१) प्रथम विषय —

 

सूत्रस्थानीयं वाक्यम् –

 

भगवद्भक्ति काल, देश व चिन्ता (लौकिक करणों/इन्द्रियों के द्वारा कृत कल्पना) रूपी अवकरों/बाधकों (उपाधियों) से अबाधिता है श्री भगवान् की ही तरह उनकी स्वरूपभूता ह्लादिनी शक्ति (आनन्ददायिका) की विशेष वृत्तिरूपा होने के कारण ।

 

टिप्पणी –

 

{ क) भगवान् के देश/कालादि की उपाधियों से परे होने के श्रौत/औपनिषदिक व आर्ष (महात्माओं के द्वारा रचित ग्रन्थ) प्रमाण – तैत्तिरीयोपनिषद् २.१.१  – “सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म” अर्थात् “परब्रह्म वा श्रीभगवान् सत्य (नित्य), चिन्मय (ज्ञान) व अनन्त (देश तथा काल की सीमा से परे व अबाधित) है” + श्रीवैष्णवसम्प्रदाय के श्रीयामुनाचार्य के द्वारा रचित स्तोत्ररत्नम् का १६वाँ श्लोक – “उल्लङ्घितत्रिविधसीमातिशायिसम्भावनं…..” अर्थात् “जो परब्रह्म तीन प्रकार की सीमाओं (उपाधियो) यथा ‘देश’, ‘काल’, व ‘चिन्तन’ का उल्लङ्घन करते हो” (उन सीमाओं से परे हो) ।

 

ख) श्रीभगवान् की ह्लादिनी शक्ति का प्रामाण्य व ह्लादिनी का भगवत्स्वरूपभूतत्त्व –

 

बृहदारण्यकोपनिषद् ३.९.२८ – “विज्ञानमानन्दं ब्रह्म” अर्थात् – “ब्रह्म विज्ञान (चित्/संवित्) व आनन्दमय (ह्लादिनी से ओतप्रोत) है” +

 

तैत्तिरीयोपनिषद् २.७.२ – “रसो वै सः रसं ह्येवायं लब्ध्वाऽऽनन्दी भवति” अर्थात् “केवल परब्रह्म निश्चित् रूप से ‘रस’ है तथा इन रसब्रह्म की प्राप्ति करने से ही जीव आनन्दयुक्त हो जाता है ।”

 

+ श्रीविष्णुमहापुराण १.१२.६८ (रामानुजीया विष्णुचित्तीयम् टीका वाले देवनागरी संस्करण में) वा १.१२.६९ (श्रीधरस्वामिपाद कृता टीका वाले बाङ्गला संस्करण में) – “ह्लादिनी सन्धिनी संवित्त्वैय्येका सर्वसंस्थितौ । ह्लादतापकरी मिश्रा त्वयि नो गुणवर्ज्जिते ।।” अर्थात् “ह्लादिनी, सन्धिनी व संवित् – ये एक अन्तरङ्गा शक्ति की तीन वृत्तियाँ आपके स्वरूप में हैं । परन्तु ह्लाद, तापकरी व मिश्रा नामकी बहिरङ्गा त्रिगुणात्मिका माया शक्ति की वृत्तियों से आप रहित हो ।”

 

+ पद्मपुराणान्तर्गत श्रीमद्भागवतमाहात्म्य के प्रथमाध्याय का मङ्गलपद्य – “सच्चिदानन्दरूपाय विश्वोत्पत्त्यादिहेतवे । तापत्रयविनाशाय श्रीकृष्णाय वयं नुमः ।।” अर्थात् “सत् (सन्धिनी), चित् (संवित्) व आनन्द (ह्लादिनी) के स्वरूप (ये तीनों उनकी स्वरूपभूता वृत्तियाँ है), विश्व की उत्पत्ति (सर्जन), स्थिति (पालन) व संहृति (संहार) के आदि/आत्यन्तिक हेतु वा कारणस्वरूप (ब्रह्मा, रुद्र, विष्ण्वादियों की भाति तात्कालिक हेतु नहीं और न ही दुर्गाम्बा की तरह साधनात्मिका शक्ति इन तीनों कार्यों के लिये), तीनों तापों (आध्यात्मिक, आधिदैविक व आधिभौतिक) के विनाशकारी श्री अर्थात् राधा से संश्लिष्ट कृष्ण को हम नमस्कार करते है ।” श्रीकृष्ण को ब्रह्मा, विष्णु, महेश, गणपति, देवी, सूर्य तथा अन्यान्य समस्त देवी/देवताओं के मूल के रूप में ब्रह्मवैवैर्वर्त्तपुराण के ब्रह्मखण्ड के प्रारम्भिक अध्याय स्पष्ट रूप से उल्लिखित करते हैं ।

