Mudit Mishra

वेदान्तद्वितीयपाठस्य फलम् –

 

भ.र.वे.प्र.तृतीयसमूहस्य रत्नवच्छात्र/सदस्यस्वरूपः (किंकथं धरातले अन्तर्जालीये) विद्यार्थी श्रीमुदितमिश्रमहोदयः औदीच्य: स्वतन्त्रान्वेषक: कान्यकुब्जविप्रः (छत्तीसगढराज्यस्य विलासपुरे निवसति) प्रथमक्रमाङ्केनोतीर्ण: भवति वेदान्तद्वितीयपाठस्य प्रश्नमालायाम् । अन्येषां मूकसदस्यानां कृते कापि उत्तीर्णाङ्काः न देयाः।

 

— भक्तिरसवेदान्तपीठाधीश्वराः आचार्यश्री: गुरूपादाः ।

 

***

 

वेदान्त के दूसरे पाठ का फल –

 

भ.र.वे.प्र. के तीसरे समूह के (व्हाट्सएप अन्तर्जालीय धरातल पर)  रत्नसदृश छात्र/सदस्यस्वरूप विद्यार्थी श्री मुदित मिश्र महोदय (औदीच्य कान्यकुब्ज विप्र तथा स्वतन्त्र अन्वेषक – हाल में छत्तीसगढ राज्य के विलासपुर के रहने वाले) ने वेदान्त के दूसरे पाठ की प्रश्नमाला को प्रथम क्रमांक से उत्तीर्ण किया है । अन्य मूँगे सदस्यों के लिए कोई भी उत्तीर्णाङ्क नहीं दिए गए हैं।

 

— भक्तिरसवेदान्तपीठाधीश्वर आचार्य श्री गुरुपाद

 

***

 

Results of the second lesson on Vedānta –

 

The jewel-like pupil/participant from the third group of BRVF (on WhatsApp cyber application), Mr. Mudit Mishra (Kānyakubja Brahmin of Northern Bhārata, an independent research fellow and currently residing in Bilaspur, Chattisgarh, Bhārata) stands foremost in the question/answer series on the second lesson on Vedānta. No passing grades have been given to the silent spectators.

 

— Bhaktirasavedāntapīṭhādhīśvara Ācārya Śrī Gurupāda

 

***

 

Note – For the sake of information, the whole question series on the second lesson on Vedānta is produced below along with the detailed answers given by Mr. Mudit Mishra in Hindi.

 

 

द्वितीयपाठस्य प्रश्नमालेयम् समूहस्य सदस्यानां कृते / दूसरे पाठ की यह प्रश्नमाला समूह के सदस्यों के लिये / Question series on the second lesson for the group participants.

 

 

 

सूचना/Notice –

 

 

ये सदस्यजनाः निम्नोद्धृतप्रश्नानां समीचीनोत्तरान् दास्यन्त्यग्रिमद्विसप्ततितमायां घटिकायां, तान् समस्तान् प्रौढप्रज्ञजनान् प्रति श्रीमदाचार्यगुरुपादा: तारतम्यमूलका: उत्तीर्णाङ्का: दास्यन्ति प्रतिपाठानान्तरम् ।

 

जो सदस्यजन निम्नलिखित प्रश्नों का समीचीन उत्तर प्रदान करेङ्गे अगले बहत्तर घण्टों के भीतर, उन समस्त प्रौढमतिवान् सदस्यों के प्रति श्रीमदाचार्यचरण तारतम्य से उत्तीर्ण अङ्क देङ्गे प्रति पाठ के पश्चात् ।

 

Those participants who will provide proper satisfactory answers to the below produced queries within next seventy two hours, such intellectually grown participants shall be given passing grades with hierarchical gradation by Ācārya Śrī Gurupāda after every consecutive lesson.

 

१/1) वेदान्तसूत्रेषु ब्रह्म केन प्रकारेण निरूपितम्? अन्यान्यवेदसमूहेषु ब्रह्म केन प्रकारेण निरूपितम्? शास्त्रेषु ब्रह्मणः किमर्थमवाच्यत्वम्? आत्यन्तिकावाच्यत्वपक्षे ब्रह्मणः को दोषः स्यात्?

 

वेदान्तसूत्रों में ब्रह्म किस प्रकार से निरूपित हुआ है? दूसरे वेदादि शास्रों में ब्रह्म किस प्रकार से निरूपित है? शास्त्रों में ब्रह्म को अवाच्य क्यों कहा गया? ब्रह्म को आत्यन्तिक रूप से अवाच्य मानने पर कौन सा दोष लगता है?

