​Discussions from ‘BRVF – Vedanta – 1’ group on WhatsApp —

A) Feedback of the previously given reply & a new query in Hindi —

+91 89296 86619 (College Student Mr. Mohit Sharma from Panipat, Haryana, Bharata):

जय हो महाराज जी — आपने प्रमाणो द्वारा अति उत्तम समाधान दिया–आपके चरणो मे मेरा प्रणाम महाराज जी 🌺🌺🙏😊
महाराज जी भागवत मे भगवान ने कहा की “भक्तो मे मनुष्य को  मनुष्य बुद्धि नही रखनी चाहिये” लेकिन महाराज जी अगर किसी मनुष्य  को पता चल जाए की कोई भक्त किसी दुसरे  से द्वेष रखता है तो ये तो संसारिक रजोगुणी  भावना का परिणाम होता है तो क्या उस समय  उस संत मे या भक्त मे मनुष्य बुद्धि नही रखनी चाहिये?? मनुष्यो की तरह अगर किसी भक्त मे या संत मे द्वेषादि विकार हों तो क्या ये जानते हुए भी उनमे मनुष्यबुद्धि नही रखनी चाहिये??

Answer in Hindi as given by Bhakti-rasa-vedanta-pithadhisvara —

क) यदि सिद्ध भगवत्पार्षदों में क्रोध-अभिमान-राग-द्वेष-मात्सर्यादि परिदृष्ट होते हैं यथा श्री चित्रकेतु, जय/विजय व अक्रूरादि में – तो उन्हें योगमाया के द्वारा भगवल्लीला को रोचक बनाने के लिए उत्पादित मानाना चाहिए । वैसी परिस्थिति में ऐसे क्रोधादि पदार्थ लौकिक त्रिगुणों के द्वारा निर्मित न होकर अप्राकृत अलौकिक विशुद्ध-सत्त्व के भाव मानें गए हैं । इस परिस्थिति में भगवत्पार्षदों के लिए मर्त्त्यबुद्धि रखना अपराधरूप है ।
ख) यदि किसी भक्तिमार्ग के साधक में ये द्वेष-काम आदि भाव देखे जातें हैं, तो उसे “अपि चेत्सुदुराचारो….” – इत्यादि श्रीमद्भगवद्गीतोक्त साक्ष्य के आधार पर साधु मानना चाहिए ।
ग) यदि किसी पाखण्डी/धर्मध्वजी के द्वारा भक्तिमार्ग को अपनाकर व उस भक्तिमार्ग को पापाचरण के दुःखरूपी फल को धोने के साधन के रूप में मानकर यदि भक्ति के अनुचित बल पर ऐंठ के उस पापचरण में वृद्धि होने लगे, तब ऐसे सप्तम-नामापराधी व्यक्ति को निश्चित् ही मर्त्यभाव से देखना चाहिए ।

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B) Query in English —

+91 9538292290 (Er. Adithya Rangan from Bangalore, KA, IN):

Dandavats to Swami,

A small question on how different is Srivaisnava sampradaya from Gaudiya Sampradaya. We have read about parakiya vipralambha madhurya rasa to be the highest mood of association with Bhagavan in Gaudiya philosophy which is evident from scriptures.  The same has been exhibited by Nammalvar as Parankusa Nayaki in Divya Prabandhams. In that case, how different are the two sampradayas per se? 

Jai Sriman Narayana!

Answer in English by Gurupadacarya–

i) In Vaikuntha, no scope of extra-marital paramour romance exists. Only eternally wedded love prevails there. Former is ‘parakiya-bhava’; whereas, latter is ‘svakiya-bhava’. Former prevails only in Vraja, not even in Goloka. Samartha-rati and the resultant ‘mahabhava’ are present, solely, in Vraja.  Elsewhere, are present, the variants of ‘samanjasa-rati’.
ii) ‘Parankusa-nayaki’ means a consort who acts as a whip to control her beloved. ‘Parakiya-nayaki’ denotes the conception of an egoistically (in morphological context) paramour woman in romance. 
iii) The devotion of such parankusa-nayaki is towards Vaikunthanatha, not towards Vrajanatha. The devotion of parakiya-nayikas is directed, solely, for Nandanandana. The romance directed for Nandanandana supersedes the erotic love for Vaikunthadhipati. Had it not been so, the following proposition by Shukadeva Muni would turn irrelevant– “nayam shriyo’nga u nitanta-rateh prasadah……” (Shrimad-bhagavatam).

— (Maha Shakti Ashram, Lodi, San Joaquin County, Northern CA, USA)

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