अति कटु सत्य, अत्यन्त आवश्यक तथा अभूत्पूर्व विश्लेषण (Only Hindi version) –

 

 

 

पिछली शताब्दी (२०वीं) से एक बडा परिवर्तन सनातनधर्म के आध्यात्मिक गगन पर देखने को मिल रहा है । क्यों इतने सारे धार्मिक/आध्यात्मिक/सांस्कृतिक आयोजनों के होने के बावजूद भी अध्यात्म/धर्म का स्तर लगातार गिरता जा रहा है? क्या है वह कारण? चलिये आईये, देखते है –

 

पिछले १०० वर्षों से चली आ रही स्थिति —

 

१) कथावाचक पण्डितगण –

 

९०% व्यावसायिक व सङ्गीतमेह्फ़िलो के गैवैयो जैसे तथा तत्त्वज्ञान वाले अंश को छोड कर केवल मँहगा मनोरञ्जन कराने  वाले कहानीयों के प्रवक्ता । कथनी व करनी के साम्य से रहित जीवन वाले । मूल श्रीमद्भागवत/रामायण शास्त्रों का अध्ययन न करते हुए केवल उनके अनुवादों पर निर्भर रहने वाले या फिर मूलग्रन्थों को कभी भी न पढते हुए बाजार में उपलब्ध आज कल के कथावाचकों के प्रवचनों के संग्रह से निर्मित्त ‘साप्ताहिकी कथा की पद्धतियों’ को बताने वाली बहुत कम पन्नों वाली पुस्तकों को ही पढकर कथावाचक बनने वाले (जिनके पक्ष में श्रीमद्भागवत/रामायण आदि के उपर प्राचीन संस्कृत भाष्यकारों की टीकाओ को पढने का तो सवाल ही खडा नही होता – न ही उन ‘बेचारों’ के पास वैसी समझने की सामर्थ्य है – असली विद्वानों की तुलना में – मुर्गे जैसे होने के कारण) । भारतीय राजनेताओं की ही तरह आगामी १० पीढीयों के लिये ‘माल’ इकठ्ठा करने वाले व जैसे कथा के अनधिकारी स्वर्गस्थदेवताओं ने स्वर्गीय अमृत के बदले में भागवती कथा के विनिमय (अदला-बदली) का प्रस्ताव रखा था, उनसे भी गठीया सोच वाले कथावाचक भागवती कथा के बदले चन्द कागज से बनी धनराशि का विनिमय करने के लिये आतुर टर्र टर्र करने वाले मेढकों के समान निर्लज्ज । समस्त राग/द्वेषादि दुर्गुणों के भण्डार व तपस्या/साधना/वैराग्य/स्वाध्याय रहित जीवन शैली/दिनचर्या वाले ।

 

२) गुरुकुलों में निवास करने वाले विप्रकुल के वटु/विद्यार्थी/ब्रह्मचारी/छात्र –

 

९०% ऐसे ब्राह्मण बालक जो कि आधुनिक काल में चल रही पाश्चात्त्य शिक्षा प्रणाली से ओतप्रोत विद्या के संस्थानो में जाने के योग्य बौद्धिक रूप से योग्य नही समझे जाते {बचपन से ही मन्दबुद्धि मुर्गे जैसे होने के कारण, उन्हे उनके स्वजन/परिजन – ‘वह हमारा बेटा यह नही (doctor/चिकित्सक, engineer/अभियन्ता आदि), तो कम से कम कुछ तो सही (राम जी मंदिर का पुजारी या सस्ता कथावाचक)}’ – इस मानसिकता से ग्रस्त होकर ऐसे प्राच्यविद्या का अध्यापन कराने वाले विद्यालयो/गुरुकुलो में छोड आते है – कि जहाँ प्रायः खानापूर्ती के लिये ही कर्मकाण्ड, व्याकरण आदि का उपर उपर से जैसा तैसा अध्यापन/अध्ययन होता है । दर्शनशास्त्रों का तो प्रायः होता ही नही । और यदि इनमें से कुछ वटु college/university में भी चले गये वहाँ के Indian Philosophy/Sanskrit Dept. से स्नातक होने के लिये, तो वे भी केवल परीक्षा में पार होने मात्र तक पर्यन्त रहने वाली ही पढाई करने में अपने आप को धन्य मानते है । भारतीय दार्शनिक क्षेत्र में नवीन शोधात्मक ग्रन्थ/विचारधारा की दिशा में तो किसी का प्रायः मन ही नही है ।

