Buddha - Samadhi posture

Discussion from ‘BRVF – Very Last Chance’ group on WhatsApp –

 

 

[23/06 15:12] Umesh Sharma — Madhya Pradesh:

 

इस उच्चतम विचार समूह में केवल वेदांत के जिज्ञासू प्रेमियो का ही स्थान है।
गुरुवार समाधि पाद के विषय में मार्ग दर्शित करें।।।। अनुग्रह होगा ।।सभी भक्तो पर??

 

***

 
[23/06 15:14] भक्तिरसवेदान्तपीठाधीश्वरा:

 

प्रिय उमेश शर्मा (मध्य प्रदेश, भारत),

 

आशीर्वाद । समाधिपाद के विषय में पहले तुम यह स्पष्ट करो कि तुम्हारी क्या जानकारी है उसके बारे में । तदनन्तर हम निज अभिप्राय को प्रकाशित करेंगे ।

 

— गुरुपादाचार्य

 

***

 
[23/06 15:25] Umesh Sharma — Madhya Pradesh:

 

समाधिपाद से मै अनुभव शून्य हु।
कुछ पतंजलि योग सूत्र और अन्य विचारको को पढ़ा है।परन्तु  सुनना पढ़ना ।अलग विषय है। अनुभव सत्य होता है।
अनुभव हेतु क्या प्रयत्न हो ।यह आशीर्वाद चाहता हु।

 
[23/06 15:25] Umesh Sharma — Madhya Pradesh:

 

 

 

***

 
[23/06 18:41] भक्तिरसवेदान्तपीठाधीश्वरा:

 

 

 

प्रिय उमेश शर्मा,

 

क) परमार्थ/अध्यात्म के पथ पर अनुभूति से पूर्व साधना/तपस्या व उससे भी पूर्व दार्शनिक सिद्धान्त आता है प्रथम सोपान के रूप में क्रमशः उत्तरोत्तर आरोहणार्थ ।

 

ख) किसी एक विशिष्ट दार्शनिक सिद्धान्त का अनुसरण करने से पहले तत्तद्दार्शनिक सिद्धान्त के अनुसार आचरण करने वाले तत्त्वदर्शी महापुरुष की वैचारिकी सन्निधि (ideological association) में रहना अनिवार्य कृत्य है ।

 

ग) स्वयं उस विशिष्ट दार्शनिक पथ पर आरूढ़ गुरु से उस दर्शन का ज्ञान प्राप्त करने का फल ‘दिशा का स्पष्टीकरण’ माना गया है अर्थात् कि ‘सम्बन्ध’, ‘अभिधेय’, ‘प्रयोजन’ व ‘अधिकारी’ — इन चार पहलुओं (अनुबन्ध-चतुष्टयम्) का ज्ञान अर्ज्जित करना ।

 

घ) जब वैसा दिशा का स्पष्टीकरण हो जाय, तब उस गुरूपदिष्ट मार्ग का अनुसरण करना ‘साधना’ को चरितार्थ करता है ।

 

ङ) वैसी साधना का फल ही ‘अनुभव’ माना गया है ।

 

च) तो पहले यह दार्शनिक ज्ञान तुम्हें दिया जाए कि वेदोपदिष्ट व आगमोपदिष्ट मार्ग में — उभयरीत्या – ‘कर्म’, ‘ज्ञान’, ‘योग’ व ‘भक्ति’ — इन चार साधनों की कर्मविद्या (प्रवृत्तिमार्ग) व ब्रह्मविद्या (निवृत्तिमार्ग) में उपयोगिता स्वीकृता है ।

 

छ) इन चारों मार्गों के साधक व सिद्ध पृथक् पृथक् माने गए हैं । ‘कर्म’ प्रवृत्तिमार्ग का सूचक है व अन्य तीन निवृत्ति के संसूचक हैं ।

 

ज) ‘योग’ शब्द का प्रयोग ‘कर्म’, ‘ज्ञान’ व ‘भक्ति’ के साथ भी होता है शास्त्रीय उदाहरणों के आधार पर । जब ‘योग’ पद का योग उन तीनों के साथ हों, तब वैसा ‘कर्मयोग’ भी निवृत्तिमार्ग की प्रथम सीढी का सूचक है ।

