Hitharivansh - 1

 

वास्तविक व अवास्तविक प्रभुप्रेमी की पहचान / Recognizing a true lover of God from a duplicitous one (only Hindi version).

 

 

 

इस दारुण कलिकाल में कोई आवश्यक नहीं है कि हर कोई अपने आपको प्रभुप्रेमी बताने वाला वास्तव में प्रभुप्रेमी हो । उत्तर भारत में तो वर्षाकालीन कुक्कुरमुत्तों की तरह प्रभुप्रेमीयों की आज के समय में एक बाढ सी आ चुकी है! बहुत सारे प्रभुप्रेम में तडपने व तडपाने वाले इस समय दुनिया में दिखायी दे रहे है जो कि वास्तव में प्रभु के द्वारा दी गयी आज्ञाओं को (जो कि शास्त्रों में वर्णित है) – उनका पालन नहीं करते । बहुत सारे तथाकथित प्रभुप्रेमी (व्रजमण्डल में, विशेषतया) साधक और तथाकथित सिद्ध — एकादशी व्रत तक का पालन नहीं करते हैं — जो कि वैष्णवों के प्रति की गयी निर्विकल्पा (अर्थात् जिसके पालन में करने व न करने का विकल्प न दिया गया हो – जो केवल करणीय ही हो – अकरणीय कतही नहीं) भगवदाज्ञा का प्रत्यक्ष उल्लङ्घन है । प्रभुप्रेमी कदापि अपने प्रभु की आज्ञा के विपरीत कार्य नहीं कर सकता । श्रीमद्भगवद्गीता १६.२३-२४ में उनके प्रभु ने ही आज्ञा दी है कि जो व्यक्ति भगवद्विग्रहस्वरूप वेदपुराणादि शास्त्रों की अवहेलना कर मनमाना आचरण करता है वह सिद्धि, परम गति, परम सुख — इनमें से किसी की प्राप्ति नहीं करता । अतः आज कल बहुत से भण्ड/पाखण्डी प्रभुप्रेमी दिखायी देते है । ये पाखण्डी श्रीमद्भागवतम् ११.११.३२ के “आज्ञायैवं गुणान्दोषान्मयाऽदिष्टानपि स्वकान् । धर्मान्सन्त्यज्य यः सर्वान्मां भजेत्स तु सत्तम: ॥“ का उद्धरण देकर कहते हैं कि शास्त्रों व शास्त्रप्रतिपादित धर्म का त्याग ही तो भक्ति है, तब भक्ति में कोई नियमादि लागु नहीं ! अरे इन गर्दभों को कौन बतायें कि श्रीमद्भागवतम् ११.११.३२ व श्रीमद्भगवद्गीता १८.६६ (“सर्वधर्मान्परित्यज्य…”) का आशय केवल कर्ममार्ग व अष्टाङ्ग-योग/साङ्ख्य/ज्ञान आदि मार्गों का परिहार करते हुए शुद्धभक्त्यधिकारी के लिये भागवतधर्म या भक्तियोग की एकमात्र करणीयता का विधान करना है – न कि भक्तिप्रतिपादक शास्त्रों में विहित भक्तिमार्गावलम्बियों के लिये अनिवार्य रूप से करणीय विधिविधानों की उपेक्षा करना ! यदि ऐसा ही होता तो निम्नोद्धृत आगमवचन (ब्रह्मयामलतन्त्रम् से) निरर्थक हो जायेगा !

