जीव की अनादिबहिर्मुखावस्था व नित्यबद्धावस्था का पार्थक्य

 

 

 

From BRVF’s WhatsApp group numbered 5 / भ.र.वे.प्र. किंकथं समूह क्रमाङ्क ५ से / भरवेप्रकिंकथंसमूहात् पञ्चमात् —

 

19/03 15:46] Pt. Satyanarayana / Deepak Sharma — Nayagaon Neemuch & Ujjain:

 

जय श्री मन्नारायण
श्री आचार्य जी
नमो नमः
जिज्ञासा—-

 

जीव सदा से ही ईश्वर से भिन्न है परंतु उसमें उनका अतर्यामीरूप अंश है लेकिन उनको जीव भूला हुआ है । इसका क्या कारण रहा की सदा से वह उनको भूला हुआ रहा । और   जीव सदैव से ईश्वर से भिन्न है उनका अंश है लेकिन उन्हें भूला है । इसका बिना किसी शास्त्र प्रमाण के स्वानुभूति से जानने  का क्या साधन है?

 

***

 

आचार्य श्री गुरुपाद का उत्तर –

 

क) जीव में स्वतःसिद्ध परब्रह्मज्ञान का अनादिकालीन अभाव है उसकी अनादिकालीना भगवद्विमुखावस्था के कारण, अतः बिना अपौरुषेयशास्त्रवचन व तदनुगतमहत्पुरुषवचन के अनुशीलन के जीव कदापि भगवद्ज्ञानाभाव व स्वस्वरूपज्ञानाभाव का निवारण नहीं कर सकता है । तभी तो वेदादि शास्त्रों का प्राकट्य हुआ है! निष्कर्ष यह है कि शास्त्रप्रमाणापेक्षिणी स्वानुभूति से तो भगवदनुभूति सम्भव है, पर शास्त्रप्रमाणानपेक्षिनी काल्पनिकानुभूति से नहीं ।

 

ख) श्रीभगवान् ने जो श्रीमद्भगवद्गीता १५.१५ में कहा है कि ‘मुझ से ही जीव को स्मृति प्राप्त होती है व मुझ से ही स्मृति का अपोहन अर्थात् विस्मृति की प्राप्ति होती है’ (“मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनञ्च”) – यह श्रीभगवान् के द्वारा कृत ‘पूर्वप्राप्ता स्मृति का अपोहन’ जीव के पक्ष में परिदृष्टा अनादिकालीन भगवद्वैमुख्य से प्रसूत होने वाली तथा प्रागभावविरहिता – बिना प्रागभाववाली  (प्रागभाव, प्रध्वंसाभाव, अत्यन्ताभाव – तीन प्रकार के संसर्गाभाव व अन्योन्याभाव – आदि की परिभाषा नव्यन्याय दर्शन में द्रष्टव्या है) भगवद्विस्मृति (अर्थात् भगवद्विस्मृति का प्रागभाव नही था – उसके अनादिकालीना होने के कारण) के सन्दर्भ में लागू नहीं होता, क्योकि यदि वैसी भगवद्विस्मृति का प्रागभाव होता, तब तो यह बात कहने को बनती कि पूर्व में कभी जीव को भगवद्स्मृति थी, पर अब उसका अभाव है । पर यहाँ जीव के पक्ष में तो भगवद्स्मृति का ही प्रागभाव है (भगवद्विस्मृति का नही) । तो जब भगवद्स्मृति उसे कभी थी ही नही, तो उसके ‘अपोहन’ की बात कहा से प्रकटी? अपोहन (छीन लेना) क्रिया तो प्राप्त वस्तु के विषय में घटित होती है न! जीव के पक्ष में भगवद्स्मृति कहाँ पूर्वप्राप्त है?

