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The opinion of an ideologically deviant self-styled spiritual master/godman of Sanātana-dharma /  सनातनधर्म में एक भ्रान्तिपूर्ण विचार वाले स्वयम्भू गुरु का मत  –

 

 

 

A person solely endeavouring for his own emancipation from the clutches of nescience is deemed a selfish one in the spiritual context. Whereas, a one primarily endeavouring for the liberation of others is a truly selfless being.

 

Evidences —

 

a) ‘ātmanastu kāmāya sarvaṁ priyaṁ bhavati’ or “All objects/beings, sentient or insentient, are perceived as dear and lovely for one’s own pleasure sake.” (Bṛhadāraṇyaka Upaniṣad)

 

b) ‘sarve ‘tra sukhinaḥ santu sarve santu nirāmayāḥ / sarve bhadrāṇi paśyantu mā kaścaid duḥkha-bhāg bhavet //’ or ‘Let all the beings be replete with bliss and let them all be without miseries. Let all auspicious occur with them and let not any calamity befall on them.’ (Veda)

 

c) ‘dyauḥ śāntirantarikṣa gaṁ śāntiḥ pṛthvī śāntirāpaḥ śāntirauśadhayaḥ śāntirvanaspatayaḥ śāntir viśvedevāḥ śāntir brahma śāntiḥ sarva gaṁ śāntiḥ śāntireva śantiḥ sāmā śāntiredhi //’ or ‘Let the heavenly planets, the sky in between, the earth, the water, the medicines, the herbs, the Viśvedevās, the brahman etc. – let all move towards peace.’ (Śukla-yajurveda-samhitā)

 

d) Śrīmad-bhāgavatam 7.9.44 –
prāyeṇa deva munayaḥ sva-vimukti-kāmā maunaḿ caranti vijane na parārtha-niṣṭhāḥ /

naitān vihāya kṛpaṇān vimumukṣa eko nānyaḿ tvad asya śaraṇaḿ bhramato ‘nupaśye //

Rendition —

Śrī Prahlāda  says – “My dear Lord Nṛsiḿhadeva, I see that there are many saintly persons and devatās (celestial gods) indeed, but they are interested only in their own deliverance. Not caring for the big cities and towns, they go to the Himalayas or the forest to meditate with vows of silence [mauna-vrata]. They are not interested in delivering others. As for me, however, I do not wish to be liberated alone, leaving aside all these poor fools and rascals. I know that without firm devotional faith in you, the Absolute, and without taking shelter of Your lotus feet, one cannot be happy. Therefore I wish to bring them back to shelter at Your lotus feet.”

 

e) ‘vairāgya-yug-bhakti-rasaṁ prayatnair apāyayan mām anabhīpsum andham / kṛpāmbudhir yaḥ paraduḥkhaduḥkhī sanātanaṁ taṁ prabhuṁ āśrayāmi //

(Vilāpakusumāñjailḥ of Gauḍīya-vaiṣṇavācārya Śrīla Raghunāthadāsa Gosvāmipāda)

“I take submissive refuge of the lotus-like feet of Śrīla Sanātana Gosvāmipāda who was (in spiritual context and not in the mundane one) full of melancholy upon beholding the miseries of the conditioned jīvas in this samsara, who was an ocean of mercy and who, despite my remaining adamant and defiant, forcibly made me drink the divine succulent mellows of bhakti endowed with strong feeling of renunciation (towards samsara). Though, I was blind (not knowing what is good or bad for me), he showered his compassion on me.”

 

f) ‘vāñchā-kalpatarubhyaś ca kṛpā-sindhubhya eva ca / patitānāṁ pāvanebhyo vaiśṇavebhyo namo namaḥ //’ (Vaiśṇava-vandanā)

 

‘Our prostrations unto vaiṣṇavas (devotees of Śrī Hari) who are like desire-trees for fulfilling spiritual desires of bhakti, who are ocean of compassion and who are the liberators of those most fallen.’

 

Conclusion –

 

Thus, we have seen as to how the views of today’s bogus gurus are in clear contravention with scriptures like Upaniṣads, Vedas, Śrīmad-bhāgavata-mahāpurāṇa and the books composed by great saintly souls of past.

 

 

 

— Bhaktirasavedāntapīṭhādhīśvara Ācārya-śrī Gurupāda

(Anand, Gujarat, Bhārata)

 

 

***

 

सनातनधर्म में एक भ्रान्तिपूर्ण विचार वाले स्वयम्भू गुरु का मत  –

 

 

उपर के चित्र में दीखाये गये मत का खण्डन –

 

जो केवल निजोद्धार के निमित्त प्रयत्नशील रहता है, वह आध्यात्मिक सन्दर्भ में स्वार्थी कहलाता है। जबकि, जो सतत निजात्मोद्धार से अधिक परात्मोद्धार के लिए प्रयासशील बना हुआ है, वह यहाँ परार्थी माना गया है ।

 

प्रमाण —

 

क) ‘आत्मनस्तु कामाय सर्वम्प्रियम्भवति’ (बृहदारण्यकोपनिषद्)