 

एक तथाकथित प्रभुप्रेमी से एक बार पूछा गया कि ‘प्रभुप्रेम’ की क्या परिभाषा है ? तो वह मुँह ताक  कर व भोली सी सुरत बनाकर अनजान होकर कहने  लगा कि “बस प्रभु प्रेम जी, बस प्रभु प्रेम ! बस डूबना है जी इसमें, बस डूबना है जी !” — ये धूर्त्त शास्त्रों में दी गयी प्रभु-प्रेम की परिभाषा तक को  नहीं जानते (शास्त्रोक्ता परिभाषा – यथा विष्णुपुराणे – “अनन्यममताविष्णौ ममता प्रेमसङ्गता । भक्तिरित्युच्यते भीष्मप्रह्लादोद्धवनारदै: ॥“ + भक्तिरसामृतसिन्धौ – “सम्यग्मसृणितस्वान्त: ममत्वातिशयाङ्कित: । भाव: स एव: सान्द्रात्मा बुधैः प्रेमा निगद्यते ॥“ + गोपालपूर्वतापनिश्रुतौ — “भक्तिरस्यभजनं तदिहामुत्रोपाधिरास्येनामुष्मिन्मनस: कल्पनमेतदेव च नैष्कर्म्यमिति” + नारदपाञ्चरात्रे – “सर्वोपाधिविनिर्मुक्तं तत्परत्वेन निर्मलम् । हृषीकेण हृषीकेशसेवनं भक्तिरुच्यते ॥“ + “भक्तिवशः पुरुषो भक्तिरेव भूयसी भक्तिरेव गरीयसी” – माठरश्रुतौ + श्रीमद्भागवते – “भक्त्याहमेकया ग्राह्यः” + “न साधयति मां योगो…..” + श्रीमद्भगवद्गीतायाम् – “कर्मिभ्यश्चाधिको योगी……योगिनामपि सर्वेषां….श्रद्धावान्भजते यो मां….” + गरुडपुराणे – “भजित्येष वै धातुः सेवायां परिकीर्त्तितः” + नारदपुराणे – “देवेर्षे विहिता प्रोक्ता हरिमुद्दिश्य या क्रिया ।  सैव भक्तिरिति प्रोक्ता तया भक्तिः परा भवेत् ॥“ — इत्यादि) और प्रभुप्रेम को प्राप्त करने का या उस मार्गपर  चलने की उद्घोषणा करते है ! अतः बहुत सावधान रहें कि  वास्तव  में  कौन प्रभुप्रेमी वैष्णव साधक/सिद्ध भक्त  है  और कौन केवल मिथ्याचारी ! मिथ्याचारी के प्रति किया गया कटाक्ष कदापि वैष्णव-अपराध में परिगणित नहीं माना गया है । उलटे नीर/क्षीर का विवेक करके दोनों को (सत्य व असत्य को) पृथक् करना तो विवेकवान् का कर्त्तव्य है ।

 

इसी कारण से कलिकाल में आद्यभक्तिरसदर्शनप्रस्थानप्रतिष्ठापकाचार्यधुरन्धर श्रील रूप गोस्वामिपाद ने श्रीभक्तिरसामृतसिन्धुः में ब्रह्मयामलतन्त्रम् के वचन को समुद्धृत करते हुए कहा है कि – “श्रुतिस्मृतिपुराणादिपञ्चरात्रविधिं विना । ऐकान्तिकी हरेर्भक्तिरुत्पातायैव कल्पते ॥” – यह विधा वैधी व रागानुगा – भक्ति के दोनो मार्गों पर समान रूप से किञ्चित् तारतम्य के साथ लागू है ।

 

ये पाखण्डी कुतर्क करते हैं कि भला ‘प्रेम’ (फिर चाहे वह प्रभु के लिये हो या ‘काम’ के रूप में संसार के लिये) भी कोई ऐसी कला/विद्या/भाव है कि जिसके लिये शास्त्रों की आवश्यकता/अपेक्षा/अनिवार्यता हो? क्योंकि इस लौकिक जगत् में जैसे एक किशोर व किशोरी के मध्य में लौकिकी रति का अभ्युदय जिस प्रकार से किसी पूर्व प्रशिक्षण की अपेक्षा नहीं रखता, वैसे ही भगवत्प्रेम के विकसित व प्रकट होने में भी भक्तिशास्त्रज्ञानरूपी प्रशिक्षण की भला क्या आवश्यकता है?