 

+ ब्रह्मसंहिता के पञ्चमाध्याय का प्रथम श्लोक – “ईश्वरः परमः कृष्णः सच्चिदानन्दविग्रहः । अनादिरादिर्गोविन्दः सर्वकारणकारणम् ।।” अर्थात् “परम ईश्वर कृष्ण है जो कि सच्चिदानन्द कलेवर है, अनादि है, अन्य समस्त जीवभूत व जडभूत समुदाय के आदि है – वैसे गोविन्द सर्वकारणों के कारण है (अर्थात् ‘आदि हेतु है जगत् की सृष्टि, स्थिति व संहृति के’) ।”

 

+ श्रीविष्णुस्वामिपाद के द्वारा प्रणीत सर्वज्ञसूक्त का प्रमाण – “ह्लादिन्या संविदाश्लिष्टः सच्चिदानन्द ईश्वरः । स्वाविद्यासंवृतो जीवः सङ्कलेशनिकराकर: ।।” अर्थात् “ह्लादिनी, संवित आदि से जो सच्चिदानन्द ईश्वर युक्त है तथा दूसरी ओर निज अविद्या से घिरा हुआ जीव समस्त क्लेशों का आगार है ।”

 

+ ऋग्वेदीया राधिकोपनिषद् का स्पष्ट कथन है कि – “एवं हि तस्य शक्तयस्त्वनेकधा । आह्लादिनी सन्धिनी ज्ञानेच्छा क्रियाद्या बहुविधा शक्तयः । तास्वाह्लादिनी वरीयसी परमान्तरङ्गभूता राधा कृष्णेनाराध्यत इति राधा कृष्णं समाराधयति सदेति राधिका गान्धर्वेति व्यपदिश्यत इति । अस्या एव कायव्यूहरूपा: गोप्यो महिष्यः श्रीश्चेति । येयं राधा यश्च कृष्णो रसाब्धिर्देहेनैकः क्रीडनार्थं द्विधाऽभूत् ।” अर्थात् – “इस प्रकार से उस परतत्त्व गोपाल की अनेक शक्तियाँ है जैसे कि आह्लादिनी, सन्धिनी, ज्ञानेच्छा, क्रिया आदि । इन सब में सर्वप्रमुखा आह्लादिनी उस परतत्त्व की परम अन्तरङ्गभूता है (स्वरूपभूता/आत्मभूता है) ।………”

 

+ श्रील रूपगोस्वामिपाद के श्रीभक्तिरसामृतसिन्धु के १.३.१. की श्रील जीवगोस्वामिपाद की दुर्गमसङ्गमनी नाम्नी टीका में तथा श्रील रूपचरणों के श्रीउज्ज्वलनीलमणि के स्थायिभाव प्रकरण १७६ में – “राधिकायूथ एवासौ मोदनो न तु सर्वतः । यः श्रीमान् ह्लादिनीशक्तेः सुविलासः प्रियो वरः ।।” की टीका में श्रीजीव, श्रीविश्वनाथ चक्रवर्त्ति व श्रील विष्णुदास गोस्वामिपाद आदि गौडीयवैष्णवाचार्यों ने अकाट्या युक्ति व प्रमाणों के साथ यह सिद्ध कर दिया है कि किस प्रकार भगवद्भक्ति श्रीहरि की ह्लादिनी शक्ति की सारविशेषस्वरूपा है ।}

 

पूर्वपक्ष: –

 

“तो फिर किसी समयविशेष में (यथा कलिकाल के प्रारम्भ में) व किसी स्थानविशेष में (यथा द्राविड देश में) उसकी (भावरूपिणी भक्ति की अधिष्ठातृणी देवी भक्तिदेवी की जो कि ह्लादिनी की सारवृत्तिस्वरूपा है) उत्पत्ति कैसे स्वीकार्य हो सकती है? उसकी उत्पत्ति का लौकिक देश व काल में स्पष्ट निरूपण किया गया है पद्मपुराण के उत्तरखण्ड के श्रीमद्भागवतमाहात्म्य के निरूपक प्रकरण के प्रथमाध्याय के ४८वे श्लोक में यथा – “उत्पन्ना द्रविडे साहं वृद्धिं कर्णाटके गता । क्वचित्क्वचिन्महाराष्ट्रे गुर्जरे जीर्णतां गता ।।” अर्थात् – “मै, भक्तिदेवी, (कलि के प्रारम्भ में) द्राविड देश (तमिलनाडु प्रान्त भारत का) में उत्पन्न हुई…….” ।

 

समाधानम् –

 

देश वा काल वाला पक्ष –

 

