​Discussion from ‘BRVF – Vedanta – 1’ group on WhatsApp —

Query by the seeker —

[12/08 22:52] Mohit Sharma (Panipat, HR, IN): 
महाराज जी एक जिज्ञासा है की ” माधुर्य कादम्बिनी मे लिखा है की भगवान की जीवशक्ति से अंसख्य जीव प्रकट होते है ओर प्रत्येक जीव मे ह्लादिनि अंश आनंद ओर सम्वित अंश ज्ञान ओर सन्धिनी अंश चैतन्य होता है– यानि जीवशक्ति से प्रकट सभी जीवो मे ज्ञान,आनंद ओर रुप तीनो होते है–

  लेकिन फिर आगे लिखा है की — जब सभी जीव जड जगत ओर चित् जगत दोनो के बीच मे खडे होकर दोनो तरफ देख रहे थे तो जिन जीवो ने  ज्ञान से युक्त होकर चित् जगत मे करना चाहा वे चित् जगत मे प्रवेश होकर भगवान के नित्य मुक्त पार्षद बन गये ओर जो जीव जड जगत ज्ञान को भुलकर जड जगत मे भोगने की ईच्छा से गये तो उनको माया ने वश मे कर लिया–

     महाराज जी जिज्ञासा यह है की जीव शक्ति से उत्पन्न सभी जीवो मे सम्वित् यानि ज्ञान विद्यमान रहता है– यानि सभी जीव ज्ञानी होते है तो सभी जीवो ने चित् जगत मे जाने की ईच्छा क्यो नही की?? ज्ञानी जीव तो जानता है की कहां जाना चाहिये ओर कहां नही– तो आधे जीव चित् जगत मे ओर आधे जड जगत मे आ गये– ज्ञान से युक्त जीव मे जड जगत की तरफ जाने का अज्ञान कहां से प्रकट हुआ???

***

Reply by Bhaktirasavedantapithadhishvara —

क) आज के समय में कतिपय प्राचीन गौडीय ग्रन्थों के आधुनिक व्याख्याकार स्वयं ही मूल गौडीय वैष्णव सिद्धान्तों के विषय में दिग्भ्रान्त रहते हैं । मूल ग्रन्थ की व्याख्या वें सही ढंग से नही करते ।
ख) एकपादविभूति (प्रपञ्च) के अन्तर्गत स्थित समस्त मायाबद्ध जीवात्माएँ श्रीमहाविष्णु (परमात्मा) की स्वरूपभिन्ना (स्वरूपभूता नहीं) तटस्था क्षेत्रज्ञा जीवशक्ति के ही अनन्त अंश हैं । जबकि ‘संवित्’, ‘सन्धिनी’ व ‘ह्लादिनी’ — यें तीन वृत्तियाँ श्रीभगवान् की स्वरूपभूता अन्तरंगा शक्ति की हैं । अतः जीवात्मा के अपने स्वरूप में जो मूलभूत (innately inherent) ‘सत्’, ‘चित्’ व ‘आनन्द’ प्राप्त हैं, वें अन्तरंगा भगवत्स्वरूपभूता शक्ति की वृत्तियाँ न होकर तटस्था भगवत्स्वरूपभिन्ना शक्ति की वृत्तियाँ हैं । This is the ontological distinction between the two categories.
ग) श्रील जीव गोस्वामिपाद के ‘प्रीतिसन्दर्भ:’ में उद्धृत विष्णुपुराण के श्लोक के आधार पर यह प्रमाणित होता है कि नित्य-निरन्तर श्रीमहाविष्णु जीवशक्ति के अंशस्वरूप जीवों को सर्वप्रथम बार प्रकट करवा कर मायिक प्रपञ्च में प्रेषित करते हैं । ठाकुर भक्तिविनोद के ‘जैव-धर्म’ के आधार पर जो जीव निर्बल ‘चित्’ की मात्रा से युक्त होतें हैं, उन्हें तटस्थ जगत् (कारण समुद्र) से बाहर स्थित मायिक जगत् आकर्षित करता है । ऐसा इसीलिए होता है क्योंकि तटस्था शक्ति वर्ग के ‘चित्’ में इतना दम नही होता कि वह त्रिगुणात्मिका माया की ‘अविद्या’ वृत्ति से लोहा ले सके । मायाबद्ध होने से पूर्व ही ये जीव ‘अनादि-भगवत्-बहिर्मुख’ होतें हैं । 

— गुरुपादाचार्य श्रीचरण

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