​Discussion from ‘BRVF – Vedanta – 1’ group on WhatsApp —

A new query in Hindi —

+91 89296 86619 (College Student Mr. Mohit Sharma from Panipat, Haryana, Bharata):

महाराज जी अगर कोई वक्ता धन के लिए कथा कहे किंतु कथा करके दुसरो के मन मे भक्ति जागृत कर दे तो  क्या उस कथाकार की सच्चाई जानने पर की ये तो पैसो के लिए कथा करता है,,तो क्या उसके मुख से कथा सुनना छोड देना चाहिये–ईस विषय मे हमारे वैष्णवाचार्यो का क्या कहना है?? कथा की बातो पर ध्यान देना चाहिये या कथाकार के व्यवहार पर??– जैसे आधुनिक बहुत सारे बडे बडे वक्ता कथा करके लाखो रुपया लेते है किंतु कथा से लोगो को भगवान से जोड देते है– ईस स्थिति मे क्या ये  देखा जाए की ये वक्ता धन के लिए कथा करता है या ये देखा जाए की धन्य हो एसा वक्ता जिसने प्रभु की भक्ति प्राप्त करा दी??

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Answer in Hindi as given by Bhakti-rasa-vedanta-pithadhishvara —

क) भुक्ति व मुक्ति की स्पृहारूपिणी पिशाचीनी यावत् पर्यन्त जीव के ह्रदय में विद्यमती है, तावत् पर्यन्त विशुद्ध निर्गुण भक्तियोग से उत्पादित रस के कणमात्र के आभास का भी आस्वादन जीव नहीं कर सकता । प्रमाण — “भुक्तिमुक्तिस्पृहा यावत्पिशाची हृदि वर्तते । तावत्भक्तिसुखास्यात्र कथमभ्युदयो भवेत् ।।” (भक्तिरसामृतसिंधौ)
ख) अतः कंचन/कामिनी/कीर्ति/लोकैषणा/वित्तैषणा/पुत्रैषणा आदि में लोलुप ‘सराग’ वक्ता कदापि शुद्धा/उत्तमा भक्ति का संचार श्रोता जीव में नहीं कर सकता । क्योंकि शुद्धा भक्ति का संचार वही कर सकता है जिसने शुद्धा भक्ति को स्वयं प्राप्त किया हो । अवैष्णव अभक्त के द्वारा किया गया हरिकथामृत का परिवेषण केवल सर्पोच्छिष्ट दुग्ध सदृश हानिकारक है । प्रमाण — “भक्तिस्तु भगवद्भक्तसंगेन परिजायते ।” + “अवैष्णवमुखोद्गीर्णं पूतं हरिकथामृतम् । श्रवणं नैव कर्त्तव्यं सर्पोच्छिष्टं यथा पय: ।।” + “विरक्तो वैष्णवो विप्रो….वक्ता कार्यो’तिनिस्पृह:” (पद्मपुराणे)  
ग) आचरण बिना का ज्ञानोपदेश पाखण्डमात्र है । प्रमाण — “….मिथ्याचारी स वर्तते ।।” + “यद्यदाचरति श्रेष्ठ:…..।।” (श्रीमद्भगवद्गीतायाम्)
घ) जिस श्रीमद्भागवतम् रूपी अलौकिक अमृत की लौकिक समुद्रमंथनोद्भूत स्वर्गस्थित अमृत के साथ तुलना/विनिमय करने के इंद्रादि देवताओं के द्वारा प्रस्तुत प्रस्ताव को शुकदेव महामुनि ने अनुचित जानकर ठुकरा दिया व उस अक्षम्य अपराध के कारण उन देवताओं को भागवतरूपी अमृत के पान का अनधिकारी मान उनकी खिल्ली उड़ाकर उनको खदेड़ दिया गया, उस कृष्णस्वरूप भागवत की लौकिक पार्थिव धन से तुलना करना तो सर्वथा ऐसे तुलनाकारकों को भागवतामृत के वक्तृत्व में अनधिकारी प्रमाणित करता है । कम से कम स्वर्गस्थिता सुधा के पान से चिरंजिवीत्व तो प्राप्त है! पृथ्वी पर सुलभ धन के द्वारा तो वो भी प्राप्त नहीं! फिर उसकी तुलना भागवत के साथ कैसे? प्रमाण – “तेनेयं वांगमयी मूर्ति: प्रत्यक्षा वर्तते हरे:” + “का सुधा का कथा लोके क्व काँच: क्व मणि: महान्…….एवं विनिमये जाते सुधा राज्ञा प्रपीयताम्……” (पद्मपुराणोक्त श्रीमद्भागवतमाहात्म्यम्) । 

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Feedback by Mr. Mohit Sharma —
जय हो महाराज जी– अति उत्तम समाधान बताया– स्कंदपुराण मे भी वक्ता के लक्षण बताते हुए कहा गया की ” भगवन्मति निरपेक्षं सुह्रद सा दीनेषुकम्पा–

 कृष्णार्थीति धनार्थीति श्रोता वक्ता द्विधा मत:-

यथा वक्ता तथा श्रोता तत्र सौख्यं विवर्द्धते”–

   आपने बहुत उत्तम समाधान बताया– आपके चरणो मे मेरा बारंबार प्रणाम महाराज जी–🌺🌺🙏😊

— (Maha Shakti Ashram, Lodi, San Joaquin County, Northern CA, USA)

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