क्या वेद एवं गीता केवल सनातनधर्मीयों के लिये  है  या इतर पन्थों के अनुगन्ताओ के लिये भी? / Are Vedas & Gītā only meant for the followers of Sanātana-dharma or are these relevant for the traversers of other paths, too? (Only Hindi version)

 

 

 

कोई यदि गीता को ऐसा ग्रन्थ मानता है कि जो सनातनधर्मेतर पन्थों का भी विरोध करने वाला ग्रन्थ नहीं है, तो ये उस व्यक्ति की सबसे बड़ी मूर्खता है । गीता १६.२३-२४ का पारम्परिक अर्थघटन ये सिद्ध करता है कि भगवान् ने सनातनधर्मेतर ग्रन्थों को न शास्त्र माना है और न ही उन पन्थों को शास्त्रप्रतिपादित मार्ग ।

 

शास्त्र केवल सनातनधर्म के वेदपुराणादि ग्रंथों को माना गया है । बौद्ध, जैन, ख्रिस्ती, इस्लाम जैसे वेदविरुद्ध मतों की स्थापना करने वाले ग्रंथो को कतही सनातनधर्म के महान आचार्यो ने ‘शास्त्र’ की संज्ञा नहीं दी है । गीता १६.२३-२४ के ऊपर शांकर, रामानुज आदि सनातनधर्म के महान इतिहासप्रसिद्ध भाष्यकार आचार्यों के मत के विरूद्ध जाना है जब कोई यह कहे की गीता १६.२३-२४ में जिन शास्त्रों की अवहेलना न करने की बात की गयी है – वो ‘शास्त्र’ सनातनधर्म के शास्त्र के अलावा अन्य वेदविरुद्ध पथ के धर्मग्रन्थ भी हैं । अतः मनगढन्त व्याख्याओं से बचे और पारम्परिक गीताभाष्यों का अध्ययन करें । गीता १६.२३-२४ जब अवैदिक ग्रंथों को शास्त्र मानती ही नहीं है, तब तो गीता १६.२३-२४ के अनुसार ‘शास्त्रों की अवज्ञा’ वैदिक शास्त्रों की अवज्ञा हैं, अवैदिक काल्पनिक शास्त्रों की अवज्ञा नहीं । विपरीत तर्क अर्थात् reverse logic के द्वारा गीता १६.२३-२४ के अनुसार यदि कोई अवैदिक धर्मग्रन्थ का अनुसरण करता है, वह भी ‘शास्त्र’ की अवहेलना करने वाला ही माना जाएगा । गीता महाभारत का अंग है व महाभारत ‘इतिहास’ की श्रेणी में आने के कारण ‘पञ्चमवेदस्वरूप पुराण’ से उसका आशय भिन्न नहीं हो सकता । तभी तो महर्षि वेदव्यास महाभारत के प्रारम्भ में कहते हैं कि — ‘इतिहासपुराणाभ्यां वेदं समुपबृम्हयेत्’ अर्थात् ‘महाभारत + वाल्मीकीय रामायण रूपी इतिहास व १८ महापुराण रूपी पुराणों के सहारे वेदों का सही तात्पर्य जानना होगा ।’ ‘पुराणः पञ्चमो वेद:’ — ऐसा भी शास्त्रों में अनेक बार उल्लिखित हुआ है ।

 

अत: स्कंदपुराण का वचन –‘ऋग्यजु:सामाथर्वाञ्च भारतं पंचरात्रकम । मूलरामायणम् चैव शास्त्रमित्यभिधीयते ।। यच्चानुकूलमेतस्य तच्च शास्त्रम् प्रकीर्तितम् । अतो’न्य ग्रन्थविस्तारो नैव शास्त्रं कुवर्त्म तत् ।।’ अर्थात् ‘४ वेद + तत्संश्लिष्ट उपनिषद्/ब्राह्मण/आरण्यकादि ग्रन्थ, महाभारत, नारदपाञ्चरात्र, मूल वाल्मीकीय रामायणम् — इनको ही शास्त्र माना गया है । परवर्त्ती ऋषि/मुनि/आचार्यो/सन्तों/विद्वानों के द्वारा रचित कोई भी ग्रन्थ जो की इन मूल शास्त्रों के अनुकूल आशय वाले हों — उन्हें भी शास्त्र माना जा सकता । पर जिन ग्रंथों का मत इन मूल वैदिक शास्त्रों के मत के विरोध में हो — उन्हें — ‘शास्त्र’ नहीं, अपितु कुपथ मानना चाहिए।” — महर्षि वेदव्यास का वचन ।