 

 

ग) श्रीमद्भागवत ११.२.३७ में पाञ्च मुख्य तथ्य प्रकाशित हुए है –

 

 

१) सर्वसंसारबन्धनकारणभूत अनादिकालीन ईशवैमुख्य (यहा श्री.गी. ५.१५ लागू नहीं होता),

 

आ) ईशवैमुख्य से उत्पन्न व त्रिगुणात्मिका माया/अविद्या की आवरणात्मिका वृत्ति के द्वारा कृत जीव के स्वस्वरूप का आवरण अथवा ‘अस्मृतिः’/’विस्मृति:’/‘अज्ञान’, (श्री.गी. १५.१५ यहा लागू होता है)

 

२) स्वस्वरूपावरण के साथ ही माया की विक्षेपात्मिका वृत्ति के द्वारा किया गया जीव का प्राकृत/मायिक/प्रापञ्चिक/त्रिगुणात्मक पदार्थो में – यथा देह/गेहादियो में विपरीत ज्ञान/विपर्यय – उन अनात्म पदार्थो में अहंता व ममता का होना,

 

३) उस अहंता व ममता के फलस्वरूप उन पदार्थो में अभिनिवेश/आवेश/विक्षेप,

 

४) उस अभिनिवेश के परिणामस्वरूप राग, द्वेष, काम, क्रोध, लोभ, मद, मात्सर्य, आसक्ति, शोक, मोह व भय आदि रिपुओं की उत्पत्ति व पुनः पुन: संसार चक्र में आवागमन की शृङ्खला का बने रहना,

 

विश्लेषण –

 

श्रीमद्भगवद्गीता ५.१५ में जिस तमोगुणप्रसूत अज्ञान (त्रिगुणात्मिका माया का ‘अविद्या’ नामक पर्व) के द्वारा ज्ञान के आवृत्त होने की बात कही गयी है (“अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः”),  वह ज्ञान कोई प्राकृत/लौकिक सत्त्वगुण से उत्पन्न ज्ञान नही है (जिस सात्त्विक ज्ञान का उल्लेख श्रीमद्भगवद्गीता १४.१७ में हुआ है – “सत्त्वात् सञ्जायते ज्ञानं..”) । क्योंकि यदि श्री.भ.गी. ५.१५. में सात्त्विक ज्ञान अभिप्रेत होता तो वैसा सात्त्विक ज्ञान तो मायातीत स्वरूप वाले जीव में कैसे रह सकता है? (मायाबद्धावस्था में भी जीव के स्वरूप में माया का प्रवेश नहीं है) अतः जिस जीवस्वरूपगत/जीवस्वरूपभूत ज्ञान के आवरण की बात काही गयी है वह सात्त्विक ज्ञान नही है । स्वरूपभूतज्ञानशाली होने के कारण जीव के ज्ञान का आवरण ‘दैवी सामर्थ्य से युक्त’ (“दैवी हि एषा गुणमयी मम माया दुरत्यया” – श्री.भ.गी. ७.१४) त्रिगुणात्मिका माया कर लेती है निज आवरणात्मिका वृत्ति के द्वारा । परन्तु जीव का यह स्वरूपभूतज्ञान ‘परतत्त्वसम्बन्धी ज्ञान’ नही है, अपितु परतत्त्वसम्बन्धी ज्ञान का अंशभूत जीव का स्वस्वरूपसम्बन्धी ज्ञान है । क्योंकि जीवात्मा के इस स्वरूपभूत व निजस्वरूपसम्बन्धी ज्ञान के माया के द्वारा आवृत्त/अपहृत होने से पूर्व ही जीव भगवद्वैमुख्य/ईशवैमुख्य की अवस्था को प्राप्त है । एवं श्रील जीव गोस्वामिपाद ने भक्तिसन्दर्भ के प्रारम्भ में व तत्त्वसन्दर्भ में भी बताया है कि अनादि काल से चले आ रहे परतत्त्व (परब्रह्म) के ज्ञान के प्रागभाव रूपी संसर्गाभाव के कारण ही तो जीव के व्यक्तित्व में छिद्र को पाकर माया उस जीव के स्वरूपभूत ज्ञान का आवरण करती है । एवं यह परतत्त्व के ज्ञान का अनादि अभाव ही तो जीव के पक्ष में ‘ईशवैमुख्य’ के रूप में स्वीकृत हुआ है जो! अतः श्रीभगवान् की जीवभूता क्षेत्रज्ञा तटस्था शक्ति के अंशभूत व्यष्टि जीवों (नित्यबद्ध जीवगण) के स्वस्वरूप का ज्ञान (उनका स्वरूपभूत ज्ञान) – परतत्त्वज्ञान से पृथक् है । माया तो केवल जीव को आत्मस्वरूप का विस्मारण करवाती है, परतत्त्वात्मक ज्ञान का तो अनादि काल से जीव में अभाव है । प्रमाण –

