क्रमागतो वेदान्तसन्देशः – ६-१७ / क्रमागत वेदान्तसन्देश – ६-१७ / Serialized Vedāntic Message – ६-१७

 

उपोद्घातम् प्रमेयरत्नावल्या: / भूमिका प्रमेय रत्नावली की / Introduction to Prameya-ratnāvalī

 

 

प्रमेयरत्नावल्या: द्वितीयप्रमेयाध्याये श्रीहरेरखिलाम्नायवेद्यत्वं निरूपितम् । वेदान्तसूत्रैः श्रीहरिः अन्वयेन निरूपितः अन्यान्यवेदसमूहैः परम्पराक्रमेण प्रतिपादितश्च । येषु येषु शास्त्रस्थलेषु ब्रह्म वेदावाच्यरूपेण निरूपितम् तदनन्तब्रह्मविषयकानन्तज्ञानप्राप्तेर्जीवपक्षेऽसम्भाव्यत्त्वात् । न चानन्तब्रह्मविषयकखण्डानुभूतेरभावात्तद्वेदावाच्यत्वम् । अन्यथा ब्रह्मणः आत्यन्तिकावाच्यत्वपक्षे तद्ब्रह्मज्ञानप्राप्तिनिमित्तो वेदाध्ययनारम्भस्य नैरर्थ्क्यम् ।

 

एतद्ब्रह्मज्ञानं स्वतःसिद्धं भक्तिपदवाच्यञ्च । उक्तज्ञानस्य परिशुद्धिना विषयनिर्विषयात्मकस्य द्वन्दस्य परिहारेण तद्ज्ञानस्य भगवल्लक्ष्यत्वं भगवदनुशीलनञ्च प्रस्थापितम् तद्ज्ञानस्य भक्त्यात्मकत्वेन । अनेन विश्लेषणेन श्रीभगवतः निखिलाम्नायैकवैद्यत्वं प्रतिपादितम् ।

 

तृतीयप्रमेयाध्याये परिदृश्यमतः विश्वस्य परमसत्यत्वं व्याख्यातम् । जगतः क्षणभङ्गुरता वर्णिता । यत्र यत्र जगतः असत्यत्वमुक्तं तज्जगतः वर्तमानकाले तत्र तत्रैव वैराग्योत्पादनोद्देश्यपरिचालितेन तदुक्तेः सङ्गतिः । जगदसदुक्तिरसत्यत्वान्नोल्लिखिता जगतः । सृष्टे: प्रागेव संहारोत्तरकाले च यदसदुक्तिः दर्शिता शास्त्रेषु तत्राशयः वनलीनविहङ्ग इव सूक्ष्मास्तित्वद्योतकत्वम् ।

 

चतुर्थप्रमेयाध्याये भेदस्य परमसत्यत्वं निरूपितम् । जीवेश्वरयोः काल्पनिको/व्यावहारिको/प्रातिभासिको भेदो न वर्त्तते । अपितु वास्तवभेदस्य सिद्धिः । मुण्डककठोपनिषदो: (‘परम साम्यमुपैति’ + ‘तादृगेव’ + ‘मम साधर्म्यमागता:’) श्रीमद्भगवद्गीतायाश्चानेकानेकवाक्यैः मोक्षावस्थायामपि भेदोक्तिना तद्भेदस्य तात्त्विकत्वं प्रमाणितम् ।

 

चिज्जडात्मकप्रपञ्चस्य ब्रह्माधीनत्वात् यथा वागादीन्द्रियं प्राणशब्देन व्यपदिश्यते तथैव एषः प्रपञ्चोऽपि क्वचित्क्वचित् (‘सर्वम् खविदं ब्रह्म’ + ‘तत्त्वमसि’ + ‘अयमात्मा ब्रह्म’ + ‘सोऽहं’ + ‘प्रज्ञानं ब्रह्म’ – इत्यादि वाक्येषु) ब्रह्मशब्देन व्यपदिश्यते ।

 

केचिज्जनानां मन्तव्ये – इह जगति ब्रह्म व्याप्यरूपेण स्थितमतः जागतिकं किमपि वस्तु ब्रह्मशून्यं न वर्त्तते । अनेन हेतुना जगत्यपि ब्रह्म इति शब्दस्यारोपं भवति ।

 

शाङ्करमतस्य प्रतिबिम्बवादे प्रपञ्चात्मके विश्वे जीवस्य ब्रह्मप्रतिबिम्बत्वस्वीकृत्वेन निरुपाधिकब्रह्मणः विभुत्वं निर्विशेषत्वञ्चास्वीकृतम् सीमाबद्धस्य रूपध्वनिवतश्च वस्तुनः एव प्रतिबिम्बकारितायाः ।

 

शाङ्करमतस्य परिच्छेदवादेऽप्यपरिच्छिन्नब्रह्मणः परिच्छेदमसम्भाव्यम् । परिच्छेदस्य वास्तवत्वे टङ्कछिन्नपाषाणखण्डवत् ब्रह्मणः विकारित्वमप्यश्यम्भावीति । निष्कर्षेण मतद्व्यस्याग्राह्यत्वं सिद्धम् ।

