South Indian style Krsna and Yasoda

क्या श्रीमद्भागवतम् श्रीहरि के अतिरिक्त भी अन्य किसी देव/देवी को परात्पर ब्रह्म के रूप में स्वीकारता है? / Does Śrīmad-bhāgavatam establish any other celestial deity as the Absolute Reality other than Śrī Hari? (Only Hindi version)

 

 

 

अवतारणा / Introduction –

 

आज के व्यावसायिक युग में कुछ श्रीमद्भागवत के महाप्रसिद्ध कथावाचकगण वैष्णवविरोधी स्मार्त्त मत को ग्रहण करते हुए श्रीमद्भागवत के आदिम स्कन्ध के प्रथमाध्याय के पहले श्लोक (जो कि गायत्र्यात्मक है) के उपर प्रवचन देते समय इस प्रलापपूर्णा उक्ति को प्रस्तुत करते हैं –

 

पूर्वपक्ष —

 

चूँकि श्रीमद्भागवत के १.१.१. में परात्पर तत्त्व परब्रह्म का कोई विशेष नाम नहीं लिया गया है (जैसे कि राम, कृष्ण, विष्णु, नारायण, शिव, दुर्गा, गणेश आदि), अपितु महर्षि वेदव्यास केवल इतना कहते हुए पाये जाते हैं कि ‘…..सत्यम् परम् धीमहि’ अर्थात् ‘हम परम सत्य का ध्यान करते हैं’ – अतः या तो समस्त विशेषणों से रहित ‘निर्विशेषब्रह्म’ श्रीमद्भागवत का विषय है अथवा तो कोई एक विशेष भगवत्स्वरूप या देव/देवी न होकर सनातनधर्म में जितने भी देवगण उपास्य है – सभी का ‘परम सत्य’ के रूप में निर्देश यह श्रीमद्भागवत का प्रथम श्लोक करता है । प्रमाण —

 

“इन्द्रं॑ मि॒त्रं वरु॑णम॒ग्निमा॑हु॒रथो॑ दि॒व्यः स सु॑प॒र्णो ग॒रुत्मा॑न् ।
एकं॒ सद्विप्रा॑ बहु॒धा व॑दन्त्य॒ग्निं य॒मं मा॑त॒रिश्वा॑नमाहुः ॥४६॥“ (ऋग्वेद १.६४.४६)

 

अर्थात् “एक ही परतत्त्व का तत्त्वदर्शी अनेक संज्ञाओ से निर्देश करते है यथा ‘अग्नि’, ‘यम’, ‘मातरिश्वा’, ‘इन्द्र’, ‘मित्र’, ‘वरुण’, ‘अग्नि’ एवं ‘सुपर्ण गरुड’ ।

 

चूँकि श्रीमद्भावत १.१.३ में कथित हुआ है कि ‘निगमकल्पतरोर्गलितं फलं…..’ अर्थात्  ‘यह श्रीमद्भागवत वेदरूपी कल्पलता का गलित फल है….’, अतः वेद का व्याख्यानरूप होने से वैदिक सिद्धान्त कि समस्त इन्द्रादि देवता एक परमेश्वर के ही रूप हैं – श्रीमद्भागवत भी स्वीकारता है तथा इसी कारण से उसके मङ्गलाचरण के प्रथम श्लोक में किसी भी विशेष भगवत्स्वरूप वा देव/देवी का नामोल्लेख नहीं हुआ है ।

 

***

 

उत्तरपक्ष व सिद्धान्त –

 

क) शुक्लयजुर्वेदीय शतपथ ब्राह्मण १४.१.१.५ में जहाँ पर उल्लिखित हुआ है कि – “तद्विष्णुं प्रथमं प्राप स देवतानां श्रेष्ठोऽभवत्” – अर्थात् “वह विष्णु प्रथम स्थान को प्राप्त हुआ व देवताओं में श्रेष्ठ बना” । पुनः ऋग्वेदीय शाकलशाखीय ऐतरेय ब्राह्मण १.१.१. में उल्लिखित है कि – “अग्निर्वै देवनामवमो विष्णुः परमस्तदन्तरेण सर्वा अन्या देवता  अर्थात् “अग्नि समस्त देवताओं में अधम है; विष्णु समस्त देवों में परम है तथा उन दोनों के मध्य में अन्य समस्त देवताओं की स्थिति है ।“

 