 

श्रीभक्तिसंदर्भस्य प्रथमः अनुच्छेद: –

 

“परमात्मवैभवगणने च तत्तटस्थशक्तिरूपाणां चिदेकरसानामप्यनादि-परतत्त्व-ज्ञान-संसर्गाभावमय-तद्वैमुख्य-लब्धच्छिद्रया तन्माययावृत-स्वस्वरूपज्ञानानां तयैव सत्त्वरजस्तमोमये जडे प्रधाने रचितात्मभावानां जीवानां संसारदुःखञ्च ज्ञापितं यथोक्तमेकादशे श्रीभगवता….”

 

इन नित्यमायाबद्धजीवों के ठीक विपरीत भगवन्नित्यपार्षदगण अनादिकालीन ईशसाम्मुख्यवान् (अनादिकालीन परतत्त्वज्ञानयुक्त) होते हैं जिसका प्रमाण स्कन्दपुराण के काशीखण्ड में प्राप्त होता है – “न च्यवन्ते हि यद्भक्ता महत्यां प्रलयापदि । अतोऽच्युतोऽखिले लोके स एकः सर्वगोऽव्ययः ।।”

 

श्रीमद्भागवत १.७.४-५ की व्याख्या करते समय पुनः अचिन्त्यभेदाभेदवादाचार्य श्रील जीव गोस्वामिपाद निजकृत तत्त्वसन्दर्भ के ३२वें अनुच्छेद में आज्ञा करते है कि –

 

“अथ प्राक्प्रतिपादस्यैवाभिधेयस्य प्रयोजनस्य च स्थापकं जीवस्य स्वरूपत एव परमेश्वराद्वैलक्षण्यमपश्यदित्याह ययेति । यया – मायया सम्मोहितो जीवः स्वयं चिद्रूपत्वेन त्रिगुणात्मकाज्जडात् परोऽप्यात्मानं त्रिगुणात्मकं जडं देहादिसङ्घातं मनुते, तन्मननाकृतमनर्थं संसारव्यसनञ्चाभिपद्यते । तदेवं जीवस्य चिद्रूपत्वेऽपि, “यया सम्मोहित” इति ‘मनुत’ इति च स्वरूपभूतज्ञानशालित्त्वं व्यनक्ति, प्रकाशैकरूपस्य तेजसः स्वपरप्रकाशनशक्तिवत्, “अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः” (श्री.भ.गी. ५.१५) इति श्रीगीताभ्यः । तदेवं ‘उपाधेरेव जीवत्वं, तन्नाशस्यैव मोक्षत्वम्’ इति मतान्तरं परिहृतवान् । अत्र “यया सम्मोहितः” (श्री.भा.म.पु. १.७.५) इत्यनेन तस्या एव तत्र कर्तृत्वं, भगवतस्तत्रोदासीनत्वं मतम् । वक्ष्यते च – “विलज्जमानया यस्य स्थातुमीक्षापथेऽमुया । विमोहिता विकत्थन्ते ममाहमिति दुर्धियः । ।” (श्री.भा.म.पु. २.५.१३) इति ।