 

झ) ‘ज्ञान’ व ‘निर्गुणा/त्रिगुणातीता/अव्यभिचारिणी अहैतुकी निष्काम भक्ति’ – ‘योग’ शब्द से युक्त या अयुक्त होने पर — उभय स्थिति में – केवल व केवल निवृत्तिमार्ग के सूचक हैं ।

 

ञ) अकेला ‘योग’ शब्द ‘योगमार्ग’ वा अष्टाङ्गयोग का सूचक है । यह यदि मोक्ष की प्राप्त्यर्थ अनुष्ठित होता है, तब ‘निवृत्तिमार्ग’ के अन्तर्गत आता है । यदि यह अष्टसिद्धि आदि की प्राप्ति के लिए सम्पन्न होता है, तब प्रवृत्तिमार्ग के अन्तर्गत उसकी परिगणना होती है ।

 

ट) ठीक वैसे ही, यदि ‘सगुणा सात्विकी, राजसिकी वा तामसिकी स्तर की भक्ति’ कि जिसका का प्रयोग इहलौकिक वा पारलौकिक क्षणभंगुर विषयों की प्राप्ति के निमित्त होता है अथवा मोक्षेतर किसी अन्य प्रयोजन के निमित्त होता है — तो वह भी प्रवृत्तिमार्गान्तर्गता मानी गयी हैं । यह सकाम भक्ति ही ‘उपासनाकाण्ड’ है ।

 

ठ) ‘कर्म’ सकाम वा काम्य होने पर ‘कर्मकाण्ड’ संज्ञा से विभूषित प्रवृत्तिमार्ग का सूचक है । वही ‘कर्म’ – ‘योग’ शब्द से युक्त होने पर निष्काम भगवदर्पित ‘कर्मयोग’ व निवृत्तिमार्ग का सूचक है ।

 

ड) ‘ज्ञान’ ही ‘ज्ञानकाण्ड’ है । ‘ज्ञान’ व ‘निर्गुणा भक्ति’ — दोनों ही ‘ब्रह्मविद्या’ स्वरूप माने गए हैं । यहाँ ‘ज्ञान’ का अर्थ ‘शास्त्रज्ञान’ न माना जाकर, ‘ब्रह्मसायुज्यकारी पथ’ को माना गया है । तत्तत्पथानुकूल शास्त्रज्ञान की तो हर मार्ग/पथ पर अपरिहार्य व निर्वविकल्प रूप से आवश्यकता है तत्तत्पथपथिक की प्रगति के व तत्तत्पथप्रसूता लक्ष्यपूर्त्ति के निमित्त ।

 

ण) ‘योग’ — अष्टाङ्गयोग है । यह अष्टाङ्गयोग — चाहे सकाम भाव से अनुष्ठीयमान होने पर प्रवृत्तिमार्ग का अंग माना जाय या फिर मोक्षकामभाव से अनुष्ठीयमान होने पर निवृत्तिमार्ग का अंग माना जाए — उभय अवस्था में चतुर्विध यों माना गया है –

 

१) पातञ्जलयोगदर्शनप्रतिपादित अष्टाङ्गयोग

 

२) ब्रह्मसूत्र/उपनिषद्/श्रीमद्भागवतादिपुराणोपदिष्ट अष्टाङ्गयोग ।

 

३) नारदपंचरात्रादि वैष्णव/एकायन/वैखानस/सात्त्वत-आगमोपदिष्ट अष्टाङ्गयोग ।

 

४) राजसिक व तामसिक प्रकृति के ‘अवैष्णव’ पाशुपतादि-तंत्रागम के द्वारा उपदिष्ट योग मार्ग ।

 

