एक अध्यात्मपथपथिक के भ्रान्तिपूर्ण उद्गार –

“मुझे अध्यात्म में इतने आगे जाना है कि मेरे प्रभु व मेरे बीच और कोई न हो!”

 

चैतन्यसम्प्रदायी भक्तिरसवेदान्तपीठाधीश्वर के द्वारा उपरोक्त भ्रान्ति का निराकरण –

“तुम्हें प्रभु और तेरे बीच भगवान् के अति प्रिय भक्तों अर्थात् उनके नित्य-सिद्ध पार्षदों को अवश्य रखना पडेगा व उन नित्यसिद्ध पार्षदो के अनुगामी श्रीगुरुदेव (जो कि वैष्णव सम्प्रदाय में स्वयं दीक्षित हों और भगवत्साक्षात्कार को प्राप्त हों व शास्त्रज्ञान में सुनिपुण हो) को भी अवश्य रखना पडेगा । हमारे यहाँ गौडीय वैष्णव सम्प्रदाय में ‘आनुगत्य वाली’ उपासना चालती है । ‘एकाकी’ उपासना नही ।

हमारी भला क्या हैसियत है कि हम सीधे प्रभु से नेहा लगा बैठे? ये तो जीव की उद्दण्डता ही मानी जायेगी न कि जिन शुद्ध भगवद्भक्तों की कृपा से उसे भगवत्प्राप्ति हुई — उन भगवद्भक्तों को ही दरकिनार कर ‘सीधे’ (जैसे कि हमसे पहले प्रभु के उपर किसी का कोई अधिकार ही न था अरु हम ही पहले और अन्तिम भगवदुपासक है) भगवान् से सम्बन्ध जोड कर और किसी तीसरे व्यक्ति की सत्ता को ही न स्वीकारा जाये भगवदुपासना के क्षेत्र में? इससे बडा और अहंकारभरा दुस्साहस भला जीव का क्या हो सकता है? अतः भक्तिमार्ग के आचार्यो ने कहा कि –

‘नाहं विप्रो न च नरपतिर्नापि वैश्यो न शूद्रो………गोपीभर्त्तुर्पदकमलयोर्दासदासानुदासः….’ कि ‘हम तो गोपीजनवल्लभ के पादारविन्दों के अनुगामी भृत्यजनों के किङ्करों के सेवकों के दासों के भी अनुग दास जो है न!’ — भगवत् कृष्णचैतन्यदेव महाप्रभु (श्रील रूप गोस्वामिपाद की पद्यावली का वचन)

और मुकुन्दमालास्तोत्रकार राजर्षि कुलशेखर आलवन्दार कहते है — ‘…तव भृत्यभृत्यपरिचारकभृत्यभृत्यभृत्यस्य भृत्य इति मां स्मर लोकनाथ…’ कि ‘हे लोकनाथ श्री हरि! हम तो आपके भृत्य के भृत्य के परिचारक के भृत्य के भृत्य के भृत्य के भृत्य है — इस रूप में हमारा समरण करना!’ इति”

 

 

Link / सूत्र —  https://goo.gl/r7fP5A

  • आचार्य श्री गुरुपाद

 

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