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चैतन्यराद्धान्त में ब्रह्म के अद्वितीयत्त्व का अर्थघटन / The interpretation of the non-duality/singularity of Absolute/brahma in the Caitanyaite Vedānta (Mostly Hindi version)

 

 

 

गौडीय वैष्णव वेदान्त दर्शन के अनुसार ब्रह्म ही एकमात्र तत्त्व सत्ता में है हर दृष्टिकोण से व हर धरातल पर। ‘एकमेवाद्वितीयम्ब्रह्म’ — उपनिषद् भी इसकी पुष्टि करता है । जीव, जगत, व माया को ब्रह्म तत्त्व की ही अवान्तर श्रेणी (sub-category) माना गया है, क्योंकि जीव ब्रह्म की अस्वरूपभूता तटस्था क्षेत्रज्ञा जीवभूता परा शक्ति के अंश है; अविद्या त्रिगुणात्मिका माया ब्रह्म की अस्वरूपभूता बहिरंगा शक्ति है; परिदृश्यमान मायिक जड़ त्रिगुणात्मक जगत् उस माया शक्ति का कार्य/वैभव है, भगवन्नाम/धाम/रूप/नित्यपरिकर/गुण/लीला/भक्ति/श्रीमद्भागवतादि शब्दब्रह्मात्मक शास्त्र आदि तो ब्रह्म की स्वरूपभूता/आत्मभूता शक्ति के कार्य/वैभव है; — अतः चूँकि अस्वरूपभूता शक्तियाँ (तटस्था व बहिरंगा), अस्वरूपभूता शक्तियों के अंश (व्यष्टि विभिन्नांश जीव) व उनके कार्य (जड़ जगत्), स्वरूपभूता शक्ति (अन्तरंगा),  उस स्वरूपभूता शक्ति के कार्य (भगवद्धामादि) व परब्रह्म के स्वांश (रामनृसिंहादि भगवत्स्वरूप) — यें सभी परब्रह्म –

 

(चतुर्द्धा असाधारण माधुरीविशिष्ट नन्दनन्दन आनन्दकन्द गोविन्द — “कृष्णो ब्रह्मैव शाश्वतम्” – कृष्णोपनिषद् १२ + बृहद्गौतमीयतंत्रे — “तयोरैक्यं परं ब्रह्म कृष्ण इत्यभिधीयते” + श्रीमद्भागवत ७.१०.४८ + १०.१४.३२ + विष्णुपुराण ४.११.४ + रामपूर्वतापन्युपनिषद् १.६ –“इति रामपदेनासौ परम्ब्रह्माभिधीयते” को व वैकुण्ठनाथ नारायण के माहात्म्य प्रतिपादक शास्त्रवचनों को शतनामस्तोत्र व ब्रह्माण्डपुराण के इन वाक्यों के साथ सामञ्जस्य बैठा कर अर्थघटित करना होगा — “विष्णोरेकैकनामापि सर्ववेदाधिकं मतम् । तादृकनामसहस्रेण रामनामसमं स्मृतम् ।।” + सहस्रनाम्नां पुण्यं त्रिरावृत्त्या तू यत्फलम् । एकावृत्त्या तु कृष्णस्य नामैकम् तत्प्रयच्छति ।।”)

 

— से सम्बन्धित है किसी न किसी प्रकार से, अतः यें सभी ‘autonomous substance’ अर्थात् स्वतन्त्र तत्त्व न मानें जाकर, केवल एक अद्वितीय परब्रह्म की ही अवान्तर श्रेणियों (subcategories) के रूप में स्वीकृत हुए हैं । प्रमाण –

 

