is not always wrong.”
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Section B — Replies from Bhakti-rasa-vedanta-pithadhishvara Gurupadacharya Shri-charana Radhakrishnadeva Munindravarya Amnaya-vacaspati Svami (Ramkrishna R Swami — BRVF – Anand, GJ + Vrindavan, MTJ, West UP, IN + Maha Shakti Ashram, City of Lodi, San Joaquin County, Northern California, USA) —
श्रीरामकृष्णगौरहरि । shree-raama-krishna-gaurahari. अथ स्वस्ति श्री । atha svasti shree.
A) Towards Mr. Mohit Sharma —
“(क) ‘विरोध’ व ‘विरोधाभास’ का अन्तर समझना पड़ेगा । जिसका समन्वय न् हो सकता हो, वह विरोध कहलाता है । एवं जिसका समन्वय हो सकता हो, वह विरोधाभास है । 
सकल वेद/पुराण/उपनिषद्/श्रुति/स्मृति/निगम/आगम आदि वैदिक वाङ्गमय का प्रयोजन व कार्य एक ही है जो कि वासुदेव की महिमा का निरूपण करना है । 
इसी कारण से तो महाभारत के खिलभाग हरिवंशपुराण में उद्घोषित हुआ है — “वेदे रामायणे चैव पुराणे भारते तथा । आदावन्ते च मध्ये च हरि: सर्वत्र गीयते ।।” । पुनः श्रीमद्भागवतम् उद्घोषित करता है — “वासुदेवपराः वेदाः….” + “नारायणपराः वेदाः…..” । 
जहाँ जहाँ विष्ण्वेतर देवों की महिमा का प्रतिपादन हुआ है शास्त्रों में, उन प्रकरणों को भी अन्ततोगत्त्वा विष्णु-माहात्म्य का ही पोषक माना गया है, उन देवों के भगवद्विभूति-स्वरूप होने के कारण । प्रमाण — “आकाशात्पतितं तोयं यथा गच्छति सागरम् । सर्वदेवनमस्कारः केशवं प्रति गच्छति ॥” + “अथवा बहुनैतेन किं ज्ञातेन तवार्जुन । विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत् ॥” (सुभाषित व श्रीमद्भगवद्गीता)।
लेकिन अन्य देवों का महिमामण्डन भी शास्त्रों में गौण दृष्टि से ही मान्य है । मुख्य दृष्टि से उन समस्त अन्यान्य देवों के नाम वास्तव में भगवान् वासुदेव के वाचक नाम् हैं । केवल गौण दृष्टि से उन अन्यान्य देवों के नाम उन उन देवों से सूचक हैं । प्रमाण — “नामानि विश्वा’भि न सन्ति लोके यदाविरासीदनृतस्य सर्वम् । नामानि सर्वाणि यमाविशन्ति तम् वै विष्णुम् परममुदाहरन्ति ॥ (भाल्लवेय श्रुतिः) + “यज्ञो वै विष्णु:” – (तैत्तिरीय ब्राह्मण १.२.५.४०) ।
अतः समग्र वैदिक वाङ्गमय का एक ही प्रयोजन (वासुदेव-माहात्म्य-प्रतिपादन) होने के कारण, विरोधाभास का अवस्थान मान्य है, परन्तु विरोध का नहीं । 
दूसरी बात कि अधिकार-भेद व अन्वय/व्यतिरेक/साक्षात्/परम्परया/परोक्ष/अपरोक्ष/समास/व्यास — इन पहलुओं के कारण, एक ही प्रयोजन वाले शास्त्र कभी कभी विरोधाभासी प्रतीत होते हैं । सनातनधर्म के अधिकारी (आचरण करने की योग्यता से सम्पन्न) भिन्न भिन्न स्तरों के (अन्ध-तामसिक, तामसिक, रजः-तमोमिश्रित, सत्त्व-तमोमिश्रित, रजःसत्त्वमिश्रित, सात्त्विक व निर्गुण/त्रिगुणातीत/वसुदेव/विशुद्ध-सत्त्व) होने के कारण शास्त्र भी उनके अधिकार के अनुसार ग्रहणीय विविध स्तरों वाले धर्म का उल्लेख करते हैं, उन निम्न स्तर वाले धर्माधिकारियों का क्रमिक उत्थान करवाने के लिए । 