 

३) धर्माचार्य –

 

९०% केवल अपने अपने मठ/मन्दिर/आश्रम/संस्थान/अनुयायीगण – इन तक सीमित रहने वाले । धार्मिक/सामाजिक/राष्ट्रीय/सांस्कृतिक मुद्दों पर राजनेताओं के ईशारों पर नृत्य करने वाले पप्पु । बस अपनी ‘लड्डू की व्यवस्था’ तक सोच रखने वाले । यदि देश, गोमाता, तीर्थस्थानादि के संरक्षण के आन्दोलन में कूदें भी, तो भी केवल नाटकीय रूप से हल्ला मचाकर ‘सूर्खिया’ बटोरने की कोशिश में लगे रहने वाले (बजाय कि वहाँ ध्यान दे कि जहाँ से वास्तव में उन उद्देश्यों की पूर्त्ति हो सके – कि जिन उद्देश्यों का ढण्ढोरा वो पीट रहें है) । चरित्र के मामले में कहीं न कहीं किसी न किसी प्रकार से संदिग्ध भूमिका वालें । सनातनधर्म के जिस संप्रदाय के मानने वालें है, उसकी दार्शनिकी विचारधारा के प्रचार/प्रसार में प्रायः गतोत्साहित (उत्साह को त्यागे हुए) – ये सोच कर कि ये तो सब पुरानी बाते हो चुकी है – अब इनसे समाज का क्या कल्याण होगा! राजनीति में घुसो, सूर्खीयाँ बटोरो, धनबल/जनबल/सत्ताबल से ताकतवर बनो – तब समाज/धर्म/राष्ट्र का तो जो होना होगा सो होगा, हमारी TRP rating तो अवश्य बढेगी! ऐसे भ्रान्त मूर्ख ये भूल जाया करते है कि दार्शनिक चर्चाओं से जब से धर्माचार्यों ने परहेज करना प्रारम्भ किया, तभी से आर्यसंस्कृति का ह्रास अधिक हुआ है । जिस काल में (मुग़ल काल में भी) धर्मगुरु केवल दार्शनिक विवेचनाओं में ही रमा करते थे (वेदान्तवाक्येषु सदा रमन्ति), उस काल में न गङ्गा/यमुनादि सरिताएँ प्रदूषित थीं, न ही गोह्त्या व्यावसायिक तौर पर होती थी, न ही वैदिकी गुरुप्रणाली लुप्तप्रायः थी व न ही मुगलों तथा अङ्ग्रेजों के द्वारा राजनैतिक गुलामी भोगने के बावजूद भारत का जनसामान्य आर्य उन म्लेच्छों/यवनों का ‘सांस्कृतिक दास’ बना था, जो अब वह तथाकथित राजनैतिक स्वतन्त्रता के बाद बन चुका है । अतः आज कल के सन्त/महन्त/धर्माचार्य राजनैतिक चर्चाएँ (धर्मरक्षा के नाम पर) करने की बजाये, अपने परम्परागत कर्त्तव्य पर पहले ध्यान दें । यदि यहाँ ऋषि विश्वामित्र का उदाहरण दिया जाता है, तो यह बता देवें कि ऋषिधर्म स्वीकार करने के बाद जो कार्य एक प्रशासक का होता है उसे अपने यतिधर्म के विरूद्ध मानते हुए – क्षात्रधर्मपरायण श्री राम को ले गये थे ताटका आदि असुरों का वध करने के लिये – स्वयं ऋषि विश्वामित्र समस्त दिव्यास्त्रों से लैस होने पर भी ब्रह्मर्षि होने के पश्चात् क्षात्रधर्म में प्रवृत्त नहीं हुए – उन सन्तों/धर्मगुरों के लिये बहुत बडा सङ्केत जो कि स्वयं राजनीति में घुस जाते है अनेक बहाने बनाकर । कञ्चन/कामिनी का त्याग किये हुए सन्न्यासी का कार्य समाजहित के लिये  भी ‘व्यापार/व्यवसाय’ करना नहीं है, उसको वो दूसरों को प्रेरणा देकर करवा सकता है – स्वयं यतिधर्म का पालन करे – ‘कारोबारी साधु’ बनके लान्छित न हो तो ही अच्छा है ।