श्रीभगवान् भी लौकिक (जडीय/मायिक/प्राकृत/प्रापञ्चिक) देश (स्थान) व काल/समय से अबाधित होने पर भी (क्योंकि श्रीभगवान् का प्रपञ्च में अवतरण अर्थात् ‘जन्म’ – ‘दिव्य’ वा अलौकिक माना गया है श्रीमद्भगवद्गीता ४.९ “जन्म कर्म च मे दिव्यं एवं यो वेत्ति तत्त्वतः..” में) जैसे अपने आधिदैविक काल (अप्राकृत चिन्मय त्रिगुणातीत काल विशेष जो कि अप्रकट-व्रजधाम, गोलोकधाम, साकेतधाम, अयोध्यापुरी, मथुरा, द्वारका, व वैकुण्ठ आदि स्थानों पर प्रकाशित है व जिस काल में भूत, भविष्य व वर्त्तमान रूपी तीन विकल्प नहीं होते व जो केवल नित्य वर्त्तमान में रहता है – प्रमाण – ब्रह्मसंहिता ५.५६ – “निमेषार्धाख्यो वा व्रजति न हि यत्रापि समयः….भजे श्वेतद्विपं तमहमिह गोलोकमिति यं…..” अर्थात् “जहाँ एक निमेष मात्र / पल भर का भी समय व्यतीत/आगत/बीतता नही है नित्य वर्त्तमानता के कारण वैसा श्वेतद्वीप/गोलोकधाम रूपी परमपद”) को प्रपञ्चस्थिता भूधरा (पृथ्वी) पर पहले स्थापित कर (श्रीमद्भागवतमहापुराण के १०.३.१ के “…कालः परमशोभनः…” के उपर श्रीवल्लभाचार्य की सुबोधिनी टीका द्रष्टव्या है जहा पर यह स्पष्ट किया गया है कि श्रीकृष्ण का प्रपञ्चस्थिता मथुरापुरी में अवतरण परमशोभायुक्त काल अर्थात् आधिदैविक/अप्राकृत काल की उपस्थिति में हुआ) जैसे प्रकट होते है अपने भौमधाम मधुपुरी में व अपने नित्य व्रजमथुरादि धामों का भूतल पर प्राकट्य करवाकर पश्चात् जैसे स्वयं प्रकट होते है उन प्रपञ्चस्थित दैवी धामों में (गर्गसंहिता के गोलोकादि प्रकरण द्रष्टव्य है यह जानने के लिये कि किस प्रकार इस लौकिक जगत् में स्थित व्रजधाम नित्य गोलोकधाम का ही अभिन्न रूप है – किञ्चित् तारतम्य के साथ – यथा श्रील रूप गोस्वामिपाद के लघुभागवतामृतम् १.५.४९७-५४० में व श्रील रूप कवीश्वर के सारसङ्ग्रह: में विश्लेषित । प्रमाण यथा – स्कन्दपुराण – “गुणातीतं परम् ब्रह्म व्यापकं व्रज उच्यते । सदानन्दं परम् ज्योति: मुक्तानां पदमव्ययम् ।।” + ब्रह्मसंहिता पञ्चमाध्याय – “सहस्रपत्रकमलं गोकुलाख्यं महत्पदं…” + श्रीजीवगोस्वामिपाद के श्रीकृष्णसन्दर्भ: में – “श्रीवृन्दावनस्य प्रकाशविशेषो गोलोकत्वं तत्र प्रापञ्चिकलोकप्रकटलीलावकाशत्वेनावभासमानः प्रकाशो गोलोक इति समर्थनीयम्” + श्रील सनातन गोस्वामिपाद के श्रीबृहद्भागवतामृतम्  में – “यथा क्रीडति तद्भूमौ गोलोकेऽपि तथैव सः । अध उर्ध्वतया भेदोऽनयोः कल्प्येत केवलम् ।।” + श्रीमद्भागवत १०.४४.१३ + १०.२१.१० + ऋग्वेद १ मण्डल, १५४वाँ सूक्त – “ता वां वास्तुन्यूश्मसि गमध्यै यत्र गावो भूरिशृङ्गा अयासः । अत्राह तदुरूगायस्य वृष्णाः परमं पदमवभाति भूरि ।।”), ठीक वैसे ही श्रीभगवान् की स्वरूपभूता शक्ति भक्तिदेवी भी सर्वप्रथम द्राविडीय श्रीरङ्गमवेङ्कटाद्रि आदि स्थानों में (१०८ कुल दिव्यदेशम् श्रीवैष्णव रामानुजीय सम्प्रदाय में मान्य) कि जिन्हें स्कन्दपुराण के वैष्णवखण्ड के वेङ्कटाचलमहात्म्य व वराहपुराण में पृथ्वीस्थित साक्षात् वैकुण्ठस्वरूप माना गया है – वहाँ प्रकटिता/अवतरिता होती है । अतः जब वेङ्कटाद्रि आदि द्राविडीय दिव्यदेश को वैकुण्ठस्वरूप घोषित किया गया है पुराणो में, तब तो वहाँ व्याप्त समय भी निश्चित् रूप से चिन्मय आधिदैविक त्रिगुणातीत अलौकिक काल ही तो होना चाहिये न!