उन्नत स्तर की योग्यता प्राप्त करने पर निम्न स्तर के धर्म का त्याग भी अनिवार्य है । प्रमाण — “मुमुक्षवो घोर-रूपान् हित्त्वा भूतपतीनथ । नारायण-कलाः शान्ता: भजन्ति ह्यनसूयवः ॥” + “अकामः सर्वकामो वा मोक्षकाम उदाराधी: । तीव्रेण भक्तियोगेन यजेत् पुरुषं परम् ॥” + “जुगुप्सितं धर्म-कृते’नुशासनं….” + “लोके व्यवायामिषमद्यसेवा…” आदि श्रीमद्भागवतीय प्रमाण व “अग्निर्वै देवानामवमः विष्णु: परम: तदन्तरेण सर्वा अन्या: देवता:” — ऋग्वेदीय शाकलशाखीय ऐतरेय ब्राह्मण १.१.१ + “तद्विष्णुम् प्रथमं प्राप स देवतानां श्रेष्ठो’भवत” — शुक्लयजुर्वेदीय शतपथ ब्राह्मण १४.१.१.५  ।
अतः धर्म के निम्नाधिकारियों के उपदेश के लिए जो शास्त्र प्रवृत्त हुए हैं, उनमें अपर-धर्म/अर्थ/काम/मोक्ष/कर्मकाण्ड/ज्ञानकाण्ड/अन्यदेवतोपासना/भक्ति इतर अन्य साधन/मार्गों का निरूपण —  आदि बहुत सारे कैतव/मल परिदृष्ट होते हैं । जबकि “धर्म: प्रोज्झितकैतवो’त्र परमो…” + “भवतानुदितं प्रायं यशं भगवतो’मलम्….” + “श्रीमद्भागवतं पुराणममलं यद्वैष्णवानां प्रियम्….” — आदि भागवतीय प्रमाण व वेदव्यास की असन्तुष्टि का प्रसङ्ग व पद्मपुराणान्तर्गत श्रीमद्भागवत-माहात्म्य का वचन – “वेद-वेदान्त-घोषैश्च गीता-पाठैर्मुहुर्मुहु:.” + “वेदोपनिषत्साराज्जाता भागवती कथा” + गरुड़पुराण का वचन – “अर्थो’यम् ब्रह्मसूत्रणाम्….. पुराणानां सामरूपः…” — आदि अकाट्य प्रमाण हैं जो कि श्रीमद्भागवत के ‘अमल-प्रामाण्य’ व प्रस्थान-त्रयी (गीता/ब्रह्मसूत्र/उपनिषद्) तथा अन्य पुराणों के भी ऊपर श्रीमद्भागवत के आत्यन्तिक परम सर्वोत्कर्ष को सिद्ध करते हैं ।
ख) “योगस्य ईश्वरः नियन्ता वा यः सः योगेश्वर:” — षष्ठी तत्पुरुष समास के वैयाकरणिक प्रयोग से जो योग का ईश्वर है वह योगेश्वर है । श्रीकृष्ण को श्रीमद्भगवद्गीता में ‘योगेश्वर’ कहा गया । प्रमाण – “यत्र योगेश्वरः कृष्ण:…” ।  अतः योग कृष्णाधीन है, कृष्ण योगाधीन नहीं । 
जो श्रीभगवान् श्रीमद्भगवद्गीता में कहें हों कि मैं स्मृति का प्रदाता व अपोहनकारी हूँ (“..मत्त: स्मृतिर्ज्ञानमपोहनञ्च..” — १५वाँ अध्याय) + कहें हों कि हे अर्जुन! तुम्हें व अन्य जीवों को अपने जन्म-जन्मान्तरों के वृत्तान्त की सुध नहीं, पर मुझ परमात्मा को सर्व-वृत्तान्त स्मृत है (“वेदाहं समतीतानि तव जन्मानि चार्जुन…न त्वम् वेत्थ परन्तप” — गीता) + जिन्होंने अपनी सर्वान्तर्यामिता व सर्वज्ञता को घोषित किया हो (“…सर्व-क्षेत्रेषु भारत…” — गीता) — ऐसे नित्य-शुद्ध-बुद्ध-मुक्त-स्वभाव सर्वज्ञ योगेश्वर श्रीकृष्ण परमात्मा के लिए गीता के ज्ञान को ‘योग-रहित’ होने के कारण भूलना असम्भव है । 