 

उपरोक्त कुतर्क का खण्डन –

 

लौकिक काम व रङ्गकला के आचरण/क्रियान्वयन व विकास के लिये भी आर्य/भारतीय साहित्य में नाट्यशास्त्रम्, वात्स्यायनसूत्रम् व पौरुरवसमनसिजसूत्रम् आदि कामशास्त्र/ग्रन्थों की रचना हुई है । आखिर में लौकिक काम भी तो तीन सांसारिक पुरुषार्थों (धर्म, अर्थ तथा काम) में से एक है ! अतः वह भी शास्त्रसापेक्ष है ! उच्छ्रिङ्खल नहीं ! हाँ, यह बात अवश्य है कि लौकिक काम के हृदय में उद्भावन के लिये किसी शास्त्रनिर्देश की आवश्यकता नहीं पडती । पर क्यों? क्योंकि यह लौकिक ‘काम’ तो अनादिसंसारदशाग्रस्त मायाबद्धजीव का नैसर्गिक हृदयरोग जो माना गया न श्रीमद्भागवतशास्त्र १०.३३.३९ में (“…भक्तिं परां भगवतिं प्रतिलभ्य कामं हृद्रोगमाशुमपहिनोत्यचिरेण धीरः…”) व श्रीमद्भागवतम् ११.२.३७ + २.५.१३ + १.७.५ आदियों में ! अब जिस का संसारग्रस्ता दशा में नैसर्गिक भाव हो, उसका तो उद्दीपन के परस्पर संयोग से (एक किशोरी के एक किशोर के साथ योग से) स्वतः उद्भावन हो जायेगा न भला ! तथापि उद्भावन के पश्चात् उस काम की कार्यप्रणाली को सुव्यवस्थित करने के लिये ही तो कामशास्त्र की रचना हुई है । अतः लौकिक काम के क्षेत्र में भी तो ‘शास्त्र’ से पीछा नहीं छुडाया जा सकता है – एक कटु सत्य है ।

 

अब लौकिक काम के अतिरिक्त यदि अन्य लौकिक भावों / लौकिकी रतियों / लौकिक रसों की बात करें (जैसे कि लौकिक जगत् में पिता/पुत्र, मित्र/सखा, स्वामी/सेवक – आदियों के बीच का सम्बन्ध), तो भी उन लौकिक भावों/रतियों के व्यवस्थापन व उन लौकिक रसों (श्रीमद्रूपगोस्वामिपाद के अनुसार तो लौकिक रति में रसत्व का पूर्ण निषेध है भले ही नाट्यशास्त्रकर भरतमुनि व तदनुगत लौकिक विद्वानों ने लौकिक रति में रस की निष्पत्ति स्वीकारी हो) की समुचित निष्पत्ति करवाने के लिये लौकिक नाट्यशास्त्र की रचना हुई जो है न — यथा भरतमुनि का नाट्यशास्त्रम् व शारदातनय का भावप्रकाशनम् आदि बहुतेरे ग्रन्थ संस्कृत वाङ्मय में । बहुतेरे लौकिक रस-दर्शन के आचार्यों ने अनेकानेक वादों की भी तो स्थापना की यथा – श्रीलोल्लटभट्ट का उत्पत्तिवाद, श्रीशंकुक का अनुमितिवाद, श्रीभट्टनायक का भुक्तिवाद, श्रीअभिनवगुप्त का अभिव्यक्तिवाद व अद्वैतधुरन्धर श्रीपाद मधुसूदन सरस्वती का भगवद्रति (भगवत्प्रेम) को एक लौकिकी रति या चित्तद्रुतिपर्यन्त भक्तिरति को सीमितरूप से परिभाषित करना/मानना (जैसे कि उनके भगवद्भक्तिरसायनम् ग्रन्थ में स्पष्ट है) – आदि आदि ! अतः अन्य लौकिक भावों / रतियों में भी शास्त्र की अनिवार्यता है!