 

भक्ति की समयविशेष में उत्पत्ति के कारण होने वाली उस भक्ति की अनित्यता की सम्भावना का खण्डन –

 

जैसे श्रीकृष्ण गतद्वापरान्त (अभी अभी बीत गये द्वापर युग के अन्तिम चरण में) में वसुन्धरा (पृथ्वी) पर आत्मप्रकट होकर प्रकटलीला का प्रकाश करने से पूर्व भी निजधाम (अप्रकट व्रज, गोलोकादियों में) नित्य अवस्थित थे, ठीक वैसे ही भक्तिदेवी भी द्राविड देश में प्रकट होने से पूर्व भी सत्ता में थी । यदि श्रीकृष्ण व श्रीराधा द्वापरान्त में उनके लौकिक जगत् में अलौकिक प्राकट्य से पूर्व सत्ताहीन होतें, तब तो पद्मपुराणोक्त प्रसङ्ग के अनुसार सूर्यवंशभूषण तथा भगवान् राघवेन्द्र के पूर्वज सत्ययुग में विद्यमान महाभाग राजर्षि अम्बरीष के द्वारा श्रीमदनगोपाल के अर्चाविग्रह अयोध्या के सरयूतट पर समर्चित नहीं होतें व ब्रह्मवैवर्त्तपुराण के प्रकृतिखण्ड के ५० से ५६वें अध्यायों में वर्णित प्रसंग के आधार पर गतद्वापर से बहुत पूर्ववर्ती काल में राजर्षि सुयज्ञ के द्वारा श्रीराधा समाराधिता नहीं हुयी होतीं!

 

अधिकन्तु भगवत्स्वरूप तथा शुकदेव जी के द्वारा कथित (शुकप्रोक्त) श्रीमद्भागवत भी सत्ययुग में राजर्षि अम्बरीष के द्वारा श्रुत नहीं हुए होते गौतममुनि से प्रेरणान्वित होकर — यथा पद्मपुराण का प्रमाण – “अम्बरीष! शुकप्रोक्तं नित्यं भागवतं शृणु । पठस्व स्वमुखेनापि यदीच्छसि भवक्षयं ।।” – अर्थात् “हे अम्बरीष! तुम शुकदेव जी द्वारा कहे गये (याद रहें कि शुकदेव बहुत बाद में इस कथा को द्वापर युग के अन्त में परीक्षित् को सुनायेङ्गे) नित्य श्रीमद्भागवत (जो कि अनादि काल से शुक-परीक्षित संवाद से युक्त है – यही ‘नित्य’ शब्द का अर्थ है ‘भागवत’ के विशेषण के रूप में) को सुना करो अपने मुख से उच्चारण करके अथवा तो किसी वक्ता के मुख से – यदि तुम अपने भवबन्धन का नाश चाहते हो तो ।”

 

प्रथम विषय का सिद्धान्तपक्ष –

 

भक्ति, भगवान् व श्रीमद्भागवतशास्त्र  — तीनों नित्य है परस्पर अभिन्न होने के कारण (भक्ति कैसे भगवान् की स्वरूपभूता है यह पहले ही विश्लेषित हो चुका है । श्रीमद्भागवत भी शब्दब्रह्म होने के कारण तथा पद्मपुराण के “पादौ यदीयौ प्रथमद्वितीयौ….मुखारविन्दः दशमः..” प्रमाण + वेदों के “द्वादशाङ्गो ह वै पुरुषः”  + पद्मपुराण के उत्तरखण्ड के श्रीमद्भागवतमाहात्म्य के “तेनेयं वाङ्मयी मूर्त्तिः प्रत्यक्षा वर्त्तते हरेः” – इत्यादि वचनों के आधार पर स्पष्ट रूप से भगवद्विग्रह के रूप में ही प्रमाणित होता है), अतः लौकिक जगत् में इन तीनों के प्रादुर्भाव से पूर्व भी इस त्रिपुटी की नित्य अनादिकालीन सत्ता रहती है – यह युक्ति व शास्त्रीय आधार पर सिद्ध हुआ ।

 

(क्रमशः)

 

  • भक्तिरसवेदान्तपीठाधीश्वराः आचार्यश्री: गुरुपादा:

(आनन्द, गुजरात, भारत)

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