श्रीमद्भागवतम् का अभूतपूर्व माहात्म्य — भाग ५

 

 

 

(क) पुराणनिचय रजोगुण, सतोगुण व तमोगुण के सम्बन्ध से भी वर्गीकृत हुए है । श्रीकूर्मपुराण २.४३.४९ तथा मत्स्यपुराण ५३.६८-६९ में कथन प्राप्त होता है –

 

“सात्त्विकेषु पुराणेषु माहात्म्यमधिकं हरेः । राजसेषु च माहात्म्यमधिकं ब्रह्मणो विदुः ।। तद्वदग्नेश्च माहात्म्यं तामसेषु शिवस्य च । सङ्कीर्णेषु सरस्वत्या: पितृणाञ्च निगद्यते ।।…सङ्कीर्णास्तामसाश्चैव राजसास्सात्त्विकास्तथा । कल्पाश्चतुर्विधाः प्रोक्ताः ब्रह्मणो दिवसाश्च ते ।। यस्मिन् कल्पे तु यत्प्रोक्तं पुराणं ब्रह्मणा पुरा । तस्य तस्य तु माहात्म्यं तेन रूपेण वर्तते ।।”

 

अर्थात् – “सात्विक पुराणों में श्रीहरि का माहात्म्य अधिक वर्णित हुआ है तथा राजसिक पुराणों में चतुर्मुख श्रीब्रह्मा का माहात्म्य अधिक वर्णित हुआ है । उसी प्रकार अग्निदेव का व श्रीशिव तथा दुर्गादेवी का अधिक माहात्म्य तामसिक पुराणों में परिद्रिष्ट होता है । जबकि सङ्कीर्ण प्रजाति के उपपुराणों में सरस्वतीदेवी व पितृओं का माहात्म्य अधिक वर्णित है । सङ्कीर्ण, तामसिक, राजसिक तथा सात्त्विक (श्रीमद्भागवतम् वाली अप्राकृत विशुद्धसत्त्वमय निर्गुण/त्रिगुणातीत श्रेणी भी ‘छत्रिणो गच्छन्ति’ – इस न्याय से ‘सात्त्विक’ श्रेणी में अन्तर्भुक्त हुई है) – ये चतुर्विध पुराण माने गये हैं…….”

 

 

(ख) श्रीपद्मपुराण, उत्तरखण्ड २३६.१८-२२ –

 

“वैष्णवं नारदीयञ्च तथा भागवतं शुभम् । गारुडञ्च तथा पाद्मं वाराहं शुभदर्शने ।। सात्त्विकानि पुराणानि विज्ञेयानि च षट्पृथक् ।  ब्रह्माण्डं ब्रह्मवैवर्तं मार्कण्डेयं तथैव च  ।।  भविष्यद्वामनं ब्राह्मं राजसानि च षड्विधाः । मात्स्यं कौर्मं तथा लैङ्गं शैवं स्कान्दं तथैव च ।। आग्नेयञ्च षडेतानि तामसानि निबोध मे । …सात्त्विका मोक्षदा ज्ञेया राजसाः स्वर्गदाः स्मृताः । तथैव तामसा देवि निरयप्राप्तिहेतवः ॥”

 

अर्थात् – “विष्णुपुराण, नारदपुराण, मङ्गलमय (त्रिगुणातीत/निर्गुण) श्रीमद्भागवतपुराण, गरुडपुराण, पद्मपुराण तथा वराहपुराण – इनकों सात्विक पुराणसमूह जाना जाए । ब्रह्माण्डपुराण, ब्रह्मवैवर्त्तपुराण, मार्कण्डेयपुराण, भविष्यपुराण, वामनपुराण तथा ब्रह्मपुराण – इनकों राजसिक पुराणसमूह माना गया है । मत्स्यपुराण, कूर्मपुराण, लिङ्गपुराण (वायुपुराण), शिवपुराण, स्कन्दपुराण तथा अग्निपुराण – इनकों तामसिक पुराणसमूह जानो ।..सात्त्विक पुराणों को मोक्षदायक मानो व राजसिक को स्वर्ग के प्राप्तिकारक व तामसिक को दुःखमय पद की प्राप्ति कराने वाले । (तात्पर्य यहाँ सात्त्विकपुराणों के सात्विकांश, राजसिक पुराणों के राजसिकांश तथा तामसिक पुराणों के तामसिकांश से है अर्थात् सात्विकपुराणों का सात्त्विकांश अभयपदकारी है, राजसिक पुराणों का रजोगुणी अंश स्वर्गादिभोग को प्रदान करने वाला है तथा तामसिक पुराणों का तमोगुणी अंश मोहपद की प्राप्ति कराने वाला है – ऐसा मानना चाहिये । राजसिक व तामसिक पुराणो में जो विष्णुमाहात्म्य का प्रतिपादन करने वाला सात्त्विकांश है वह भी मोक्षप्रदानकारी है – यही निष्कर्ष निकलता है – तथा श्रीमद्भागवत् जैसा साक्षाद्भगवद्विग्रहात्मक पुराण तो निर्गुण अथच विशुद्ध अलौकिक सत्त्वमय होने के कारण चतुर्वर्ग का अतिक्रमणकारी व भगवत्पादारविन्दों का प्रेम प्रदायक है ।)”