दूसरी ओर, महाभारत का वचन भी मिथ्या नहीं है । समाधान यह है कि योग में न होने का अर्थ वहाँ कुछ और है। क्या है उसका अर्थ वहाँ? आशय यह है कि भले ही भगवान् नित्य योगेश्वर हैं व नित्य सर्वज्ञ हैं, परन्तु, मानव-सदृश प्रकट-लीला व मानव-सदृश चिन्मय वपुस्वरूप होने के कारण उनकी उन लीलाओं में रसवैचित्री-उत्पादनार्थ श्रीभगवान् की ही आत्मभूता/स्वरूपभूता/अन्तरंगा स्वरूप-शक्ति की संविदाख्या ‘योगमाया-शक्ति’ – उस भगवत्-प्रदत्त स्वातंत्र्य का उपयोग करते हुए {कि जो भगवान् ने उस लीला-संयोजिका योगमाया शक्ति को अनादिकाल से प्रदान कर रखा है – अन्ततोगत्त्वा शक्ति को समस्त अधिकार उसके नियामक शक्तिमान् परब्रह्म कृष्ण ही देतें हैं । श्रीबलराम के द्वारा श्रीमद्भागवत के दशमस्कन्धोक्त ब्रह्मविमोहनलीला में उल्लिखित वाक्य कि जहाँ वें अपने प्रभु श्रीकृष्ण की योगमाया शक्ति के प्रभाव का चिन्तन करते हैं — भी यह पुष्टि करता है कि योगमाया के पास कैसे असीमित भगवत्प्रदत्त अधिकार हैं । रासपञ्चाध्यायी के प्रारम्भ में भी “…भगवानपि ता रात्री:..योगमायामुपाश्रितः” — से यह स्पष्ट हुआ है कि कैसे भगवान् अपनी योगमाया शक्ति का आश्रय लेकर रासलीला करते हैं । उन अज परमात्मा का अलौकिक दिव्य जन्म भी तो योगमाया के द्वारा करवाया जाता है – “जन्म-कर्म च मे दिव्यं…” + “अजो’पि सन्…सम्भवामि आत्म-मायया” — गीता । श्रीभगवान् कि जिनके नाम से परमभय दूर भागता है, वें स्वयम् यशोमति देवी से भयभीत हो जाते हैं – अनाटकीय रूप से – यह भागवतीय कुन्ती-स्तुत्युल्लिखित प्रसङ्ग भी तो योगमाया की देन है न! – “गोप्याददे त्वयि कृतागसि…..भयं भावनया..सा माम् विमोहयति भीरपी यद्बिभेति”} —  लीला में गीता के पुनः प्रवचन को रस-परिवेषण-परिपाटी के अननुकूल (प्रतिकूल) जानते हुए श्रीकृष्ण परमात्मा को निषिद्ध करती है उस गीताशास्त्र के पुनः प्रवचन के लिए । और अर्जुन में भी योगमाया ने गीतोक्त-ज्ञान के ग्रहण के लिए अनिवार्या श्रद्धा का अभाव उस परिस्थिति में उत्पन्न करवाया । यही महाभारत के उस प्रसङ्ग का गूढ़/कूट तात्पर्य है । ध्यातव्य है कि महर्षि वेदव्यास ने महाभारत के प्रथम अध्यायों में ही यह स्पष्ट कर दिया है कि कैसे महाभारत में कई श्लोक अति कूट/रहस्यात्मक रूप से प्रणीत हुए हैं । उनका आशय केवल भगवत्कृपावान् सद्गुरु ही उद्घाटित कर सकता है ।”
B) Towards Mr. Shishir Katote R —
“Both ‘jaati’ & ‘varna’ are synonymous. The famous hymn of Shukla & Krishna-yajurvedeeya Purusha-sookta mentions the term – ‘ajaayata’ as in — “om braahmano’sya…padbhyaam shoodro’jaayata”. ‘Ajaayata’ denotes birth/janma or ‘jaati’! Purusha-sookta declares Paramaatmaa to be the creator of the quadruple jaati (seminal castes) of Aaryans. 