 

शाङ्कर मतस्याद्वैतवादेऽपि जीवब्रह्मयो: भेदः वा अभेदः? भेदस्वीकारेण द्वैतापत्तिः । अभेदस्वीकारेण ‘अहं ब्रह्मास्मि’ / ‘तत्त्वमसि’ / ‘सर्वम् खल्विदं ब्रह्म’ – इत्यादिश्रौतवाक्येषु सिद्धसाधनतारूपदोषो जायते । यत्तत्त्वं स्वेन श्रुतिना वा सिद्धं भवति तस्यान्यरूपप्रतिपादनचेष्टा सिद्धसाधनतादोषरूपेण सञ्ज्ञिता भवति । (शुकोऽयं पक्षीति सिद्धसाधनतादोष:) अत्रोपनिषत्सु ‘ब्रह्म सर्वव्यापकम् विभुम्’ – इत्यादिवाक्यैः जीवजडयोः ब्रह्मणा साकमभेदं सिद्धम् तर्हि तद्ब्रह्मणः पुनः जीवजडयोः साकमभेदप्रतिपादनाय चेष्टा (‘तत्त्वमसि’ + ‘अहं ब्रह्मास्मि’ – इत्यादिवाक्यैः) केन हेतुना प्रेरिता?

 

निर्वेशेषब्रह्मणि नामरूपगुणक्रियादिवैशिष्ट्याभावात् तद्ब्रह्म प्रत्यक्षानुमानयोरगोचरमस्ति । तद्धेतुना निर्विशेषब्रह्म शब्दप्रमाणागम्यं तद्ब्रह्मणि प्रवृत्तिनिमित्तजातिगुणक्रियानामादीनामभावात् । पदार्थस्य शब्दप्रमाणगोचरत्वं स्यात्तत्पदार्थे प्रवृत्तिनिमित्तजातिगुणक्रियानामादीनामपेक्षत्वात् । निर्विशेषब्रह्मणि भागलक्षणाप्यसम्भाविता केन हेतुना? अभिधावृत्त्यगम्यवस्तुनः निर्वेशेषब्रह्मण: लक्षणायाः प्रवृत्तेरभावादिति निष्कर्षेणाद्वैतवादोऽग्राह्यः सर्वथा ।

 

(क्रमागतोऽयं लेखः)

 

 

 

भूमिका (क्रमागत ६-१७ पाठ)

 

 

प्रमेयरत्नावली के द्वितीय प्रमेय का निरुपण करने वाले अध्याय में श्रीहरि का सर्ववेदवेद्यत्व (समस्त वैदिक आम्नाय के द्वारा श्रीहरि की ज्ञेयता) वर्णित है । ब्रह्मसूत्र साक्षात् रूप से तथा अनान्य वेद समूह परम्पराक्रम (परोक्ष रूप से) से उन श्री हरि का प्रतिपादन करते है । शास्त्रों के जिन जिन स्थलों में ब्रह्म को वेदों के द्वारा अवाच्य के रूप में (वेदों के विषय न होने के रूप में) जो स्थापित किया गया है, वहाँ उस अनन्तस्वरूप ब्रह्म के विषयक अनन्तज्ञान की प्राप्ति जीव के पक्ष में असम्भाविता होने के कारण वैसा कहा गया है । उस ब्रह्म को वेदों का अवाच्य इसीलिये नही स्वीकारा है कि उस अनन्तस्वरूप ब्रह्म की खण्डानुभूति भी जीव के पक्ष में सम्भवपरा नहीं (क्योकि उस ब्रह्म की खण्डानुभूति/आंशिकी अनुभूति तो सम्भव है)! बल्कि उस ब्रह्म का वेदावाच्यत्व (वेदों के द्वारा ब्रह्म का वाच्य न होना) इसीलिये निर्धारित हुआ है क्योंकि सर्वांश में (अर्थात् अखण्डरूप से) उसकी पूर्णज्ञानप्राप्ति सम्भव नही । ऐसा न मानने पर (अर्थात् ब्रह्म को आत्यन्तिक रूप से वेदों का सर्वथा/हर प्रकार से अवाच्य स्वीकार करने पर) तो उस ब्रह्म के ज्ञान की प्राप्ति के लिये प्रारम्भ किया गया वेदादिशास्त्रों का अध्ययन भी निरर्थक/निष्प्रयोजन सिद्ध होगा! क्योकि जब वेदादिशास्त्रों का वह ब्रह्म किसी भी प्रकार से विषय ही नही हो सकता, तो वैसे ब्रह्म का परिज्ञान उन वेदादिशास्त्रों से भला कैसे सम्भवपर हो सकता है?

