परमार्थस्य प्रारम्भः / अध्यात्म की शुरुआत / Beginning of spirituality

 

 

 

आचार्यानुग्रहेणैवानुभवं भगवत्कृपायाः भवति न तु स्वातन्त्र्येण – ‘प्रथमं तु गुरुं पूज्यं ततश्चैव ममार्च्चनम् / कुर्वन्सिद्धिमवाप्नोति ह्यन्यथा निष्फलं भवेत् //” — इति श्रीलसनातनगोस्वामिपादानां हरिभक्तिविलासे (४.३४४) समुद्धृतं स्मार्त्तं प्रमाणम् ।

 

  • आचार्यश्रीः गुरुपादाः

 

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आचार्य के अनुग्रह के द्वारा ही केवल भगवत्कृपा का अनुभव प्राप्त होता है, स्वतन्त्ररूप से नही । ‘पहले गुरु की पूजा हो एवं तत्पश्चात् मेरी (श्रीभगवान् कह रहें है) – तब सिद्धि प्राप्त होगी एवं यदि इस क्रम में विपर्यय हुआ तो सब प्रयास निष्फल हो जायेगा’ – ऐसा श्रील सनातन गोस्वामिपाद के हरिभक्तिविलास ग्रन्थ में (४.३४४) उद्धृत स्मृति का प्रमाण है ।

 

  • भक्तिरसवेदान्तपीठाधीश्वर

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Only by the compassion of an ācārya can a sādhaka experience the grace of God; not otherwise. ‘Firstly, the guru should be paid tributes and later to Me (Śrī Hari is saying) – only then, the seeker shall attain perfection – failing in which, all endeavours shall turn futile’ (‘prathama tu guru pūjya tatścaiva mamārcanam / kurvan siddhim avāpnoti hy anyathā niphala bhavet //’)  – such evidence of smṛti is cited in the treatise Haribhaktivilāsa of Śrīla Sanātana Gosvāmipāda (4.344).

 

  • Āmnāya-vācaspati Śrī (BRVF’s Ācārya)

 

सूत्रम् / सूत्र / Link — https://goo.gl/GRO4Sv

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