गौडीयवैष्णवसम्प्रदायानुसारेण वैराग्यपरिभाषायाः स्थापनम् सकलावरोधकनिराकरणेन / गौडीय वैष्णव सम्प्रदाय के अनुसार ‘वैराग्य’ की परिभाषा की स्थापना करना सकल अवरोधकों को दूर कर / Establishment of the definition of ‘vairāgya’ or renunciation in the Gauḍīya Vaiṣṇava perspective by removing all obstructions (only Hindi + Sanskrit version).

 

 

 

गौडीयवैष्णवसम्प्रदायानुसारेण वैराग्यपरिभाषायाः स्थापनम् सकलावरोधकनिराकरणेन  –

 

‘ईश्वरतद्भक्तेतरपदार्थेषु ममत्वस्य परिहारोऽयं वैराग्यः’ (स्रोतमेतत् – “अनासक्तस्य विषयान् यथार्हमुपयुञ्जतः । निर्बन्धः कृष्णसम्बन्धे युक्तवैराग्यमुच्यते ।।” – श्रीमद्भक्तिरसामृतसिन्धौ)

 

 

 

पूर्वपक्षः –

 

“ईशावास्यमिदं सर्वं” – इत्यादिश्रुतेः ईश्वरेतरं किञ्चिन्नास्ति जगति!

 

 

उत्तरपक्षः –

 

व्याप्यव्यापकयोः भेदः द्वैतवादिनां पक्षे यस्य पुष्टिः जायते “यः पृथिव्यामन्तरो यं पृथिवी न वेद” इत्यादि बृहदारण्यकश्रुतौ । यदि सर्वानि वस्तुनि परब्रह्म एव, तर्हि परब्रह्मणः कृते किमपि प्रयोजनम् न वर्त्तते तेषु वस्तुष्वन्तर्यामित्वेनावस्थितेः! अतः ब्रह्माश्रितसत्तया सर्वपर्दार्थस्य इह जगति जगत् ब्रह्मात्मकरूपेण व्यपदिश्यते “नेह नानास्ति किञ्चन” + “सर्वम् खल्विदं ब्रह्म” – इत्यादिश्रुतौ ।

 

***

 

गौडीय वैष्णव सम्प्रदाय के अनुसार ‘वैराग्य’ की परिभाषा की स्थापना करना सकल अवरोधकों को दूर कर –

 

‘ईश्वर तथा ईश्वर के भक्तों के अतिरिक्त समस्त अन्य पदार्थो में ममता का वर्ज्जन वैराग्य है’ — {इस सूत्र का स्रोत है श्रीभक्तिरसामृतसिन्धु का श्लोक १.२.२५५ – “अनासक्त भाव से विषयों का यथायोग्य उपयोग (भगवद्भक्ति के अनुकूल) जब कृष्ण के सम्बन्ध में (कृष्णसेवा के लिये) किया जाता है – तब वैसी अवस्था को युक्त-वैराग्य कहते है ।”}

 

 

आपत्ति –

 

“ईश्वर के द्वारा यह सर्व (चराचर जगत्) व्याप्त है” (ईशोपनिषद्) – इस श्रुति से तो यह प्रमाणित होता है कि ईश्वर से भिन्न कुछ अन्य है ही नही इस जगत् में!

 

 

खण्डन –

 

द्वैतवादियों के पक्ष में व्याप्य (जिसमे किसी अन्य पदार्थ की अवस्थिति हो वह पदार्थ) तथा व्यापक (जो पदार्थ अन्य पदार्थ में अनुस्यूत/विद्यमान हो वह) पदार्थों के बीच भेद की पुष्टि होती है बृहदारण्यक श्रुति के इस वाक्य से – “जो (ब्रह्म) पृथ्वी के भीतर है, पर पृथ्वी जिसको नहीं जान सकती” । यदि सभी पदार्थ परब्रह्म ही है, तब तो परब्रह्म के लिये उन सकल पदार्थो के भीतर अन्तर्यामी रूप से अवस्थित होने का कोई प्रयोजन ही नहीं बचता! अतः इस जगत् में सभी पदार्थों की ब्रह्म के उपर आधारित/आश्रित सत्ता के कारण ही तो जगत् को ब्रह्मरूप से बताया गया है श्रुतियों/उपनिषदों के इन वाक्यो में – “यहाँ (इस जगत् में) ये सभी नाना पदार्थ कुछ भी नही है” + “यह सब कुछ ब्रह्म ही है” ।

 

 

पुनः आपत्ति –

 

यदि ब्रह्म के उपर आश्रित सत्ता से युक्त होने के कारण ही सकल पदार्थों को ब्रह्मरूप माना गया है, तब फिर छान्दोग्य श्रुति में ऐसा क्यों कहा गया है कि – “जिस प्रकार से मिट्टी से बने घडे को ‘घडा’ कहना तो केवल वाणी का विकार मात्र है, वस्तुतः तो वह ‘घडा’ मिट्टी ही है”? यहाँ तो ऐसा ही प्रतिपादित होता है न कि ब्रह्म के ही विकार स्वरूप है समस्त जागतिक पदार्थ?

