क्या सद्गुरु की प्राप्ति करना अत्यावश्यक है या वैकल्पिक है – परब्रह्म (श्रीभगवान्) व शब्दब्रह्म (वेदादिशास्त्र) की समुपलब्धि व समधिगम के लिये?

 

 

१) “यस्य देवे पराभक्ति: यथा देवे तथा गुरौ । तस्यैते कथिता ह्यर्था: प्रकाशन्ते महात्मनः।।“  — श्वेताश्वतर उपनिषद् ६.२३ । — अर्थात् जिसकी इष्टदेव में पराभक्ति (साध्या प्रेमभक्ति) है तथा वैसी ही पराभक्ति श्रीगुरु के प्रति है (श्रीमद्भागवतीय ११.१७.२७ – “आचार्यं मां विजानीयान्नावमन्येत कर्हिचित् । न मर्त्त्यबुद्ध्यासूयेत सर्वदेवमयो गुरुः ।।“ — के आधार पर), ऐसे महात्मा के प्रति कहे गये (गुरु/आचार्य के द्वारा) शास्त्रों के अर्थ स्वयं को प्रकाशित करते है (वेदादि शास्त्र स्वयंप्रकाश व स्वतःप्रामाण्यवान् है – उन्हें मर्त्यधर्मा प्राणी की बुद्धि प्रकाशित नही कर सकती । बल्कि वे स्वयं ही अपने ‘आशय/अभिप्राय/मर्मार्थ’ को प्राकाशित करते है – {भले ही श्रुतियों के शब्दों का बाह्य अर्थ प्राणी अपनी बुद्धि व व्याकरणादि शास्त्रों के अध्ययन से क्यों ही न प्राप्त कर ले – क्योंकि अन्ततोगत्त्वा वेदादि शास्त्र परतःप्रकाश व परतःप्रामाण्यवन्त न ठहरते है न जो – व निजबुद्धिप्रयास से उन स्वतःप्रकाशस्वरूप शास्त्रों का मर्मार्थ – (शब्दार्थ की बात नही हो रही है) जान पाना तो उन शास्त्रों को परतःप्रकाश बना देगा न जो ! (यह बात अलग है कि भगवत्कृपा व आचार्यकृपा से ओतप्रोता मानवी बुद्धि उन मर्मार्थो को जान पाये श्रीमद्भगवद्गीता १०.१०. के आधार पर यथा – “ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते” – इससे शब्दब्रह्मात्मक शास्त्र परतःसिद्ध नही हो जाता क्योंकि अन्ततोगत्त्वा शास्त्रों के अर्थो की अवबोधिका वैसी मति/बुद्धि/प्रज्ञा भी तो भगवत्कृपा/गुरुकृपामयी ही है न जो!)}”

 

२) मुण्डकोपनिषद् १.२.१२ – “तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत् ।समित्पाणिः श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम् ।।“ अर्थात् “उस परब्रह्म के विज्ञानार्थ (उसकी अपरोक्षानुभूति – बाह्य व अन्तः साक्षात्कारात्मक रूप से प्राप्त करने के लिये) वह (साधक) हाथ में यज्ञीय समिधा लिये (विनम्र व पवित्र भाव से) श्रोत्रिय तथा ब्रह्मनिष्ठ (श्रीमद्भगवद्गीता ४.३४ में भी यही उल्ल्लिखित है – “तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया । उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्नानिस्तत्त्वदर्शिनः ।।“ व श्रीमद्भागवत ११.३.२१ में भी कथित है कि – “तस्माद्गुरुं प्रपद्येत जिज्ञासुः श्रेय उत्तमम् । शाब्दे परे च निष्णातं ब्रह्मण्युपशमाश्रयम् ।।“) गुरु की सन्निधि में अभिगमन करेङ्गे (जायेङ्गे) ।“

 

३) पुनः छान्दोग्योपनिषद् ६.१४.२ में कथित है कि – “आचार्यवान् पुरुषो वेद” – अर्थात् “आचार्य (जिसने यज्ञोपवीत संस्कार के पश्चात् कर्मविद्यात्मक वेदों का अध्यापन करवाया हो वैसा गृहस्थाश्रमी विप्रकुलप्रसूत गुरु + जिसने वैराग्यवान् मुमुक्षुओं को अध्यात्म/ब्रह्मविद्यात्मक वेदों के वेदान्त अंश का अध्यापन करवा हो वैसा विरक्त/सन्न्यासी गुरु) से युक्त (उससे दीक्षा व शिक्षा को प्राप्त) व्यक्ति ही परब्रह्म (पुरुष) को जान सकता (उसका साक्षात्कार कर सकता) है ।“

 

निष्कर्ष –

 

बिना तत्वदर्शी सद्गुरु की शरणागति के शास्त्रों के मर्मार्थ व परब्रह्म की प्राप्ति असम्भाविता है । सदाचार्य/सद्गुरु शब्दब्रह्म (शास्त्र) में निष्णात (श्री.भा.म.पु. ११.३.२१ द्रष्टव्य है) होने के कारण शिष्य के अन्तःकरण में उत्पन्न होने वाली समस्त प्रकार की अध्यात्मविरोधिनी शङ्काओ के छेदन/अपनोदन में समर्थ होता है, व वह सद्गुरु परब्रह्म में निष्णात (भगवदनुभूति सम्पन्न) होने के कारण शिष्य के साधक जीवन को सिद्धि तक पहुँचा देता है निजानुभूति से उसके साधक जीवन को निर्देशित करते हुए – अतः गुरुवरण की अत्यन्त अपरिहार्यता (अनिवार्यता) है ।

 

Link / सूत्र — https://goo.gl/8peHkq

 

  • भक्तिरसवेदान्तपीठाधीश्वरा: आचार्यश्री: गुरुपादा:

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