 

ऐसा यह ब्रह्मज्ञान स्वतःसिद्ध तथा ‘भक्ति’ (श्रीमद्भगवद्गीता के ‘भक्त्या मामभिजानाति…ततो मां तत्त्वतः ज्ञात्वा’ के आधार पर ऐसा ब्रह्मज्ञान भक्त्यात्मक है) शब्द का भी वाच्य है । ऐसा ज्ञान परिशुद्ध होने पर तथा विषय व निर्विषयात्मक द्वन्द्व (अर्थात् ज्ञान का विषय व ज्ञान का अविषय – ये दो प्रकार का द्वन्द्व) का परिहार (वर्जन) करते हुए श्रीभगवान् को लक्ष्य कर उनका अनुशीलन करता है व भक्त्यात्मक है । विषयनिर्विषयात्मक द्वन्द का तात्पर्य है कि ऐसे ब्रह्मज्ञान का विषय केवल ब्रह्म है तथा इसके अतिरिक्त अन्य कोई भी प्रकार का लौकिक व अलौकिक पदार्थ इस ब्रह्मज्ञान का न तो विषय है, और न ही अविषय है । ब्रह्मज्ञान ब्रह्मातिरिक्त (ब्रह्म को छोड कर) जब किसी पदार्थ का विषय ही नही, तब तो वह किसी भी ब्रह्मातिरिक्त पदार्थ का अविषय भी नही (क्योकि ‘अविषय’ शब्द ‘विषय’ शब्द से निर्मित है, अतः जब उसका कोई अन्य ‘विषय’ ही नही, तब तो उसका कोई अन्य ‘अविषय’ भी नही – विषय हो तभी तो अविषय के होने की सम्भावना उदिता होती है) इस विश्लेषण के द्वारा श्रीहरि/परब्रह्म का अखिलवेदप्रतिपाद्यत्व (समस्त वेदो के द्वारा श्रीहरि का प्रतिपादित होना) प्रमाणित होता है ।

 

 

तृतीय प्रमेय के निरूपक अध्याय में परिदृश्यमान (दिखायी देने वाला तथा पञ्चेन्द्रियों के द्वारा अनुभूति का विषय) जगत् की पारमार्थिकी सत्यता का वर्णन हुआ है । जगत् की क्षणभङ्गुरता भी स्वीकृता हुई है । उपनिषदादि शास्त्रों में जहाँ जहाँ पर जगत् को उसके वर्तमान काल में असत्य बताया गया है, वहाँ वहाँ पर मुमुक्षु जीव में वैराग्य के उत्पादन के उद्देश्य को लेकर वैसा कहा गया है । न कि जगत् की वस्तुतः (पारमार्थिक रूप से) असत्यता के कारण (जगत् तो कदापि असत्य है ही नही जो) । शास्त्रों में कहीं कहीं जगत् की जिस असत्यता का वर्णन उस जगत् की सृष्टि के पूर्व काल को लेकर किया गया है (अर्थात् जहाँ जहाँ पर शास्त्रों में यह कथित हुआ है कि सृष्टि से पूर्व जगत् ‘असत्य’ था), वहाँ वहाँ पर वैसे (जगत् को असत्य बताने वाले) कथन का तात्पर्य लेना है जगत् की सूक्ष्मरूपता में विद्यमानता का (सृष्टि से पूर्व) । सूक्ष्मरूप से विद्यमान वस्तु भी ‘असत्य’ कही जाती है दार्शनिक सन्दर्भ में । ये आवश्यक नहीं कि किसी पदार्थ के अस्तित्व का आत्यन्तिक रूप से अभाव होना ही ‘असत्य’ कहलाता हो । अतः सघन वन (जङ्गल/अरण्य) में लीन पक्षी की भाँति जगत् के स्थूल अस्तित्व का लय सृष्टि से पूर्व देखा जाता है व इसी कारण से (जगत् के सूक्ष्म अस्तित्व के कारण) जगत् की असत्यता प्रतिपादिता हुई है सृष्टि के पूर्वकाल व संहारोत्तर काल को लेकर ।

 

चतुर्थ प्रमेय के निरुपक अध्याय में जीव, जगत् तथा ईश्वर के मध्य व्याप्त भेद की पारमार्थिकी सत्यता का वर्णन है । जीव तथा ईश्वर/ब्रह्म  के बीच कोई काल्पनिक/प्रातिभासिक/व्यावहारिक भेद नही है । (ध्यातव्य है कि अद्वैतीयों/शाङ्करमतावलम्बीयों के पक्ष में जीव तथा ब्रह्म का भेद केवल व्यावहारिक स्तर पर है, पारमार्थिक रूप से नही) अपितु दोनों के बीच वास्तविक (पारमार्थिक) भेद की सिद्धि होती है । मुण्डकोपनिषद्, कठोपनिषद् तथा श्रीमद्भगवद्गीता के अनेकानेक वचनों के द्वारा (यथा – ‘परमसाम्यमुपैति’ + ‘तादृगेव’ + ‘मम साधर्म्यमागता:’) मोक्षावस्था में भी जीव व ईश्वर के बीच भेद की स्पष्टरूप से सिद्धि होने के कारण भेद की तात्त्विकता/पारमार्थिकता/वस्तुता को स्वीकारना पडेगा ।