Whereas, confirming the same trend, Shreemad-bhagavad-geetaa asserts Krishna Paramaatmaa to be the creator of quadruple ‘varnas’ (classes) — “caaturvarnyam mayaa srishtam….”. Hence, jaati and varna are synonymous.”
C) Towards Mr. Sankarshandas Adhikari —
“The ‘general sense’s reflects ambiguity if its connotation is not made explicit. A guru is not an ‘uttama-adhikaaree’ of bhakti anymore. He is an ‘uttama-bhaagavata’ displaying the function of a ‘madhyama-bhaagavata’. 
The technical definitions and contexts of the ‘bhaagavata’ and ‘adhikaaree’ categories are different. Shreemad-bhaagavatam verses like — “sarva-bhooteshu yah pashyed….” (paraphrased in Caitanya-caritaamrita as “sthaavara-jangama naa dekhe taara….”) + “eeshvare tad-adheeneshu…..” etc. define the ‘bhaagavata’ denomination. 
Whereas, Bhakti-rasa-amrita-sindhu 1.2.16-17 etc. verses like — “….shaastre yuktau ca nipunah……sa bhaktav uttamo matah….” (paraphrased in Caitanya-caritaamrita as “shaastra-yuktye sunipuna dridha-shraddhaa jaara…”) define the ‘adhikaaree’ denomination esp. for the vaidhee-bhakti-adhikaarees. 
The gist is that the stage of ‘bhaagavata’ is ascended after commencing the saadhana-bhakti formally beginning from ‘guru-paada-aashraya’ and moving onward to ‘anishthitaa bhajana-kriyaa’. But, before the start of such vaidhee saadhana-bhakti (applies to raagaanugaa-bhakti also, with slight variations as pointed in earlier analyses), the ‘adhikaara’ or eligibility is required. This eligibility is triple. The type of eligibility a saadhaka (non-technical usage) possess, a corresponding platform of saadhana-bhakti he obtains. So, an ‘uttama-adhikaaree’ turns into an ‘uttama-bhaagavata’ very rapidly with the practice of saadhana-bhakti.
Naturally, the guru is an ‘uttama-bhaagavata’ having crossed the earlier stage of an ‘uttama-adhikaaree’, if he is a saadhana-siddha guru. For nitya-siddha and kripaa-siddha typed gurus, case is different because, nitya-siddha is an eternally eligible and kripaa-siddha is eligible by God’s special favour. So, even nitya-siddha and kripaa-siddha gurus possess the same qualifications of an ‘uttama-adhikaaree’ turned ‘uttama-bhaagavata’ saadhana-siddha guru, but without endeavouring for obtaining such stages due to the vishesha-bhagavat-kripaa and nitya-siddhattva.