यहाँ पहली व चौथी श्रेणी के अन्तर्गत जो अष्टाङ्गयोग है — वह श्रुतिविरूद्ध अवैदिक माना गया हैं भगवान् वेदव्यास के द्वारा ब्रह्मसूत्र के – “ईक्षतेर्नाशब्दम्” सूत्र में एवं ततसूत्रोपरि वैष्णवाचार्यो के भाष्यों में । उन — पातञ्जलयोगदर्शन/पातञ्जलयोगदर्शन का सहोदर अग्न्यवतार (विष्णवतार कपिल के श्रीमद्भागवतोपदिष्ट सांख्यदर्शन से भिन्न) कपिल के द्वारा प्रणीत सांख्यदर्शन + पाशुपत-भैरवादि तंत्रागम के द्वारा वर्णित ‘ईश्वर’ भी वैदिक ईश्वर/ब्रह्म/परमात्मा से पृथक् ‘अवैदिक’ माना गया है ।

 

जबकि महाभारतादि साक्ष्यों के आधार पर ऊपर वर्णित द्वितीया व तृतीया श्रेणी के अन्तर्भुक्त श्रौत/औपनिषदिक/पौराणिक/पाञ्चरात्रागमोल्लेखित अष्टाङ्गयोग मार्ग पूर्णतया वैदिक है ।

 

त) जहाँ तक ‘समाधि’ – चाहे निर्विकल्प या सविकल्प, सम्प्रज्ञात या असम्प्रज्ञात — का प्रश्न है, यह भी मुख्य रूप से तीन प्रकार की है वैदिक मार्ग में ।

 

१) वैदिक ‘ज्ञानमार्ग’ के अन्तर्गत

 

२) ‘वैदिक योगमार्गान्तर्गत’  (‘वैदिक’ के द्वारा यहॉ स्कन्दपुराण के वचन ‘ऋग्यजु:सामाथर्वांञ्च भारतं पंचरात्रकम् । मूलरामायणम् चैव शास्त्रमित्यभिधीयते ।।’ + पञ्चमवेदस्वरूप महाभारत के खिलभाग हरिवंशपुराण के — ‘वेदे रामायणे चैव पुराणे भारते तथा । आदावन्ते च मध्ये च हरिः सर्वत्र गीयते ।।’ — आदि प्रमाणों से प्रथम चार वेद, ब्राह्मण, आरण्यक, उपनिषदादि तदंग, पञ्चमवेदस्वरूप महाभारत/पुराण/वाल्मीकीयरामायाणादि व नारदपाञ्चरात्रादि वेदानुकूल आगम/तंत्रशास्त्र अभिप्रेत हैं ।)

 

३)  वैदिक भक्तिमार्गान्तर्गत

 

वैदिक ज्ञानमार्ग का लक्ष्य परमसत्यस्वरूप/अद्वयज्ञानस्वरूप तत्त्व/वास्तव वस्तु के ‘निर्विशेषब्रह्म’ नामक प्रकार में सायुज्यकारिणी अवस्था को प्राप्त कराना है । (निर्विशेषकैवल्य)

 

वैदिक योगमार्ग का लक्ष्य परमसत्यस्वरूप/अद्वयज्ञानस्वरूप तत्त्व/वास्तव वस्तु के ‘अन्तर्यामी परमात्मा’ नामक प्रकार में सायुज्यकारिणी अवस्था को प्राप्त कराना है (अर्द्धसविशेषकैवल्य) ।

 

वैदिक भक्तिमार्ग (साधारण प्रकार जिसे कि भगवदैश्वर्यज्ञानशिथिलीकृत (भगवान् के ऐश्वर्यज्ञान से जो शिथिलीकृत हुआ हो वैसा) ‘विधिमार्ग’ वा ‘मर्यादामार्ग’ कहा गया है) का लक्ष्य परमसत्यस्वरूप/अद्वयज्ञानस्वरूप तत्त्व/वास्तव वस्तु के ‘भगवान्’ नामक प्रकार के साथ ‘सालोक्य’/’सार्ष्टि’/’सामीप्य’/’सारूप्य’ ( — इन चार सविशेष मुक्तियों के भी ‘प्रेमसेवोत्तरा’ व ‘सुखैश्वर्योत्तरा’ नामक दो प्रकार माने गए हैं ।) — इनमें से कोई एक मुक्ति प्राप्त करना है । (पूर्णसविशेषकैवल्य)