 

जिस प्रकार से शास्त्रों में कहीं कहीं वागादीन्द्रियों को ‘प्राण’ शब्द से सूचित किया गया है उन वागादि इन्द्रियों की प्राण के उपर निर्भरता के कारण (भले ही प्राण तथा वे वागादि इन्द्रियाँ साङ्ख्यदर्शन के आधार पर परस्पर भिन्न क्यों न हो), ठीक वैसे ही, चिज्जडात्मक प्रपञ्च (चित् तथा अचित्/जड तत्त्वों के सम्मिश्रण से बना यह जगत्) के भी ब्रह्माधीन होने के कारण (जगत् ब्रह्म के अधीन है जो कि श्रीमद्भगवद्गीताशास्त्र के ‘मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव’ के द्वारा भी प्रमाणित है) कभी कभी शास्त्रों में जगत् को (जडभूत + जीवभूत) ‘ब्रह्म’ शब्द से निर्देशित करते हुए ब्रह्मरूप कहा गया है (यथा – ‘तत्त्वमसि’, ‘सर्वम् खलु इदं ब्रह्म’, ‘अयमात्मा ब्रह्म’, ‘सोऽहम्’, ‘प्रज्ञानं ब्रह्म’ – इत्यादि औपनिषदिक वाक्यों में) ।

 

किन्हीं किन्हीं व्यक्तियों के मत में चूँङ्कि इस जगत् में परब्रह्म ही सर्वत्र/सर्वदा सर्वव्यापक रूप से विद्यमान है, अतः जागतिक (जगत् की) कोई भी वस्तु ब्रह्म से शून्य नही मानी जा सकती (ब्रह्म की हर पदार्थ में व्यापिता/अनुस्यूतता होने के कारण) । इस कारण से भी ‘जगत्’ में ‘ब्रह्म’ शब्द का आरोप किया जाता है (वस्तुतः जगत् ब्रह्म नही होने पर भी) और जगत् को ‘ब्रह्म’ शब्द के द्वारा निर्देशित किया जाता है ।

 

शाङ्करमत के प्रतिबिम्बवाद में जहाँ जीव को परब्रह्म का प्रतिबिम्ब स्वीकार किया गया है, वहाँ वैसे स्वीकार कर लेने से उलटे शाङ्करमत की मूलभूता मान्यताएँ ही हानि को प्राप्त होती है । कैसे? क्योंकि यदि प्रपञ्चस्थित जीव को ब्रह्म का प्रतिबिम्ब स्वीकार कर लिया गया, तो ब्रह्म विभु तथा निर्विशेष नही रह पायेगा क्योंकि सीमाबद्ध (विभु पदार्थ कदापि सीमाबद्ध नही होता) तथा शब्दरूपादि गुणों से युक्त वस्तु (निर्विशेष ब्रह्म तो शब्दरूपादि गुणों से हीन है भला!) का ही प्रतिबिम्ब/प्रतिध्वन्यादि घटित होता है । और इस प्रकार से यदि ब्रह्म निर्विशेष नही रह पाया तब तो शाङ्करमत का मूलभूत ढाँचा ही समाप्त हो जायेगा!

 

शाङ्करमत के परिच्छेदवाद में भी अपरिच्छिन्न ब्रह्म (जो ब्रह्म कभी भी परिच्छेद का विषय न होता हो) का परिच्छेद असम्भाव्य है (परिच्छेद नही हो सकता)  । और यदि परिच्छेद को वास्तविक माना जाये तब तो फिर टङ्कच्छिन्न पाषाणखण्डवत् (हथौडे के द्वारा पर्वत से तोडे गये पत्थर के टूकडे की भाँति) ब्रह्म का भी विकारी होना अवश्यम्भावी हो जायेगा । और यदि ब्रह्म में विकारित्व के आभास को भी स्वीकार कर लिया गया, तब तो वेदान्तदर्शन का मूलभूत सिद्धान्त जो कि ब्रह्म को अविकारी मानता है – उसका विरोध होगा! अतः ये दोनो ही मत अग्राह्य है वेदान्त के यथार्थ अनुयायीयों के द्वारा ।

 

शाङ्करमत के अद्वैतवाद में भी जीव तथा ब्रह्म के बीच भेद अथवा अभेद है? (अभेद) अद्वैत में भेद (द्वैत) स्वीकार करने पर तो द्वैतापत्ति (अद्वैत है तो फिर द्वैत कैसे) हो जायेगी और अद्वैत ही समाप्त हो जायेगा! और यदि ‘अभेद’ (अद्वैत) स्वीकार कर लिया गया, तो भी उपनिषदों के ‘अहं ब्रह्मास्मि’, ‘सर्वम् खल्विदं ब्रह्म’ तथा ‘तत्त्वमसि’ – इत्यादि वाक्यों में ‘सिद्ध-साधनता’ नामक दोष आ जायेगा । कैसे? आईये देखते है ।

