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वेद अवतारवाद के पोषक नहीं हैं – ऐसे आर्यसमाजी नवीन विद्रोही मत जो कि अब्राहमी विचारों से प्रभावित है उसका खण्डन / Vedas do not advocate the theory of incarnation of God – Refutation of such heretic view held by the new Āryasamājī sect influenced with Abrahamic notions.

१/1) “उत नोऽहिर्बुध्न्य: शृणोत्वज एकपात्पृथिवी समुद्रः । विश्वेदेवा ऋतावृधो हुवाना: स्तुता मन्त्रा: कविशस्ता अवन्तु ।।” (शुक्लयजुर्वेदसंहिता ३४.५३)

 

अनुवाद – “परमेश्वर सर्वाश्रय होने से ‘बुध्न्य’ हैं । कभी नाश न होने से ‘अहिः’ हैं । एकमात्र ज्ञानमय मोक्षस्वरूप होने से वा एकरस होने के कारण वें ‘एकपात्’ हैं । सर्वाश्रय और सब जगत् का विस्तार करने वाला होने से वे ‘पृथिवी’ हैं । वें ही समस्त सृष्ट लोकों का उद्भव होने के कारण ‘समुद्र’ हैं । वें  हमारी प्रार्थना श्रवण करें । समस्त (विश्वे) सत्य, ज्ञान और ऐश्वर्य की वृद्धि करने वाले (ऋतावृद्धः), एक दूसरे से स्पर्धापूर्वक बढने हारे (हुवाना:) देवगण (देवाः) और विद्वान् दीर्घदर्शी पुरुषों से कहे गये (कविशस्ता:) स्तुतियुक्त एवं उत्तम (स्तुताः) मनन करने योग्य विचार एवं वेदमन्त्र सभी (मन्त्राः) हमारी रक्षा करें (नः अवन्तु) ।”

 

सूचना – यजुर्वेद के ऐतिहासिक संस्कृत भाष्यकार उव्वटाचार्य व महीधराचार्य ने उपरोक्त मन्त्र का तात्पर्य कर्मकाण्डपरक माना है क्योंकि वें महर्षि जैमिनि के पूर्वमीमांसा दर्शन के अनुयायी हैं । परन्तु वेदों के अन्तिम भाग वेदान्त/उपनिषद्/आरण्यक के अनुयायी ब्रह्मसूत्र व तत्प्रणेता महर्षि वेदव्यास के उत्तरमीमांसात्मिका ब्रह्मविद्या के अनुयायी होने के कारण इन मन्त्रों का तात्पर्य ब्रह्मविद्या में ग्रहण करते हैं ।

 

uta no ‘hirbudhnyaḥ śṛṇotvaja ekapātprithivī samudraḥ. viśvedevā ṛtāvṛdho huvānāḥ stutā mantraḥ kaviśastā avantu.” (Śukla-yajurveda-samhitā 34.53)

 

Rendition – “Absolute is ‘budhnyaḥ’ because He is the shelter of all. He is ‘ahiḥ’ because He is immortal. Because He is unborn, He is called ‘aja’. Because He is embodiment of knowledge leading to liberation or because of maintaining single identity, He is called ‘ekapāt’. Because, He is the resting abode of all and the extender of creation, He is called ‘prithivī’. Because, He is the source of all creation, He is called ‘samudra’. May He listen to our prayers. Demigods (devāḥ) who are the enhancers (ṛtāvṛddhaḥ) of all (viśve) truth, knowledge and opulence and who compete within themselves (huvāṇāḥ) – along with the contemplated Vedic hymns (mantrāḥ) replete with exalted prayers (stutāḥ) which are revealed by the scholarly seers (kaviśastāḥ) – all these may protect us (naḥ avantu). ”

 

Note – In the classical Sanskrit commentaries on Yajurveda by the great historical scholars Uvvaṭācārya and Mahīdharācārya (followers of the Pūrvamīmāṁsā or karma-kāṇḍa school of Sage Jaimini), the above hymn has been interpreted in the light of ritualistic ceremony or karmakāṇḍa. However, the followers of the Upaniṣads/Vedānta/Āraṇyaka/Uttara-mīmāṁsā portion (as expounded by Maharṣi Vedavyāsa in the Brahma-sūtras) interpret these verses in the light of brahma-jñāna or spiritual knowledge of the Absolute divine.