{जीव परम्परया अर्थात् परोक्षरूप से ब्रह्म के विभिन्नांश है — श्रीमद्भगवद्गीता १५.७ + ७.५ + ब्रह्मसूत्र का अंशाधिकरणम् २.२.४१-४३ + वराहपुराण – “स्वांशश्चाथ विभिन्नांश इति द्वेधायमिष्यते । अंशिनो यत्तु सामर्थ्यम् यत्स्वरूपं यथा स्थितिः । तदेव नाणुमात्रो’पि भेदः स्वांशांशिनो: क्वचित् । विभिन्नांशो’ल्पशक्तिः स्यादत् किञ्चित्सादृश्यमात्रयुक् । विभन्नांशस्तु जीवः स्यादिति ।” + श्रीमद्भागवत १.७.४-५ + विष्णुपुराण –“विष्णुशक्तिः परा प्रोक्ता क्षेत्रज्ञाख्या तथा’परा । अविद्या कर्मसंज्ञान्या तृतीया शक्तिरिष्यते ।।”) व वेदान्तदर्शन में शक्ति तथा शक्तिमान् के मध्य आत्यन्तिक द्वैत निषिद्ध है क्योंकि तटस्था व बहिरंगादि शक्तियाँ स्वरूपतः ब्रह्म से पृथक् सत्तावती होने के बावजूद भी (श्रीमद्भगवद्गीता ७.४ में प्रयुक्त “..मे भिन्ना प्रकृति…” पदसमूह व श्रीमद्भगवद्गीता ९.१० + ७.१४ ) आधार/आधेय सम्बन्ध के कारण ब्रह्म से सम्बन्धिता हैं (श्रीमद्भगवद्गीता ७.७ — आश्रित/आश्रय) व इसी कारण से उन्हें ब्रह्म से स्वतन्त्र कोई पृथक् तत्त्व नहीं माना जा सकता है। जब स्वरूपतः ब्रह्म से भिन्ना होने पर भी वें शक्तियाँ ब्रह्म से पृथक् द्वितीय/तृतीय तत्त्व नहीं, तब तो उनका ब्रह्म से स्वागत, सजातीय व विजातीय भेद भी निरस्त/अपास्त हुआ न जो! क्योंकि ये भेदत्रय तो वहीँ लागु होते है न कि जहाँ पर कोई तत्त्व ब्रह्म तत्त्व से पृथक् द्वितीय तत्त्व हों (सजातीय व विजातीय भेदों के संर्दभ में) या फिर ब्रह्म के स्वरूप के भीतर होकर ब्रह्म से भिन्नता को प्राप्त हों (स्वगतभेद के सन्दर्भ में) ! पर यहाँ न तो ब्रह्मस्वरूप से ‘बहिरंगा’ शक्ति माया अविद्या और न ही ब्रह्मस्वरूप से ‘तटस्था’ शक्ति जीवभूता क्षेत्रज्ञा — उस ब्रह्म से पृथक् कोई स्वतन्त्र द्वितीय/तृतीय तत्त्व है (ब्रह्मरूपी शक्तिमत् वस्तु की अस्वरूपभूता/स्वरूप से विभिन्ना शक्तियाँ होने के कारण) । दूसरी ओर ह्लादिनी (क्रिया/आनन्द), संधिनी (सत्//सत्य/बल) व संविदाख्या (चित्/ज्ञान) — यें तीन जो कि परब्रह्म के स्वरूप से अभिन्ना ‘अन्तरंगा/स्वरूपभूता/आत्मभूता’ स्वरूपशक्ति की वृत्तियाँ है (विष्णुपुराण — “ह्लादिनीसन्धिनीसंवित्त्वय्येका सर्वसंस्थितौ । ह्लादतापकरीमिश्रा त्वयि नो गुणवर्ज्जिते ।।” + श्वेताश्वतर श्रुति ६.८ का अंश — “..परास्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते स्वाभाविकी ज्ञानबलक्रिया च” + तैत्तिरीय श्रुति २.१.१ “..सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म..”) — वें तो परब्रह्म के स्वरूप से सर्वथा अभिन्ना होने के बावजूद भी उनमेँ व परब्रह्म में जो समुद्र व समुद्र की तरंगो की भाँति किञ्चित् भेद दिखायी देता है, वह परब्रह्म के स्वरूप से उनका भेद न माना जाकर ‘विशेष’ माना जाएगा, क्योंकि जहाँ स्वरूप में अभेद होने पर भी भेद सरीखी प्रतीति होती हो, उसे नव्यन्यायदर्शनादियों में ‘भेद’ माना ही नहीं गया है । जब वो ब्रह्म के स्वरूप के भीतर का भेद ही नहीं, तब तो ब्रह्म में स्वगतभेद भी निरस्त हो गया न! दूसरी ओर, अनेकानेक भगवत्स्वरूपों में तथा परतत्त्व की त्रिविधा अवस्थाओं में (यथा रामनृसिंहादियों में व ब्रह्म, परमात्मा + भगवान् — इन तीनों में) — भी उन भगवत्स्वरूपों तथा उन त्रिविधा अवस्थाओं का — मूल भगवत्स्वरूप (स्वयं भगवान् व्रजेन्द्रनन्दन श्यामसुन्दर — श्रीमद्भागवत १.३.२८ व गोपालतापन्युपनिषद् १.३) व मूल अवस्था (‘अद्वयज्ञानतत्त्व’ — श्रीमद्भागवत ११.२.११) से जो स्वरूपगत अन्तर प्रतीत होता है, वह भी केवल ‘विशेष’ मात्र है, वास्तविक अन्तर/भेद/पार्थक्य नहीं — उन भगवत्स्वरूपों को अद्वयज्ञानतत्त्व स्वयं भगवान् नन्दनन्दन का ‘स्वांश’ माने जाने के कारण! वैकुण्ठ, गोलोक, व्रज, अयोध्या, साकेतादि भगवद्धाम, भगवन्नाम, भगवद्गुण आदि भी तो इसी आत्मभूता स्वरूपशक्तिभूता योगमाया के वैभव/कार्य/परिणाम होने के कारण वें भी तो परब्रह्म से केवल ‘विशेष’ को प्राप्त है, स्वरूपगत अन्तर/स्वगतभेद को नहीं — श्रीमद्भागवत १०.१४.१४, १०.८५.३१, १.३.२६ , १.२.२६ + श्रीमद्भगवद्गीता ४.६ में प्रयुक्त ‘…आत्ममायया…’ पद}

