Jaya & Vijaya - 2

भगवान् सङ्कर्षण के पार्षद चित्रकेतु का वैष्णवापराध वास्तव में अपराध नहीं है तथा जय-विजय भगवत्पार्षदों ने स्वेच्छापूर्वक प्रतिकूल भाव को अङ्गीकृत किया है

 

 

 

गौडीयवैष्णवसम्प्रदायाचार्य श्रील विश्वनाथ चक्रवर्तिपाद के द्वारा रचित ‘माधुर्य-कादम्बिनी’ ग्रन्थ (१७वीं शताब्दी – श्रीधाम वृन्दावन में प्रणीत) की तृतीयामृतवृष्टिः (तीसरे अध्याय) में से –

 

“यस्तु तत्रापि चित्रकेतौ कादाचित्को महदपराधः स प्रातीतिक एव न वास्तवः । सत्यां प्रेमसम्पत्तौ  पार्षदत्ववृत्रत्वयोर्वैशिष्ट्याभावसिद्धान्तात् । जयविजयोस्त्वपराधकारणं प्रेमविजृम्भिता स्वेच्छैव । सा च ‘हे प्रभुवर  देवादिदेव नारायण अन्यत्राल्पबलत्वातदस्मासु तु प्रातिकूल्याभावाद्यदि तत्र भवतो युयुत्सा न सम्पद्यते तदा आवामेव केनापि प्रकारेण प्रतिकूलीकृत्य तद्युद्धसुखमनुभूयतामित्यावयोः स्वतः परिपूर्णतायामनणुमात्रमपि न्यूनत्वमसहमानयोः किङ्करयोः प्रार्थनाहठ: स्वभक्तवात्सल्यगुणमपि लघुकृत्य निष्पाद्यताम्’ इत्याकारा कादाचित्कप्रसङ्गभवा मानसा मनसैव जेया ।“

 

अर्थात् –

 

“भगवत्प्राप्ति के पश्चात् भी राजर्षि चित्रकेतु के विषय में जो महादपराध की बात सुनी जाती है, वह वास्तविक नहीं है, अपितु प्रातीतिक मात्र है । क्योंकि उस महत् अपराध के कारण वृत्रासुर की योनि प्राप्त करने के बाद भी उसमें  प्रेमाभक्ति विद्यमान रहने से उसके भगवत्पार्षदत्व तथा वृत्रत्व के वैशिष्ट्य का अभाव ही सिद्ध होता है । जय-विजय के अपराध का कारण भी तो उनके भगवत्प्रेम से परिवर्द्धित अपनी इच्छा ही थी । और वह थी – ‘हे प्रभो! देवादिदेव नारायण! आपकी युद्ध की इच्छा को पूर्ण कर सके ऐसा कोई भी बलवान व्यक्ति अन्यत्र हमें नहीं दीखता और हममें यदि ऐसा बल है, तो हम आपके प्रतिकूल हो ही नहीं सकते । अतः किसी प्रकार हमें ही अपना प्रतिकूल-विरोधी बनाकर आप युद्ध के सुख (वीररस) का अनुभव करें । आपकी स्वतःपूर्णता में (परब्रह्म की तैतिरीयोपनिषद् की ब्रह्मानन्दवल्ली में उल्लिखिता रसब्रह्मता) बिन्दुमात्र भी ह्रास हो, यह बात हम लोग सहन नहीं कर सकते । अतः आप अपने भक्त वात्सल्य गुण को आच्छादित कर हमारी प्रार्थना को पूर्ण करें, क्योंकि हम आपके दास हैं ।’ (ऐसी कथा विष्णुधर्मोत्तरपुराण में उल्लिखिता है ।) यदि किसी समय प्रसङ्गवश इस प्रकार का मानसिक वासनामय अपराध मन में जागे उठे, तो विचारपरायण बुद्धि वृत्ति के द्वारा मानसिक भाव को जीतकर उसे दबा देना चाहिए ।“

 

 

 

  • भक्तिरसवेदान्तपीठाधीश्वरा:

 

***

 

The offense rendered by  Citraketu, the associate of Lord Saṅkarṣaṇa, unto Śiva is not an actual offense & the two eternal associates of Hari viz., Jaya & Vijaya have voluntarily undertaken an unfavourable disposition.

 

 

 

From the third chapter of the ‘Mādhūrya-kādambinī’ by Gauḍīya-vaiṣṇavācārya Śrīla Viśvanātha Cakravarttipāda (17th Century – Śrīdhāma Vṛndāvana) –

 

yastu tatrāpi citraketau kādācitko mahadaparādha sa prātītika eva na vāstava. satyāṁ prema-sampattau pāradatvavtratvayorvaiśiṣṭyābhāvasiddhāntāt. jayavijayostvaparādhakāraam premavijmbhitā svecchaiva. sā ca ‘he prabhuvara devādideva nārāyaa anyatrālpabalatvādasmāsu tu prātikūlyābhāvādyadi tatra bhavato yuyutsā na sampadyate tadā āvāmeva kenāpi prakārea pratikūlīktya tadyuddhasukhamanubhūyatāmityāvayo svata paripūṇatāyāmaumātramapi nyūnatvamasahamānayo kikarayo prārthanāhaha svabhaktavātsalyaguamapi laghuktya nipādyatām’ ityākārā kādācitkaprasagabhavā mānasā manasaiva jeyā.

 

Rendition –

 

“In the case of Citraketu’s who had already attained the lotus feet of the Lord, his accidental mahā-aparādha to Śiva was apparent, not real, for there was no ill effect from his mistake. Both as an associate of the Lord, and assuming the form of a demon (Vṛtrāsura) his wealth of prema was still evident. The cause of the apparent offense of Jaya and Vijaya was a manifestation of their personal desire stimulated by prema. The two desired in this way: “0 Prabhu! 0 Lord of Lords! 0 Nārāyaṇa! You desire to fight but we do not see a suitable opponent for You. All those available are too weak. Though we are strong, we are not inimical to You. Somehow or other, make us inimical to You, and realize Your desire to fight. We, being Your faithful servants, cannot tolerate to see any lack whatever in Your perfection. Diminish Your quality of affection for your devotees and fulfill our prayer.”

 

 

Link / सूत्र — https://goo.gl/IOO6QI

 

  • Bhaktirasavedāntapīṭhādhīśvara

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