 

जो तत्त्व स्वयं (अपने आप – स्वयं प्रकाश तथा स्वतःसिद्ध होने के कारण – ब्रह्म को स्वतःसिद्ध व स्वयंप्रकाश माना गया है वेदान्त में)  के द्वारा अथवा श्रुतियों (उपनिषदादि शास्त्रों के द्वारा) से प्रमाणित होता है, उसका पुनः अन्य प्रकार से विवेचन करने की चेष्टा करना ही ‘सिद्धसाधनतादोष’ कहलाता है । जैसे कि कहना ‘यह तोता/शुक एक पक्षी है’ – यहाँ पर ‘शुक’ कहने मात्र से ही जब उसका पक्षीत्व सिद्ध होता है, तो फिर पुनः उसे पक्षी कहना ही ‘सिद्ध-साधनतादोष’ (अर्थात् जो बात/तथ्य एक बार प्रमाणित/सिद्ध हो चुका है, उसके पुनः अन्य उपायों से प्रमाणित/सिद्ध करने की चेष्टा करना) माना गया है । ठीक वैसे ही जब श्रुतियों ने कह दिया कि ब्रह्म सर्वव्यापक व विभु है (और अद्वैतियों ने ब्रह्म की इस सर्वव्यापकता/विभुता को अभेद/अद्वैत-परक मान लिया) – तो जब अद्वैतियों के मत में ब्रह्म की यह सर्वव्यापकता/विभुता ही ब्रह्म के जगत् तथा जीव के साथ अभेद/अद्वैत को सिद्ध करती है, तब फिर पुनः जीव तथा जगत् की ब्रह्माभिन्नता (ब्रह्म से उन दोनो की अभिन्नता) को ‘अहं ब्रह्मास्मि’, ‘तत्त्वमसि’ तथा ‘सर्वम् खलु इदं ब्रह्म’ – इत्यादि श्रौतवाक्यों से सिद्ध करने का प्रयास करना ही ‘सिद्ध-साधनता-दोष’ है ।

 

निर्विशेषब्रह्म में रूपध्वनि आदि गुणों के न होने से वह प्रत्यक्ष तथा अनुमान प्रमाणों का गोचर (विषय) भी नही हो सकता है । ऐसा ब्रह्म तो शब्दप्रमाणगम्य (शब्दप्रमाण/श्रुति प्रमाण का विषय) भी नही हो सकता है, उसमें (उस ब्रह्म में) ‘प्रवृत्ति’, ‘निमित्त’, ‘जाति’, ‘गुण’, ‘क्रिया’ तथा ‘नाम’ आदि लक्षण/विशेषताएँ (इन शब्दो के पारिभाषिक अर्थों को जानने के लिये न्याय व वैशेषिक दर्शन द्रष्टव्य है) न होने के कारण । शास्त्रप्रमाणगम्य बनने के लिये भी तो ब्रह्म में ‘प्रवृत्ति’, ‘निमित्त’, ‘जाति’, ‘गुण’ ‘क्रिया’ तथा ‘नाम’ आदि लक्षणों की अत्यन्त आवश्यकता/अपेक्षा है ।

 

निर्विशेषब्रह्म में ‘भागलक्षणा’ (जहत्-अजहत्-लक्षणा – एक प्रकार की शब्दों की गौणी वृत्ति अद्वैतीयों के द्वारा आविष्कृत) भी सम्भव नही है, क्योंकि जब एक बार ब्रह्म को अद्वैतियों ने ‘अभिधावृत्ति’ (शब्दों की मुख्या वृत्ति जिसके द्वारा मुख्य अर्थ का प्रकाश हो) का ही ‘अविषय’ (अगोचर) मान लिया, तब तो वैसी अभिधावृत्ति के द्वारा अगम्य/अविषयीभूत/अगोचर वस्तु/पदार्थ ब्रह्म में ‘लक्षणा-वृत्ति/गौणी वृत्ति’ की प्रवृत्ति (उसका प्रवेश ब्रह्मतत्त्व के निरुपण में) हो ही नही सकता! अतः लक्षणा के द्वारा भी अद्वैतियों का ब्रह्म प्रतिपाद्य नही! अतः अद्वैतवाद भी सर्वथा तिरस्करणीय है ।

 

(क्रमागत लेख)

 

 

 

Introduction (Serialized – 6th-17th Lessons)

 

 