 

अत्र ‘विलज्जमानया’ इत्यनेनेदमायाति – तस्या जीवसम्मोहनं कर्म्म श्रीभागवते न रोचते इति यद्यपि सा स्वयं जानाति, तथापि – “भयं द्वितीयाभिनिवेशतः स्यादीशादपेतस्य” (श्री.भा.म.पु. ११.२.३७) इति दिशा जीवानामनादिभगवदज्ञानमयवैमुख्यमसहमाना स्वरूपावरणमस्वरूपावेशञ्च करोति । ।”

 

घ) अब प्रश्न यह खडा होता है कि अनादिपरतत्त्वज्ञानसंसंर्गाभावमयवैमुख्य से ग्रस्त नित्यबद्धजीव (आधिभौतिक काल की दृष्टि से केवल नित्यबद्ध एवं आधिभौतिक, आध्यात्मिक व आधिदैविक – इन तीनों कालों की दृष्टि से अनादिबहिर्मुख)  का उद्गम कहाँ से होता है? गौडीयवेदान्ताचार्य श्रील बलदेव विद्याभूषणपाद के वेदान्तोपरि श्रीगोविन्दभाष्यम् के अनुसार जीव कदापि ‘निर्मित’ नही होता उसका अनादिकालीन अस्तित्व रहने के कारण (तीनों कालों के परिप्रेक्ष्य में – आधिदैविक काल, आध्यात्मिक काल व आधिभौतिक काल) । अतः जब “सृज्यन्ते” शब्द का प्रयोग निम्नोद्धृत विष्णुधर्मोत्तरपुराण के वाक्य में देखा जाये, तो वहाँ उसका तात्पर्य ‘निर्माण’ न लेते जुए ‘अभिव्यक्ति’ के अर्थ में लेना है । श्री.भ.गी. के द्वितीयाध्याय के सिद्धान्तानुसार भी जीव नित्य अर्थात् अनादि व अन्त रहित सत्ता वाला है । श्रीभगवान् भी उसकी सत्ता का प्रारम्भ नहीं करते, बल्कि केवल उसके अस्तित्व को अभिव्यक्त मात्र करते है जो कि नीचे स्पष्ट है –

 

विष्णुधर्मोत्तरपुराण के श्रीवज्र व श्रीमार्कण्डेयमुनि के संवाद में –

 

“जीवस्यान्यस्य सर्गेण नरे मुक्तिमुपागते । अचिन्त्यशक्तिर्भगवान् जगत् पूर्यते सदा । । ब्रह्मणा सह मुच्यन्ते ब्रह्मलोकमुपागताः । सृज्यन्ते च महाकल्पे तद्विधाश्चापरे जनाः । ।”(प्रीतिसन्दर्भोद्धृत)

 

अर्थात् “मानव मुक्त होने पर अचिन्त्यशक्ति भगवान् अन्य (ईशविमुख) जीवों की सृष्टि करके सर्वदा मायिक जगत् को (एकपाद विभूति को) पूर्ण करते है । जो जीव ब्रह्मलोक (सत्यलोक) गमन करते हैं, वे ब्रह्मा के सहित मुक्त हो जाते हैं । महाकल्प में उस प्रकार अन्य जन समूह (नवीन ईशविमुख जीव) की सृष्टि (अभिव्यक्ति) करते हैं वें भगवान् ।”

 