 

२/2) “स पर्य्यगाच्छुक्रमकायमव्रणमस्नाविरं शुद्धमपापविद्धम् । कविर्मनीषी परिभूः स्वयम्भूर्याथातथ्यतोऽर्थान् व्यदधाच्छाश्वतीभ्यः समाभ्यः ।। (शुक्लयजुर्वेदसंहिता ४०.८ / ईशावास्योपनिषद् वा वाजसनेयि-संहितोपनिषद् ८)

 

अनुवाद – “वह परमेश्वर (सः) सर्व्वत्र व्यापक है (पर्य्यगात्) । वह शुद्ध, कान्तिमय अथवा तीव शीघ्र गति देने वाला (शुक्रम्), स्थूल, सूक्ष्म एवं कारण – इन तीनों शरीरों से रहित (अकायम्), व्रण, घाव आदि से रहित (अव्रणम्) है । स्नायु आदि बन्धनों से रहित, शुद्ध व अविद्यादि दोषों से रहित एवं सदा पवित्र (अस्नाविरम्), पापों से सदा मुक्त (अपापविद्धम्), क्रान्तदर्शी वा मेधावी (कविः), सबके मनों को प्रेरणा करने वाला (मनीषी), सर्व्वत्र व्यापक वा सब का वशयिता (परिभू:), स्वयं अपनी सत्ता से सदा विद्यमान अथवा स्वयं से ही प्रकट होने वाला (स्वयम्भू:) है । ऐसा वह यथार्थरूप से (याथातथ्यत:) सनातन से चली आयी (शाश्वतीभ्य:) प्रजाओं के लिये (समाभ्यः) समस्त पदार्थों को (अर्थात्) रचता है (व्यदधात्) ।”

 

sa paryagācchukramakāyamavraṇamasnāviraṁ śuddhamapāpaviddham. kavirmanīṣī paribhūḥ svayambhūryāthātathyato ‘rthān vyadadhācchāśvatībhyaḥ samābhyaḥ.” (Śukla-yajurveda-samhitā 40.8 / Īśāvāsyopaniṣad alias Vājasaneyi-samhitopaniṣad 8)

 

Rendition – “That Absolute (saḥ) is all-pervasive (paryyagāt). He is pure, lustrous or a great booster (śukram), bereft of the triple body viz., the subtle, the gross and the causal (akāyam), and devoid of all sorts of pimples and injuries (avraṇam). He is bereft of nervous veins, pure and devoid of all impressions of nescience (asnāviram), devoid of all vices (apāpaviddham), a great seer having sharp acumen (medhāvī), inspiring the minds of all beings (manīṣī), all-pervasive or controller of all (paribhūḥ), and self-existent or manifesting by His own power (svayambhūḥ). Such God, factually (yāthātathyataḥ), creates (vyadadhāt) all items (arthāt) for all the living beings (samābhyaḥ) in existence eternally (śāśvatībhyaḥ).”

 

३/3) “अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन् । प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय सम्भवाम्यात्ममायया ।।” (श्रीमद्भगवद्गीता ४.६)

 

अनुवाद – “मैं अजन्मा (अजः), अविनाशी (अव्ययात्मा) होते हुई भी (सन् अपि)  जीवों का (भूतानां) ईश्वर (ईश्वर:) होते हुए भी (सन् अपि) अपनी योगमाया/आत्मभूता/स्वरूपभूता/अन्तरङ्गाशक्तिस्वरूपा आत्ममाया के द्वारा (आत्ममायया) अपने सच्चिदानन्द स्वरूप का (स्वां प्रकृतिं) अवलम्बन कर (अधिष्ठाय) आविर्भूत होता हूँ (सम्भवामि) ।”

 

ajo ‘pi sannavyayātmā bhūtānāmīśvaro ‘pi san / prakṛtiṁ svāmadhiṣṭhāya sambhavāmyātma-māyayā //” (Śrīmad-bhagavad-gītā 4.6)

 

Rendition – although (api); being (san); unborn (ajaḥ); and having an imperishable body (avyaya-ātmā); although (api); being (san); the Lord (īśvaraḥ); of all beings (bhūtānām); I fully manifest (sambhavāmi); by My Yoga-māyā which is of the nature of My own self (ātma-māyayā); situated in (adhiṣṭhāya); My original (svām); nature (prakṛtim).

 

“Although I am unborn, imperishable and the controller of all living entities, I appear by My Yogamāyā potency in My original sac-cid-ānanda-svarūpa (identity replete with perpetual cognition and bliss).”