In this second chapter of Prameya-ratnāvalī dedicated to the exposition on the second theological principle (dvitīya prameya), Śrī Hari is established as the sole depicted subject of the whole Veda. Directly, the Vedāntic corpus and indirectly, the other Vedic literature – do endeavour to expound on Śrī Hari. In those scriptural venues, wherein, brahma/Absolute has been considered as ‘non-expressible’(‘veda-avācya brahma’) by the Vedic word (because of its/brahma’s not being a subject of the Veda), it is to be understood that such ‘non-expression’ of brahma of unlimited existence (ananta-brahma-svarūpatā) is, merely, stated to dissipate the very possibility of acquiring unlimited knowledge of the unlimited brahma – on the part of a jīva (individual soul). It is not that brahma has been considered ‘non-expressible’ through the Vedas because of the whole impossibility of even the fragmental knowledge of brahman (brahma-jñānam) on jīva’s part (because, the fragmental/partial/limited knowledge of unlimited brahman is possible to be had by the jīva). Rather, such non-expressiveness (brahma-avācyatva) of brahma is advocated due to the impossibility of the unlimited knowledge regarding the unlimited brahma. If such is not accepted (and if it’s accepted that unlimited brahma cannot remain expressible through any means by the Veda, irrespective of limitedly or unlimitedly knowing brahma ‘brahma-ātyantika-avācyatva’), then even the commencement of the perusal of Vedas/Vedānta targeted for obtaining the knowledge pertaining to such a brahma shall turn irrelevant and futile (Because, in such a scenario, where brahma is, ultimately, inexpressible through the Vedas in any way – partial or whole – then, how can such a Vedic word grasp such an inexpressible Absolute/brahman as its depicted subject?).

 

Such knowledge about brahman is axiomatical/self-evident (svata-siddha) and is designated by the term ‘bhakti’ or devotion (vide the ‘bhaktyā mām abhijānāti…..tato māṁ tattvataātvā’ verse of Śrīmad-bhagavad-gītā). After its refinement, the said brahma-jñāna abolishes the duality of objectivity and non-objectivity (‘viaya’ and ‘aviaya’) i.e. the objectivity and non-objectivity of knowledge are transcended by such brahma-jñāna which cultivates the devotion to Bhagavān and is, thus, permeated with bhakti. That brahma is the sole objective of such brahma-jñāna and that such brahma-jñāna is fully devoid of any mundane or divine objective and non-objective other than brahma – is implied when brahma-jñāna is described as bereft of the duality of objectivity and  non-objectivity of knowledge. When brahma-jñāna is not ‘subjective’ to any other object other than brahma, then it is, also, implied that such brahma-jñāna is not ‘non-subjective’ to any other object than brahma. Why? Because, the terms ‘non-subjective’ and ‘non-objectivity’ are coined from the root words ‘subjective’ and ‘objective’. If ‘subjective’ is not existent, its dependent – ‘non-subjective’ cannot exist, too. Likewise, if ‘objectivity’ (viayattva) is not existential, ‘non-objectivity’ (aviayattva) cannot be actualized. For that reason, after transcending the duality of any mundane or divine objective and non-objective, brahma-jñāna, solely, targets the Absolute. By such analysis, Śrī Hari is established as the sole object propounded by the whole Vedic corpus.

 

In the third chapter describing the third theological principle, the phenomenal world to be experienced through the five-fold mundane senses is established as factually real. The transitory status of the phenomena has been described along with the allotment of the clarification over such scriptural assertions which pronounce the ephemeral world as literally ‘unreal’ (jagat-asatya) in its currently existential stage. Based on the clarification, whenever śrutis/upaniads/vedas address the visible world as unreal, their sole purpose is to awaken a strong fervent feeling for renunciation in the heart of a spiritual seeker. Not because that the world is factually unreal in ultimate sense that it has been designated as false/unreal. The world is never unreal any of its three stages viz., before its creation, after its created and after its dissolution.

 

In those portions of the scriptures wherein, the world is described as unreal before its creation, it has to be understood that the implication of such ‘worldly unreality’ (jagat-asatyatva) is towards the ‘subtlest existence’ (sūkma-rūpātmikā jagad-avasthiti) of the visible material world before its grossly experienced physical creation.  In oriental philosophical context, even an object in existence on an extremely subtle metaphysical plane is deemed ‘unreal’ or ‘asatya’. Hence, the concept of ‘unreality’ does not necessarily denote the total/ultimate (on any plane irrespective of physical or metaphysical) non-existence of an item – in all contexts. Hence, as analogous to a bird’s initial entrance and subsequent disappearance/merger into a dense rainforest, the presently manifest world exists in its subtlest compact form both before the creation and after the dissolution of the present phenomena. Such subtle existence (asad-rūpa) of the world both prior to the creation and after its dissolution – has been considered its ‘unreality’ or asatyatāin the Upaniṣads.

 

In the chapter depicting the fourth theological principle, the ultimately essential reality (pāramārthika-sattā-gata-bheda) of the five-fold distinction prevailing between the sentient individual souls (jīvas), the insentient material products (jaa) and the God Absolute (parabrahma) is described. Such distinction between the jīvas and brahma is not imaginary (kālpanika), nor an appearing reality (prātibhāsika) and not even the common worldly reality (vyāvahārika), but the essentially ultimate reality (pāramāthika) – in clear contrast to the Advaitins/monists (followers of the Śaṅkarite theology) who hold such a distinction only as vyāvahārika or on common worldly level. In numerous statements found in Muṇḍakopaniṣad, Kaṭhopaniṣad, Śrīmadbhagavadgītā (like ‘parama-sāmyam upaiti’, ‘tādg eva’, ‘parama-sādharymyam āgatāḥ’ etc. to name a few), a clear demarcation is made between the existential reality of the jīvas and that of the brahma – even after the state of liberation (mokottarāvasthā) – thus proving such a distinction on the plane of essentially ultimate reality (pāramārthika bheda) – in clear contravention with the Śaṅkarīte conclusion.

