श्रेयस्कारी पर कटु सत्य बोलना चाहिये के नही – परमार्थ में? / Should the ultimately beneficial, but apparently unpleasing truth be spoken or not – in spirituality? (Only Hindi version).

 

 

 

शास्त्रों का यह वाक्य कि ‘सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात् न ब्रूयात् सत्यमप्रियम्’ (मनुस्मृति ४.१३८) — अर्थात् ‘ऐसा सत्य बोलो जो कर्ण व मानस को प्रिय हो व ऐसा न बोलो जो इन दोनों को न भाता हो’ – केवल ‘प्रेय’ के पथ का अनुसरण करने वाले प्रवृत्तिमार्गीयों के लिए विहित हुआ है। न कि ‘श्रेय’ के पथ पर गमन करने वाले निवृत्तिमार्गीयों के लिए! क्योंकि श्रीविष्णुमहापुराण ३.१२.४४ का अधिक बल युक्त वाक्य (व्याकरण शास्त्र से प्रारम्भ करते हुए हर श्रेणी के शास्त्रों में वाक्यो के तुल्य बलाबल को संज्ञान में रखने का विधान है अर्थघटन करते समय) उस पूर्ववर्त्ती वाक्य का निषेध कर देता है ‘निवृत्तिपथपथिकों’ के लिए, यथा –

 

“श्रेयस्तत्र हितं वाक्यम्/वाच्यं यद्यप्यत्यन्तमप्रियम्” अर्थात् ‘वह वाक्य वास्तव में श्रेयप्रद वा कल्याणकारी कहा जाएगा, जो यद्यपि भले ही कर्ण/मन इत्यादियों के लिए अप्रिय हो, पर जो प्राणीयों के हित में हो ।’

 

इस पारमार्थिकी नीति का अनुसरण भरत ने निज माता कैकेयी का त्याग करके किया, बलि ने गुरु शुक्राचार्य का त्याग करके व प्रह्लाद ने पिता हिरण्यकशिपु का वर्ज्जन किया — जबकि वेदों का कर्ममविद्यात्मक अंश स्पष्ट रूप से उद्घोषित करता है कि — “आचार्य देवो भव, पितृ देवो भव, मातृ देवो भव” – तथापि । अतः श्रीमद्भागवत जो कि कर्मविद्यात्मक शास्त्र न होकर विशुद्ध प्रेमशास्त्र (ब्रह्मविद्यात्मक / आत्यन्तिककैवल्यमयनिष्कैतवपञ्चमपुरुषार्थप्रेमप्रतिपादक) है, उद्घोषित करता है ५.५.१८ में कि — “गुरुर्न सा स्यात् स्वजनो न सा स्यात् पिता न सा स्याज्जननी न सा स्यात् । दैवं न तत्स्यान्न पतिश्च सा स्यान्न मोचयेद्यः समुपेत मृत्युम् ।।” — अर्थात् “उपनयनकर्त्ता व वेदों का अध्यापक (मनुस्मृति के अनुसार) होने के कारण जो आचार्य अथवा गुरु है वह, जो रक्त का सम्बन्धी है वह, जन्मदात्री माँ है वह, जो इष्टदेव है वह, व जो विवाहित पति है वह — यें सभी गुरु, स्वजन, पिता, जननी, देव व पति आदि कहलाने योग्य नहीं — यदि वें सभी अपने आश्रितों को (यथा शिष्यों, पुत्रों, सम्बन्धियों, उपासकों व पत्नियों को)  संसार रूपी भय (मृत्यु) से मुक्त न करा सकते हों तब ।”

 

तभी तो श्रीमद्भागवत २.३.२० स्पष्टरूपेण कहता है कि — “बिले बतोरुक्रमविक्रमान ये न श्रृण्वतः कर्णपुटे नरस्य । जिह्वासती दार्दुरिकेव सूत न चोपगायत्युरुगायगाथाः ।।” + १.५.१० — “न यद्वचश्चित्रपदं हरेर्यशो जगत्पवित्रं प्रगृणीत कर्हिचित् । तद्वायसं तीर्थमुशन्ति मानसा न यत्र हंसा निरमन्त्युशिक्षयाः ।।” + १.५.११ — “तद्वागविसर्गो जनताघविप्लवो यस्मिन्प्रतिश्लोकमबद्धवत्यपि । नामान्यनन्तस्य यशो अंकितानि यछ्रण्वन्ति गायन्ति गृणन्ति साधवः ।।”

 

अतः कठोपनिषद् १.२.२ में भी ‘परमार्थस्वरूप श्रेय’ तथा ‘लोकानुभूतिस्वरूप प्रेय’ — इन दोंनो में स्पष्ट अन्तर बताते हुए परमार्थस्वरूप श्रेयात्मक पथ की सर्ववरीयता सिद्ध की है यथा –