Hence, a saadhana-siddha ‘uttama-bhaagavata’ guru is much more than a simple ‘uttama-adhikaaree’. The qualification of being expert in the scriptures (shaastra-sunipunataa) is a qualification pertaining to the ‘uttama-adhikaaree’ of bhakti. 
As far as the qualification of a guru is concerned, he, too, is retaining the earlier qualification of an ‘uttama-adhikaaree’ viz., theoretical expertise in scriptures (shaastra-sunipunattva). But, an ‘uttama-bhaagavata’ sadguru has an additional peculiar qualification which an only ‘uttama-adhikaaree’ doesn’t possess. And what is that? It is ‘shabda-brahma-nishnaatattva’ or ‘practical realization of the scriptural sound form of God’. This is substantiated by the phrase – ‘shaabde pare ca nishnaatah….’ in the Shreemad-bhaagavatam 11.3.21 verse.
Of course, a guru needs to be both realized (special qualification of a sadguru) and theoretically expert (an earlier qualification of an ‘uttama-adhikaaree’ retained in an ‘uttama-bhaagavata’ guru) in scriptures. But, a disciple, too, needs to be an ‘uttama-adhikaaree’ and thus, theoretically expert in scriptures. Only then, can such an aspiring disciple come to know as to whether the personality he is going to surrender himself unto does actually meet the qualifying scriptural criteria of a sadguru or not. And even after surrender, he needs to be armed with scriptural knowledge for rapid progress in saadhana-bhakti.”
D) Towards Mrs. Kuheli Chatterjee —
“The eight fold deity form of Bhagavaan is mentioned in the Shreemad-bhaagavatam verse — “shailee daarumayee……pratimaa ashtavidhaa smritaa”. Do refer that verse for further details.”
E) Towards Mr. Ajay Soni —
“क) पुष्टिमार्ग के सम्बन्ध में उठायी गयी तुम्हारी जिज्ञासा का हम पहले की प्रश्नमाला में उत्तर दे चुकें हैं । लगता है तुमने उस उत्तर को पढ़ा ही नहीं।
ख) “नित्यसिद्ध कृष्णप्रेम साध्य कभु नय….” — इस चैतन्यचरितामृत के पद्य का हम व्याख्यानं हमारे पूर्व में प्रस्तुत धारावाहिक – “दिव्य स्वरूप व उसकी प्राप्ति / Divine Identity & Its Acquirement” — में दे चुकें हैं । पढो ठीक से ।”
F) Towards Mr. Sumit Parashar —
“युगपद्विरूद्धधर्माश्रयित्व भगवान् में होने के कारण व अचिन्त्यशक्तियुक्त होने से वें साकार व निराकार दोनों एक साथ हैं । “सर्वतः पाणिपादम्….” + “अपाणिपादो जवनो ग्रहीता…” — ये शास्त्रवचन प्रमाणस्वरूप हैं ।”
G) Towards Er. Rahul Kambhampati —
“Real nature of Hare Krishna Mahaamantra is that it is non-different and identical with the Divine Moeity Raadhaa & Govinda. Wouldn’t the happiness directly oozing out from God (His Holy Name self-same as Him) be greater than bodily sensual mundane happiness — since, God is the very embodiment of eternal divine felicity?”
H) Towards Mr. Aryan Paladin —
“Both are, equally, important in raaga-maarga. But, peculiarity of raaga-maarga is ‘panca-naama-smaranam’ — a unique element superseding the concept of the Hari-naama & even the deekshaa-mantras. This secret is not known to most of today’s Gaudeeyas who have not come across certain extremely rare texts by Shreela Roopa Gosvaamipaada and by other Gosvaamipaadas– as it is unfound in the mainstream popular texts. Why so? Certain texts were kept by Gosvaamipaadas to guide only those who took bhajana-shikshaa from them in particular on one to one basis and not for all general Gaudeeya followers.”
I) Towards Mrs. Soma Nair —
“It needs to be checked as to whether the mantram given by your Guru Ji is authorized by scriptures and tradition or not. Rest all discussion can take place.”
