Goat & Sword for Ajakripaniyanyaya

अजाकृपाणीयन्याय: ।। aja-kṛpāṇīya-nyāyaḥ (Goat & Sword analogy)

 

बकरी एवं तलवार का दृष्टान्त । यह उस कथानक पर आधारित उदाहरण है कि जिसमें बकरी का आकस्मिक निधन हो जाता है खड्ग/तलवार के आघात से एवं इस दृष्टान्त का प्रयोग किसी ऐसी आश्चर्यजनक घटना के दिग्दर्शनार्थ किया जाता है जो कि यकायक बिना किसी पूर्व योजना के हो जाया करती है । अतः यह ‘न्याय’ अथवा दृष्टान्त उसी श्रेणी से सम्बन्धित है कि जिसमें ‘काकतालीय’ व ‘खल्वाटबिल्वीय’ आदि न्याय परिगणित होते हैं ।

 

इस न्याय का समुचित प्रयोग द्रष्टव्य है श्रीहर्ष मिश्र ‘कान्यकुब्ज’ (११वीं शताब्दी – काशी/वाराणसी) की धुरन्धरा ऐतिहासिकी कृति (अद्वैत वेदान्त के उपर प्रणीत वितण्डात्मक ग्रन्थ कि जिसमें नव्यन्यायदर्शन के कतिपय सिद्धान्तों का उच्छेदन किया गया है अद्वैतमत के रक्षणार्थ) ‘खण्डनखण्डखाद्यम्’ में – “पाणौ पञ्च वराटकापिन्धाय कश्चित्पृच्छति कति वराटका इति । पृष्टश्चाजाकृपाणीयन्यायेन ब्रवीति पञ्चेति” ।।

 

इस ‘अजाकृपाणीय-न्याय’ को इस तरह विश्लेषित किया जाता है – “कण्डूयनार्थं स्तम्भादौ शिथिलबन्धखड्गे छागी ग्रीवां प्रसारयति यदृच्छया च ग्रीवा छिद्यते तथाभूतोऽजाकृपाणीयन्यायः काकतालीयन्यायसमः” ।।

 

वेदान्तसंश्लिष्ट व्याकरणदर्शन के ग्रन्थ ‘गणरत्नमहोदधि:’ के कर्ता श्री वर्द्धमान (१२वीं शताब्दी) भी प्रकारान्तर से उक्त तथ्य को समझाते हैं (ग.र.म.द. ३.१९६) – “यथाजया भूमिं खनन्त्यात्मवधाय कृपाणो दर्शितस्तत्तुल्यं वृत्तं केनाचिदात्मविनाशाय कृतमजाकृपाणीयम् “।।

 

 

‘अजाकृपाणीयन्याय’ की तृतीया परिभाषा के अवबोधनार्थ संस्कृत व्याकरण (पाणीनीय परम्परा) के ग्रन्थ “काशिकावृत्ति” (७वीं शताब्दी ईसा पश्चात् में जयादित्य व वामन के द्वारा रचित) के उपर प्रणीत टीकाग्रन्थ ‘पदमञ्जरी’ (मध्यकालीन भारत में श्री हरदत्त मिश्र के द्वारा रचित) ५.३.१०६ में द्रष्टव्या है ।

 

इस न्याय का पुनः उल्लेख नव्यन्यायदर्शन के विद्वान् आचार्य श्री वाचस्पति मिश्र (१५वीं शताब्दी ईसा पश्चात् कि जिन्होंने अद्वैती ग्रन्थ ‘खण्डनखण्डखाद्यम्’ का खण्डन किया व जो १०वीं शताब्दी के मैथिल वाचस्पति मिश्र भामतीकार से भिन्न हैं) ने अपने ग्रन्थ ‘खण्डनोद्धार:’ में किया है तथा पुनः दाक्षिणात्य शैव पन्थ के आचार्य श्री अप्पय दीक्षित् (१६वीं शताब्दी ईसा पश्चात् – भारत का द्रविड प्रान्त) ने भी अद्वैतवेदान्त के उपर प्रणीत निज ग्रन्थ ‘सिद्धान्तलेशसङ्ग्रहः’ में किया है । वहाँ उल्लिखित हुआ है यथा – “काकतालीयसंवादिवराटकसङ्ख्याविषेशाहार्यज्ञानवत्” ।