 

अब यदि अप्राकृत भगवद्भक्तिरसप्रस्थान की बात करें, तो भी यहाँ श्रीमद्भागवतम्, गीतगोविन्दमहाकाव्यम्, कृष्णकर्णामृतम्, भक्तिरसामृतसिन्धु:, उज्ज्वलनीलमणि:, भक्तिरसामृतशेष: (और गौडीय वैष्णव सम्प्रदाय के पास तो ऐसे सैकडों रसपरक ग्रन्थ भरे पडे हैं – अनान्य व्रजरसोपासनाकारी सम्प्रदायों के पास भी बहुत भण्डार है) जैसे शास्त्र हैं । अप्राकृत भगवद्रति के आविर्भाव के लिये (चाहे रागमार्ग की उपासना हो या विधिमार्ग की) भी शास्त्रनिर्देशों के पालन की अति आवश्यकता है (श्रीविश्वनाथ चक्रवर्त्ति की रागवर्त्मचन्द्रिका में विवेचित विषय – गोदुग्धप्राप्तिप्रक्रिया के उदाहरण के द्वारा) ! वैधी मार्ग (मर्यादा मार्ग) में शास्त्रनिर्देशों के पठन से उतपन्न ‘कर्त्तव्यबुद्धि’ से भक्ति का प्रवर्तन (प्रारम्भ) माना गया साधक में । व राग मार्ग (पुष्टि मार्ग) में भक्ति का प्रवर्त्तन मुख्यरूपेण श्रीमद्भागवतादि शास्त्रों व तदनुगत भक्तिरसलीलापरक ग्रन्थावली के श्रवण/अध्ययन/मनन से उत्पन्न ‘लोभ’ के द्वारा माना गया – और दोनो मार्गों में भक्ति के साधक हृदय में उदय के पश्चात् उस भक्ति के रति/भाव/प्रेम के रूप में परिणत होने की प्रक्रिया भी शास्त्रनिर्दिष्टा ही मानी गयी ।

 

क्यों? क्योंकि मायाबद्ध जीव परतत्त्व भगवान् के ज्ञान के अनादिकालीन अभाव से ग्रस्त है, अतः स्वतः (अपने आप) उस जीव को भगवत्स्मृति नहीं आ सकती (श्रीमद्भागवत का “भयं द्वितीयाभिनिवेशतः स्यादीशापतेस्य विपर्ययोऽस्मृतिः” श्लोक) । इसी कारण से तो श्रीभगवान् ने अपौरुषेय वेदपुराणादि शास्त्रों को आविर्भूत करवाया है इस प्रपञ्च में – ताकि भगवद्ज्ञान व उसके संस्कार से पूर्णतया रहित (प्रागभाव नामक संसर्गाभाव) जीव शास्त्रानुशीलन के द्वारा (भगवद्भक्तों की सन्निधि में) उस भगवद्स्मृति को प्राप्त कर सके ! अतः लौकिक काम के उद्भावन होने की जो प्रक्रिया है लौकिक जगत् के एक किशोर नायक तथा किशोरी नायिका के हृदयों में – वह यहाँ परमार्थ में लागू नहीं ! लोक में हृदय रोग काम स्वतःसिद्ध है अविद्याग्रस्त-जीव के पक्ष में, यहाँ परमार्थ में भगवद्रति स्वतःसिद्धा न होकर शास्त्रीय निर्देशों का पालन करते करते कालक्रम में भगवान् के नित्यधाम स्थित नित्य सिद्ध परिकरों के हृदयकमल से सम्प्रदाय/दीक्षा-गुरुपरम्परा के माध्यम से साधक जीव के हृदय में स्थानान्तरित होती है (श्रील जीवगोस्वामिपाद का भक्तिसन्दर्भ: व प्रीतिसन्दर्भ: द्रष्टव्य है इस विषय में + श्रीपादबलदेवविद्याभूषण के सिद्धान्तरत्नम् में भी) ।

 

पुनः पाखण्डी तथा प्रभुप्रेम का स्वाङ्ग रचने वालों के द्वारा उठायी आपत्ति –

 

यद्यपि एकादशी-व्रत करना शास्त्रों मे वर्णित तो है, भगवान् ने श्रीमद्भगवद्गीता व श्रीमद्भागवतम् में ये क्यों कहा कि मैं व्रत, दान, तप, यज्ञ से नहीं मिलता ? रामचरितमानस में भी मैंने पढा है कि– “मिलहि न रघुपति बिनु अनुरागा, किए जोग जप तप वैरागा” — गीता के अनुसार तो व्रत से भगवान नहीं मिलते तो क्या व्रत करना अनावश्यक होगा ?

