[29/08 11:06] भक्तिरसवेदान्तपीठाधीश्वरा: Discussion (query by a seeker and answer by a master) from ‘BRVF – Vedanta – 1’ group on WhatsApp –[29/08 09:52] College Student Mohit Sharma  (Panipat, HR, IN): आचार्य जी एक जिज्ञासा है की अगर संसार अनित्य होते हुए भी सत्य है ओर परमात्मा सत्त होते हुए भी नित्य है ओर भगवान ही संसार बने है तो जब भगवान नित्य है तो भगवान का ही स्वरुप संसार अनित्य कैसे हुआ?? अगर संसार ही भगवान है तो संसार भी नित्य होना चाहिये-??***Reply by Bhakti-rasa-vedanta-pithadhishvara -जगत् का परिदृश्यमान सृष्ट रूप अनित्य है । उस जगत् का सूक्ष्म मूल प्रकृति वाला रूप तो नित्य ही है । मकड़ी के जाल के समान इस जगत् को उर्णनाभ के सदृश परब्रह्म ने प्रकट किया है जगत् के अभिन्न मुख्य निमित्तोपादान कारण बन कर ।– गुरुपादाचार्य्या:***[29/08 11:38] भक्तिरसवेदान्तपीठाधीश्वरा: Discussion from ‘BRVF – Vedanta – 1’ group on WhatsApp –[17/08 03:18] Mohit Sharma – Panipat: महाराज जी एक जिज्ञासा है की  गीता के 13/11 मे भगवान कहते है की “तत्वज्ञानार्थदर्शनम्”– अर्थात् तत्वज्ञान से भगवद्दर्शन होता है— ओर गरुड पुराण मे गरुड जी को कहा की– “तत्वज्ञान हि मोक्ष कारणं खगेश्वर:”– अर्थात् ज्ञान ही मोक्ष का कारण है–    ओर फिर गीता मे एक जगह कहा की जो भक्त मेरा भजन करते है उनको मै बुद्धियोग देता हूं ओर उनके ह्रदय मे अज्ञान हटाकर ज्ञान का प्रकाश करता हुं जिससे वे मुझे प्राप्त करते है—   महाराज जी ईन तीनो बातो मे भगवान कह रहे है की तत्वज्ञान से दर्शन होगा ओर तत्वज्ञान से मोक्ष होगा ओर भजन करने वाले को भी बुद्धियोग यानि ज्ञान प्रदान करता हूं-  यानि ज्ञान से ही दर्शन ,ज्ञान से ही मोक्ष बता रहे है तो फिर भक्ति की क्या महिमा रहेगी गुरुदेव???—***Reply by Bhakti-rasa-vedanta-pithadhishvara –जिन दोनों तीनों शास्त्रीय प्रमाणों को तुमने उपस्थापित किया है, उसमें से “….ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते” वाले साक्ष्य में तो स्पष्ट उल्लिखित है कि “मेरा भजन/भक्ति करने वालों को वैसा बुद्धियोग/ज्ञान मैं देता हूँ” अर्थात् यहाँ भगवद्भक्त्यात्मक व भक्तिप्रसूत भक्तितनय स्वरूप ज्ञान की बात की गयी है जो कि श्रीमद्भगवद्गीता के “भक्त्या मामभिजानाति….. ततो माम् तत्त्वत: ज्ञात्त्वा…” + श्रीमद्भागवत के “वासुदेवे भगवति…जनयत्याशु वैराग्यम् ज्ञानं..” + “…..यत्र ज्ञानविरागभक्तिसहितं नैष्कर्म्यम्….” आदि  प्रमाणों से सुस्पष्ट है । श्रीमद्भागवत के “ज्ञाने प्रयासमुदपास्य….” + “नैष्कर्म्यमप्यच्युतभाववर्ज्जितम् न शोभते ज्ञानम्…” आदि में उल्लिखित नैष्कर्म्य व ज्ञान “…ददामि बुद्धियोगं…” आदि में अभिप्रेत नहीं है ।– गुरुपादाचार्य्या:

Leave a Reply

Please log in using one of these methods to post your comment:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s