 

सूचना – आगे चल कर श्रीमद्भगवद्गीता ४.७ व ४.८ में (“यदा यदा हि धर्मस्य…..परित्राणाय साधूनां…”) श्रीभगवान् विस्तारित रूप से इसी अवतारग्रहण की बात को कहते हैं कि जिसकी वर्त्तमान श्लोक संख्या ४.६ में अवतारणा हुई है ।

 

Note – In the succeeding two verses viz., Śrīmad-bhagavad-gītā 4.7 and 4.8 (“yadā yadā hi dharmasya….paritrāṇāya sādhūnāṁ…”), Lord Kṛṣna has elaborated upon the theme of taking incarnation – a notion commenced by the Blessed Lord from the present verse viz., ŚBG 4.6.

 

पूर्वपक्ष (आर्यसमाजीयों का) –

 

चूँकि उपर उद्धृत शुक्लयजुर्वेद ३४.५३ व ४०.८ स्पष्ट रूप से उद्घोषणा करते हैं कि परमात्मा ‘अज’ अर्थात् ‘जन्मरहित’ है तथा ‘अकायम्’ अर्थात् ‘शरीररहित’ हैं, अतः श्रीमद्भगवद्गीता के ४.७ व ४.८ में कही गयी भगवदवतरण की बात वेदों के विरुद्ध है ।

 

 

Prima facie contention lashed by Aryasamāja –

 

Because the above given citations from Śukla-yajurveda 34.53 and 40.8 clearly proclaim that the Paramātmā (God Absolute) is ‘aja’ or without birth and is ‘akāyam’ or without body/form, hence, the proposition held by Śrīmad-bhagavadgītā 4.7 and 4.8 is contrary to the Vedic assertion.

 

 

खण्डन –

 

Refutation —

 

क) स्वयं वेद ही परमात्मा को ‘युगपत्विरूद्धधर्माश्रयी’ अनेक स्थानों पर घोषित करता है जिसका एक प्रमुख उदाहरण है कृष्णयजुर्वेदीया काठकोपनिषद् २.२० व श्वेताश्वतरोपनिषद् ३.२० जहाँ उल्लिखित हुआ है कि “अणोरणीयान् महतो महीयान् आत्मा..” अर्थात् “परमात्मा अणु से भी अधिक अणु वा सूक्ष्म है तथा महान् से भी महत्तम (बृहत् से भी बृहत्तम) है” ।

 

a) Directly, the Vedas have declared the Paramātmā to be ‘yugapat-virūddha-dharmāśrayī’ (an entity which is the shelter of simultaneously contradictory functions or an entity which harmonizes oxymoron concurrently) and the foremost example of it are the assertions made by Kāṭhakopaniṣad 2.20 and Śvetāśvataropaniṣad (both belonging to Kṛṣna-yajurveda-samhitā) wherein, it is stated – “aṇor āṇīyān mahato mahīyān ātmā….” Meaning “Paramātmā is smaller than the smallest atom and is greater than the greatest object”.

 

ख) परमात्मा की इसी ‘विरुद्धधर्माश्रयिता’ का उल्लेख श्रीमद्भगवद्गीता ने किया है ४.६ में जब श्रीभगवान् ने कहा कि “अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन्…” – मै ‘अज’ अर्थात् ‘अजन्मा’ होते हुए भी जन्म लेता हूँ ! तथा ‘आत्ममायया’ शब्द से भगवान् ने अपने जन्म को — साधारण देहधारी त्रिगुणात्मिका माया से बद्ध हुए संसारी जीवों के जन्मों से — अपने ‘जन्म’ वा प्राकट्य को विलक्षण बताया है ! अधिकन्तु, इसी कारण से तो श्रीभगवान् ने  श्रीमद्भगवद्गीता के ४.९ में (“जन्म कर्म च मे दिव्यं एवं….”) स्पष्ट उद्घोषणा कर दी है कि “मेरा जन्म तथा मेरे कर्म दिव्य अर्थात् प्रापञ्चिक न होकर अलौकिक/अप्राकृत है” !

 

b) The very same ‘virūddha-dharma-āśrayitā/āśrayittva’ of Paramātmā has been described by Śrīmad-bhagavad-gītā 4.6 when the Blessed Lord has pronounced – “ajo ‘pi sannavyayātmā bhūtānāmīśvaro ‘pi san…” – meaning – “I (Kṛṣna), though being an ‘aja’ or unborn – do take birth!” And, by the usage of the term ‘ātma-māyayā’ (through My own potency or Yoga-māyā), the Lord has differentiated His own birth/advent (janma) from the births undertaken by the constrained/conditioned/illusioned/entrapped jīvātmās (individual souls entangled in the illusory triguṇātmikā māyā consisting of three guṇas/attributes viz., sato-guṇa/goodness, rajo-guṇa/passion and tamo-guṇa/ignorance; this triguṇātmikā māyā is different from the Yoga-māyā) who take birth as ordinary mortals. Moreover, because of this reason (because of this difference prevailing between the birth of God and those of the mortals), the Lord has explicitly asserted in Śrīmad-bhagavad-gītā 4.9 as such – “janma karma ca me divyaṁ evaṁ…” meaning “My advent/birth/janma/prākaṭya/āvirbhāva and deeds/pastimes/līlās/karma are, wholly, divine and not mundane/phenomenal/worldly – but supra-mundane or transcendental…”.

