श्रीजीवगोस्वामी

श्रीहरिनामामृतव्याकरणम् / श्री हरिनामामृत संस्कृत व्याकरण / The Harināmāmṛta Saṁskṛta Grammar

 

पण्डितप्रवरश्रीहरेकृष्णाचार्यविरचितया श्रीगोपीचरणदासवेदान्तभूषणपरिशोधितया शेषांशपूर्णितया च बालतोषिण्या टीकया समलङ्कृतम् / पण्डित प्रवर श्री हरेकृष्ण आचार्य के द्वारा विरचिता तथा श्री गोपीचरणदास वेदान्तभूषण महोदय के द्वारा सम्पादिता व अन्तिमांशपूर्णिता ‘बालतोषिणी’ नामक संस्कृत टीका से संयुक्त / Adorned by the  Saṁskṛta Commentary Bālatoṣiṇī composed by the great scholar Pt. Śrī Hare Kṛṣṇa Ācārya and edited cum completed by Sir Śrī Gopīcaraṇadāsa Vedānta-bhūṣaṇa.

 

प्रथमः पाठः / पहला पाठ / First Lesson

 

उपोद्घातम् / भूमिका / Introduction

 

 

 

 

अर्भकमतिभ्योऽपि व्याकरणवेदाङ्गानुशीलनव्यपदेशेन सर्वपापहरसर्वतापहरप्रेमामृतनित्यकल्याणकरहरिनामग्रहणसौभाग्यप्रदानार्थं निखिलवेदवेदान्तवेदाङ्गषड्दर्शनेतिहासपुराणकाव्यालङ्कारसङ्गीतशास्त्रादिपारावारपारीणै: महामहोपाध्यायाध्यापकनिकरैः प्राच्यदार्शनिकधुरन्धरैः कर्णाटप्रदेशस्थकृष्णयजुर्वेदीयभारद्वाजगोत्रीयराजवंशीयगौडसारस्वतविप्रकुलसमुद्भूतैः परमबृहत्तमसिद्धसङ्घैश्च निषेवितपादसरोरूहै: गौडीयवैष्णवसिद्धान्तराज्यरक्षणैकसेनापतिभिः श्रीमत्सनातनरूपानुगवरैः परमहंसकुलमुकुटमणिभिः श्रीचैतन्यवैष्णवसम्प्रदायाचार्यवर्य्यैः श्रीलजीवगोस्वामिपादैः विरक्तैः श्रीहरिनामामृतव्याकरणमिदं प्रणीतम् ।

 

टीकापरिष्कर्त्तु: टीकायाः शेषांशलेखकस्य श्रीमद्गोपीचरणदासवेदान्तभूषणस्य परिचयः –

 

वृद्धपितामहश्रीमद्वैकुण्ठचक्रवर्त्तिनः । पितामहश्रीगोलोकशर्मणः पाठकस्य च । पितृठक्कुरगौरकिशोरचक्रवर्त्तिनः । श्रीगोपीचरणदासवेदान्तभूषणस्य च । भ्रातृगोविन्दचरणदासवाचस्पति: । वात्स्यगोत्रं सीमलान् गाञि श्रीकाह्नुसन्ततिः । शाण्डिल्यासितप्रवरसामकाठकशाखिनः । सनाब्दे शशियुग्माभ्यां सजुवाणाग्निसम्मिते । प्रथमे मासि वैशाखे दिवसे सोमनायके । वृद्धमातामहश्रीमन्मणिरामाधिकारिकः । मातामहमणिरामाधिकारिदेवशर्मकः । मातामही च महिमप्रियेति प्रथिता तथा । माता श्यामप्रिया ज्ञेया । मातुलश्रीगोराचान्दाधिकारी गोत्रकाश्यपः । चाटुतिगाञिक: ख्यातो गोशब्दाख्यग्रामके पुरा । निवासः पैत्रिको वीरभूमीतसङ्गितः । पूर्वं परिचयं सर्वम् भद्भ्यो विनिवेदितम् ।

 

समस्त बालकबुद्धि लोगों के लिये वेदों के अङ्गरूपी व्याकरणशास्त्र के उपदेश के बहाने से सर्वपापहारी, सर्वतापहारी, प्रेमामृतस्वरूप, नित्यकल्याणकारी हरिनाम ग्रहण के सौभाग्य को प्रदान करने के लिये – समस्त वेद, वेदाङ्ग, वेदान्त, षड्दर्शन, इतिहास, पुराण, काव्य, अलङ्कार, सङ्गीत आदि शास्त्रों के आर-पार को प्राप्त, महामहोपाध्यायों के अध्यापकसमूहस्वरूप, प्राच्य दार्शनिकों में धुरन्धर, कर्णाटक प्रदेश के कृष्णयजुर्वेदीय भारद्वाजगोत्रीय राजवंश के गौडसारस्वत वैदिक ब्राह्मण कुल में आविर्भूत, जिनके चरणकमल परम महान् सिद्धों के सङ्घों के द्वारा आराध्य है वैसे, गौडीय वैष्णव सिद्धान्त राज्य के एकमात्र संरक्षक सेनापति, श्रील रूप तथा सनातन गोस्वामिपादों के अनुगामीयों में सर्वश्रेष्ठ, परमहंसो के कुल के मुकुटमणिस्वरूप, श्री चैतन्य वैष्णव सम्प्रदाय के आचार्यों में अग्रणी — विरक्त श्रील जीव गोस्वामिपाद के द्वारा लिखित यह श्री हरिनामामृत व्याकरण है  ।

