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क्या वेदादि ग्रन्थों में वर्णित विष्णु आदि सञ्ज्ञाएँ केवल प्रकृति के अस्तित्व की वाचिका है या उन विष्णु आदि देवों की वाचिका है?

 

जिन लोगों को मत में वेदब्राह्मणादि ग्रन्थों में जिन विष्णु, रुद्र, इन्द्रादि सञ्ज्ञाओं का उल्लेख हुआ है, वे सञ्ज्ञाएँ पौराणिक व आगम ग्रन्थो में वर्णित विष्णु, रुद्र आदि देवताओं से पृथक् है तथा केवल प्रकृति के विभिन्न रूपों की सूचक है (यथा ‘अग्नि’ को अग्नि नामक देव न मानकर उसको केवल अग्नि नामक ज्वलनशील पदार्थ मानना आदि) – उनका मत ध्वस्त हो जाता है शुक्लयजुर्वेदीय शतपथ ब्राह्मण १४.१.१.५ में जहाँ पर उल्लिखित हुआ है कि – ‘तद्विष्णुं प्रथमं प्राप स देवतानां श्रेष्ठोऽभवत्’ – अर्थात् ‘वह विष्णु प्रथम स्थान को प्राप्त हुआ व देवताओं में श्रेष्ठ बना’ । पुनः ऋग्वेदीय शाकलशाखीय ऐतरेय ब्राह्मण १.१.१. में उल्लिखित है कि – ‘अग्निर्वै देवनामवमो विष्णुः परमस्तदन्तरेण सर्वा अन्या देवता’  अर्थात् ‘अग्नि समस्त देवताओं में अधम है; विष्णु समस्त देवों में परम है तथा उन दोनों के मध्य में अन्य समस्त देवताओं की स्थिति है’ । जहाँ कही भी वेदपुराणादि शास्त्रों में विष्णु के अतिरिक्त अन्य देवताओं का परमतम रूप में स्तवन देखा जाता है, वहाँ उन सूर्यब्रह्मरुद्रेन्द्रादि देवताओं के हृदयाकाश में अन्तर्वर्ती परमात्मा के रूप में स्थित विष्णु का ही स्तवन अभिप्रेत है एवं भाल्लवेय श्रुति का तो यहाँ तक कथन है कि – ‘नामानि विश्वाऽभि न सन्ति लोके यदाविरासीदनृतस्य सर्वम् । नामानि सर्वाणि यमाविशन्ति तं वै विष्णुं परममुदाहरन्ति ।’  – अर्थात् ‘समस्त नाम/सञ्ज्ञा/पदों/अभिधाओं/वाचकों/शब्दों (देवभाषा संस्कृत में) के द्वारा विष्ण्वातिरिक्त अन्य किसी भी अर्थ को लेना उन शब्दों का शाश्वत अर्थ नही माना जा सकता । अतः केवल विष्णु ही समस्त अभिधाओं/नामों के द्वारा परमतम शाश्वत रूप से वाच्य/अभिधेय है ।’ – इन साक्ष्यों के आधार पर जहाँ भी रुद्रब्रह्मेन्द्रादि देवताओं का परमरूप में उल्लेख हुआ है, वहा वे ब्रह्मरुद्रेन्द्रादि देवता अभिप्रेत न होकर केवल विष्णु ही उन सञ्ज्ञाओं के परमतम/मुख्यतम वाच्य होने के कारण अभिप्रेत है । अतः पुनः पद्मपुराण के आधार पर भी ‘आत्मा’ शब्द के बहुतेरे अर्थ होनें पर भी उसकी भी मुख्यवृत्ति (मुख्यार्थ) परमात्मा विष्णु/जनार्दन/वासुदेव  से ही है, न कि ब्रह्मा आदि देवताओं (जीवात्माओ) से । प्रमाण –

 

“चेतनस्तु द्विधा प्रोक्तो जीव आत्मेति च प्रभो । जीवा: ब्रह्मादयः प्रोक्ता आत्मैकस्तु जनार्दनः ।।

इतरेष्वात्मशब्दस्तु सोपचारः प्रयुज्यते । तस्यात्मनो निर्गुणस्य ज्ञानान्मोक्ष उदाहृतः ।।

सगुणस्त्वपरे प्रोक्ताः तज्ज्ञानान्नैवमुच्यते । परे हि पुरुषो विष्णुः तस्मान्मोक्षस्ततः स्मृतः ।।“ (पद्मपुराणे)

 

अर्थात् –

 