 

अतः यजुर्वेद ३४.५३ में प्रयुक्त ‘अज’ शब्द का श्रीमद्भगवद्गीता ४.६ (एवं श्री.भ.गी. ४.७-८) खण्डन नहीं करती {आर्यसमाजीयों की यह मिथ्या धारणा है कि श्री.भ.गी. ४.६-८ यजुर्वेद ३४.५३ का विरोध करती है}, अपितु, परमात्मा के उस ‘अजत्व’ को स्वीकारती है और उसमें परमात्मा की विरुद्धधर्माश्रयिता का योग कर कहती है कि ऐसे परमात्मा ‘अज’ होते हुए भी ‘जन्म’ लेते है ! अतः श्रीमद्भगवद्गीता में प्रतिपादित परमात्मा का अवतारवाद – वेदविरुद्ध नहीं है क्योंकि वेद व गीता जिस अर्थ में परमात्मा को ‘अज’ बताते है वह है लौकिक जन्म के सन्दर्भ में । अर्थात् परमात्मा का लौकिक जन्म न होने के कारण वें ‘अज’ माने गये हैं । परन्तु, उनका समानान्तर अलौकिक प्राकट्य/जन्म इस लोक में समय समय पर होने के कारण वें ‘जन्मयुक्त’ भी माने गये हैं ।

 

Therefore, the term ‘aja’ (unborn or without birth) as employed in Yajurveda-samhitā 34.53 – is not, at all, confuted by Śrīmad-bhagavad-gītā 4.6 (and ŚBG 4.7-8) {Ārya-samājīs have wrongly opined that ŚBG 4.6-8 contradicts Yajurveda 34.53 etc.}, rather, ŚBG 4.6 accepts that unborn state of Paramātmā (ajatva) whilst annexing the special attribute of ‘virūddha-dharmāśrayitā’ by holding the stand that such Paramātmā, though being an ‘aja’ or unborn – concurrently, undertakes birth or janma. Therefore, the theory of incarnation (avatāra-vāda) ascribed to Paramātmā by Śrīmad-bhagavad-gītā is not in contradiction with the Vedas, because, the context in which both Vedas and Gītā hold Paramātmā as ‘unborn’ or ‘aja’ – is, totally, in the mundane/worldly relative context. In short, because Paramātmā does not undergo any worldly birth (unlike the worldly jīvas taking birth as mortals), He has been deemed as ‘aja’ or unborn. At the same time, due to the occasional occurrence of His parallel divine advent/birth in this mortal world, He has been considered ‘born’ or ‘sa-janmā’, too.

 

ये वैसी ही बात है जैसे कि वेद परमात्मा को अणु से भी सूक्ष्म व विराट् से भी अधिक बृहत् – युगपत् रूप से बताते है ! अतः यह युगपद्विरूद्धधर्माश्रयित्त्व तो वेदप्रतिपाद्य ईश्वर/परब्रह्म का दूषण नहीं, बल्कि भूषण है ! जो परमात्मा के इस विरूद्धधर्माश्रयित्त्व को निर्लज्जभाव से निरस्त करते हैं, उन आर्यसमाजीयों से बढ कर और कोई नास्तिक नहीं ! वेदों के मनमाने अर्थघटन की आड में ऐसी नास्तिकता वास्तव में ही घोर निन्दा की पात्र है ! वास्तव में, इस विशेष गुण (उपर चर्चित) से विहीन परमात्मा अपने ईश्वरीय लक्षण से ही विहीन हो जाएँगे क्योंकि वैसी परिस्थिति में वे अपने में तथा साधारण जीवों में विशेष अन्तर नही प्रदर्शित कर पायेङ्गे !

 

To consider Paramātmā as, simultaneously, unborn and born – is tantamount to when the Vedas declare that Paramātmā to be, concurrently, subtler than the subltest atom and greater than the greatest! Therefore, such ‘yugapad-virūddha-dharmāśrayittva’ entertained by Paramātmā is not His contamination, but rather, His adornment! There can exist no greater atheists than those Ārya-samājīs who, shamelessly, show their disbelief in such special attribute of God as the ‘concurrent harmonization of contradictory functions’ (virūddha-dharma-āśrayittva)! Such atheism covered under the superficial pretext of Vedic canon (and under the faulty interpretation of the Vedas) is, truly, subject of contempt. Without this special attribute (discussed above), God cannot be called Absolute for He will fail to show demarcating peculiarity between Him and the other entities!