 

यहाँ यह ध्यातव्य है कि भारतदेश के महाराष्ट्र प्रान्त के लोगों ने भी इसी न्याय को लोकोक्ति में संप्रासारित किया है, परन्तु भिन्न अर्थ/परिभाषा के साथ ।

 

 

 

सङ्कलनकर्त्ता – भक्तिरसवेदान्तपीठाधीश्वरा: गुरुपादाचार्या:

(आणन्द, गुजरात, भारत)

 

***

 

Aja-kṛpāṇīya-nyāyaḥ is the maxim of the she-goat and the sword.  It is founded on some story of a goat’s being suddenly killed by accidental contact with a sword, and is used to illustrate any surprising event happening altogether by chance. It, therefore, belongs to the same class as ‘kāka-tālīya-nyāya’ , ‘khalvāṭa-bilvīya-nyāya’  and others of a similar kind.

 

An excellent illustration of its use is found in Śrī-harśa Miśra’s Khaṇḍana-khaṇḍa-khādyam (a work composed in the defense of Advaita-vedānta in a polemical style by confuting certain notions of Navya-nyāya school — 11th Century CE in Vārāṇasī/Kāśī)  as follows – “pāṇau pañca varāṭakāpindhāya kaścit pṛcchati kati varāṭakā iti. pṛṣṭaścājākṛpāṇīña-nyāyena bravīti pañceti.”

 

Thus, the maxim can be explained further – “kanḍūyanārthaṁ stambhādau śithila-bandha-khaḍge chāgī grīvāṁ prasārayti yadṛcchayā ca grīvā chidyate tathābhūto ‘jākṛpāṇīya-nyāyaḥ kāka-tālīya-samaḥ.”

 

Śrī Varddhamāna, the composer of the treatise ‘Gaṇa-ratna-mahodadhiḥ’ (a work of 12th Century CE on the Pāṇini’s grammatical philosophy combined with Vedānta) puts it differently in his comment (G.R.M.D. 3.196) – “yathājayā bhūmiṁ khanantyātma-vadhāya kṛpāṇo darśitas-tat-tulyaṁ vṛttaṁ kenacid ātma-vināśāya kṛtam ajā-kṛpāṇīyam”.

 

For still another variety, do refer to the ‘Padamañjarī’ 5.3.106 (composed by Haradatta Miśra of medieval Bhārata) Sanskrit sub-commentary on the Sanskrit commentary on Pāṇini’s Āṣṭādhyāyī (Sanskrit grammar) called ‘Kāśikā-vṛtti’ (composed by scholars Jayāditya and Vāmana in the 7th Century CE) .

 

This nyāya (analogy/comparison), with the same illustration, is found, also, in the ‘Khaṇḍanoddhāra’ (composed as refutation of the earlier Advaitin treatise ‘Khaṇḍana-khaṇḍa-khādyam — by Navya-naiyāyika Vācaspati Miśra of 15th Century CE – different from the Vācaspati Miśra of 10th Century CE of Mithilā – the Bhāmatī-kāra). And, the illustration, without the said nyāya, is found in the Advaita-vedānta treatise ‘Siddhānta-leśa-saṅgrahaḥ’ of Śaivācārya Appaya-dīkṣita (16th Century CE – Draviḍa Province of Bhārata). It is mentioned there – “kāka-tālīya-samvādi-varāṭaka-saṅkhyā-viśeṣāhārya-jñāna-vat”.

 

It is interesting to note that the Marāṭhī-speaking folk of Western Bhārata have adopted the same maxim, but with a changed meaning. It is defined as “The maxim of the sword upon the neck of the goat. Expressive of meekness and absolute helplessness.”

 

 

 

Compiler – Bhakti-rasa-vedānta-pīṭhādhīśvarāḥ Guru-pādācāryāḥ

(Anand, Gujarat, Bhārata)

 

Link / सूत्र — https://goo.gl/ko8qpr

 

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