 

In the Vedānta-sūtras, brahma is depicted in which manner? In the other Vedic literature, brahma is expounded in which way? The non-expression of brahmaas mentioned in the scriptures indicates what? What fault is incurred upon consideration of brahma as ultimately non-expressible?

 

 

२/2) ब्रह्मज्ञानं भक्तिपदवाच्यं कथं केन शास्त्रप्रमाणेन च? ब्रह्मज्ञानस्य विषयनिर्विषयात्मकद्वन्दवर्ज्जितत्त्वस्य को आशयः?

 

ब्रह्मज्ञान को ‘भक्ति’ शब्द का वाच्यार्थ क्यों माना गया है? व उसका शास्त्रप्रमाण क्या है? ब्रह्मज्ञान को विषय + निर्विषय – इन दोनों द्वन्द्वों से वर्ज्जित कहने का क्या आशय है?

 

Why the knowledge about brahma (brahma-jñānam) is considered the ‘directly expressed meaning’ (vācyārtha) of ‘bhakti’ (devotion)? And what scriptural evidence proves it? What is the intention for asserting the transcendence ofbrahma-jñāna in regards the objectivity and non-objectivity of knowledge (viṣaya-nirviṣayātmaka-dvandva-parihāra)?

 

 

३/3) वर्त्तमानकाले जगतः असत्यकथनेन शास्त्रेषु को अभिप्रायः? सृष्टेः प्रागेव जगतः असत्यकथनेन शास्त्रेषु को अभिप्रायः?

जगत् को वर्त्तमान काल में ‘असत्य’ उद्घोषित करने के पीछे शास्त्रों का क्या अभिप्राय है? सृष्टि से पूर्व जगत् को ‘असत्य’ कहने के पीछे शास्त्रों का क्या अभिप्राय है?

 

During the grossly existential stage of the creation, what is the intention of the scriptures after terming the phenomenal (perceptible) world as ‘unreal’ (asatya)? What is the scriptural intention behind consideration of the world as unreal especially, before the perceptible creation (of the world)?

 

 

४/4) भेदस्य तात्त्विकत्वं केन युक्त्याधारेण प्रमाणितम्? व्यावहारिकप्रातिभासिककाल्पनिकपारमार्थिकसत्तानाम् कः अर्थः? जीवजगद्भ्यां साकं परब्रह्मणः एकतासूचकानां वाक्यानां को आशयः? ब्रह्माधीनसत्तायाः को आशयः? वागादीन्द्रियानां प्राणेन साकं को सम्बन्ध:? केचिज्जनानां मते केन हेतुना जगज्जीवयोः ब्रह्मात्त्वकत्त्वेन निर्देशः?

 

भेद की वास्तविकता किस युक्ति के आधार पर प्रमाणित होगी? व्यावहारिकी, प्रातिभासिकी, काल्पनिकी तथा पारमार्थिकी सत्ताओं का क्या अर्थ है? जीव व जगत् के साथ परब्रह्म के एकत्व सूचक वाक्यों का क्या आशय है? ब्रह्माधीनसत्ता क्या का अर्थ है? वाणी आदि इन्द्रियों का प्राण के साथ कौन सा सम्बन्ध है? कतिपय व्यक्तिओं के मत में किस कारण से जगत्+जीव का ब्रह्म के साथ एकत्व निर्देशित हुआ है?

 

The factuality of distinction (dvaita/bheda-vāstavikatā) shall be verified on the basis of what logic? What is the meaning of the quadruple phases of existence or realities viz., ‘common worldly’ (vyāvahārikī), ‘appearing’ (prātibhāsikī), ‘kālpanikī’ (imaginary) and the ‘ultimately essential’ (pāramārthikī)?

 

 

५/5) प्रतिबिम्बवादो कः? तस्य खण्डने मुख्या युक्तिः का? परिच्छेदवादो कः? तस्य निरसने मुख्या युक्तिः का? अद्वैतवादो कः? अद्वैते द्वैतस्वीकारेण का आपत्तिः? अद्वैते अद्वैतस्वीकारेण का विषमता? सिद्धसाधनता दोषो कः? तस्य लौकिकोदाहरणम्? ब्रह्मणि तदुहारणस्य कथं प्रयोगः?