J) Towards Mr. Mudit Mishra ‘Kaanyakubja’ —
“राग व वैधी — इन दो भक्तिमार्गों की साधना से प्राप्त भगवद्रति/प्रेम की गुणवत्ता में बहुत अन्तर है जिसका भक्तिरसामृतसिन्धु में निर्देश हैं । जैसे महिष का दुग्ध व गो का दुग्ध — दोनों दुग्ध ही माने जाते हैं, परंतु उनकी गुणवत्ता में विपुल पार्थक्य है, तथैव ।”
K) Towards Astrologer Mrs. Pratibha Modi —
“क) ‘भगवता उदितं प्रोक्तमिति भागवतम्’ — ‘श्रीभगवान् के द्वारा कथित व आविर्भूत हुआ होने के कारण इसे भागवत कहते हैं ।’ श्रीमद्भागवत जे दस लक्षण हैं — 
ख) “अत्र सर्गो विसर्गश्च स्थानं पोषणमूतय: । मन्वन्तरेशानुकथा निरोधो मुक्तिराश्रयः ॥” — “सर्ग, विसर्ग, स्थान, पोषण, ऊति, मन्वन्तर, इशानुकथा, निरोध, मुक्ति व आश्रय — ये दस लक्षण हैं भागवत के ।”
L) Towards Ms. Kaushalya Ramchandani —
“क) नृसिंह उपपुराण व विष्णु महापुराण में वर्णित प्रह्लाद चरित्र का अध्ययन कर लो ।
ख) बलभद्र के रोहिणी देवी के गर्भ में संकर्षित होने पर भी व्रजवासियों को रोहिणी का चरित्र निःसंदिग्ध प्रतीत हुआ भगवती योगमाया के प्रभावाधीन रहने के कारण । गर्भ के संकर्षित होने की पूरी प्रक्रिया के चप्पे चप्पे पर योगमाया की निगरानी थी जो कि श्रीमद्भागवतीय १०.३.८-१० (“देवक्या जठरे गर्भम्…… रोहिण्या उदरे सन्निवेशय ॥”) से प्रमाणित है ।”
M) Towards Mr. Shailendra Singh —
“सृष्टि अनेक प्रकार की है यथा सर्ग (विष्णु से प्रारम्भित आदि सृष्टि यथा ब्रह्मा की उत्पत्ति करना), विसर्ग (ब्रह्मा से आरम्भित यथा प्रजापतियों व सूर्यदेव की मानस सृष्टि करना ), मानवी (सूर्यदेव से वैवस्वत मनु व शतरूपा तथा उन दोनों से सूर्यवंशी मनुष्य कुल का प्राकट्य; वैसे ही अग्निदेव से अग्निवंशी, चंद्रदेव से सोमवंशी तथा नागों से नागवंशी क्षात्रकुलों का प्राकट्य) + प्राजापत्य (दक्ष आदि प्रजापति व सप्तर्षियों से उत्पन्न सन्तानें) । 
मूलतः चतुर्वर्ण का प्रतीक-प्राकट्य (symbolic creation) विष्णु के द्वारा की हुई आदि सृष्टि अर्थात् सर्ग में होता है । व्यावहारिक प्राकट्य (physical creation) भले ही सप्तर्षियों व मनु आदि से हुई हों । कायस्थ जाति तो यमराज के सचिव चित्रगुप्त से सीधी उत्पन्न है । पुनः औरस व मानस भेद से सभी लौकिक सृष्टियाँ दो प्रकार की हैं ।”
N) Towards Mr. Harsh Sharma —
“परात्पर पुरुषोत्तम नारायणस्वरूप भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र की नित्य अप्रकट व प्रकट द्वारकालीला के नित्यसिद्ध पार्षद साक्षात् नरस्वरूप श्री अर्जुन (कि जिनके वपु में लौकिक इन्द्र का अंश भी समाहित था) प्रकट पार्थिव लीला के समय लौकिक व वैदिक आर्य-मर्यादाओँ का कतही उल्लङ्घन नहीं किये । क्योंकि ‘गोत्र’ मातृवंश के आधार पर तय नहीं होता (जाति/वर्ण भले ही कभी कभार आपवादिक स्थितियों में मातृवंश के आधार पर तय हों) । ‘गोत्र’ पितृवंश के अनुसार निर्णीत होता है । ‘सगोत्र’ उसे कहते हैं कि जहाँ दोनों ही व्यक्ति एक दूसरे से पितृवंश के आधार पर जुड़े हुए हों । 
अर्जुन केवल अपने मातृवंश (कुन्ती के पितृवंश) के आधार पर श्रीकृष्ण व सुभद्रा से जुड़े हैं । पितृवंश के आधार पर नहीं । अतः सुभद्रादेवी का परिणय सगोत्र विवाह नहीं माना गया ।”
O) Towards Yuvaraj Mahant Guru Premanand Ji —
“श्रीमद्भागवतम् १.७.३७ में — (“स्वप्राणान् यः पर….”) + “अनागसं प्रसुप्तम् च बालकं हन्ति यो नरः….” (मनुस्मृतौ) + “अग्निदो गरदश्चैव शस्त्रपाणिर्धनापहः । क्षेत्रदारहरश्चैव षडेते ह्याततायिनः ॥” (स्मृतौ)”