 

 

(ग) श्रीपद्मपुराण, उत्तरखण्ड २३६.२३-२६ में तो धर्मशास्ररूपा स्मृतियों का भी वर्गीकरण त्रिगुणों के अनुसार हुआ है –

 

“वासिष्ठञ्चैव हारीतं व्यासं पाराशरं तथा । भारद्वाजं काश्यपीयं स्मृतिषट्कन्तु सात्त्विकम् ।।

मानवं यज्ञवल्क्यञ्च आत्रेयं दाक्ष्यमेव च । कात्यायनं वैष्णवञ्च स्मृतिषट्कन्तु राजसम् ।।

गौतमं बार्हस्पत्यञ्च सांवर्तञ्च यमस्मृतिः । शाम्भमौशनसञ्चैव स्मृतिषट्कन्तु तामसम् ॥”

 

अर्थात् – “वसिष्ठस्मृति, हारीतस्मृति, व्यासस्मृति, पराशरस्मृति, भारद्वाजस्मृति तथा काश्यपस्मृति – ये सात्त्विक मानी गयी है । मनुस्मृति, याज्ञवल्क्यस्मृति, अत्रिस्मृति, दक्षस्मृति, कात्यायनस्मृति तथा विष्णुस्मृति – ये राजसिक मानी गयी है । गौतमस्मृति, बृहस्पतिस्मृति, संवर्त्तस्मृति, यमस्मृति, शम्भस्मृति तथा उशनस्मृति – ये तामसिक मानी गयी है ।”

 

 

(घ) श्रीगरुडपुराण ३.१.५२ में कथन है –

 

“विष्णोः पुराणं भागवतं पुराणं सत्त्वोतमं गारुडं चाहुरार्या: ।”

 

अर्थात् – “आर्यो के मतानुसार सात्त्विकपुराणो में भी विष्णुपुराण, भागवतपुराण तथा गरुडपुराण अन्यो की अपेक्षा श्रेष्ठ है (श्रीमद्भागवत तो सर्वश्रेष्ठ है निर्गुण होने के कारण) ।”

 

 

 

— चैतन्यगौडीयवैष्णवसम्प्रदायिन: भक्तिरसवेदान्तपीठाधीश्वराः आचार्यश्री: गुरुपादाः

 

 

 

***

 

 

 

Unprecedented glory of Śrīmad-bhāgavatam — Pt. 5 (Concise presentation of the above elaborate version in Hindi)

 

 

 

(a) The Purāṇas are, also, classified as belonging to the mode of goodness (sāttvika), passion (rājasika) or ignorance (tāmasika). The Kūrma-purāṇa (2.43.49) and the Matsya Purāṇa (53.68-69) state:

 

“sāttvikeṣu purāṇeṣu māhātmyam adhikaṁ hareḥ/ rājaseṣu ca māhātmyam adhikam brahmaṇo viduḥ / tadvad ageneśca māhātmyaṁ tāmaśeṣu śivasya ca //”

 

“In the Purāṇas in the mode of goodness, the focus is the glory of Lord Hari; in those in the mode of passion, the focus is the glory of Lord Brahmā; similarly, in those in the mode of ignorance, the focus is the glories of Lord Śiva, Durgā and Agni.”

 

 

(b) The Garuḍa-purāṇa (3.1.52) confirms:

 

“viṣṇoḥ purāṇaṁ bhāgavataṁ purāṇaṁ sattvottamaṁ gāruḍaṁ cāhur āryāḥ”

 

“The Āryans declare that Viṣṇu-purāṇa, Śrīmad-bhāgavata-purāṇa and Garuḍa-purāṇa are the best of the Purāṇas in the mode of goodness (actually, Śrīmad-bhāgavatam is not on the plane of the mundane mode of goodness, but, on the level of the transcendental goodness).”

 

 

 

Link / सूत्र —  https://goo.gl/H41XPq

 

— Caitanya-gauḍīya-vaiṣṇava-sampradāyī Bhakti-rasa-vedānta-pīṭhādhīṣvara Ācārya-śrī Gurupāda

 

 

 

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