 

Just as in certain places in the scriptures, the senses like that of oration etc. (vāg-indriya) have been addressed as ‘prāṇa’ (vital air constituting the living force within the body) due to the formers’ dependence on the latter for its operation (senses cannot function without the inspiration of the prāṇa-vāyu) – despite the difference between those senses and the vital air (according to Sāṅkhya-darśanam); so similarly, this world constituted of the resultant conglomeration of the sentient and insentient beings (cij-jadātmaka-jagat) has been considered non-different from the Absolute Reality/brahma and has, thus, been addressed by the word ‘brahma’ as well. This, in no way, indicates that the world and the jīva is brahma or even non-different from brahma. At most, it indicates that the jagat and jīva (world and the living beings) are relying on brahma for their existence (brahmādhīna-sattāvān-jīva-jagat). This subordinate existence of the world and the living beings to that of the Absolute has been verified in the testimony of Śrīmad-bhagavad-gītā wherein, it is stated that just as pearls/flowers stay on the substratum of a thread, similarly the sentient cum insentient beings in the world exist on the power of Absolute Śrī Hari or para-brahma (‘..mayi sarvam ida prota sūtre maigaṇā iva…’). Hence, sometimes in the scriptures, the world or jagat (sentient + insentient) has been named as ‘brahma’ e.g. Upaniṣadic assertions like – ‘tat tvam asi’, ‘sarva khalu ida brahma’, ‘ayam ātmā brahma’, ‘so ‘ham’, ‘prajñāna brahma’ etc.

 

Whilst in the opinion of some people because the Absolute brahma is all-pervasive in the world at all times (jagad-vyāpitā), therefore, no worldly item – whether sentient or insentient – can be considered devoid of the presence of brahma within (inside) and without (outside) them (because of brahma’s innate presence throughout). For this reason, at times, the term ‘brahma’ is super-imposed on the world ‘jagat’ and thus, the world comes to be known as ‘brahma’ (though the world is, factually, not brahma).

 

In the theory of reflection (‘pratibimba-vāda’) sourced in the Śaṅkarite theology, wherein, the living entity (jīva) is considered the reflection of Absolute (brahma) – by such acceptance, the very fundamental beliefs of the Śaṅkarite philosophy are jeopardized and thus, put on stake. How? Let us examine. If a worldly constrained (within illusion) jīva is perceived as a reflection of the brahman,  then the said brahman shall not be able to stay anymore as omnipresent (vibhu) and as without specifications/variety (nirviśea) because, reflection/resonance (pratibimba/pratidhvani) of only those items occurs which are limited by space (deśa-kāla-sīmā-baddha and not vibhu) and which are characterized by attributes such as form and sound etc. (śabda-rupādi-gua-viśiṣṭa). Now, on one end, in the philosophy of the Śaṅkarites, the brahman in not limited by the adjuncts of time and space (deśa-kālopādhi-vinirmukta brahma) and is not characterized by any attributes such as form and sound etc. (śabda-rūpādi-gua-śūnya) and on the other end, this previous belief of theirs is negated when they accept the theory of reflection of the brahma. Such inconsistencies are in the very DNA of the theory of reflection. If the brahma could not be established as non-specified or nirviśea (devoid of any limiting adjunct and not characterized by any attribute), then the very fundamental structure of Śaṅkarite theology is dismantled, by default.

 

In the theory of division (‘pariccheda-vāda’) propounded upon by the monists of the Śaṅkarite order, also, many inconsistencies do prevail. The division (pariccheda) of the undividable (aparicchinna) brahma (that brahma which never becomes subject to any division) is an extinct (died out) possibility. And even if this division in the svarūpa (identity) of akhaṇḍa-brahma (whole undivided brahma) is deemed as factual, nevertheless, the mutation (vikāritva) of the otherwise non-mutable (avikārī or avikriya) brahma becomes undeniable as analogous to a chunk of stone cut, divided and separated from its mountainous source – thus explicitly contravening with the fundamental Vedāntic principle claiming the non-mutable status (avikārittva) of brahma perennially. Hence, both the above mentioned flawed theories of Śaṅkarīte Vedānta are worthy for despise by the true followers of the Vedavyāsa’s Vedānta.