 

निष्कर्ष –

 

आद्य शंकराचार्य के मायासम्पृक्त केवलाद्वैतवाद में जीव स्वरूपतः ब्रह्म से अभिन्न है । हमारे यहाँ स्वरूपतः ब्रह्म से भिन्न है । अद्वैत में जगत् स्वरूपतः ब्रह्म का विवर्त्त है । हमारे यहाँ जगत् ब्रह्म की बहिरंगा माया शक्ति का परिणाम/कार्य है । अद्वैत में माया/अविद्या सदसद्विलक्षण अनिर्वचनीया व ब्रह्म से उत्पन्न उसकी उपाधि है । हमारे यहाँ त्रिगुणात्मिका माया ब्रह्म की उपाधि न होकर उसके स्वरूप से भिन्न उसकी बहिरंगा शक्ति है । अद्वैत में समस्त अप्राकृत व प्राकृत वैविध्यता से रहित ब्रह्म निरूपाधिक है । हमारे यहाँ निखिलप्राकृतगुणवर्ज्जित व सर्वाप्राकृतगुणगणमण्डित श्यामसुन्दर निरूपधिक ब्रह्म है । उनके यहाँ त्रिगुणात्मिका माया की सात्त्विक उपाधि विशिष्ट रामकृष्णादि साकार, सविशेष, सगुण ईश्वर के रूप — निरूपाधिक ब्रह्म नहीं है । जब कि हमारे यहाँ त्रिगुणात्मिका माया की समस्त उपाधियों से अतीत/परे व निर्गुण/अप्राकृत/त्रिगुणातीत/मायातीत परब्रह्म की सर्वोच्च अवस्था ही वेणुनिनादपरायण राधासंश्लिष्ट मदनमोहन है ! प्रमाण – श्रीमद्भगवद्गीता १४.२६ व श्रीमद्भागवत १०.८८.३-५ । उनके यहाँ निर्गुण का तात्पर्य स्वस्वरूप में समस्त प्राकृत व अप्राकृत गुणवाली से रहित होना है । हमारे यहाँ स्वस्वरूप में केवल समस्त प्राकृत गुणावली से शून्य होना है । उनके यहाँ सगुण का तात्पर्य समस्त प्राकृत व अप्राकृत गुणों से युक्त होना है — ब्रह्म के पक्ष में । हमारे यहाँ सगुण का अर्थ केवल लौकिक गुणों से युक्त होना है — प्राकृत पदार्थो के पक्ष में व अप्राकृत गुणों से मण्डित होना है ब्रह्म के पक्ष में । इसी प्रकार निराकार, निर्विशेष आदि शब्दों के अर्थों को जानना होगा। हमारी परिभाषा की स्पष्ट पुष्टि शास्त्र करते हैं — “सत्त्वादयो न सन्तीशे यत्र च प्राकृता गुणाः” — विष्णुपुराण १.९.४४ + “गुणांश्च दोषांश्च मुने व्यतीत समस्तकल्याणगुणात्मको हि” । + पद्मपुराण — “यो ‘सौ निर्गुण इत्युक्तः शास्त्रेषु जगदीश्वरः । प्राकृतैर्हेयसंयुक्तैर्हीनत्वमुच्यते इति ।।”। अतः परब्रह्म की ब्रह्मज्योति नामक अव्यक्तशक्तिक चिन्मात्रसतामयी अवस्था को (जिन्हें अद्वैती निरूपाधिक निर्गुण निराकार निरञ्जन निर्विशेष ब्रह्म कहते है) गौडीय दार्शनिकों ने सविशेष परब्रह्म के ऊपर आश्रित माना है श्रीमद्भगवद्गीता १४.२७ के अकाट्य साक्ष्य के आधार पर ।