जहाँ कही भी वेदपुराणादि शास्त्रों में विष्णु के अतिरिक्त अन्य देवताओं का परमतम रूप में स्तवन देखा जाता है, वहाँ उन सूर्यब्रह्मरुद्रेन्द्रादि देवताओं के हृदयाकाश में अन्तर्वर्ती परमात्मा के रूप में स्थित विष्णु का ही स्तवन अभिप्रेत है एवं भाल्लवेय श्रुति का तो यहाँ तक कथन है कि – “नामानि विश्वाऽभि न सन्ति लोके यदाविरासीदनृतस्य सर्वम् । नामानि सर्वाणि यमाविशन्ति तं वै विष्णुं परममुदाहरन्ति ।“  – अर्थात् “समस्त नाम/सञ्ज्ञा/पदों/अभिधाओं/वाचकों/शब्दों (देवभाषा संस्कृत में) के द्वारा विष्ण्वातिरिक्त अन्य किसी भी अर्थ को लेना उन शब्दों का शाश्वत अर्थ नहीं माना जा सकता । अतः केवल विष्णु ही समस्त अभिधाओं/नामों के द्वारा परमतम शाश्वत रूप से वाच्य/अभिधेय है ।“ – इन साक्ष्यों के आधार पर जहाँ भी रुद्रब्रह्मेन्द्रादि देवताओं का परमरूप में उल्लेख हुआ है, वहा वे ब्रह्मरुद्रेन्द्रादि देवता अभिप्रेत न होकर केवल विष्णु ही उन सञ्ज्ञाओं के परमतम/मुख्यतम वाच्य होने के कारण अभिप्रेत हैं ।

 

तभी तो काठक श्रुति कहती है कि “सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति” अर्थात् “सभी वेद जिस पद का वर्णन करते है” – तभी तो सामवेद की कौथुमीय शाखा के उत्तरार्चिक का २.८.२.५.४-५ स्पष्ट कहता है कि – “तद्विष्णोः परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरयः । दिवीव चक्षुराततं ।। तद्विप्रासो विपन्यवो जागृवांस: समिन्धते । विष्णोर्यत्परमं पदम् ।।“ अर्थात्  “उस विष्णु का परम पद सदा देवताओं के द्वारा अवलोकित होता रहता है…” ।

 

पुनः ऐतरेय उपनिषद् उद्घोषित करता है – “ता वा एता: सर्वा: ऋच: सर्वे वेदाः सर्वे घोषा: एकैव व्याह्रति: एकैव व्याह्रतिः प्राण एवेति ।“ अर्थात् – “सभी ऋचाए, सभी वेद, सभी घोषस्वर केवल एक ‘प्राण’ का ही वर्णन करते है, केवल एक उसका ही ।“

 

श्रीमद्भगवद्गीता के १५.१५ में भी यही उद्घोषित हुआ है – “…वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो….” अर्थात् “…समस्त वेदों के द्वारा केवल मैं ही निश्चित रूप से जाना जाता हूँ ।“ अतः महाभारत का परिशिष्टस्वरूप हरिवंशपुराण भी कहता है – “वेदे रामायणे चैव पुराणे भारते तथा । आदावन्ते च मध्ये च हरिः/विष्णुः सर्वत्र गीयते ।।“ अर्थात् – “वेदे में, रामायण में, पुराण में, तथा महाभारत में – इन सब के आदि में, मध्य में, अन्त में – और तो और – इन सब शास्त्रों के हर स्थान में श्री हरि का ही गान हुआ है ।“

 

चूँकि समस्त संज्ञाएँ सर्वमुख्यरूप से केवल एक श्री हरि की ही प्रतिपादिका हैं (उन उन नाम से प्रसिद्ध हरिभिन्न देवों की प्रतिपादिका तो गौण रूप से हैं), अतः पुनः ऋग्वेद  १०.८२.३ कहता है – “यो देवानां नामधा एक एव” अर्थात् “जो अनेकानेक देवों के नामों से प्रतिपादित एक ही परमेश्वर है” ।

मुण्डकोपनिषद् भी इसी बात को दुहराता है – “सर्वनामा सर्वकर्मा सर्वलिङ्ग:” अर्थात् “परब्रह्म सर्वनाम (सभी नामों के द्वारा प्रतिपाद्य) है, सर्वकर्म है तथा सर्वलक्षणों से युक्त है” ।

 

पुनः वामनपुराण का उद्घोष है – “सर्वछन्दोभिधो ह्येषः सर्वदेवाभिधोह्यसौ” अर्थात् “यह विष्णु ही सभी छन्दों (वेदों) में वर्णित संज्ञाओं/नामों/अभिधाओं का वाच्य है (उन नामों से प्रतिपादित है) तथा सभी देवताओं/देवीओं के नाम से भी यही विष्णु प्रतिपादित हुआ है ।“

 

