Swami Madhusudanacharya Ji - Sultanpur

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[06/03 11:32] Swami Madhusudanacarya Ji — Vedanti Ashram — Civil Lines, Sultanpur:

श्रीमन्नारायण
आदरणीय आचार्य प्रवर सत्य और असत्य के स्वरूप पर प्रकाश डालने की कृपा किया जाय

[06/03 12:20] आचार्यश्री: गुरूपादाः:

प्रिय स्वामी श्री मधुसूदनाचार्य जी (वेदान्ती आश्रम, सिविल लाइन्स, सुल्तानपुर, अवध क्षेत्र, पूर्वी उ.प्र., भारत),

क) श्रीमद्भगवद्गीता के २.१६ के अनुसार जिस पदार्थ का ‘भाव’ (सत्ता/अस्तित्त्व/विद्यमानता) न हो, उसे ‘असत्य’ उद्घोषित किया गया है। व जिसका  ‘अभाव’ (अनस्तित्त्व) न हो, उसे ‘सत्य’ माना गया है।

ख) अब ‘अभाव’ भी चार प्रकार का माना गया है न्यायदर्शन में। तर्कसंग्रह — “अभावश्चतुर्विधः प्रागभावः प्रध्वंसाभावो अत्यन्ताभावो अन्योन्याभावश्चेति”।

ग) पुनः ‘अनुपलब्धि’ या प्राप्त के अदर्शनमय लोप को भी वैयाकरणिक अभाव मानते है — ‘प्रसक्तस्यादर्शनं लोपसंज्ञम् स्यात्’ — पाणिनीये।

घ) अव्यक्त प्रकृति को भी ‘असत्’ मानने का विधान है सृष्टिलय प्रक्रिया में।

ङ) अद्वैतीयों में मिथ्यात्व/अभावत्त्व/असत्त्यत्व/अलीकत्त्व को शशशृङ्गवत्, विन्ध्यापुत्रवत् तथा गगनकुसुमवत् न मानने की भी परम्परा है।

निष्कर्ष — विविध सन्दर्भों में विभिन्न पारिभाषिक आशय लिए गए है।

— भक्तिरसवेदान्तपीठाधीश्वर

[06/03 12:36] Swami Madhusudanacarya Ji — Vedanti Ashram — Civil Lines, Sultanpur:

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