श्रीमद्भागवतम्  का अभूतपूर्व माहात्म्य — भाग २

 

 

 

माहात्म्य की दृष्टि में निज असाधारण वैशिष्ट्य के कारण श्रीमद्भागवतम् का यश अन्य पुराणों की महिमा को अतिक्रान्त करता है । पाँच विषय ऐसे है जिन्हें पुराणों में सन्निविष्ट होना अति अनिवार्य है पुराणों के पुराणत्व को अक्षुण्ण रखने के लिए ।

 

“सर्गश्च प्रतिसर्गश्च वंशो मनवन्तराणि च । वंशानुचरितञ्चेति पुराणं पञ्चलक्षणम् ।।” (यह श्लोक ब्रह्माण्डपुराण १.१.३७, शिवपुराण ७.१.१.४१, वायुपुराण १.३१, मत्स्यपुराण ५३.६५, कूर्मपुराण १.१.१२ व गरुडपुराण १.२.२८ में परिदृष्ट होता है। ऐसा ही श्लोक अन्य शास्त्रों में भी द्रष्टव्य है।)

 

अर्थात् “प्राथमिकी सृष्टि, गौण सृष्टि, विभिन्न ऋषिमुनियों व राजाओ के वंशों की गणना, विभिन्न मनुओं के चरित्र तथा वंशों के चरित्र — यें पुराणों के पञ्च लक्षण माने गए हैं।”

 

 

 

–  चैतन्यगौडीयवैष्णवसम्प्रदायी भक्तिरसवेदान्तपीठाधीश्वर आचार्यश्री गुरुपाद

(आणन्द, गुजरात, भारत)

 

***

 

Unprecedented glory of Śrīmad-bhāgavatam — Pt. 2

 

 

 

By its very characteristics, Śrīmad-bhāgavatam far surpasses all other Purāṇas. There are five fundamental subjects that must be included in a Purāṇa according to the following definition:

 

“sargaś ca pratisargaś ca vaṁśo manvantarāṇi ca / vaṁśanucaritañ ceti pañca-lakṣaṇam //” (This same stanza appears in the Brahmāṇḍa-purāṇa 1.1.37, Śiva-purāṇa 7.1.1.41, Vāyu-purāṇa 1.31, Matsya-purāṇa 53.65, Kūrma-purāṇa 1.1.2 and Garuḍa-purāṇa 1.2.28. A similar verse appears in other scriptures, as well.)

 

Meaning — “Primary creation, secondary creation, the dynasties of sages and kings, the several Manus and the activities of the various dynasties — these are the five characteristics of a Purāṇa.”

 

 

 

— Caitanya-gauḍīya-vaiṣṇava-sampradāyī Bhakti-rasa-vedānta-pīṭhādhīśvara Ācārya-śrī Gurupāda

(Anand, Gujarat, Bhārata)

 

Link / सूत्र — https://goo.gl/6RwNTy

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