 

प्रतिबिम्बवाद क्या है? उसके खण्डन में मुख्य युक्ति क्या है? परिच्छेदवाद क्या है? उसके निरसन में मुख्य युक्ति क्या है? अद्वैतवाद क्या है? अद्वैत में द्वैत स्वीकार करने पर क्या आपत्ति खडी होती है? अद्वैत में अद्वैत को स्वीकार करने पर क्या विषमता जन्म लेती है? सिद्धसाधनता दोष क्या है? उसका लौकिक उदाहरण? ब्रह्म में उस उदाहरण का प्रयोग कैसे होगा?

 

What is the theory of reflection (pratibimba-vāda)? What is the main logic for cutting asunder the said theory? What is the theory of division (pariccheda-vāda)? Which logic is employed to confute it? What is the theory of non-dualism (advaita-vāda)? What problem arises by accepting duality (dvaita) in the non-dualism/advaita? What inconsistency arises by accepting advaita inadvaita? What is meant by the ‘siddha-sādhanatā-doṣa’ or the fault of perfecting the ever perfect? What is its mundane example? How is this fault applicable in the context of brahma?

 

 

६/6) कैः हेतुभिः निर्विशेषब्रह्म प्रमाणत्रयमगोचरमस्ति? तद्ब्रह्मणि भागलक्षणावृत्तेरसम्भावना कथं? भागलक्षणायाः अपरनाम किम्? अद्वैतवादो कथमग्राह्यः?

 

किन हेतुओं से निर्विशेषब्रह्म तीनो प्रमाणों के अगोचर बन जाता है? उस निर्विशेष ब्रह्म में भागलक्षणा वृत्ति की असम्भावना कैसे है? भागलक्षणा का पर्यायवाची नाम क्या है? अद्वैतवाद क्यों ग्रहण करने योग्य नहीं है?

 

Due to which reasons the non-specified (nirviśeṣa-brahma) Absolute turns non-objective to the triple evidence (pratyakṣa / directly perceptive, anumāna / intellectual inference and apauruṣeya śabda / immortal Vedic sound)? How is the inapplicability of the ‘bhāga-lakṣaṇā’ justified in the context of brahma? What is the synonymous term for ‘bhāga-lakṣaṇā’? Why the theory of non-dualism (advaita-vāda) is unacceptable?

 

 

 

  • भक्तिरसवेदान्तपीठाधीश्वराः आचार्यश्रीः गुरुपादाः / भक्तिरसवेदान्तपीठाधीश्वर आचार्य श्री गुरुपाद / Bhaktirasavedāntapīṭhādhīśvara Ācārya Śrī Gurupāda

 

***

 

By Mr. Mudit Mishra ‘Kānyakubja’

 

वेदांत-सम्बन्धी द्वितीय पाठ की प्रश्नमाला की उत्तरावली :-

 

१) वेदांतसूत्रों में ब्रह्म “अपरोक्ष” अर्थात “साक्षात/प्रत्यक्ष” रुप से निरुपित हुआ है व् दुसरे वेदादि शास्त्र में “परोक्ष” अर्थात “परम्पराया/अप्रत्यक्ष” रुप से निरुपित हुआ है ……शास्त्रों में ब्रह्म को अवाच्य कहने का तात्पर्य है की कोई भी “ब्रह्म” कि पूर्णानुभुति मे सक्षम नही है,जीव अपनी अल्पज्ञतावशात “ब्रह्म” कि अखंडानुभुति  व् ज्ञान में असमर्थ है अत: जीव की पूर्णज्ञान में अक्षमता को लक्ष्य करते हुए “ब्रह्म” कि अवाच्यता का शास्त्र कथन करते है …….ब्रह्म की सर्वांश में सर्वथा अवाच्यता के स्वीकरण से ब्रह्म की वेदादि के परम-तात्पर्य रूप होने का सिद्धांत बाधित होता है फलत: वेदादि सत्शास्त्रो कि उपादेयता भी निरस्त होती है अत: उनका अध्ययन,श्रवण,परिपालन भी व्यर्थ होता है इसलिए वेदों को ब्रह्म का प्रतिपादक होने के कारण “ब्रह्म”को सर्वथा “अवाच्य” नही माना जा सकता उसकी आत्यन्तिक अनिर्वचनीयता का सिद्धांत ब्रह्म की वेद-वेघता को निरस्त करता है और उसे सर्वथा अज्ञेय बना देता है अत: ये सिद्धांत अमान्य सिद्ध होता है ।