 

हमारे यहाँ ब्रह्म किसी भी प्रकार की उपाधि से सर्वथा सम्बन्धरहित है । यहाँ तक कि आत्मभूता योगमाया शक्ति के द्वारा कृत परब्रह्म का नित्य/नैमित्तिक ज्ञानावरण (रस व लीला के निष्पादन में वैविध्य हेतु) उस परब्रह्म की उपाधि नहीं माना गया है उस योगमाया शक्ति का ब्रह्म की आत्मभूता होने के कारण (त्रिगुणात्मिका माया की तरह विशुद्धसत्त्वात्मिका योगमाया कोई ब्रह्मस्वरूपबहिर्भूता थोड़ी न है — प्रमाण — १०.२९.१ + १०.१४.२१ + १०.१३.३७) ।

 

अतः तत्त्वतः (तत्त्व की दृष्टि में) केवल एक ही तत्त्व ‘परब्रह्म’ की सत्ता यहाँ स्वीकारी गयी है। अन्य जगज्जीवादि उस परब्रह्मात्मक तत्त्व से सम्बन्धित होने के कारण पृथक् तत्त्व नहीं है । इस परिप्रेक्ष्य में ब्रह्म के साथ जगजजीवादियों की एकता/अभेद सिद्ध हुई एक ही ब्रह्मतत्त्व से वें जुड़े होने के कारण। पर स्वरूप के परिप्रेक्ष्य में जगज्जीवादि ब्रह्म से नित्य पृथक् सत्तावान् होने के कारण उनका ब्रह्म से भेद भी सिद्ध हुआ। ब्रह्म के साथ जगज्जीवादियों के ऐसे निराले सम्बन्ध में ‘विशेष’ तो लग सकता नहीं, उनकी ब्रह्म से स्वरूप/सत्तागता पृथकता होने के कारण । अतः अचिन्त्यभेदाभेदवाद की स्थापना हुई ब्रह्म की विरूद्धधर्माश्रयिता को ध्यान में रखते हुए। तत्त्व की दृष्टि से ब्रह्म के साथ अभेद। स्वरूप  व सत्ता की दृष्टि से ब्रह्म के साथ भेद। गुणों की दृष्टि से जीवों का ब्रह्म के आंशिक गुणों से युक्त होना ।

 

जबकि आत्मभूता स्वरूपशक्ति व उसके कार्यस्वरूप चिद्वैभव का ब्रह्म के साथ तत्त्व व स्वरूप/सत्ता — दोनों दृष्टियों से अभेद है। व उनके बीच ‘विशेष’ सम्बन्ध की व्याप्ति है ।

 

गौडीयप्रस्थानत्रयीभाष्यकार श्रील बलदेव विद्याभूषणपाद ने गोविन्दभाष्य के प्रारम्भ में जो पाँच अलग अलग तत्त्व प्रतिपादित किये हैं, उन्हें केवल स्वरूप/सत्तागत पार्थक्य से वैसा वहाँ बताया गया है । अन्यथा, श्रीबलदेव भी श्रील जीव गोस्वामिपाद के भागवतसंदर्भोंद्धृत मत का (ब्रह्म की केवल एक तत्त्वता — उसके अतिरिक्त अन्य कोई तत्त्व नहीं — उसके अतिरिक्त अन्य पदार्थ केवल उस ब्रह्म से सम्बन्धित है — उससे पृथक् स्वतन्त्र तत्त्व नहीं) ही सर्वात्मभावेन अनुसरण किये है ।

