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व्रजवासीयों की भक्ति व व्रजबहिर्भूत भक्तों की भक्ति का अन्तर / Difference between the devotion contained with the Vrajavāsī bhaktas and the devotees of other bhagavad-dhāmas (Only Hindi version)

“अर्जुन की सख्य-रति (भक्ति) भगवदैश्वर्य-ज्ञान के द्वारा प्रभावित थी, इसीलिये उसे ऐसा लगा कि उसने गलती कि है कृष्ण को अपना सखा, दास, सारथी, भाई इत्यादि मानकर (गीता ११.४१-४२), जबकि व्रज की लीला में कृष्ण के सखा तो कृष्ण को घोडा बनाने से भी नही हिचकिचाते और उनके भाग्य की शुकदेव मुनि भूरि भूरि प्रशंसा हे करते है (उन व्रज के सखाओं ने तो कभी भी भगवान् के विराट्रूप के दर्शन नही किये है एवं श्रृङ्गारभाव वाली गोपीयों ने भी भगवान के विराट्रूप के दर्शन नही किये है, तो भी वे गोपीयाँ कह रही है कि हम जानती है कि तुम अखिलदेहधारीयों की अन्तरात्मा हो) — प्रमाण – यथा –

क) भा.पु. १०.१८.२४ — “उवाह कृष्णो भगवान् श्रीदामानं पराजितः। वृषभं भद्रसेनस्तु प्रलम्बो रोहिणीसुतम् ।।”

ख) भा.पु. १०.३१,४ — “न खलु गोपिकानन्दनो भवानखिलदेहिनामन्तरात्मादृक् । विखनसार्थितो विश्वगुप्तये सख उदेयिवान् सात्वतां कुले ।।”

ग) भा.पु. १०१४.३२ — “अहो भाग्यमहो भाग्यं नन्दगोपव्रजौकसाम् । यन्मित्रम्परमानन्दम्पूर्णब्रह्म सनातनम् ।।”

दूसरा प्रमाण यह है कि युधिष्ठिर आदि पाण्डवों के सौभाग्य को नारद मुनि ने अधिक माना है अन्य प्रह्लाद आदि भक्तों की तुलना में क्योकि (युधिष्ठिर को नारद ये वाक्य सुना रहे है महाभारत युद्ध से बहुत पहले राजसूययज्ञ के समय जब तक कि अर्जुन को भी विराट्रूप दर्शन का सौभाग्य नही मिला था),

प्रमाण –

घ) भा.पु. ५.६.१८ — “राजन्पतिर्गुरुरलम्भवतां यदूनां दैवम्प्रियः कुलपतिः क्व च किङ्करो वः । अस्त्वेवमङ्ग भगवान् भजताम्मुकुन्दो मुक्तिं ददाति कर्हिचित् स्म न भक्तियोगम् ।।”

ङ) भा.पु. ७.१०.५० की श्रीधरस्वामी की भावार्थदीपिका टीका — “न तु प्रह्लादस्य गृहे परम्ब्रह्म वसति न च तद्दर्शनार्थम्मुनयस्तद्गृहानभियन्ति न च तस्य ब्रह्म मातुलेयादिरूपेण वर्त्तते न च स्वयमेव प्रसन्नमतो यूयमेव ततोऽप्यस्मत्तोऽपि भूरिभागा इति भावः ।”

सूत्र / Link – https://goo.gl/M7nVYX

  • भक्तिरसवेदान्तपीठाधीश्वरा:

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