Dayanand - 2

आर्यसमाजीयों को यह भी समझ लेना चाहिये कि धर्म का तर्कसङ्गत होना आवश्यक नहीं, पर तर्क का धर्मसङ्गत होना आवश्यक है । वैसे ही धर्म को जड-विज्ञान सम्मत होना आवश्यक नहीं, परन्तु जड-विज्ञान को धर्म-सम्मत होना आवश्यक है! क्यों? क्योंकि यदि ऐसा नहीं स्वीकारा गया तब तो जड-विज्ञान के नियम भी कुछ ही काल के फेर में परिवर्त्तित होते रहते है (जैसे की डारविन की evolution theory जो कि एक जमाने में प्रामाणिकता रखती थी, वह आज के जड-वैज्ञानिकों के द्वारा निरस्त की जा चुकी है! वैसे भी वह वेद-पुराणादि शास्त्रो की मान्यता के विरुद्ध थी!), तब तो यदि धर्म जडविज्ञान के अनुगत स्वीकारा जाए तो उस जड-विज्ञानानुगत धर्म में भी बार बार परिवर्त्तन स्वीकारना पडेगा! पर देखने को तो उलटा ही मिल रहा है कि जो जड-विज्ञान आज तक यह मानता चला आ रहा था कि अन्य ग्रह सूर्य की परिक्रमा करते है (वेद-पुराणादि शास्त्रों के विरुद्ध बात), वही जड-विज्ञान आज यह स्वीकार रहा है कि सूर्य अन्य ग्रहों की परिक्रमा करते है (वेदादि के अनूकूल बात) । अतः दयानन्दी आर्यसमाजीयों का यह कहना कि धर्म को प्राकृत-विज्ञान के अनुगत होना चाहिये, सर्वथा दोषयुक्त प्रलाप है । ठीक वैसे ही धर्म को प्राकृत, लौकिक व जड-तर्क के अनुगत बताना भी ठीक नही क्योकी ईश्वर का ईश्वरत्व भी तो ‘कर्त्तुं-अकर्त्तुं-अन्यथाकर्त्तुं-समर्थ:’ एवं ‘अघटन-घटन-पटीयसी-शक्त्यात्मक’ व ‘सकल-विरोध-भञ्जिका-शक्ति-युक्तत्व’ ही तो है! नही तो ईश्वर सामान्य व्यक्ति हो जायेगा! लौकिक तर्क के अनुसार तो महर्षि विश्वामित्र भी कृत्रिम स्वर्गलोक की रचना नही कर सकते थे! और वैसी भी महाभारत भीष्मपर्व ५.२२ स्पष्टरूप से उद्घोषित करता है कि – “अचिन्त्या: खलु ये भावा: न तांस्तर्केण योजयेत् प्रकृतिभ्यः परम् यत्तु तदचिन्त्यस्य लक्षणम् ।।“ – अतः लौकिक तर्क तो अचिन्त्य पदार्थ स्वरूप ईश्वर के विषय में लगाये ही नहीं जा सकते! अतः हम परम्परागत सनातनधर्मावलम्बियो के लिये ‘सत्यार्थप्रकाश’ में अवगाहन करने का कोई औचित्य ही नहीं!

धर्म में जिस तर्क की आवश्यकता है वह शास्त्रमूलक तर्क है । शास्त्रविरोधी शुष्क कुतर्को की यहा कोई अपेक्षा नहीं है  । यथा शास्त्र कहते है कि भगवान् रासलीला करते है अपने भक्तों के साथ (अथर्ववेदीया गोपालतापन्युपनिषद्) एवं तथापि वे निष्कलङ्क बने रहते हैं, तो इस पर तर्क करके भगवान् की लीलाओं को न मानकर उन्हे केवल महापुरुषमानना ये सनातनधर्म की परम्परा नहीं है, केवल आर्यसमाज की परम्परा है । शास्त्र के कुछ अंशो को मानकर कुछ को न माननेवाले लोग अर्ध कुक्कुटी न्याय के अनुगन्ता है (logic of half chicken)।  वे एक अर्ध सत्य को मानकर एवं  अन्य अर्ध सत्य को न मानकर – एक अज्ञानी से भी अधिक भ्रष्ट है वैचारिकरूपेण । हम पहले चार वेदों को तो मानेङ्गे पर पञ्चम वेद स्वरूप पुराणो, इतिहास स्वरूप महाभारत को नहीं मानेङ्गे एवं गीता के भी कुछ श्लोक जो की हमारे आर्यसमाजी मान्यता के अनुकूल हो – केवल उन्हे ही मानेङ्गे! अरे वाह दयानन्दी काला अक्षर भैस बराबर! आर्यसमाजी  भगवान् राम, कृष्ण आदियो को केवल महापुरुष मानते है, ईश्वर नहीं !

Āryasamāja is none else than an unsuccessful endeavour to establish Islamic beliefs on the pretext of Vedas. All classical traditions of Sanātana-dharma, even those which are far distant from Vaiṣṇavism – like the Śaivas, Pāśupatas, Nātha Pantha etc. – have accepted the concept of deity worship. But, these modern interpreters of the Vedas have rejected ‘mūrtti-upāsanā’ by upholding the Islamic beliefs under the pretext of Vedas and by bycotting Purāṇas as not authentic.”

– भक्तिरसवेदान्तपीठाधीश्वर आचार्यश्री गुरुपाद / Bhaktirasavedāntapīṭhādhīśvara Ācārya-śrī Gurupāda

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