 

‘नेह नानास्ति किञ्चन’ व ‘य यह नानेव पश्यति’ — जैसे द्वैत को निरस्त करनेवाले औपनिषदिक/श्रौत वाक्य जगज्जीवादियों के ब्रह्म के साथ होने वाले स्वरूपगत द्वैत का निषेध नहीं करते है । वें तो केवल जगज्जीवादियों के ब्रह्मतत्त्वसम्बन्धीत्व (जगत् व जीवों का ब्रह्मतत्त्व के सम्बन्धी के रूप में सत्तायुक्त होना; पृथक् तत्त्व के रूप में नहीं) के कारण उन जगज्जीवादियों की ब्रह्मस्वतन्त्रतत्त्वता (जगत् व जीवों का ब्रह्म से पृथक्/स्वतंत्र तत्त्व होना) का निराकरण मात्र करतें है ।

 

“अहं ब्रह्मास्मि” (“मै वही ब्रह्म हूँ”) व  “तत्त्वमसि” (“तुम वहीं ब्रह्म हो”) जैसे औपनिषदिक वाक्यों के आशय को उन्हीं उपनिषदों में अन्यत्र आये “द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया” (“दो पक्षी – जीवात्मा व परमात्मा रूपी – सखा की तरह पास में बैठे है”) व “सोऽश्नुते सर्वान् कामान् सह ब्रह्मणा विपश्चिता” (“मुक्त जीव अपनी समस्त कामनाओं को पूर्ण कर्ता है ब्रह्म के साथ”) + “ब्रह्मविद्ब्रह्माप्नोति” (“ब्रह्म को जानने वाला ही ब्रह्म को प्राप्त कर सकता है”) — जैसे जीव-ब्रह्मस्वरूपगत द्वैतपरक वाक्यों के साथ सामञ्जस्य बैठाकर लेना होगा । एकाकी रूप से नहीं । अन्यथा म्लेच्छप्रिय अर्धकुक्कुटीन्याय घटित होगा । अद्वैतवेदान्त की तरह अचिन्त्यभेदाभेदवादी वेदान्त में रामकृष्णविष्ण्वादि भगवत्स्वरूप कोई प्रतीकात्मक नही है परब्रह्म के! बल्कि साक्षात् परब्रह्म है! अतः प्रतीकोपासना यहाँ निरस्ता है!

 

The factual import of the Upaniṣadic assertions such as “aha brahmāsmi” (“I am that Absolute”) and “tat tvam asi” (“Thou art That”) needs to be derived by taking into account other parallel found Upaniṣadic assertions such as “dvā supraṇā sayujā sakhāyā” (“two birds – the living being and the God – are sitting in mutual vicinity as friends”) and “so ‘śnute sarvān kāmān saha brahmaṇā vipaścitā” (“the liberated living jīva fulfils all his desires in the accompaniment of the Absolute”) + “brahma-vid brahma āpnoti” (“the knower of Absolute attains Him”) etc. – which are the propositions supporting pro-Dvaita doctrine. Such interpretation should not be made one-sided. Or else, the logic of half chicken very dear to the mlecchas shall prevail. Unlike Advaita-vedānta, the Godly forms such as Rāma, Kṛṣṇa and Viṣṇu etc. are not mere representative emblems of the Absolute Almighty! But, are rather the very Absolute Almighty!

 

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Link / सूत्रम् — https://goo.gl/qfhoHz

 

— भक्तिरसवेदान्तपीठाधीश्वरा: गुरुपादाचार्या: रामकृष्णस्वामिन: आम्नायवाचस्पतय: अचिन्त्यभेदाभेदवेदान्तवादिन: गौडीयवैष्णवसाम्प्रदायिन:  / — Bhaktirasavedāntapīṭhādhīśvara Gurupādācārya Rāmakṛṣṇa Svāmī Āmnāya-vācaspati Acintya-bheda-abheda-vedāntī Gauḍīya-vaiṣṇava-sampradāyī

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