अतः अति स्पष्टरूप से ब्रह्माण्ड पुराण भी वेद में प्रयुक्त ‘ब्रह्म’/’इन्द्र’ आदि सभी संज्ञाओं को केवल पुरुषोत्तम/त्रिविक्रम/विष्णु/हरि – परक ही मानता है । प्रमाण – “बृम्हणाद्ब्रह्मनामासौ ऐश्वर्यादिन्द्र उच्यते । एवं नानाविधै: शब्दै: एक एव त्रिविक्रम: । वेदेषु सपुराणेषु गीयते पुरुषोत्तम: ।।“ अर्थात् – “अतिमहान् होने से वह ब्रह्म कहा जाता है तथा ऐश्वर्यवान होने से वह इन्द्र कहा जाता है । इस प्रकार नाना प्रकार के शब्दों से केवल एक भगवान् त्रिविक्रम (विष्णु) ही कहे जाते हैं । वेदों व पुराणों में पुरुषोत्तम ही गाये गये हैं ।“

 

ख) जहाँ तक श्रीमद्भागवत का मत है, वह भी वैष्णवविरोधी स्मार्त्त मत (स्मार्त्त मत समस्त देवों/देवीयों को भगवान् वासुदेव के समकक्ष वा उनसे सर्वथा अभिन्न मानता है – न कि उन्हें वासुदेव के विभूतिस्वरूप तथा ऐसा स्मार्त्तमत समस्त वेदादिशास्त्रों का महातात्पर्य केवल भगवान् वासुदेव में नहीं, अपितु सकल अन्यान्य देवी/देवताओं में भी पर्य्यवसित मानता है) के प्रतिकूल है । यदि ग्रन्थ के दो उपक्रम (प्रारम्भिक) वाक्य यथा श्री.भा.म.पु. १.१.१ (“….सत्यम् परम् धीमहि”) व

 

श्री.भा.म.पु.  १.२.२८-२९ (“वासुदेवपरा वेदा वासुदेवपरा मखा: वासुदेवपरा योगा वासुदेवपराः क्रिया: । वासुदेवपरम् ज्ञानं वासुदेवपरम् तपः वासुदेवपरो धर्मो वासुदेवपरा गतिः ।।“ अर्थात् “वासुदेव के ही प्रतिपादक हैं समस्त वेदादि शास्त्र, वासुदेव की ही सन्तुष्टिपरायण हैं समस्त वैदिक यज्ञ, योग भी वासुदेव की प्राप्ति के लिये अनुष्ठित होता है, वासुदेव के निमित्त ही सकल वैदिकी क्रियायें हैं, वासुदेवपरक ज्ञान है ब्रह्मविद्या का, वासुदेव के निमित्त तपस्या का आचरण होता है, धर्म भी वासुदेवपरक है एवं मोक्ष भी वासुदेव का ही प्रापक है ।“)

 

तथा ग्रन्थ के बीच में आने वाले दो मुख्य माध्यमिक वाक्य यथा

 

श्री.भा.म.पु. १०.१४.४२ (“अहो भाग्यं अहो भाग्यं नन्दगोपव्रजौकसाम् । यन्मित्रं परमानन्दं पूर्णं ब्रह्म सनातनम् ।।“ अर्थात् “क्या अहो भाग्य है ! क्या अहो भाग्य है नन्दगोप के व्रज में निवास करने वालें व्रजवासी गोप व गोपीवृन्द का कि सनातन पूर्ण ब्रह्म परमानन्दस्वरूप श्रीगोविन्द इनके साक्षात् मित्र बन चुके हैं !”) +

 

श्री.भा.म.पु. १०.२.२६ (देवा: ऊचुः — “सत्यव्रतं सत्यपरं त्रिसत्यं सत्यस्य योनिं निहितं च सत्ये । सत्यस्य सत्यम् ऋतसत्यनेत्रं सत्यात्मकं त्वां शरणं प्रपन्ना: ।।“ अर्थात् ब्रह्मरुद्रेन्द्रादि उपस्थित देवताओं ने कहा – “आप श्रीगोविन्द जो कि सत्यव्रत हैं, सत्यपरायण अथवा परम् सत्य हैं, सत्य के स्रोतस्वरूप हैं, तीनों कालों, लोकों वा अवस्थाओं में सत्य हैं, सत्य में अधिष्ठित है, सत्य के भी सत्य हैं, रुचिकर सत्य के उद्गम हैं, तथा सत्यविग्रह हैं – ऐसे आप की शरण में हम गये हैं !”)