 

४) सामान्य साधु/सन्न्यासी/महात्मा/संत (किसी पद पर नही) –

 

९०% निज सम्प्रदाय तथा शास्त्रों/आचार्यों के निर्देश के अनुसार साधना न करने वाले । तपस्या व उपासना का ‘बहिर्मुख दिखावा’ करने वाले, बल्कि उपासना/साधना जैसी बातों का अन्तर्वर्ती/अन्तर्मुखी रहकर अभ्यास न करने वाले ।

 

५) ब्राह्मण –

 

९०% नित्य त्रैकालिक वैदिक/पाञ्चरात्रिक सन्ध्या परायण नहीं व निज वर्ण तथा आश्रम के कर्त्तव्यों के प्रति निष्ठावान् नही ।  संतोषरूपी धन से अलङ्कृत नही ।

 

६) विद्वान् –

 

९०% कतही शास्त्रार्थपरायण नही तथा शास्त्रार्थ के द्वारा सत्य का मन्थन न करने के लिये उत्सुक ।  यदि कभी शास्त्रार्थ करते भी है तो, शास्त्रार्थ में पराजित होने पर स्वमत को तिलाञ्जली न देकर + बहुत बहाने बनाते हुए विजेता के दार्शनिक मत को ग्रहण न करने वाले कपटी धूर्त्त ।  केवल अपने अपने निजी मञ्चों पर अपने अनुयायीयों के समक्ष निजमत के सर्वश्रेष्ठ होने का शङ्खनाद करने में निपुण! रटाउ विद्या तक ही सीमित रहने वाले ।  उस विद्या का उपयोग कर नवीनतम रहस्यों की समुपलब्धि करने में सर्वथा अक्षम ।

 

 

***

 

 

२०वीं शताब्दी से पहले तक की स्थिति

 

१) कथावाचक पण्डितगण –

 

९९ % अव्यावसायिक व तत्त्वज्ञानपूर्णा विद्वत्तायुक्त कथावाचन करने वाले । कथनी व करनी के साम्य के साथ जीवन जीने वाले । मूल संस्कृत में उपलब्ध श्रीमद्भागवत/रामायणादि ग्रन्थों के उपर लिखी गयी प्राचीन टीकाओं/भाष्यों के साथ उनका अध्ययन करने वाले (अनुवाद से काम चलाने वाले नही और न ही ‘साप्ताहिक कथा पद्धति’ पुस्तकों को पढकर कथावाचक बनने वाले) ।  निष्कामभाव से कथा करते हुए यजमानों की ओर से जो कुछ भी स्वेच्छापूर्विका दान/दक्षिणादि मिल जाये, उससे सन्तुष्ट रहने की कला में पारङ्गत । श्रीमद्भागवत की कथा को आजीविका का साधन कर्मकाण्ड या धन्धा/व्यवसाय न मानते हुए – उसे उपासना का अङ्ग मानकर प्रभुप्राप्ति का साधन मानने वाले । प्रायः दुर्गुणों/दुराचरण से बचते हुए तथा तपस्या/साधना/वैराग्य/स्वाध्याय से युक्त जीवनशैली वाले ।

 

२) गुरुकुलों में निवास करने वाले विप्रकुल के वटु/विद्यार्थी/ब्रह्मचारी/छात्र —

 