 

ग) ठीक वैसे ही परमात्मा को वेदों के द्वारा ‘अकाय’ अर्थात् शरीररहित कहा जाना भी उनके लौकिक-शरीरत्त्व को ही निरस्त करता है, अलौकिक शरीरत्त्व को नहीं ! अर्थात् परमात्मा का शरीर/रूप/विग्रह लौकिक त्रिगुणात्मक नहीं, अपितु अलौकिक सत्-चित्-आनन्द स्वरूप है ! परमात्मा के इस सच्चिदानन्दत्त्व की पुष्टि केवल पुराण ही नहीं करते (पुराणों को आर्यसमाजी प्रामाणिक नहीं मानते), अपितु श्रुति/उपनिषद्/वेद भी करता है – यथा कृष्णयजुर्वेदीया तैत्तिरीयोपनिषद् का प्रमाण – “सत्यम् ज्ञानं अनन्तं ब्रह्म…..रसो वै सः” अर्थात् परब्रह्म सत्यस्वरूप (सत् – सन्धिनी), ज्ञानस्वरूप (चित् – संवित्) तथा रसस्वरूप (आनन्द – ह्लादिनी) है ! पद्मपुराण भी इसी बात की पुष्टि करता है – “सच्चिदानन्दरूपाय विश्वोत्पत्त्यादिहेतवे । तापत्रयविनाशाय श्रीकृष्णाय वयं नुमः ।।” अर्थात् “सच्चिदानन्दस्वरूप, विश्व की सृष्टि, स्थिति व संहृति के आदि हेतु (तात्कालिक हेतु तो ब्रह्मा, विष्णु व महेश हैं), आध्यात्मिकादि तीनों तापों के विनाशक – ऐसे श्रीकृष्ण को हम नमस्कार करते हैं ।”

 

c) Similarly, when Vedas denote Paramātmā as ‘akāya’ or without body/form/figure/icon, only the possibility of His worldly body (laukika-prākṛta-deha) is negated and not the undeniable fact that God is a form which is fully divine. The fact that Absolute has a divine body (aprākṛta-divya-alaukika-cinmaya-deha) cannot be denied. The figure of Paramātmā does not constitute the any mundane ingredients or qualities, but, is replete with the divine qualities like sat (eternality), cit (cognition) and ānanda (bliss). This sac-cid-ānanda nature of the figure of Paramātmā is not just substantiated by the Purāṇas (Purāṇas are not accepted by Ārya-samājīs as authentic), but also, by śrutis/Upaniṣads/Vedas as follows – in the evidence of the Kṛsṇa-yajurveda’s Taittirīyopaniṣad – “satyaṁ jñānam anantaṁ brahma…..raso vai saḥ…” meaning “Para-brahma is true reality personified (sat or sandhinī), cognition personified (jñāna or cit or samvit) and the bliss embodied (ānanda/rasa/hlādinī).” Even Padma-purāṇa corroborates the same – “sac-cid-ānanda-rūpāya viśvotpattyādi-hetave / tāpatraya-vināśāya śrī-kṛṣṇāya vayaṁ numaḥ //” meaning – “We offer our prostrations unto Śrī-kṛṣṇa Who is the total destroyer of all the triple worldly maladies (ādhyātmika, ādhidaivika and ādhibhautika tāpas), Who is the most original cause for the creation, sustenance and annihilation of the manifest mundane creation (not the instant/immediate causes like Brahmā, Viṣṇu and Rudra), and Whose form is characterized by eternal existence (sat), consciousness (cit) and jubilation (ānanda).”

 

अधिकन्तु, वराह पुराण तो कहता है कि “देह-देही-विभागोऽयं नेश्वरे विद्यते क्वचित्..” अर्थात् “परमात्मा में शरीर तथा शरीरी के बीच व्याप्त अन्तर नहीं होता अर्थात् उनका शरीर/बाह्यरूप ही उनकी अन्तरात्मा है”! अतः अथर्ववेदीया मुण्डकोपनिषद् भी कहती है कि “..यस्य आत्मा शरीरं…” अर्थात् “जिसका आत्मा ही जिसका शरीर हो…”!