 

 

खण्डन –

 

सर्वप्रथम् तो यह कल्पना की ब्रह्म विकारी होकर जागतिक पदार्थों के रूप में प्रकट होता है (जैसे मिट्टी घडे के रूप में प्रकट होती है) – सर्वथा निराधारा है ब्रह्मसूत्र १.१.१३ के आधार पर – “विकारशब्दान्नेति चेन्न प्राचुर्यात्” (“यदि कहो कि ‘आनन्दमय’ शब्द में ‘मयट्’ प्रत्यय विकार का बोधक है, इसीलिये ‘आनन्दमय’ शब्द ब्रह्म का वाचक नहीं हो सकता – तो यह कहना सङ्गत नही है, क्योंकि ‘मयट्’ प्रत्यय यहा आनन्द की प्रचुरता को बताता है – आनन्द के विकार को नहीं – ‘आनन्दमय’ शब्द में”) । अतः वेदान्तशास्त्र के दृष्टिकोण से ब्रह्म जब विकार को प्राप्त ही नहीं होता, तब उसका विकृत होकर जगद्रूप में दीखायी देना एक कल्पना मात्र है ।

 

छान्दोग्य श्रुति का तात्पर्य है कि सकल परिदृश्यमान (दिखायी देने वाले) जागतिक पदार्थ अन्ततोगत्त्वा मूलसूक्ष्मप्रकृति के विकारमात्र है (ब्रह्म के विकार नही) कि जिस मूल सूक्ष्म प्रकृति को कभी कभी ‘असत्’ शब्द से भी निर्देशित किया जाता है (‘असत्’ उसके पारमार्थिक/प्रातिभासिक/व्यावहारिक – किसी भी सन्दर्भ में मिथ्या होने के कारण नही, अपितु वह प्रकृति सूक्ष्मलयावस्था को प्राप्त होने के कारण) और जब स्थूलप्रकृति सूक्ष्मप्रकृति में लय को प्राप्त होती है (प्रलयकाल में), तब सूक्ष्मप्रकृति भी श्री हरि में अपनी पृथक् सत्ता को खोये बिना (जैसे एक पक्षी जङ्गल में विलीन हो जाता है निज पृथक् अस्तित्व को बनाये रखकर) लय को प्राप्त हो जाती है – तभी तो चतुःश्लोकी श्रीमद्भागवत में कथन हुआ है कि – “अहमेवासमेवाग्रे नान्यत् यत् सदसत् परम्…” कि “जगत् की सृष्टि से पूर्व सत् (स्थूल प्रकृति) और असत् (सूक्ष्म प्रकृति) कछ भी परमात्मा से बाहर अवस्थित नहीं था, अपितु परमात्मा के भीतर लय को प्राप्त था” ।

 

 

निष्कर्ष –

 

अतः अन्त में परमात्मा तथा उसके भक्तों से ‘पृथक्’ अन्य समस्त पदार्थों से अनासक्ति सिद्ध हुयी! यदि परमात्मा से पृथक् कुछ है ही नही (जैसे कि आचार्य शङ्कर के अद्वैतवाद में), तब तो ‘अनासक्ति’ या ‘विरक्ति’ क्या परमात्मा से होगी? क्योकि अद्वैत में ब्रह्म/परमात्मा से पृथक् तो किसी अन्य पदार्थ का अस्तित्व ही नहीं स्वीकारा गया है जो! और यदि परमात्मा से विरक्ति या अनासक्ति होगी, तब उस प्रकार की विरक्ति/अनासक्ति जिस व्यक्ति का आश्रय करके विद्यमान रहेगी, वह व्यक्ति उस परमात्मा से पृथक् माना जायेगा! क्योकि स्वयं से (अपने आप से) तो विरक्ति होना सम्भव नही! अतः विरक्ति का ‘विषय’ (जिससे विरक्ति की जाती है) तथा ‘आश्रय’ (वैराग्य का अधिष्ठान या वैराग्य जिसके पास है) – दोनो में द्वैत स्वीकार करने पर ही तो ‘विरक्ति’ प्रमाणित होती है!

 

यदि कहो की ऐसी ‘विरक्ति’ तो केवल व्यावहारिक धरातल पर होती है (अद्वैत मत में), पारमार्थिक रूप से तो एक ब्रह्म की ही सत्ता होने के कारण ‘विरक्ति’ होने का प्रश्न ही नही खडा होता है, तब हम यह बता दे कि पञ्चविधा मुक्ति के पश्चात् भी सांसारिक पदार्थो से जो मुक्त जीव की विरक्ति देखी जाती है – वह न हो पाती – उस मुक्ति के पश्चात् ब्रह्म से ‘इतर’ (भिन्न/पृथक्) अन्य कोई पदार्थ ही न होने के कारण! अतः ‘विरक्ति’ की पारमार्थिक धरातल पर भी (केवल व्यावहारिक स्तर पर ही नही) अवस्थिति माननी पडेगी तथा इसी कारण से ब्रह्म के अतिरिक्त अन्य पदार्थो की सत्ता भी प्रमाणित हुई!

 

 

 

— भक्तिरसवेदान्तपीठाधीश्वरा: गुरुपादाचार्या: रामकृष्णस्वामिन: आम्नायवाचस्पतय: अचिन्त्यभेदाभेदवेदान्तवादिन: गौडीयवैष्णवसाम्प्रदायिन:  / — Bhaktirasavedāntapīṭhādhīśvara Gurupādācārya Rāmakṛṣṇa Svāmī Āmnāya-vācaspati Acintya-bheda-abheda-vedāntī Gauḍīya-vaiṣṇava-sampradāyī

 

(मुखपृष्ठम् / URL — https://goo.gl/96Li0W)

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