रागानुगमार्ग का रहस्य / The confidential technique of rāga-mārga (Only Hindi version)

 

 

 

गौडीय वैष्णव सम्प्रदाय के पूर्वाचार्य श्रील विश्वनाथ चक्रवर्त्तिपाद ने हितहरिवंशसंप्रदाय (वृन्दावन स्थित राधावल्लभ जी का ‘स्वकीयावादी’ मन्दिर इसी हितपन्थ की मूलपीठ है) की पञ्च मान्यताओं का खण्डन करके उन्हे ‘सौरम्यमत’ नाम देकर पाखण्डी सिद्ध किया है शास्त्रीय आधार पर श्रीभक्तिरसामृतसिन्धुः की भक्तिसारप्रदर्शिनी नामक संस्कृत टीका में । गौडीय संप्रदाय के १७वीं शताब्दी में प्रणीत बाङ्ग्ला चरित ग्रन्थ (श्री नरहरि चक्रवर्त्ती के द्वारा प्रणीत) ‘भक्ति-रत्नाकर’ में यह स्पष्ट रूप से बताया गया है कि किस प्रकार हितहरिवंश गौडीयसंप्रदाय के प्रवर्त्तक षड्गोस्वामिपादों में अन्यतम दाक्षिणात्य श्रीरङ्गम् के रामानुजीय वैष्णव विप्र पुजारी कुल में प्रकटे श्रील गोपालभट्ट गोवामिपाद (जो की व्रज की नित्यलीला में ‘गुणमन्जरी’ सखी है तथा श्रील कृष्णदासकविराज गोस्वामिपाद के श्रीगोविन्दलीलामृतम् ग्रन्थ व श्रीलरूपगोस्वामिपाद की श्रीराधाकृष्णगणोद्देशदीपिका के आधार पर जिनकी निर्धारित सेवा राधा व कृष्ण के रात्रिमिलाप के पश्चात् चर्वित ताम्बूल को अन्य मन्जरीयों/सखीयों में बाटने की है + जो वृन्दावन स्थित श्रीराधारमणदेव के श्रीविग्रह के प्रादुर्भावक है दामोदर शालग्राम शिला से) के मन्त्रशिष्य थे पर एक बार एकादशी तिथि के दिन वैष्णवों के लिये साधकदेह से अभक्ष्य व वर्ज्जित ताम्बूल युक्त पान का उन्होंने बिना गुरु की आज्ञा लिये सेवन कर लिया – इस कारण से गुरु गोपालभट्ट जी ने उन्हें कारण पूछा तब हितहरिवंश ने कहा कि मुझे तो यह ताम्बूल युक्त पान साक्षात् राधिका ने दिया है, इसीलिये मैने आपकी आज्ञा लेनी ठीक नही समझी! जब गुरुदेव ने यह बात सुनी तो कहा कि तुमने साधक वैष्णवों के आचार (जो कि श्रील सनातन गोस्वामिपाद के हरिभक्तिविलासः ग्रन्थ में वर्णित है) के विरूद्ध कार्य किया है और रागानुगामार्ग की व्रजरसोपासना में तुम्हें अपनी गुरुरूपा मञ्जरी (अर्थात् गोपालभट्ट जी जो की गुणमञ्जरी सखी है) के आनुगत्य में ही राधामाधव युगल की सेवा करनी है और रागानुगा भक्ति की परिपाटी यह है कि शिष्या मञ्जरी निज सिद्ध देह के द्वारा बिना अपनी गुरुरूपा मञ्जरी को निवेदित किये साक्षात्/सीधे स्वामिनी राधिका व श्री कृष्ण की भी आज्ञा का पालन नही करेङ्गी! गोपालभट्ट जी ने समझाया कि किस प्रकार श्रीचैतन्यदेव जो कि वास्तव में महाप्रभु है – उन्होने एकादशी व्रत को नियम सहित करणीय बताया है साधक देह से और यह भी समझाया कि श्रीराधा ने तो केवल तुम्हारे ‘गुरुरूपामञ्जरी के आनुगत्य’ व रागमार्ग में तुम्हारी निपुणता की परीक्षा लेने के लिये तुम्हे यह ताम्बूल दिया था, पर तुम जो मुझे सूचित किये बिना इसे खा गये, सो तुम्हारी च्युति हुई है रागमार्ग से । अतः तुम पश्चात्ताप करो । तुरन्त ही हितहरिवंश ने विद्रोही/बागी तेवर अपना लिया एवं गौडीय संप्रदाय का बहिष्कार करके directly श्रीराधा को अपना गुरु मानकर व चैतन्यदेव की प्रतिस्पर्धा में ‘महाप्रभु’ उपाधि धारण करके एक दूसरे नवीन काल्पनिक मत वाले अपसंप्रदाय की स्थापना की । आज के समय में हित-अपसंप्रदाय के अनुयायी गौडीयवैष्णवसंप्रदायाचार्य श्रील प्रबोधानन्द सरस्वतीपाद के ‘श्रीराधारससुधानिधि:’ के उपर भी उस ग्रन्थ से चैतन्यदेव की वन्दना के दो श्लोक हटाकर उस ग्रन्थ को व्रजवासी हितहरिवंशजी की रचना बताते है । कालान्तर में निम्बार्क वैष्णव संप्रदाय की एक शाखा जो कि स्वामी हरिदास जी (वृन्दावन स्थित बाङ्केबिहारी नामक भगवद्विग्रह के प्रादुर्भावक) के पश्चात् किञ्चित् पृथक् हुई उसमे भी हितपन्थ की देखादेखी (अन्ध अनुकरण) से ‘एकादशी’ व्रत का वर्ज्जन करने की परम्परा बन गयी । इस हरिदासी पन्थ की मूल पीठ वृन्दावन स्थित टटिया स्थान
ै । आधुनिक काल में ‘जगद्गुरु कृपालु जी’ जैसे लोग भी कमोवेश हितहरिवंश व उनके द्वारा स्थापित पन्थ की ही श्रेणी में अन्तर्भुक्त है क्योंकि ऐसे आधुनिक लोग भी एकादशी व्रत आदि में आस्था नही रखते! अस्तु ।

 

 

 

सूत्रम् — https://goo.gl/4zoUoU

  • चैतन्यगौडीयवैष्णवसम्प्रदायिन: भक्तिरसवेदान्तपीठाधीश्वरा: आचार्यश्री: गुरुपादा:

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