 

एवं ग्रन्थ के उपसंहार में आने वाले दो मुख्य वाक्य यथा –

 

श्री.भा.म.पु. १२.१३.१ {“यं ब्रह्मा वरुणेन्द्ररुद्रमरुतः स्तुन्वन्ति दिव्यैः स्तवैर्वेदैः साङ्गपदक्रमोपनिषदैर्गायन्ति यं सामगा: । ध्यानावस्थिततद्गतेन मनसा पश्यन्ति यं योगिनो यस्यान्तं न विदुः सुरासुरगणा देवाय तस्मै नमः ।।“ अर्थात् “जिनका (वासुदेव को – क्योंकि ब्रह्मा, इन्द्र, रुद्र आदि देवताओं के परिशेष के पश्चात् केवल भगवान् श्रीहरि/विष्णु/वासुदेव/नारायण ही तो अवशिष्ट रह जाते हैं !) स्तवन दिव्य स्तवों के द्वारा ब्रह्मा, वरुण, इन्द्र, रुद्र तथा मरुद्गण प्रभृति देवता किया करते हैं, सामगान में निपुण जिनका गान उपनिषद्/श्रुतिओं तथा सषडङ्गपदक्रमपाठ पूर्वक किया करते हैं, अष्टाङ्गयोगरूपी ध्यान में अवस्थित योगीगण तद्गत (भगवत्परायण) मन/चित्त/हृदय के द्वारा जिनका दर्शन प्राप्त करते हैं,

 

(ध्यातव्य है कि यह केवल श्री हरि के दर्शन की ही बात हो रही है कि जैसे पुष्टि हुई है महाभारत के अन्तर्गत प्राप्त विष्णुसहस्रनामस्तोत्रम् के श्लोक में – “शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम् । लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम् ।।“ अर्थात् “शान्ताकार, शेषशय्यासीन, पङ्कजनाभ, देवेश, विश्वाश्रय, गगन की नीलिमा के समान मेघवर्ण तथा शुभाङ्ग, लक्ष्मीपति, कमलनेत्र, संसाररोगहर, सर्वलोक के नाथ वैसे विष्णु की मैं वन्दना करता हूँ कि जो योगियों के द्वारा ध्यान में देखे जाते हैं ।“ व श्रीमद्भागवतम् २.२.८ में भी – “केचित्स्वदेहान्तर्हृदयावकाशे प्रादेशमात्रं पुरुषं वसन्तम् । चतुर्भुजं कञ्जरथाङ्गशङ्खगदाधरं धारणया स्मरन्ति ।।“ अर्थात् “कोई कोई योगीजन अपने देह के भीतर स्थित हृदयाकाश में विराजमान प्रादेशमात्र अर्थात् अङ्गुष्ठमात्र आकृति के परमपुरुष चतुर्भुज शङ्ख, चक्र, गदा तथा पद्मपुष्प के धारक का धारणा के द्वारा स्मरण करते हैं ।“)

 

ऐसे देव (भगवान् वासुदेव – अवशिष्ट न्याय से) को हम नमस्कार करते हैं कि जिनका अन्त (पारावार) सुर/देव तथा असुर/दैत्य भी नहीं पा सकतें !”

 

एवं श्री.भा.म.पु. १२.१३.२३ (श्रीमद्भागवत का सर्व अन्तिम श्लोक) कहता है – “नामसङ्कीर्त्तनं यस्य सर्वपापप्रणाशनम् । प्रणामो दुःखशमनस्तं नमामि हरिं परम् ।।“ अर्थात् “जिनका नामसङ्कीर्त्तन सर्वपापों का प्रकृष्टरूप से नाशकारी है तथा जिनको किया गया प्रणाम दुःखों का शमन करने वाला है – वैसे ‘परम’ श्रीहरि को मै नमस्कार करता हूँ ।“ —

 

का योग किया जाता है (अर्थात् ग्रन्थ के प्रारम्भ में प्राप्त दो प्रमाण १.१.१. व १.२.२८-२९ + ग्रन्थ के मध्य में प्राप्त दो प्रमाण १०.१४.४२ व १०.२.२६ + ग्रन्थ के अन्त में आने वाले प्रमाण १२.१३.१ व १२.१३.२३ – इन सभी का योग किया जाता है) तब केवल और केवल भगवान् वासुदेव पुरुषोत्तम ही श्रीमद्भागवत के एकमात्र चरमतम प्रतिपाद्य निर्णीत होते है ।

 

 

— भक्तिरसवेदान्तपीठाधीश्वरा: आचार्यश्री: गुरुपादा:

(आणन्द, गुजरात, भारत)

 

 

सम्पूर्ण निबन्ध के अध्ययन का सूत्र / Link for perusing the whole essay — https://goo.gl/Ydf6gm

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