 

“श्रेयश्च प्रेयश्च मनुष्यमेतस्तौ सम्परीत्य विविनक्ति धीरः । श्रेयो हि धीरो अभिप्रेयसो वृणीते प्रेयो मन्दो योगक्षेमाद्वृणीते ।।” — उत्तम मनुष्य श्रेय का चयन करता है और अधम मनुष्य प्रेय का ।

 

अतिरिक्त स्पष्टीकरण —

लोकानुभूतिस्वरूप प्रेय वह मार्ग है कि जिसका पर्यवसान इन्द्रियतृप्ति में होता है। वैषयिक भोग का या संसार में प्रवृत्ति का मार्ग ही प्रेय कहलाता है। धर्म, अर्थ तथा काम रूपी तीन निकृष्ट पुरुषार्थ प्रेय है। मोक्ष व भगवत्प्रेम रूपी चतुर्थ व पञ्चम पुरुषार्थ ही श्रेय है। प्रेय का लक्षण वह है कि वह प्रारम्भ में आर स्थूल दृष्टि से आनंदप्रद लगता है, पर परिणाम में अहित करने वाला होता है जैसे की खुजली को खुजाना प्रारम्भ में तुष्टिकर होता है, पर अन्ततोगत्त्वा दुःखदायी सिद्ध होता है। प्रमाण — श्रीमद्भागवत ७.९.४५ — “यनमैथुनादिगृहमेधिसुखं ही तुच्छम् कण्डूयनेन करयोरिव दुःखदुःखम् । तृप्यन्ति नेह कृपणा बहुदुःखभाजः कण्डूतिवन्मनसिजम् विषहेत धीरः ।।”

जबकि दूसरी ऒर, परमार्थपथ के अर्थात् श्रेय के सुख को प्राप्त करने के लिए तपस्या (भक्तिमार्ग की) अपेक्षिता है। प्रारम्भ में यह मार्ग कटु प्रतीत होता है जैसे कि पीलिये के रोग से ग्रस्त व्यक्ति को प्रारम्भ में शर्करा का सेवन कड़वा लगता है। पर जैसे जैसे वह उत्तरोत्तर अधिकाधिक मात्रा में शर्करा का सेवन करता जाता है, त्यों त्यों उसी शर्करा के सेवन से उसका पीलिया समाप्त होने पर वह शर्करा की मिष्टता की अनुभूति कर सकता है। प्रमाण — गौडीयवैष्णवाचार्य श्रील रूप गोस्वामिपाद के द्वारा रचित श्रीउपदेशामृतैकादशकम् का सप्तम पद्य (अविद्या/माया ही पीलिया रूपी बद्धावस्था की कारिणी है व भगवद्भक्ति शर्करा सदृश है) – “स्यात्कृष्णनामचरितादिसिताप्यविद्यापित्तोपतप्तरसनस्य न रोचिका नु । किन्त्वादरादनुदिनं खलु शैव जुष्टा स्वाद्वी क्रमाद्भवति तद्गतमूलहन्त्री ।।”

 

सूत्र / Link — https://goo.gl/QirMa7

 

— भक्तिरसवेदान्तपीठाधीश्वर आचार्य श्री गुरुपाद

(आणन्द, गुजरात, भारत)

 

5 thoughts on “श्रेयस्कारी पर कटु सत्य बोलना चाहिये के नही – परमार्थ में? / Should the ultimately beneficial, but apparently unpleasing truth be spoken or not – in spirituality? (Only Hindi version).

  1. Our position is as follows — We follow the dictum of Sri-visnu-mahapurana 3.12.44 (श्रेयस्तत्र हितं वाक्यं यद्यप्यत्यन्तमप्रियम्) for all matters concerning Veda and paramartha because, on the strength of the Kathopanishad mantram “श्रेयश्च प्रेयश्च….विविनक्ति धीरः”, ‘shreyah’ overrules the ‘preyah’. Whereas, the Manu-smrti 4.138 statement (‘सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात् न ब्रूयात् सत्यमप्रियम्’) is, only, applicable to ‘loka’ and neither to ‘veda’, nor to ‘paramartha’.

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  2. Saara-graahitva (the tendency of plucking out essence) is a noteworthy attribute to have. However, according to the mathematical formula +1-1=0. But, in the case of the damage done by the Vedic path ‘toddlers’ with unorthodox spirit – which is quite more emphatic than something good/auspicious brought about by them, the mathematical formula of +1-2=-1 will be more appropriate. Hope your esteemed self will understand our indication.

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