 

Moreover, Varāha-purāṇa suggests – “deha-dehī-vibhāgo ‘yaṁ neśvare vidyate kvacit….” Meaning “Paramātmā does not contain the difference as normally seen prevalent between the external forms/bodies and the inner souls of jīvas or common individual spirits. This is to say that the visible figure of the God is His inner self or identity.” Hence, even Muṇḍakopaniṣad of Atharva-veda-samhitā claims – “…yasya ātmā śarīraṁ…” or “…Whose self is whose body…”!

 

घ) ‘अकाय’ केवल परमात्मा के लौकिक/प्राकृत शरीर की सम्भावना को निरस्त करता है, उनके अप्राकृत वपु को नहीं ! अन्यथा, जो वेद एक स्थान पर परमात्मा को ‘अकाय’ अर्थात् शरीररहित बता रहा है और ‘अपाणिपादो..’ अर्थात् ‘बिना हाथ पैर वाला बताता है’ (श्वेताश्वतरोपनिषद् ३.४), वही वेद पुनः उन्हें पुनः सहस्रों हाथों व पैरों वाला (विराट्रूप के सन्दर्भ में) बताता है ऋग्वेद १०.९०.१ (पुरुषसूक्त) में –

 

“सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात् ।
स भूमिँसर्वतः स्पृत्वाऽत्यतिष्ठद्दशाङगुलम् ।।”
(जो सहस्रों सिरवाले, सहस्रों नेत्रवाले और सहस्रों चरणवाले विराट् पुरुष हैं, वे सारे ब्रह्माण्ड को आवृत करके भी दस अंगुल शेष रहते हैं ।।१।।)

 

ऋग्वेद के इस उपर उद्धृत मन्त्र में प्रयुक्त शब्द ‘सहस्रपात्’ (सहस्रों रूपों वा चरणो वाला) स्पष्ट रूप से यजुर्वेद के पूर्वोद्धृत मन्त्र ३४.५३ में प्रयुक्त शब्द ‘एकपात्’ (एक रूप वा चरण वाला) का विरोधी है । वैसे ही एक और विरोध की बात ऋग्वेद का यह मन्त्र करता है जब वह उद्घोषित करता है कि परमात्मा ब्रह्माण्ड की भूमि का सर्व दिशाओं से स्पर्श करते हुए (स्पृत्त्वा) भी ब्रह्माण्ड से नित्य निरन्तर १० अङ्गुल उपर बने रहते है (अत्यतिष्ठद्दशाङ्गुलम्) ! क्या ये सभी विरोधी धर्म नहीं हैं परमात्मा के भीतर ? इसका समाधान भी एकमात्र परब्रह्म के ‘युगपद्-विरूद्धधर्माश्रयित्त्व’ को स्वीकार ने से ही सम्भव है, अन्यथा नहीं ।

 

d) The term ‘akāya’, solely, negates the possibility of Paramātma having any mundane figure and does not rule out the fact that He has a divine figure! Otherwise, that Veda which states Paramātmā to be ‘akāya’ or formless and devoid of hands, legs etc. “apāṇi-pādo….” (Śvetāśvataropaniṣad 3.4) – also, describes that same Paramātmā to be endowed with thousands of legs and feet in Ṛg-veda-samhitā 10.90.1 (Puruṣa-sūkta) –

 

sahasra-śiṛṣā puruṣaḥ sahasṛakṣaḥ sahasra-pāt / sa bhūmiṁ sarvataḥ spṛtvā ‘tyatiṣṭhad-daśāṅgulam //

 

“That Virāṭa-puruṣa (Viṣṇu) Who possesses thousands of heads, thousands of eyes and thousands of feet (and thus, thousands of forms) – pervades the whole creation at the same time transcending it by remaining 10 fingers above it.”

 

In this above cited hymn from Ṛgveda , the term employed ‘sahasra-pāt’ (thousands of feet and thus, thousands of forms) clearly and solidly contradicts with the earlier cited Yajurveda 34.53 containing the term ‘eka-pāt’ (one feet or one form). Similarly, one another oxymoron is stated by the currently cited mantram of Ṛgveda 10.90.1 wherein, it states that despite touching (spṛtvā) the created universe (and thus pervading it throughout), Paramātmā remains 10 fingers aloof from it (atyatiṣṭhad-daśāṅgulam)! Are these not contradictory attributes within the personality of Paramātmā? The only way to reconcile this oxymoron is to adapt the notion of the ‘yugapad-virūddha-dharmāśrayittva’ within the identity of Absolute, and not otherwise.