निष्कर्ष यह है कि अनादिकाल से ईशवैमुख्य को प्राप्त व भगवान् श्री हरि के तनु में निद्राधीन नये नये (जो पहले कदापि मायाबद्ध न हुए हो संसृति में निपतित होकर – पर जिनका ईशवैमुख्य फिर भी अनादि हो) जीवों को संसार में प्रेषित करते रहते है भगवान् समय समय पर । यहाँ ‘ईशवैमुख्य’ व ‘मायाबद्धावस्था’ में सूक्ष्म पार्थक्य दृष्ट होता है अर्थात् मायाबद्धावस्था में ईशवैमुख्य सन्निहित (अनुस्यूत) है, पर यह आवश्यक नही कि ‘ईशवैमुख्य’ में ‘मायाबद्धावस्था’ हो, नही तो अनादीशवैमुख्यप्राप्त वें जीव जो कि भगवान् के द्वारा प्रथम बार अभिव्यक्त करवाये जाते हैं, वें तो इस संसार में आने से पूर्व कहाँ मायाबद्ध थे? पर ईश्वैमुख्य उनमें सदैव से रहा है, यहाँ तक कि उनकी अभिव्यक्ति के पूर्व उनकी सूक्ष्मावस्था में भी!

 

अतः गौडीय वैष्णव सम्प्रदाय के सभी प्रधान व प्राचीन सैद्धान्तिक ग्रन्थों में (यथा चैतन्यचरितामृत, षट्संदर्भादि) जीव को ‘अनादिबहिर्मुख’ तो कहा गया है, पर ‘अनादि-बद्ध’ नही!

 

Brahmajyoti is not marginal potency of Śrī Hari, the potent principle. Rather, brahmajyoti is one of the triple phases of the potent principle itself. Refer to Śrīmad-bhāgavatam verse ‘vadanti tat-tattva-vidas….”. In Paramātma-sandarbha of Jīva Gosvāmī, jīvas have been deemed as the expansions of the marginal potency. Brahma-jyoti is one phase of the potent principle. Whereas, taastha-jīvas are aṁśas of the taasthāśakti. Ontological difference between the two. The current ideology (regarding the origin of the jīva-tattva) as propagated by Gauḍīya Mutt / ISKCON and other neo/pseudo-Gauḍīya organizations is not in alignment with the conventional Gauḍīya Vaiṣṇava siddhānta on this issue. Śrīla Jīva Gosvāmī cites a verse from Viṣṇu-dharmottara-purāṇa in the 16th sub-section of Prīti-sandarbha to clarify the origin of jīva-tattva. All other ideologies in contravention with this are not ‘Gauḍīya’ ideology.

 

Also, another strong argument not in favour of the concocted theory asserting the origin of the jīvas from the brahma-jyoti is — that brahma-jyoti is considered to be non-variegated/non-specified because it lacks all types of qualifying adjectives or viśeanas. Śrīla Jīva Gosvāmipāda has considered nirviśea-brahma/brahma-jyoti to be ‘cinmātra-sattā‘ or only cognitive existential state of the Absolute and is thus, devoid of the growth of the sandhinī, samvit and hlādinī (the triple faculties of the internal potency or antaragā śakti) — though the attributes of sat, cit and ānanda are present in it. Therefore, it is ‘anabhivyakta-śaktika’ or that which is not manifesting any potential growth in it. Now, how can such a brahma-jyoti be considered to be the source of the jīvas? If these jīvas are considered as sprouting from brahma-jyoti, it will mean that brahma-jyoti is no more ‘anabhivyakta-śaktika’ or ‘cinmātra-sattāmayī‘ — because reservoir of multifarious and variegated jīvas can never be considered nirviśea or anabhivyakta-śaktika! Additionally, if jīvas are considered expansions of brahma-jyoti then the nirviśea-brahma cannot remain ‘kūṭastha‘ or ‘immutable’ because of reproducing the jīvas and ‘kūṭasthatva‘ or ‘immutability’ has been deemed as one of the most significant aspects of the niviśea-brahma. Growth and reproduction are not accepted in the nirviśea-brahma. Or else, it will come on par with the saviśea-brahma or the specified/variegated Absolute and the very categorical distinction existing between the two phases of Absolute will overlap!

 

 

सूत्र / Link – https://goo.gl/Af6bsm

 

  • भक्तिरसवेदान्तपीठाधीश्वरा:

 

 

 

 

 

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