 

टीका के परिशोधक तथा टीका के अन्तिम अंश के लेखक श्री गोपीचरण दास वेदान्तभूषण महोदय का परिचय –

 

उनके परदादा श्री वैकुण्ठ चक्रवर्ती थे (बङ्गाली गौडीय वैष्णव ब्राह्मण) । दादा श्री गोलोक शर्मा पाठक थे । पिता थे श्री गौरकिशोर चक्रवर्त्ती । भाई थे गोविन्दचरणदास वाचस्पति । गोत्र वात्स्य है तथा सीमल गाञि काह्नु के वंशज है । प्रवर है शाण्डिल्य असित तथा शाखा है साम वेद की काठक । शशियुग्म के द्वारा सजुवाणाग्नि सम्मित वर्ष के पहले मास वैशाख के सोमवार के दिन इस टीका का लेखन हुआ है (करीब दो सौ वर्षो से अधिक का समय) । परनाना श्री मणिराम अधिकारी थे । नाना श्री मणिराम देवशर्मा थे । नानी महिमप्रिया थी । माता श्यामप्रिया थी । मामा थे श्री गोराचान्द अधिकारी काश्यपगोत्र वाले । अधुना पश्चिम बङ्गाल के बीरभूम जनपद के अन्तर्गत चाटुतिगाञि गोग्राम नामक गाँव इनका पैतृक निवास था । इनका यह पूर्व परिचय आप सभी के लिये है ।

 

To bestow the great fortune of serving the Holy Name unto all those who are endowed with the intellect befitting children, the pretext of teaching the scripture of Sanskrit grammar (which is a part of the Vedic corpus) is undertaken. Such Holy Name is the abductor of all vices and maladies alike. It is, eternally, of the nature of love for God and is, perennially, auspicious. Said grammar has been composed by Śrīla Jīva Gosvāmipāda who is the crown jewel of all transcendentalists, chief among all the mentors of the Caitanyaite Vaiṣṇava lineage, foremost among the followers of Śrīla Rūpa and Sanātana Gosvāmīs, the sole protector of the domain permeated with the theological principles of Gauḍīya Vaiṣṇavism, whose lotus-like feet are worshiped by the multitudes of greatly perfect saintly personalities, who has seminally appeared in the Gauḍa Sārasvata Vedic Brahmin royal clan of Karṇāṭaka province (of Bhārata) which follows the path of Kṛṣṇa-yajurveda and which hails in the dynasty of Sage Bhāradvāja of yore, who is the champion among oriental theologians, who represents the flock of preceptors mentoring the great professors, who has, fully, crossed over to the other side of the ocean containing jewels of the arts like music, poetry, literature, puṛāṇas (mythology), history, six systems of philosophy, Vedānta, Vedas and the Vedic corollaries.

 

Sketch about Sir Gopīcaraṇadāsa Vedāntabhūṣāṇa – the editor and completer of the Bālatoṣiṇī commentary.

 

His great-grandfather (paternal side) was Śrī Vaikuṇṭha Cakravarttī (Bengali Gauḍīya Vaiṣṇava Brahmin). Grand-father was Śrī Goloka Śarmā Pāthaka. Father was Śrī Gaurakiśora Cakravarttī. Brother was Govindacaraṇadāsa Vācaspati. Gotram (clan) is Vātsya. Ancestral parentage coming from Sīmala Gāñi Kāhnu. Pravara is Śāṇḍilya Asita. Branch is the Kāṭhaka of Sāmaveda. The commentary has been composed on the Monday of the first month i.e. Vaiśākha in the year Sajuvāṇāgni Śaśiyugma (about more than 200+ years back). The maternal great-grandfather was Śrī Maṇirāma Adhikārī. Grand-father (maternal) was Śrī Maṇirāma Devaśarma. Maternal grand-mother was Mahimapriyā. Mother was Śyāmapriyā. Maternal uncle was Śrī Gorācānda Adhikārī of Kāśypa gotram. The ancestral parentage was located in the village called Cāṭutigāñi Gogrāma in the Bīrbhūm Dist. of present day West Bengal province of Bhārata. Such introduction of commentator is for everyone’s information.

क्रमशः/contd.

— भक्तिरसवेदान्तपीठाधीश्वरैः आचार्यश्रीभिः गुरुपादैः कृतो लेखः भाषात्रये / भक्तिरसवेदान्तपीठाधीश्वर आचार्य श्री गुरुपाद के द्वारा लिखा गया लेखा तीनों भाषाओं में / The article composed by Bhaktirasavedāntapīṭhāḍhīśvara Ācārya Śrī Gurupāda in triple languages

(आणन्द, गुजरात, भारत / Anand, Gujarat, Bhārata)

 

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