 

पुनः अन्यत्र (श्रीमद्भगवद्गीता १३.१३) कहती है कि  — “सर्वतः पाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम् । सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति ।।१३।।” अर्थात् “वह सब ओर हाथ पैर वाला, सब और नेत्र, सिर ओर मुख वाला तथा सब ओर कान वाला है, क्योंकि वह संसार में सबको व्याप्त करके स्थित है ।”

 

Once again, in other places, Śrīmad-bhagavad-gītā (13.13) states – “sarvataḥ pāṇi-pādaṁ tat-sarvato ‘kṣiśiromukham / sarvataḥ śrutimalloke sarvamāvṛtya tiṣṭhati //” meaning “He (Paramātmā) has hands and feet all over. All over are His eyes, heads and mouths along with ears – because, He is pervading the whole creation through all nooks and corners within and without.”

 

अधिकन्तु, महाभारत में भी कथित है कि “…आनन्दमात्रकरपादमुखोदरादि:” अर्थात् “परमात्मा के हाथ, पैर मुख व उदर आदि केवल आनन्द से विनिर्मित है – स्थूल त्रिगुणात्मक लौकिक तत्त्वों से नही” । अतः श्रुति भी उद्घोष करती है कि – “द्वादशाङ्गो ह वै पुरुषः” अर्थात् “परमात्मा द्वादश अङ्गों वाला है” !

 

Additionally, Mahābhāata states, too – “…ānanda-mātra-kara-pāda-mukhodarādiḥ…” meaning “Limbs of Paramātmā like hands, feet, mouth and abdomen etc. do, solely, constitute of divine bliss (and do not constitute worldly ingredients).” Therefore, even śruti asserts again – “dvādaśaṅgo ha vai puruṣaḥ”  or that “Paramātmā has 12 main limbs”.

 

निष्कर्ष –

 

जो वेद ही अन्तर्यामी परमात्मा (चतुर्भुज विष्णु) को कभी तो ‘शरीररहित’ व कभी तो ‘सर्वत्र हाथ पैर वाला’ कहता हो और श्रीमद्भगवद्गीता भी उसी तथ्य को दुहराती हो, तो उससे परमात्मा में ‘युगपद्विरूद्धधर्माश्रियता’ निर्विवाद सिद्ध होती है – वें ‘अज’ होने पर भी ‘जन्म’ लेते हैं व ‘अकाय’ होने पर भी कायावान् है – यह सिद्ध होता है ।

 

Conclusion –

 

At times, when Veda, itself, addresses the indwelling Paramātmā (four-armed Viṣṇu) as without body/form and sometimes, as having hands and feet all over and if Śrīmad-bhagavad-gītā reiterates the same concept, then by such evidences, the ‘virūddha-dharma-āśrayittva’ in Paramātmā is, concretely, established and notions such as that He takes birth though being unborn (aja) and has a figure/body though being without body (akāya) – are corroborated without doubt.

 

पक्षान्तर में, यदि गीता ४.६ व ४.९ परमात्मा को ‘अज’ बताने के बाद भी ‘दिव्य-जन्मा’ बताती है और यदि गीता की इस बात को आर्यसमाजी नास्तिक अप्रामाणिक मानते हैं गीता के वचनों में परस्पर विरोध होने के कारण (अर्थात् एक तरफ परमात्मा को ‘अज’ मानना तथा दूसरी ओर उसे ‘जन्मयुक्त’ मानना – यही विरोध) – तब तो इन मूढ आर्यसमाजीयों को यह बता दें कि जिस वेद को तुम प्रामाणिक मानते हो, उसी वेद में तो कही ‘अकायं’ अर्थात् ‘शरीररहित’ परमात्मा की बात और अन्यत्र उसी वेद में पुनः (पुरुषसूक्तादि मन्त्रों में) ‘सहस्रशीर्षा पुरुषः…’ अर्थात् ‘शरीरयुक्त’ परमात्मा की बात दृष्टिगोचर होने पर – और इस प्रकार का वेदवचनों में आन्तरिक विरोध को देखने पर क्या तुम वेदों को भी अप्रामाणिक कहोगे? यदि नहीं, तो गीता में परमात्मा को ‘अजन्मा’ तथा ‘सजन्मा’ कहा जाना भी वेदानुकूल ही है !

 

In a reverse context, when Śrīmad-bhagavad-gītā 4.6 and 4.9 spell out Paramātmā as ‘divya-janmā’ (One having a divine birth) even after labelling Him as ‘aja’ (unborn) and if such seemingly (not actually) self-contradictory assertions of Gītā are perceived by Āryasamājīs as actual contradictions and thus, they resort to proclaim the invalidity of the Gītā on this ground – then let us inform these intellectually bankrupt Āryasamājīs that the Veda which you consider a valid testimony – in few places of the same Veda, Paramātmā has been labelled as ‘akāyam’ (without body or form), whilst, in other Vedic passages (like in the Puruṣa-sūkta hymn – ‘sahasra-śīrṣā puruṣaḥ..’) He has been labelled as having figure/body – then by envisioning such oxymoron (notions conveyed by contradictory statements which cannot co-exist at the same time – in the common world) within the Vedic propositions – will you turn out and commence labelling Veda as an invalid testimony? If no, then, labelling of Paramātmā as ‘aja’ (unborn) and then again calling him ‘divya-janmā’ (with a divine birth) – as seen in Gītā 4.6 and 4.9 – is, also, following in the footsteps of the Vedas, right?

