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श्रीभक्तिसिद्धान्तसरस्वतिपाद के द्वारा किया गया अनुभाष्य का अंश चैतन्य-चरितामृत के उपर व उसका निम्नोद्धृत अनुवादांश भक्तिरसवेदान्तपीठाधीश्वर के द्वारा कृत –

 

अरे (श्री वृषभानुराजनन्दिनी का अपने रमण के प्रति किया गया मधुरसम्बोधन) हे दीनदयार्द्र, (कृष्णविरहकातरा निजजनस्वरूपा दीना गोपीयो के सम्बन्ध में  जो दया उन गोपीयों के विप्रलम्भ/विरह भाव की अपनोदनकारीणी/दूर हटाने वाली है – वैसी श्रीकृष्ण के साक्षात् रूप, गुण, लीलादियो की स्फूर्त्ति का विधान करने वाली वह कृपा, उस कृपा के द्वारा आर्द्र अर्थात् रसयुक्त स्निग्ध कोमल हृदय – अर्थात् उत्कट/प्रचण्ड विरहाग्नि से तप्त व आर्त्त हुई गोपीयों पर कृपा परायण कोमल चित्त वाले कृष्ण) हे नाथ, (मेरी जैसी एकमात्र गोपी के प्रियतम), हे मथुरानाथ (मथुरावासीयों के ईश्वर, अर्थात् हे कृष्ण, यदि तुम्हारे भीतर गोपीजनवल्लभ होने का अभिमान होता तो तुम हम गोपीयों को विस्मृत कर/भुला कर कैसे ऐश्वर्यवासना के द्वारा अभिभूत होकर मथुरा की साधारणी रति – कुब्जा के हृदय में जो निकृष्टतम स्तर की रति है वह – से युक्त कान्ता त्रिवक्रा कुब्जा के आमोदार्थ/उसकी प्रसन्नता के लिये कैसे वहाँ/उस मथुरा में निवास करते होते? अतः तुम गोपीयों पर कृपा रहित कठिन हृदय वाले हो ), कब तुम (विरहकातरस्वरूपा गोपीयों के भाव के आश्रित मेरे/माधवेन्द्र पुरी के द्वारा) देखे जाओगे? हे दयित, (हे प्राणों से भी अधिक प्रियतम), तुम्हारा दर्शन पाने के लिये आतुर हृदय (तुम्हारे दर्शन के लिये कातर/व्याकुल हृदय जो कि उद्घूर्णा/चित्रजल्पादि भावों से युक्त गोपीजनों का हृदय है), भ्रम को प्राप्त हो रहा है (उन्मादित हो रहा है), क्या करुँ (बताओ, हे कृष्ण)।

 

सूत्र / Link — https://goo.gl/acJISY

  • भक्तिरसवेदान्तपीठाधीश्वरा:

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