 

अर्थात्  – ‘निज आत्मसंतुष्टि के निमित्त ही इस संसार में सकल स्त्री, पुत्र, देह व गेह आदि पदार्थ प्रिय लगते हैं ।’

 

ख) ‘सर्वे अत्र सुखिनः सन्तु सर्वे सन्तु निरामयाः । सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद्दुःखमाप्नुयात् ।।’ (वेद)

 

अर्थात् ‘इस लोक में समस्त प्राणी सुखी हों, समस्त व्याधियों से रहित हों, उन सब शुभ का दर्शन करें एवं कदापि दुःख की प्राप्ति न करें (आध्यात्मिक सन्दर्भ में अर्थ लेना है, अन्यथा भौतिक संसार तो दुःखों का घर है स्वभाव से जो की श्रीमद्भगवद्गीता के ‘दुःखालयमशाश्वतम्’ वाले श्लोक से प्रमाणित है)

 

ग) ‘द्यौ: शान्तिरन्तरिक्ष गं शान्तिः पृथिवी शान्तिरापः शान्तिरोषधय: शान्तिर्वनस्पतयः शान्तिर्विश्वेदेवा: शान्तिर्ब्रह्म शान्तिः सर्व गं शान्तिः शान्तिरेवशान्तिः सामाशान्तिरेधि ॥’ (शुक्लयजुर्वेदसंहिता)

 

अर्थात् – “स्वर्ग में शान्ति हो, अन्तरिक्ष में शान्ति हो, पृथ्वी पर शान्ति हो, औषधीयों में शान्ति हो, वनस्पतियों में शान्ति हो, विश्वेदेवा शान्त हो, सर्वत्र शान्ति हो, निश्चित शान्ति की ओर हमारा प्रयाण हो ।’

 

घ) प्रह्लाद उवाच – ‘प्रायेण देवमुनयः स्वविमुक्तिकामा मौनं चरन्ति विजने न परार्थनिष्ठा: । नैतान्विहाय कृपणान्विमुमुक्ष एको नान्यं त्वदस्य शरणम्भ्रमतो अनुपश्ये ॥’ (श्री.भा.म.पु. ७.९.४४)

 

श्री प्रह्लाद ने कहा – ‘प्रायः देवगण व मुनिगण अपनी मुक्ति के ही अभिलाषी बने रहते हैं एवं मौन का अवलम्बन करते हैं पर उनमें परोपकार के भाव का सर्वथा अभाव होता है परन्तु मेरा ऐसा स्वभाव नहीं है । मैं तो एक भी कृपण/दयनीय संसारी प्राणी को छोड कर निज मुक्ति की कामना नही करता हूँ एवं आपके चरणकमलों की भक्ति ही एकमात्र कल्याण है, अतः मै उन प्राणीयों को भी आपके चरणों के निष्ठ बनाना चाहता हूँ ।’

 

ङ) ‘वैराग्ययुग्भक्तिरसम्प्रयत्नैरपाययन्मामनभीप्सुमन्धम् । कृपाम्बुधिर्यः परदुःखदुःखी सनातनं तम्प्रभुमाश्रयामि॥’ (विलापकुसुमाञ्जलि: श्रीरघुनाथदासगोस्वामिपादानाम्)

 

अर्थात् ‘मै उन श्रील सनातन गोस्वामिपाद के चरणों का आश्रय करता हूँ कि जिन्होंने वैराग्य से ओतप्रोत भक्तिरस का पान मुझ पान की इच्छा न करने वाले अन्ध वयकि को भी बलात् करवाया । वे तो करुणा के सागर होने के कारण अन्य समस्त संसार के त्रितापों से आहत जीवों के दुख को देखकर स्वयं दुःखी रहते हैं ।

 

च) ‘वाञ्छाकल्पतरुभ्यश्च कृपासिन्धुभ्य एव च । पतितानाम्पावनेभ्यो वैष्णवेभ्यो नमो नमः॥’ (वैष्णववन्दना) ।‘

 

अर्थात् – ‘ भक्तिरूपीणी इच्छा को फलीभूत करने के लिये जो कल्पवृक्ष सदृश हैं, जो करुणा के सागर हैं, जो पतितों का विशेष रूप से उद्धार करने वाले हैं – वैसे वैष्णवों को मैं प्रणाम करता हूँ ।”

 

निष्कर्ष –

 

अतः हमने देखा कि कैसे आज कल के तथाकथित तथा वैचारिक रूप से भ्रान्त गुरुओं के उपदेश वेद, उपनिषद्, श्रीमद्भागवत आदि मूल शास्त्रों के तथा महापुरुषों के द्वारा प्रणीत साहित्य में व्यक्त विचारों से बिलकुल विरोधी प्रमाणित होते हैं ।

 

 

 

— भक्तिरसवेदान्तपीठाधीश्वराः आचार्यश्री: गुरूपादाः

(आणन्द, गुजरात, भारत)

उपरोक्त निबन्ध के अध्ययनार्थ सूत्र / Link for studying the above full essay –

https://goo.gl/8IIINJ

 

 

 

 

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