P) Towards Entrepreneur Mr. Shishir Katote R —
“Highest morality culminates in satisfaction of Bhagavaan. Favourable relationship of an individual soul with the God Absolute on a spiritual platform in either of the five ways (passive contemplation, active servitude, fraternity, parental and conjugal/paramour) displays the highest morality. Why? 
Because, any mutually favourable relationship prevalent between the supremely primeval energetic/potent principle (aadi-shaktimaan) and the individual souls comprising His energy/potency principle (shakti-amsha-roopa) is never considered ontologically illegitimate (taatvika avaidha). 
Contrastingly, any seemingly (on a ground level and even as supported by dharma-shaastras) moral and legitimate relationship prevalent between one energy with the other energy (between one individual soul and other individual soul) without God Absolute in the centre — is, ultimately, illegitimate on an ontologically highest spiritual platform.
The simple formula is — 
Supreme Energetic (God Absolute) is positive side of a magnet. Whereas, the energies are the negative side. Just as the pairing of positive with negative is spontaneous unlike the pairing of a negative with another negative, similarly, any seemingly legitimate relationship between one energy with another energy principle without the central involvement of Supreme Energetic — is illegitimate and unnatural. If two negative magnet units are to be spontaneously paired with each other, they cannot pair up directly. They are required to keep the positive magnet unit in the centre. Similarly, the only way two energies can legitimately pair up on a highest ontological level is by keeping the Supreme Energetic in between. 
This is the reason why Gopees, when questioned upon by Shree Krishna during their arrival at the dancing arena, reasoned and informed Krishna that they haven’t broken any morality by leaving their wedded husband’s and coming to Krishna at the dead of the midnight hour because, Krishna is the Supreme Husband being even the supersoul of all souls including their wedded husbands. This is the highest morality – the connection of the energy with the Supreme Energetic principle.
Conclusion — 
Vyaavahaarika-vaidha (ordinarily legitimate) and vyaavahaarika-avaidha (ordinarily illegitimate) — both are taken as taattvika-avaidha (ontologically illegitimate). Direct connection of one energy with another energy is ontologically illegitimate. Direct connection of energy with Supreme Energetic is ontologically legitimate. Linked connection with one energy with the other by involving Energetic in the centre is, too, ontologically legitimate (तात्विक-वैध). Proofs — “na khalu gopikaa-nandano bhavaan……” + “yathaa taror moola……” (Shreemad-bhaagavatam verses).”

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