अतः आज के समय में तथाकथित ‘गीतामनीषी’ सैकड़ों पथभ्रान्त लोग जो सनातनधर्म का पारम्परिक रहस्य नहीं जानते, वें ही इस गलत बात का प्रचार करतें हैं कि ‘श्रीमद्भगवद्गीता’ सनातनधर्म के अतिरिक्त अन्यान्य अवैदिक धर्मों/पन्थों के प्रति भी ‘सहानुभूति’ या ‘निर्विरोध’ रखती हैं । अत: ऐसे अवैदिक लोगों की बातों से बचे ।

 

पुनर्जन्म व अवतारवाद जैसे सिद्धान्तों को न मानने वाले समस्त पन्थों के ग्रन्थ अवैदिक कुपथ है ।

 

आज कल के तथाकथित गीता के विवेचक गीता को ऐसा ग्रन्थ अनेक बार अनेक अवसरों पर बताया करते हैं जो कि ‘जो किसी भी सनातनधर्मभिन्न पन्थ का विरोध नहीं करती’ — बस यही बात उनकी गीता की आत्मा की विरोधिनी कैसे सिद्ध होती है — यें हमने गीता १६.२३-२४ की विश्लेषण व स्कन्दपुराण के वचन का उद्धरण देकर सिद्ध कर दी । ऐसा संत जो गीता की आत्मा के विरोध में बात करें उसका संतत्त्व संदिग्ध है । दस करोड़ लोग किसी को सन्त मान लें, उससे संतत्त्व सिद्ध नही होता । वैचारिक भ्रान्ति वाले सन्तों का आदर करना दार्शनिकों की परम्परा कभी नहीं रही ।

 

दूसरी ओर, बौद्ध, जैन, सिक्ख आदि भारतीय पन्थों (Indigenous sects) को ‘अवैदिक’ इसीलिये कहा जाता है क्योंकि उन्होंने वेदों को सनातनधर्म का प्रतिपादक मानने से एवं सनातनधर्म को स्वयं न मानने से उन वेदों उन्होंने का बहिष्कार किया “वेद: नास्ति प्रमाणम्” इस प्रकार से मानकर एवं इस्लाम, ख्रिस्ति, पारसी, यहूदी इत्यादि म्लेच्छ/यवन पन्थों (Abrahamic sects) ने भी वैदिक ‘अवतारवाद’ व ‘पुनर्जन्मवाद’ व ‘कर्मसिद्धान्तवाद’ के विरुद्ध मतों का प्रचार किया वैदिक ज्ञान को विरोध में । अतः जो मूर्ख यह प्रलाप करते हैं कि वेद धर्म-निरपेक्ष है एवं वेदों का एवं श्रीमद्भगवद्गीता जैसे शास्त्रों का कोई विशेष धर्म से सम्बन्ध नहीं हैं – वें केवल अपनी अल्पज्ञता का ही परिचय दे रहे हैं । वेद एवं गीता जैसे ग्रन्थ शुद्धरूप से एवं पूर्णतया केवल सनातनधर्मीय ग्रन्थ हैं । रही बात वेदों को मानवमात्र के लिये मानने कि – तो यह भी दोषयुक्त है क्योंकि वैदिकी परम्परा वेदों के कर्मविद्यापरक एवं ब्रह्मविद्यापरक — उभय भाग को केवल वैदिक आर्य (भ्रम से ‘आर्यसमाजी’ न मान लिया जाय) द्विजाति के लिये ही अध्ययनयोग्य मानती है । श्रीमद्भागवतम् १.४.२५ (“स्त्रीशूद्रद्विजबन्धूनां त्रयी न श्रुतिगोचरा” — “स्त्रीयों, शूद्रों व द्विजबन्धुओं का अधिकार वेदों के सम्बन्ध में निरस्त है”) में स्पष्ट रूप से वेदों के अध्ययन का अधिकार से स्त्रीयों को, शूद्रों को एवं पतित द्विजाति को बहिष्कृत किया गया है । अतः जब आर्यों में से भी बहुतेरों को वेदाध्ययन का अधिकार नहीं है, तब भला मिथ्याप्रलाप और पाश्चात्य (यवन) विद्वानों (जैसे के Max Mueller आदि) के प्रभाव में आकर यह बकना कि वेद तो प्राणीमात्र (यवन/म्लेच्छादि अन्त्यजों का तो अधिकार वेदाध्ययन में सर्वथा बाधित है) के लिये है — एक वैदिकी सनातना परम्परा के विरुद्ध कुतथ्यमात्र है ! इति शम् !

 

 

 

Link / सूत्र — https://goo.gl/A3yx6a

 

— भक्तिरसवेदान्तपीठाधीश्वरा: गुरुपादाचार्या: / Bhaktirasavedāntapiṭhādhīśvarāḥ Gurupādācāryāḥ (आणन्द, गुजरात, भारत / Anand, Gujarat, Bhārata)

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