ब्राह्मण (तथा अन्य दो वर्णों के भी) बालक जो कि ९०% अत्यन्त मेधावी होते थे, उन्हें प्राच्यविद्या (पाश्चात्यविद्या वाले school/college नही) सीखने के लिये गुरुकुल में भेजा जाता था । व्यवस्थित रूप से वैदिक कर्मकाण्ड व संस्कृत व्याकरण के साथ साथ उनका ध्येय दर्शनशास्त्रों में पारङ्गत होने का रहता था । गुरु जब तक नाक रगड रगड कर पूर्ण रूप से सन्तुष्ट न हो जाया करते अपने छात्रों की हर प्रकार से कठोर से कठोरतमा परीक्षा लेकर व उन छात्रों को उनमें उत्तीर्ण होता देखकर, तब तक छात्र स्नातक नही कहलाते थे । छात्रों का लक्ष्य परीक्षा में उत्तीर्ण होने तक सीमित नही रहता था, बल्कि वे जिस विषय का अध्ययन कर रहे होते थे, उनकी गहनतम गहराईयों में डूबने की कोशिश करते । भारतीय दार्शनिक क्षेत्र में नवीन शोधात्मक ग्रन्थ/विचारधारा की दिशा में निरन्तर अग्रसर रहने वाले ।

 

३) धर्माचार्य –

 

९०% धर्म/अध्यात्म/संस्कृति के प्रवर्द्धन को एकमात्र लक्ष्य मानकर उसमें डूबने वाले तथा प्राणतक के बलिदान के लिये सदैव तत्पर रहने वाले । धार्मिक/सामाजिक/राष्ट्रीय/सांस्कृतिक मुद्दों पर राजसत्ताओ को अपने ईशारों पर नृत्य कराने वाले । चरित्र के मामले में  प्रायः असंदिग्ध भूमिका वाले । सनातनधर्म के जिस संप्रदाय के मानने वाले है, उसकी दार्शनिकी विचारधारा के प्रचार/प्रसार में प्रायः पूर्णरूपेण उत्साहित– ये सोच कर कि इनसें ही समाज का कल्याण होगा – ये सोच कर कि दर्शनशास्त्र केवल बुद्धिवर्द्धन के लिये नही है, अपितु व्यावहारिक जीवन में उपयोग के विषय हैं व जीवन को चरमतम समुन्नति की ओर ले जाने वाले हैं  ।

 

४) सामान्य साधु/सन्न्यासी/महात्मा/संत (किसी पद पर नही) –

 

९०% निज सम्प्रदाय तथा शास्त्रों/आचार्यों के निर्देश के अनुसार साधना करने वाले । तपस्या व उपासना का ‘बहिर्मुख दिखावा’ न करने वाले, बल्कि उपासना/साधना जैसी बातो का अन्तर्वर्ती/अन्तर्मुखी रहकर अभ्यास करने वाले ।

 

५) ब्राह्मण –

 

९०% नित्य त्रैकालिक वैदिक/पाञ्चरात्रिक सन्ध्या परायण व निज वर्ण तथा आश्रम के कर्त्तव्यों के प्रति निष्ठावान् ।  संतोषरूपी धन से अलङ्कृत ।

 

६) विद्वान् –

 

९०% सदैव शास्त्रार्थपरायण तथा शास्त्रार्थ के द्वारा ही सत्य का मन्थन करने के लिये उत्सुक ।  शास्त्रार्थ में पराजित होने पर स्वमत को तिलाञ्जली देकर विजेता के दार्शनिक मत को ग्रहण करने में इमानदार ।  रटाउ विद्या तक ही सीमित न रहने वाले ।  उस विद्या का उपयोग कर नवीनतम रहस्यों की समुपलब्धि करने में सर्वथा सक्षम ।

 

 

***

 

निष्कर्ष –

 

जब इन पहेलुओं पर वटु, विप्र, साधु, धर्माचार्य, कथावाचक व विद्वान – ये ध्यान देङ्गे, तो अपने आप राजसत्ताएँ व सामान्य सनातनधर्मी जनता सही मार्ग पर आ जायेगी – प्रमाण – श्रीमद्भगवद्गीता – “यद्यदाचरति श्रेष्ठ:…” (जैसा आचरण श्रेष्ठ पुरुष करते है, सामान्य जनता उसका अनुकरण करती है) ।

 

 

सूत्र / link — https://goo.gl/OG6uke

 

  • भक्तिरसवेदान्तपीठाधीश्वर आचार्य श्री गुरुपाद

 

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