 

In the theory of non-duality (advaita-vāda) accepted by the monists of Śaṅkarite order, does distinction (duality) or non-distinction (non-duality) exists between the brahma and jīva? If distinction or dvaita/bheda (between jīva and brahma) is accepted in non-duality/advaita, then the very spirit of non-distinction/advaita will be negated. If advaita is prevalent, no scope for the prevalence of dvaita remains (we are talking about the essentially ultimate real level or on the platform of pāramārthikī sattā). So, if dvaita is accepted, advaita will be negated. However, even if the advaita (non-distinctive non-duality) is accepted as prevalent in jīva and brahma, still, the ‘fault of perfecting the ever perfect’ (‘siddha-sādhanatā-doa’) shall arise in those Upaniṣadic assertions which are interpreted to support the doctrine of Advaita like – ‘aha brahmāsmi’ (‘I am brahma’), ‘sarva khalu ida brahma’ (‘All this is certainly brahma’) and ‘tat tvam asi’ (‘Thou art That brahma’) etc. What is the ‘fault of perfecting the ever perfect’ (‘siddha-sādhanatā-doa’) and how it is applicable in the above Upaniṣadic assertions if they are interpreted pro-Advaita? Let us examine.

 

That factual object (tattva) which (because of its being ‘self-illuminating’ and ‘self-evident’, brahma is known as ‘svata-siddha’ and ‘svaya-prakāśa’ in Vedāntic philosophy) is made evident either through itself (svaya siddha) or via the agency of scriptural statements such as the assertions of Upaniṣads (śruti-pramāṇa-siddha), an endeavour made to reanalyse such a self-illuminating (or illuminated by scriptures) object in another way constitutes ‘siddha-sādhanatā-dośa’. As for example, if it is said that – ‘This parrot is a bird’ – such an assertion contains the fault of perfecting that which is already perfect. How? Herein, by the very use of the term ‘parrot’, it is indicated that it is a bird. Again ascribing the status of a bird to it by annexing the term ‘bird’ – constitutes in a flaw of perfecting something which is already perfect in that capacity. Now, in the context of Upaniṣadic statements, if the śrutis have declared once that brahma is ‘sarva-vyāpaka’ (omnipresent) and ‘vibhu’ (unlimited) and if the Advaitins have interpreted this ‘sarva-vyāpitā’ (omnipresence) and ‘vibhuttva’ (all-pervasiveness) to be supporting the concept of advaita (non-duality/non-distinction) between jīva and brahma, then, on the part of Advaitins, to reanalyse the concept of advaita through different ways by interpreting the statements like ‘aha brahmāsmi’, ‘tat tvam asi’ and ‘sarva khalu ida brahma’ to support advaita – constitutes siddha-sādhanatā-doa (to again and again verify by employing various means that which has been validated too many times before).

 

Due to the absence of qualities like sound, form etc. in the non-specified Absolute (sarva-gua-vihīna nirviśea-brahma), such brahma cannot become an object (viaya) of the valid testimonies (pramāṇas) like ‘pratyaka’ (direct perception) and ‘anumāna’ (inference). Such nirviśea-brahma cannot become an object of the scriptural testimony (śabda-pramāṇa) as well – because of its remaining devoid of specifications like ‘pravtti’, (indulgence) ‘nimitta’, (instrumental) ‘jāti’, (type) ‘gua’, (quality) ‘kriyā (activity) & ‘nāma’ (name) etc. (Vide the Nyāya and Vaiśeṣika systems of philosophy for knowing the technical meanings of these words). Even for becoming an object of the scriptures (śāstra/śabda-pramāṇa-viaya), the non-specified brahma direly needs to be specified (saviśea) by endowing itself with characteristics such as ‘pravtti’, ‘nimitta’ etc. A non-specified Absolute cannot become an object of the scriptures even!

 

While analysing such a non-specified Absolute (nirviśea-brahma), even the application of the ‘bhāga-lakaṇā (‘jahat-ajahat-lakaṇā– one type of secondary potency of words to express secondary meanings – a technique invented by the Advaitins) is not possible because, when Advaitins accepted their non-specified brahma as not an object (aviaya/agocara) of the words conveyed by the ‘abhidhā-vtti’, then the brahma (of Advaitins) which is not an object of the abhidhā-vtti/mukhyā-vtti (technique of deriving the main meanings out)– cannot, also, become an object of the words conveyed through the lakaṇā-vtti/gauṇī-vtti (secondary meaning technique). Hence, the nirviśea-brahma of the Advaitins is not expressible even through the usage of the laskaṇā technique. Hence, the theory of Monism alias Advaita-vāda is to be rejected all together.

 

(Contd. analysis)

 

  • भक्तिरसवेदान्तपीठाधीश्वरा: आचार्यश्री: गुरुपादा: / भक्तिरसवेदान्तपीठाधीश्वर आचार्य श्री गुरुपाद / Bhaktirasavedāntapīṭhāḍhīśvara Ācārya Śrī Gurupāda

(आणन्द, गुजरात, भारत / Anand, Gujarat, Bhārata)

 

सूत्रम् / सूत्र / Link — https://goo.gl/mFTmoN

Leave a Reply

Please log in using one of these methods to post your comment:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s