 

२) ब्रम्हज्ञान को भक्ति पद का वाच्यार्थ इसलिए माना गया है क्योकि ब्रह्मज्ञान का परम फल भक्ति ही है और ब्रह्मज्ञान हमे भक्ति के लिए ही सक्षम बनाता है ,समस्त विषयों का परिहार करता हुआ…….ब्रह्मज्ञान के “भक्ति “वाच्यार्थ होने की सिद्धि……श्रीमद्भगवद्गीता के “श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानम” (गीता ४:३९)‘भक्त्या मामभिजानाति……ततो मां तत्त्वतः ज्ञात्वा’ (गीता १८:५५).. आदि वचनों  से होती है …..ब्रम्हज्ञान विषय-निर्विषय आदि के द्वंदो से परे है क्योकि वह श्री भगवान को ही लक्ष्य करता हुआ अपनी सम्पूर्णता को प्राप्त होता है ….जैसा की कहा भी गया है ऐसा ज्ञान परिशुद्ध होने पर तथा विषय व निर्विषयात्मक द्वन्द्व (अर्थात् ज्ञान का विषय व ज्ञान का अविषय – ये दो प्रकार का द्वन्द्व) का परिहार (वर्जन) करते हुए श्रीभगवान् को लक्ष्य कर उनका अनुशीलन करता है व भक्त्यात्मक है । विषयनिर्विषयात्मक द्वन्द का तात्पर्य है कि ऐसे ब्रह्मज्ञान का विषय केवल ब्रह्म है तथा इसके अतिरिक्त अन्य कोई भी प्रकार का लौकिक व अलौकिक पदार्थ इस ब्रह्मज्ञान का न तो विषय है, और न ही अविषय है । ब्रह्मज्ञान ब्रह्मातिरिक्त (ब्रह्म को छोड कर) जब किसी पदार्थ का विषय ही नही, तब तो वह किसी भी ब्रह्मातिरिक्त पदार्थ का अविषय भी नही क्योकि ‘अविषय’ शब्द ‘विषय’ शब्द से निर्मित है, अतः जब उसका कोई अन्य ‘विषय’ ही नही, तब तो उसका कोई अन्य ‘अविषय’ भी नही – विषय हो तभी तो अविषय के होने की सम्भावना उदित होती है….  ।

 

३) जगत को वर्तमान काल में असत्य निरुपित करने का उद्देश्य साधक को बहिरंग जगत से विविक्त करना है ताकि वो सर्वतोभावेन श्री भगवान के चरणों में ही पूर्णतया आसक्त होता हुआ जगत के प्रति पूर्ण विरक्ति की अवस्था को  प्राप्त कर सके शास्त्रों में जगत की असत्यता के कथन का यही एकमात्र उद्देश्य है …ज़गत की सृष्टी-पूर्व असत्यता का कथन उसके स्थूल-दृष्टी से अनुपलब्धता के आधार पर हुआ है अर्थात उसकी अप्रकट  सुप्त-गुप्तावस्था को ही प्रकारान्तर से सृष्टी के असत्यत्व के रूप में निरुपित किया गया  है ।
४) गौडीय वैष्णव राधान्त के अनुसार भेद की युक्ति यथावत ही है-जीव तथा ईश्वर/ब्रह्म के बीच कोई काल्पनिक/प्रातिभासिक/व्यावहारिक भेद नही है अपितु दोनों के बीच वास्तविक (पारमार्थिक) भेद की सिद्धि होती है । मुण्डकोपनिषद्, कठोपनिषद् तथा श्रीमद्भगवद्गीता के अनेकानेक वचनों के द्वारा (यथा – ‘परमसाम्यमुपैति’ + ‘तादृगेव’ + ‘मम साधर्म्यमागता:’) मोक्षावस्था में भी जीव व ईश्वर के बीच भेद की स्पष्टरूप से सिद्धि होने के कारण भेद की तात्त्विकता/पारमार्थिकता/वस्तुता को स्वीकारना पडेगा ………जीव व जगत के साथ परब्रह्म के एकत्व-सूचक वाक्यों का अर्थ उनकी परब्रह्माश्रित्व का निरूपण करना ही है उसी प्रकार जिस प्रकार से शास्त्रों में कहीं कहीं वागादीन्द्रियों को ‘प्राण’ शब्द से सूचित किया गया है उन वागादि इन्द्रियों की प्राण के उपर निर्भरता के कारण (भले ही प्राण तथा वे वागादि इन्द्रियाँ साङ्ख्यदर्शन के आधार पर परस्पर भिन्न क्यों न हो), ठीक वैसे ही, चिज्जडात्मक प्रपञ्च (चित् तथा अचित्/जड तत्त्वों के सम्मिश्रण से बना यह जगत्) के भी ब्रह्माधीन होने के कारण (जगत् ब्रह्म के अधीन है जो कि श्रीमद्भगवद्गीताशास्त्र के ‘मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव’ के द्वारा भी प्रमाणित है) कभी कभी शास्त्रों में जगत् को (जडभूत + जीवभूत) ‘ब्रह्म’ शब्द से निर्देशित करते हुए ब्रह्मरूप कहा गया है …. ब्रह्माधीनसत्ता वे सत्ताये है जो सदा-सर्वथा ब्रह्म के अधीन हो उसके नियन्त्रण में रहती है ,जो की जीव व जगत है……वाणी आदि इन्द्रियों का प्राण के साथ आश्रय-आश्रयी सम्बन्ध है अर्थात वाणी आदि इन्द्रियां प्राणाधीना है …… यथा :- प्राणमय इन्द्रियात्मा (सुबालोपनिषद ५:१५),प्राणमुख्यत्वेन (भावनोपनिषद