“दो प्रकार के चेतन पदार्थ है – क) जीव व ख) आत्मा । जीव तो ब्रह्मा आदि है व आत्मा केवल जनार्दन है (श्रौतरूढी में) । श्री वासुदेव के अतिरिक्त अन्यत्र किसी पदार्थ के लिये  (जीवों के सन्दर्भ में) ‘आत्मा’ शब्द का प्रयोग देखा जाता है तो वैसे प्रयोग को केवल उपचार अर्थात् गौण अर्थ में लेना चाहिये (मुख्य अर्थ में आत्मा शब्द केवल वासुदेव का परिचायक है, जीवो का नही).. ।”

 

पुनः नारायणश्रुति भी ‘अहं ब्रह्मास्मि’ औपनिषदिक वाक्य की व्याख्या करते हुए ‘अहं’ आदि समस्त अभिधाओं के मुख्यतम वाच्य के रूप में केवल श्रीविष्णु को प्रस्थापित करती है –

 

अहम्ब्रह्मास्मि’ (शुक्लयजुर्वेदीया बृहदारण्यकोपनिषद्)

 

नारायण श्रुति में ‘अहं ब्रह्मास्मि’ का व्याख्यान इस प्रकार से दिया गया है –

 

“अहं नामा हरिर्नित्यमहेयत्त्वात्प्रकीर्त्तितः । त्वञ्चासौ प्रतियोगित्त्वात्परोक्षत्त्वात्स इत्यपि ।।

सर्वान्तर्यामिणि हरावस्मच्छब्दविभक्तयः । युष्मच्छब्दगताश्चैव सर्वास्तच्छब्दगा अपि ।।

सर्वशब्दगताश्चैव वचनान्यखिलान्यपि । स्वतन्त्रत्त्वात्प्रवर्त्तन्ते व्यावृत्तेऽप्यखिलात्सदा ।।

तत्सम्बन्धात्तु जीवेषु तत्सम्बन्धादचित्स्वपि । वर्तन्त उपचारेण तिङ्पदान्यखिलान्यपि । तस्मात् सर्वगतो विष्णुरेको भिच्च ततो बहुः ।।“

 

अर्थात् –

 

“क) हरि नित्य ‘अहं’ पदवाच्य है अहेय तथा सर्वोत्तम (समस्त हेयता व दोषो से रहित) होने के कारण । प्रमाण – ‘सर्वोत्तमं सर्वदोषव्यपेतं गुणैः अशेषैः पूर्णमन्यं समस्तात् । वैलक्षण्यात् ज्ञापयितुं प्रवृत्ता: सर्वे वेदाः मुख्यतो चैव नान्यत् ।।’

 

ख) वे प्रतियोगी अर्थात् सकलसृष्टपदार्थो से आगे / पूर्व में होने के कारण {‘एको ह वै नारायण आसीत् न ब्रह्मा नेशानः’ – ‘निश्चिद्रूपेण एक नारायण ही थे सृष्टि के पूर्व में, न ब्रह्मा थे, न ईशान/शङ्कर’ (महोपनिषद्) तथा  – ‘ब्रह्म वा इदमग्र आसीत्’ (बृहदारण्यकोपनिषद् १.४.१०) – ‘एक ब्रह्म ही इस सृष्टि से पहले था’}  — ‘त्वं’ पदवाच्य है ।

 

ग) और परोक्ष अर्थात् लौकिक इन्द्रियातीत होने के कारण ‘सः’ पदवाच्य है । प्रमाण – ‘यतो वाचो निवर्त्तन्ते अप्राप्य मनसा सह’ — तैत्तिरीयोपनिषद २.९.१

 

‘अस्मद्’ व ‘युष्मत्’ (सर्वनाम) वर्ग की समस्त विभक्तियों (सप्त कारक विभक्तिया) व वचनों (एकवचन, द्विवचन, बहुवचन) के रूप सर्वभूतान्तर्यामी श्रीहरि को ही व्यपदिष्ट (बताते) करते है (औपनिषदिक सन्दर्भ में) । सभी क्रमाङ्क भी उन्हीं परब्रह्म श्रीहरि को ही सूचित करते हैं । ये सभी (अस्मद्युष्मदादि शब्द व क्रमाङ्क) परम अर्थ में केवल श्रीहरि को ही प्रतिपादित करते हैं, उन श्रीहरि के परमस्वतन्त्रत्त्व व परमत्व के कारण । ये सभी पद/शब्द/क्रमाङ्क जीवगण तथा जडसमुदाय के पदार्थों/वस्तुओं को केवल उपचार से (गौण रूप से) सूचित करते हैं । ‘सुप् – तिङ्न्तादि’ धातु व नाम प्रत्यय भी श्री हरि के ही मुख्यरूप से व्यञ्जक (सूचक/वाचक) है (गौण अर्थ में ही अन्य पदार्थों के वे वाचक है) – क्योंकि श्रीविष्णु ही अखिल जगत् में व्याप्त है, उन व्याप्य पदार्थों से (जीवगण तथा जडभूत से) भिन्न है तथा एक होते हुये भी अनेक रूपों में प्रकाशित होते हैं (अनेक भगवत्स्वरूपों के द्वारा यथा राम, कृष्णादि) ।“