 

इस ‘भगवान्’ का तात्पर्य यहाँ श्रीराघवेन्द्र राम, नृसिंह, यदुनाथ कृष्ण, नारायण, मत्स्य, कूर्म, विष्णु, चतुर्व्यूहादि से है । व्रजेन्द्रनन्दन कृष्णयहाँ अभिप्रेत नहीं हैं ।

 

इस वैदिक भक्तिमार्ग की भी एक सर्वोच्च पराकाष्ठा वाली अवस्था है जिसे कि भगवदैश्वर्यज्ञानाशिथिलीकृत (भगवान् के ऐश्वर्य ज्ञान से जो शिथिलीकृत् न हुआ हो वैसा) ‘व्रजरसोपासनात्मक रागमार्ग/पुष्टिमार्ग’ कहा जाता है । इसमें परमसत्यस्वरूप/अद्वयज्ञानतत्त्वस्वरूप वास्तव वस्तु का कोई प्रकार नहीं, अपितु तीनों प्रकारों के भी मूल (निर्विशेष ब्रह्म + अन्तर्यामी परमात्मा + षडैश्वर्यपूर्ण भगवान्) साक्षात् ‘स्वयं भगवान्’ नन्दनन्दन गोकुलेश कृष्ण की विशुद्धमाधुर्यमयी लीलाओं में अप्राकृत पार्षदतनु प्राप्त कर प्रवेश करना व प्रवेशोपरान्त ‘शान्त’, ‘दास्य’, ‘सख्य’, ‘वात्सल्य’ व ‘श्रृंगार’ — आदि पञ्च मुख्य भक्तिरसो में से किसी एक रस का ‘आश्रयालम्बन विर्भाव’ बनकर ‘अष्टयामसेवा’ का निष्पादन करते रहना ही एकमात्र लक्ष्य है ।

 

इस रागमार्ग में भी ‘मन्त्रोपासनामयी’ व ‘स्वारसिकीलीलामयी’ — दो प्रकार की समाधियाँ व्रजरासिकाचार्यो के द्वारा शास्त्रीयाधार पर आविष्कृता हुईं हैं ।

 

टिप्पणी –

 

श्रीहरि के व्यतिरिक्त अन्य ब्रह्मा, रूद्र आदि देवी/देवताओं की उपासना में प्रयुक्त समाधि ‘अन्यदेवतोपासना’ (श्रीमद्भगवद्गीता में प्रयुक्त शब्दावली) के अन्तर्गत है, श्रीभगवदुपासनामयी ऐकान्तिकी/अनन्या/उत्तमा/केवला/अप्रधानीभूता/शुद्धा भक्ति के अन्तर्गत नहीं ।

 

निष्कर्ष –

 

जहाँ तक वैदिक समाधि की बात है, वह ‘अन्यदेवतोपासनामयी’, ‘ज्ञानयोगात्मिका’, ‘अष्टाङ्गयोगात्मिका’ व ‘भक्तियोगात्मिका’ है — जिसमे भक्तियोगात्मिका समाधि का उत्कर्ष सकल शास्त्रों के द्वारा गाया गया है एवं उसमें भी व्रजरसोपासनात्मिका अष्टयामसेवामयी स्वारसिकीलीलापरा समाधि ‘आत्यन्तिका’ है । उससे श्रेष्ठ अन्य कोई साधन व साध्य नहीं । वह पञ्चम पुरुषार्थ स्वरूप व्रजप्रेमपरिप्लुता है । अस्तु।

 

विशेष – बौद्ध, जैन आदि भारतीय पर अवैदिक पन्थों में आचरित व वर्णित समाधियाँ भी वैदिकी समाधि व उसके अवान्तर प्रकारों से सर्वथा भिन्न हैं ।

 

 

— गुरुपादाचार्या:

Link / सूत्र — https://goo.gl/0jAiYT

2 thoughts on “कितने प्रकार की समाधियाँ होती है? How many types of samādhis are there? (Only Hindi version)

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