Tibetan Butter Lamp in middle - antardipikanyaya

अन्तर्दीपिकान्यायः ।। antardīpikā-nyāyaḥ (Lamp & Indoor Position analogy)

 

दीपक एवं उसकी भीतरी (अन्तर्) अवस्थिति का दृष्टान्त । यह दृष्टान्त उस दृश्य पर आधारित है कि जहाँ एक दीपक को किसी स्थान के भीतर/बीचोबीच रखा जाये । इस दृष्टान्त का प्रयोग उस परिस्थिति में किया जाता है कि जहाँ किसी वस्तु के द्वारा अनेक प्रयोजन सिद्ध होते हों ।

 

इस दृष्टान्त का प्रयोग मुण्डकोपनिषद् ३.१.५ के शाङ्करभाष्य में हुआ है (मुण्डकोपनिषद् ३.१.५ मूल – “सत्येन लभ्यस्तपसा ह्येष आत्मा सम्यग्ज्ञानेन ब्रह्मचर्येण नित्यम्” । अर्थात् “सत्य के द्वार्य यह परमात्मा – ब्रह्म – लभ्य है, तपस्या के द्वारा लभ्य है, सम्यक् ज्ञान से प्राप्य है, ब्रह्मचर्य/वैदिक अध्ययन के द्वारा नित्य प्राप्य है ।“ ) ।

 

यहाँ पर आद्यशङ्कर का कथन है कि (मुण्डकोपनिषद् ३.१.५ शाङ्करभाष्यम्) – “नित्यं सर्वदा । नित्यं सत्येन नित्यं तपसा नित्यं सम्यग्ज्ञानेनेति सर्वत्र नित्यशब्दोऽन्तर्दीपिकान्यायेनानुषक्तव्य:” । । (“नित्य का तात्पर्य है सर्वदा । नित्य सत्य द्वारा, नित्य तपस्या से, नित्य सम्यक् ज्ञान के माध्यम से – यहाँ सर्वत्र ‘नित्य’ शब्द का अनुवर्त्तन है जिसका आशय ‘अन्तर्दीपिकान्याय’ से लेना है ।“)

 

अर्थात् कि जैसे किसी प्रकोष्ठ के मध्य भाग में रखा हुआ दीपक उस समस्त कक्ष को आलोकित कर देता है – ठीक उसी प्रकार, ‘नित्यम्’ शब्द यहाँ (मु.उ. ३.१.५ में) दीपक की भाँति बीचोबीच रखा हुआ है, अतः, इस ‘नित्यम्’ शब्द (विशेषण पद – अव्ययपद कोटि का व्याकरण के अनुसार) के प्रकाश से अन्य सभी शब्द (विशेष्यपदसमूह) यथा – ‘सत्य’, ‘तपसा’, ‘सम्यग्ज्ञानेन’ व ‘ब्रह्मचर्येण’ – समान रूप से प्रभावित या सम्बन्धित हो जाते हैं (अनुवर्त्तन) ।

 

यह न्याय ‘देहलीदीपन्याय’ (घर की देहली पर दीपक का आलोकित होना) व ‘मध्यदीपन्याय’ (किसी स्थान के मध्य में दीपक का रहना) के सदृश है ।

 

श्री जीवानन्द विद्यासागर प्रकाशन के द्वारा प्रकाशित मुण्डकोपनिषद् के शाङ्करभाष्य ३.१.५ वाली आवृत्ति में ‘अन्त्यदीपकन्यायेन’ (दीपक की अन्त में अवस्थिति) – ऐसा पाठभेद देखने को मिलता है । हमने जो पाठभेद दिया है – ‘अन्तर्दीपिकान्यायेन’ (दीपक की भीतर अवस्थिति) वाला – वह आनन्दाश्रम प्रकाशन से प्रकाशित आवृत्ति के अनुसार है ।

 

 

 

सङ्कलनकर्त्ता – भक्तिरसवेदान्तपीठाधीश्वरा: गुरुपादाचार्या:

(आणन्द, गुजरात, भारत)

 

 

 

***

 

 

 

Antardīpikā-nyāyaḥ is the maxim of a lamp in an indoor placement. This analogy is based on that scenario wherein, the butter-lamp is lit in a central indoor position of a chamber. It (this analogy) is applied to something which fulfils multifarious purpose simultaneously.

 

Its usage occurs in Śāṅkara-bhāṣyam on Muṇḍakopaniṣad 3.1.5 (M.U. 3.1.5 original text – “satyena labhyas tapasā hyeṣa ātmā samyag-jñānena brahmacaryeṇa nityam.”  – This paramātmā/brahma is obtainable through truth, austerity, perfect knowledge and celibacy/study of the Vedas.” ).

 

Herein, Ādya-śaṅkara comments as thus (Śāṅkara-bhāṣyam on M.U. 3.1.5 – commentary text) – “nityaṁ sarvadā. nityaṁ satyena nityaṁ tapasā nityaṁ samyag-jñāneneti sarvatra nitya-śabdo ‘ntardīpikā-nyāyenānuṣaktavyaḥ.” . (“The meaning of the term ‘nityam’ is always. Always through truth, always through penance, always through complete knowledge etc. implies that the usage of the term ‘nityam’ is throughout as similar to the logic of the indoor placement of a butter-lamp.”).

 

The gist of the above commentary is that just as a centrally positioned butter-lamp within a chamber lights up that whole cell, similarly, the term ‘nityam’ is placed here (in M.U. 3.1.5)  just like that butter-lamp in the central position of the whole verse. Therefore, through the illumination of this term (modifier of the unchanged category or viśeṣaṇa-pada of the avyaya-pada type) ‘nityam’ (‘always’), the whole M.U. 3.1.5 is lit up and all the other modified nouns (viśeṣya-padas) employed in that verse like ‘satyena’, ‘tapasā’, ‘samyag-jñānena’ and ‘brahmacaryeṇa’ – are connected with and influenced by it (this is called ‘anuvarttanam’).

 

This nyāya (logical analogy) resembles the ‘dehalī-dīpa-nyāya’ (the butter-lamp lit on the entrance or conjunction of two rooms) and the ‘madhya-dīpa-nyāya’ (the butter-lamp within the middle portion of a cell).

 

In the version published by Śrī Jīvānanda Vidyāsāgara series on M.U. 3.1.5 & its Śāṅkara-bhāṣyam, the variant textual reading of ‘antya-dīpaka-nyāyena’ (the butter-lamp placed in the end) is seen. However, the variant reading of ‘antar-dīpikā-nyāyena’ (the butter lamp within the cell or in its middle position) which we have given corresponds to the edition published by the Ānandāśrama series.

 

 

 

Compiler – Bhakti-rasa-vedānta-pīṭhādhīśvarāḥ Guru-pādācāryāḥ

(Anand, Gujarat, Bhārata)

 

 

Link / सूत्र — https://goo.gl/kuKZet

Leave a Reply

Please log in using one of these methods to post your comment:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s