 

– नारायण श्रुति

 

 

निष्कर्ष –

 

‘अहं’ शब्द का परम अर्थ (गौण अर्थ नही) – श्रीहरि है, तथा ‘अस्मि’ क्रियापद (तिङ्न्तपद) का भी परम अर्थ (श्रुति के सन्दर्भ में – लोकव्यवहार में नही) श्री हरि होते है, नारायणश्रुति के उपरुद्धृत वचनों के आधार पर । इस प्रकार ‘अहं ब्रह्म अस्मि’ का तात्पर्य निकलता है – ‘अहेयस्वरूप (अहं) नित्य हरि (ब्रह्म) है (अस्मि)’ – ‘मै जीव (अहं) परब्रह्म (ब्रह्म) हूँ (अस्मि)’ – ये अर्थ नारायणश्रुति के द्वारा परिभाषित ‘अहं ब्रह्मास्मि’ के अर्थ से विरोध में होने के कारण काल्पनिक है ।

 

Some other clarifications regarding the supremacy of Śrī Viṣṇu –

 

1) If Śaivaites assert the excellence of Śiva over Viṣṇu by citing Śiva-mahimna-stotram’s incidence wherein, it is mentioned that Śiva gave Sudarśana-cakram to Viṣṇu, let us, also, mention that even in Mahābhārata’s Ādi-parva’s last chapters where the incidence of Khāṇḍava-dāha or the forest fire in the Khāṇḍava forest has been depicted, even Agnideva or Fire God has given the Gāṇḍīva bow to Arjuna and Sudarśana-cakram to Dvārakādhīśa Kṛṣṇa. So, should Agni be considered a superior God to Viṣṇu in contravention with the explicit assertion of Ṛgveda’s Aitareya Brāhmaṇa 1.1.1. wherein it is stated that Agnideva is the lowest among all Gods and Viṣṇu is the highest (‘agnir vai devānam avamo viṣṇu paramas tad-antarea sarvā anyā devatā)? No. Absolutely not. Just because Śiva or Agni gave Sudarśana disc to Viṣṇu/Kṛṣṇa does not tantamount to the formers’ supremacy on the latter. Otherwise, when same Viṣṇu appeared in the form of Vāmanadeva/Upendra as the son of Aditidevī and Kaśyapa Prajāpati (refer to Śrīmad-bhāgavatam’s 8th Canto and the same incidence mentioned in other Purāṇas as well), all devatās (demigods/gods) gave some and some paraphernalia to Vāmanadeva. Does it mean they were all superior to Him? Was Lakṣmī not existing prior to Her re-advent during the churning of the milky ocean in Satya-yuga? Absolutely, She is eternally existing in Vaikuṇṭha. Similarly, Sudarśana disc is possessed by Kṛṣna/Viṣṇu eternally. Only when These bhagavat-svarūpas descend onto the mortal platform in Their various incarnations, for the sake of creating variegated charm in the pastimes of the Lord, various demigods supply the Supreme God Viṣṇu/Kṛṣṇa with His own eternally belonging items like Sudarśana-cakra, Kaustubha jewel etc. This is all arranged by Yogamāyā potency who is given the power to make the pastimes of the Lord more pleasurable by infusing Those līlās with variety.

 

2) Mahābhārata 12.341.16-32 – (Śāntiparva — Dialogue between Lord Kṛṣṇa and Arjuna):

 

aniruddha iti prokto lokānāṁ prabhavāpyaya / brāhme rātri-kaye prāpte tasya hy amita-tejasa // prasādāt prādurbhavat padma padmanibhekaa / tato brahmā samabhavat sa tasyaiva prasādaja //

 

In the Brāhma-muḥurtta, at the end of the night, due to the mercy of the extremely brilliant Lord, a lotus emerged from His navel and in that lotus, Brahmā was born, of course, due to His grace.