 

और तो और, श्रीमद्भगवद्गीता और वेदादि शास्त्र भी जीवात्मा को भी ‘अज’ मानते है – प्रमाण – श्रीमद्भगवद्गीता २.२० – “न जायते न म्रियते वा कदाचिन्…अजः शाश्वतोऽयं….” अर्थात् “जीवात्मा कभी न जन्म लेता है और इसीलिये वह अज कहलाता है” – इतना होने पर भी संसार में जीवात्मा का जन्म व मरण देखा जाता है ! अतः ‘अज’ परमात्मा के लौकिक संसार में अलौकिक जन्म को साधारण जीवात्माओं (जीव भी अज माने गये हैं) के जन्म से विलक्षण बताने के लिये ही तो श्रीमद्भगवद्गीता ४.६ में श्रीभगवान् स्वयं को ईश्वर (साधारण जीव नहीं) बताते हुए (‘अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन्..’) तथा स्वयं को अज बताते हुए भी अपने दिव्य जन्म की बात करते हैं (गीता ४.९ में ) ! क्यों? क्योंकि ‘अज’ जीवात्मा के ‘जन्म’ से ‘अज’ परमात्मा के ‘जन्म’ को विलक्षण प्रतिपादित करने के लिये! गौडीयवैष्णवाचार्य श्रीविश्वनाथ चक्रवर्त्तिपाद की सारार्थवर्षिणी संस्कृत टीका श्रीमद्भगवद्गीता ४.६ पर द्रष्टव्या है ।

 

What more to say! Even scriptures like Śrīmad-bhagavad-gītā and Vedas consider even jīvātmā (individual common soul) to be ‘aja’ (not just Paramātmā to be ‘aja’). Evidence is Śrīmad-bhagavad-gītā 2.20 (“na jāyate na mriyate vā kadācin…….ajaḥ śāśvato ‘yaṁ…”) meaning “jīvātmā never takes birth and for that, he is known as ‘aja’ or unborn” – but despite such, the worldly death and birth of the jīvātmās is a commonly perceived event! Hence, just so that the ‘ajattva’ (state of being unborn) of the Paramātmā is differentiated from the ‘ajattva’  of the jīvātmās and thus, to differentiate the divine birth of the Paramātmā within this creation – with the mundane birth of the common souls (jīvas) – Lord Kṛṣna emphasizes His janma or birth as ‘divine’ or ‘divya’ (as in ŚBG 4.9) and in ŚBG 4.6, He stresses on the point that though  He is Supreme Controller (‘…bhūtānām īśvaro ‘pi san…ajo ‘pi san avyayātmā..’) and unborn, still He takes birth. If Lord would not have emphasized that He is Supreme Controller (Paramātmā), His ajattva would have been taken on the same level as the ajattva of the common beings (for both jīvātmā and paramātmā have been declared as ‘aja’ in the scriptures). The classical Sanskrit commentary Sārārthavarṣiṇī on ŚBG 4.6 can be referred to.

 

 

Link — https://goo.gl/ck16v6

— Authored by Bhaktirasavedāntapīthādhīśvara Ācārya-śrī Gurupāda / प्रणेता – भक्तिरसवेदान्तपीठाधीश्वर आचार्यश्री गुरुपाद

2 thoughts on “आर्यसमाजमतकपोलचपेटिका / आर्यसमाजीय मत रूपी गाल पर तमाचा / A big slap on the face of the Ārya-samājī doctrine.

  1. Pranam Swamiji,
    I suppose there are some corrections:
    1. “deha dehi vibhago…” verse is from Kurma purana and not Varaha puran as far as I know.
    2. “yasya atma sariram” is from Brihadaranyakopanishad and not Mundakopanishad and it means that Atma(jivatma) is the body of Brahman(Paramatma) due to the latter being the former’s antaryamin.

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  2. A well deserved slap! Unfortunately, I had studied in Arya Samaji school for 14 years. They kept saying, don’t worship idols and they even said Krishna is not a God, He was just another great man. I am so happy that there is one bold sadhu (your self), who is daring to give them a nice slap.

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