 

खण्डन –

 

तुम तथाकथित ‘रसिकभक्तों/प्रभुप्रेमीयों’ ने यदि कभी ‘माधुर्यकादम्बिनी’ नाम देवभाषा संस्कृत में प्रणीत (तुम्हारे ही श्रीधाम वृन्दावन में १७वीं शताब्दी में प्रणीत) ग्रन्थ के प्रथम अध्याय को पढा हो, तो उसमें गौडीयवैष्णवाचार्य श्रील विश्वनाथ चक्रवर्त्तिपाद ने स्पष्ट रूप से ‘भगवद्भक्ति के अङ्गरूप् दान, व्रत, तप’ तथा ‘कर्मकाण्ड के अङ्गरूप् दान, व्रत, तप’ आदियों के मध्य का स्पष्ट अन्तर बताया है और सिद्धान्तित किया है श्रीमद्भागवत के ही दो भिन्न भिन्न श्लोकों की अवतारणा करके जिसमें एक श्लोक व्रतदानादियों से भक्ति को अप्राप्या बताता है और दुसरा उनको भक्ति का अङ्गस्वरूप ।

 

एकादशीव्रत भगवद्भक्ति का अङ्गभूत होने से निर्विकल्परूप से करणीय है जिसके न करने से प्रत्यवाय/दोष लगता है जो कि पद्मपुराण व नारदपुराण आदियों में वर्णित सप्तम नामापराध/भक्त्यपराध के रूपे में बन जाता है – यदि उस एकादशी व्रत को न करने वाला ऐसा सोचता है कि उसकी तथाकथित भगवद्भक्ति के बल से एकादशी न करने से उसे जो दोष लगेगा वह निवृत्त हो जायेगा तब ! श्रीमद्भगवद्गीता का “सर्वधर्मान्परित्यज्य….अहं त्वां सर्वपापेभ्यो..” श्लोक भक्ति के अङ्गों को न करने के उपर लागू नहीं पडता, बल्कि भक्तियोग के अतिरिक्त अन्य साधनों के न करने के उपर लागु पडता है (यहा ‘सर्वधर्म’ शब्द से ‘परमनिष्कैतवधर्मस्वरूप भागवतधर्म या भक्तियोग’ अभिप्रेत नही) । ऐसा नहीं मानने पर “भक्त्याहमेकया ग्राह्यः” व “न साधयति/रोधयति मां योगो…यथा भक्तिर्ममोर्ज्जिता” जैसे भागवतीय वचनों के साथ विरोध होगा ! और भक्ति के अङ्गों का अनुष्ठान न करने से ‘पाप’ नहीं लगता, बल्कि अपराध होता है भक्तिमार्ग के साधक के पक्ष में (पाप व अपराध में बहुत अन्तर है – गीता के उस श्लोक में ‘सर्वपापेभ्यो’ आया है न कि ‘सर्वापराधेभ्यो’) ! अधिकन्तु, एकादशी व्रत जैसे भक्त्यङ्ग ‘सर्वधर्म’ के भीतर परिगणित नहीं, बल्कि ‘परमधर्मस्वरूप भक्ति’ के अङ्ग है !

 

 

 

 

— चैतन्यगौडीयवैष्णवसम्प्रदायी भक्तिरसवेदान्तपीठाधीश्वरा: आचार्यश्रीः गुरुपादा:

 

 

 

सूत्र / URL — https://goo.gl/xlz9Eq

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