नयनोन्मिलनकारी सन्देश –

 

 

 

संतमत (किसी प्रसिद्ध सन्त ने जो कह दिया वही प्रमाण माना जाने लगा फिर चाहे वो कही गयी बात शास्त्रोपदिष्ट व पूर्वपरम्परागता हो या न हो ) व परम्परागत सम्प्रदाय (प्रस्थानत्रयी/चतुष्टयी के भाष्यों के आधार पर शताब्दीयों के दार्शनिक इतिहास के इम्तिहान को उत्तीर्ण कर किसी विशेष दार्शनिक मत व उपासना पद्धति को मानने वाले — जैसे कि गौडीय वैष्णव सम्प्रदाय का मत है ‘अचिंत्यभेदाभेदवादः’ व उसकी उपासना पद्धति का नाम है ‘रागमार्ग’) — यें दो धाराएँ आज के समय में सनातन धर्म में देखने को मिलती है ।

 

पर उत्कर्ष व प्रामाण्य तो परम्परागत आचार्यों का ही स्वीकार्य है क्योंकि वें गीता, ब्रह्मसूत्र, उपनिषद् व श्रीमद्भागवत के उस व्याख्यान की उस दार्शनिकी विचारधारा का अनुसरण करने वाले होते हैं जो कि शताब्दीयों से चली आ रही विद्वत् आचार्यों की शृङ्खला के द्वारा सुव्यवस्थित रूप से निर्मित होतीं है  (system/school of philosophical thought) ।

 

आज कल कुछ ऐसे भी महात्मा देखने को मिलते है जो कि बाह्य रूप से तो किसी सम्प्रदाय/पन्थ/अपसंप्रदाय आदियों में प्रारम्भिक काल में दीक्षित होते है, परन्तु वैचारिक रूप से उन्मुक्त (जैसे नगरवधू भी उन्मुक्त रहती है) व वैचारिक धरातल पर किसी सम्प्रदाय/परम्परा का अनुसरण न करने वाले एवम् इसी कारण से कई बार अपनी पूर्ववर्तिनी अध्यात्मसम्बन्धिनी विचारधाराओं का त्याग कर उनकी विरोधिनी नयी नयी अध्यात्म/धर्म-सम्बन्धिनी विचारधाराओं का अनुसरण करने में निपुण व एक प्रकार से वैचारिक खिचड़ी को पकाने वाले एवम् जीवन के अंतिम वर्षों तक अपने आप को वैचारिक रूप से ठगा हुआ व दिग्भ्रान्त महसूस करने वाले (जिसकी पुष्टि कई बार ऐसे सत्यान्वेषी लोग अपने नवीनतम प्रकाशित ग्रन्थो में करते है ये कहते हुए कि उनकी पहले वाली व्याख्या को कोई न पढ़ें एवम् नयी व्याख्या को पढ़ें) एवम् आजीवन सदाचारी रहने वाले होते है ।

 

इस प्रकार से किसी प्राचीन परम्परा व सम्प्रदाय की शिक्षाओं से न जुड़कर ‘स्वयम् अकेले अकेले सत्य की खोज में आजीवन जुटे रहकर कई बार वैचारिक तौर पर गिरते/फिसलते/पुनः उठने वाले’ महात्माओं व उनके द्वारा प्रतिपादित सन्तमत की इस सनातनधर्म में कोई कमी नहीं है । Absolutely no shortage of the self-styled god-men here in Sanātana-dharma especially, nowadays. यदि कमी है तो वो केवल ऐसे गुरुओं की कि जो बिना कोई मिश्रण किये निज निज प्राचीन परम्पराओं का दार्शनिक रूप से शतप्रतिशत अनुसरण करने वाले हों ।

 

तथाकथित व कभी सम्भव न हो सकने वाला बाह्य रूप से किया गया ‘सर्वमतसमन्वयन’ तो चाण्डाल का कार्य है कि जो ५६ प्रकार के व्यंजनों को घुला मिलाकर खाने के लिए पहचाने जाते है महाभारतादि ग्रंथों में वर्णित अख्यायिकाओं के आधार पर । आशा है कि इससे पाठकों को बहुत कुछ समझ में आ गया होगा । अस्तु ।

 

 

 

सूत्र – https://goo.gl/eTJjTj

 

— भक्तिरसवेदान्तपीठाधीश्वर आचार्य श्री गुरुपाद

(आनन्द, गुजरात, भारत)

 

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