 

६) प्राणस्यैतद्वशे  सर्वे (प्रश्नोपनिषद २:१३)इत्यादि ।
कतिपय व्यक्तियों के मत में चूँकि इस जगत् में परब्रह्म ही सर्वत्र/सर्वदा सर्वव्यापक रूप से विद्यमान है, अतः जागतिक (जगत् की) कोई भी वस्तु ब्रह्म से शून्य नही मानी जा सकती (ब्रह्म की हर पदार्थ में व्यापिता/अनुस्यूतता होने के कारण) । इस कारण से भी ‘जगत्’ में ‘ब्रह्म’ शब्द का आरोप किया जाता है (वस्तुतः जगत् ब्रह्म नही होने पर भी) और जगत् को ‘ब्रह्म’ शब्द के द्वारा निर्देशित किया जाता है ।

 

५)जिस वाद में जीव को ब्रह्म का प्रतिबिम्ब माना जाता है उस वाद को प्रतिबिम्बवाद कहा जाता है।प्रतिबिम्बवाद के खंडन की मुख्य युक्ति यह है की यदि प्रपञ्चस्थित जीव को ब्रह्म का प्रतिबिम्ब स्वीकार कर लिया गया, तो ब्रह्म विभु तथा निर्विशेष नही रह पायेगा क्योंकि सीमाबद्ध (विभु पदार्थ कदापि सीमाबद्ध नही होता) तथा शब्दरूपादि गुणों से युक्त वस्तु (निर्विशेष ब्रह्म तो शब्दरूपादि गुणों से हीन है भला!) का ही प्रतिबिम्ब/प्रतिध्वन्यादि घटित होता है और इस प्रकार से यदि ब्रह्म निर्विशेष नही रह पाया तब तो शाङ्करमत का मूलभूत ढाँचा ही समाप्त हो जायेगा…… शाङ्करमत के अनुसार जिस वाद की यह मान्यता हो की “अपरिच्छिन्न ब्रह्म” (जो ब्रह्म कभी भी परिच्छेद का विषय न होता हो) का परिच्छेद असम्भाव्य है (परिच्छेद नही हो सकता) उसे परीच्छेदवाद कहते है,और उसका खंडन की मुख्य युक्ति यह है की यदि परिच्छेद को वास्तविक माना जाये तब तो फिर टङ्कच्छिन्न पाषाणखण्डवत् (हथौडे के द्वारा पर्वत से तोडे गये पत्थर के टूकडे की भाँति) ब्रह्म का भी विकारी होना अवश्यम्भावी हो जायेगा और यदि ब्रह्म में विकारित्व के आभास को भी स्वीकार कर लिया गया, तब तो वेदान्तदर्शन का मूलभूत सिद्धान्त जो कि ब्रह्म को अविकारी मानता है उसका विरोध होगा! अतः ये दोनो ही मत अग्राह्य है वेदान्त के यथार्थ अनुयायीयों के द्वारा  । जिस वाद में जीव व ब्रम्ह की अभेदता(एकत्व)का स्वीकरण होता है वह अद्वैतवाद (पदम् पुराणानुसार जिसे मायावाद भी कहा जाता है)कहलाता है। अद्वैत में द्वैत स्वीकरण से अद्वैत-सिद्धांत बाधित होता है और “द्वैतापत्ती” से युक्त हो निरस्त होता है क्योकि दोनों सिद्धांत परस्पर विपरीत है  और अद्वैत में अद्वैत (अभेद) के स्वीकरण से उपनिषदों के ‘अहं ब्रह्मास्मि’, ‘सर्वम् खल्विदं ब्रह्म’ तथा ‘तत्त्वमसि’ – इत्यादि वाक्यों में ‘सिद्ध-साधनता’ नामक दोष आ जायेगा……. । जो तत्त्व स्वयं (अपने आप – स्वयं प्रकाश तथा स्वतःसिद्ध होने के कारण – ब्रह्म को स्वतःसिद्ध व स्वयंप्रकाश माना गया है वेदान्त में)  के द्वारा अथवा श्रुतियों (उपनिषदादि शास्त्रों के द्वारा) से प्रमाणित होता है, उसका पुनः अन्य प्रकार से विवेचन करने की चेष्टा करना ही ‘सिद्धसाधनतादोष’ कहलाता है । जैसे कि कहना ‘यह तोता/शुक एक पक्षी है’ – यहाँ पर ‘शुक’ कहने मात्र से ही जब उसका पक्षीत्व सिद्ध होता है, तो फिर पुनः उसे पक्षी कहना ही ‘सिद्ध-साधनतादोष’ (अर्थात् जो बात/तथ्य एक बार प्रमाणित/सिद्ध हो चुका है, उसके पुनः अन्य उपायों से प्रमाणित/सिद्ध करने की चेष्टा करना) माना गया है । ठीक वैसे ही जब श्रुतियों ने कह दिया कि ब्रह्म सर्वव्यापक व विभु है (और अद्वैतियों ने ब्रह्म की इस सर्वव्यापकता/विभुता को अभेद/अद्वैत-परक मान लिया) – तो जब अद्वैतियों के मत में ब्रह्म की यह सर्वव्यापकता/विभुता ही ब्रह्म के जगत् तथा जीव के साथ अभेद/अद्वैत को सिद्ध करती है, तब फिर पुनः जीव तथा जगत् की ब्रह्माभिन्नता (ब्रह्म से उन दोनो की अभिन्नता) को ‘अहं ब्रह्मास्मि’, ‘तत्त्वमसि’ तथा ‘सर्वम् खलु इदं ब्रह्म’ – इत्यादि श्रौतवाक्यों से सिद्ध करने का प्रयास करना ही ‘सिद्ध-साधनता-दोष’ है ।

 

६) ‘प्रवृत्ति’, ‘निमित्त’, ‘जाति’, ‘गुण’, ‘क्रिया’ तथा ‘नाम’ आदि लक्षण/विशेषताएँ के न होने के कारण निर्विशेषब्रह्म तीनो प्रमाणो को अगोचर बन जाता है………”भागलक्षणा” का पर्यायवाची नाम शाब्दि-गौणी-वृत्ति है,निर्विशेषब्रह्म में ‘भागलक्षणा-वृत्ति” कि असम्भावना इसलिए है की जब एक बार ब्रह्म को अद्वैतियों ने ‘अभिधावृत्ति’ का ही ‘अविषय’ (अगोचर) मान लिया, तब तो वैसी अभिधावृत्ति के द्वारा अगम्य/अविषयीभूत/अगोचर वस्तु/पदार्थ ब्रह्म में ‘लक्षणा-वृत्ति/गौणी वृत्ति’ की प्रवृत्ति (उसका प्रवेश ब्रह्मतत्त्व के निरुपण में) हो ही नही सकता अतः लक्षणा के द्वारा भी अद्वैतियों का ब्रह्म प्रतिपाद्य नही अतः अद्वैतवाद भी सर्वथा तिरस्करणीय है ………सर्वं श्रीगोविन्दार्पणमस्तु! सब कुछ श्रीगोविन्द के चरणों में समर्पित ! 🏻

 

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***

 

  • भ.र.वे.प्र. का सचिवालय / भ्रवेप्रस्य सचिवालय: / BRVF’s Secretariat

 

Link / सूत्र — https://goo.gl/uo56rI

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