 

ahna kaye lalāṭācca suto devasya vai tathā / krodhāviṣṭasya sañjajñe rudra samhāra-kāraka // etau dvau vibhudha-śreṣṭhau prasāda-krodhajāvubhau /

 

At the end of the day, the Lord [present as antaryāmī or indwelling monitor in the heart of Brahmā*] created Rudra (Śiva) out of krodha-gua (quality of anger), to enable him to be the ‘samhāra-karttā’ (destroyer of the worlds). Thus, these two ‘fine-among-wise’, Brahmā and Rudra, are known to have been born out of grace and anger (qualities of Śrī Hari) respectively.

 

* This interpretation is necessary because in the later sections of Mokṣadharma section of Mahābhārata, Brahmā addresses Rudra as a son.

 

tadādeśita-panthānau śrṣṭi-samhāra-kārakau // nimitta-mātram tāvatra sarva-prāṇi-vara-pradau /

 

Thus, they carry out the instructed tasks of creation and destruction. However, they (Rudra and Brahmā), the givers of boons to all the creatures, are just the agents.

 

kapardī jailo muna śmaśāna-gha-sevaka // ugra-vrata-caro rudro yogī parama-dārua / dakśa-kratu-haraścaiva bhaga-netra-haras tathā //

 

[Rudra has] braided hair with knot of an ascetic and rest of the head bald. He dwells in the home of graveyard, steadfast on vigorous penance as a yogī. He is ferocious to Triurpāsura (Tripua Demon), destroyed Dakṣa-yajña and took away the eyes of Bhagadevatā.

 

nārāyaṇātmako jñeya pāṇḍaveya yuge yuge /

 

O Arjuna, know that in every yuga (eon), Rudra is ‘nārāyaṇātmaka‘. (This phrase literally means – ‘One whose indweller or antaryāmīātmā is Nārāyaa or the second literary meaning is – ‘One who is always immersed in Nārāyaṇa’ – such Śiva/Rudra.)

 

tasmin hi pūjyamāne vai deva-deve maheśvare // sampūjito bhavet pārtha devo nārāyaa prabhu /

 

It is the Lord, the prabhu, the Nārayaṇa *IN* Maheśvara/Rudra/Śiva (Maheśvara – an adjective to Śiva means – the worshipable, the lord of the devas), who is actually worshiped.

 

aham ātmā hi lokānāṁ viśveśāṁ pānu-nandana // tasmād ātmānam eva agre rūdra sampūjayāmyaham / yady aha nārcayeya vai īśāna varada śivam //  ātmāna nārcayet kaścit iti me bhāvitātmana /

 

O son of Pāṇḍu, I am, indeed, the ātmā (or super-soul), the indweller of this universe and the worlds. Therefore, I worship myself first, even when I worship Rudra. If I did not worship Rudra, the bestower of boons, in such a way (i.e., worshiping the indwelling Lord first), some would not worship Me, the indwelling Lord, at all – this is my opinion.

 

mayā pramāṇa hi kta loka samanuvartate // pramāṇāni hi pūjyāni tatas ta pūjayāmya aham /

 

Whatever I follow and give due worth as a pramāṇa (or validly established precedent/ideal), the world follows that. Such pramāṇas have to be duly followed; therefore I follow them.

 

yas ta vetti sa māṁ vetti yo anu ta sa hi mām anu // rūdro nārāyaaś caiva sattvam eka dvidhā ktam / loke carati kaunteya vyaktistha sarva-karmasu //

 

Whoever knows him, knows Me. Whoever follows him, follows Me. (Though) the world, in all its actions, worships two gods, Rudra and Nārāyaṇa, it is actually one only who is worshiped.

 

na hi me kenacid deyo vara pāṇḍava-nandana / iti sañcintya manasā purāṇa rūdram īśvaram // putrārtham ārādhitavān ayam ātmānam ātmanā /

 

O Son of Pāṇḍu, there is, of course, nobody who can grant Me boons. Knowing that well, I worship Myself, Who am the beginningless and universal power, known as Sarveśvara, for the sake of getting sons.

 

na hi viṣṇu praamati kasmaicid vibudhāya ca // te ātmānam eveti tato rūdra bhajāmy aham /

 

Indeed Viṣṇu does not bow to any one and [even when He bows to Himself], for what sake, but for the sake of showing the path to the wise. Therefore, it is the truth that I worship myself even when I worship Rudra.

 

sa-brahmakāḥ sa-rudrāśca sendrā-devāḥ saharibhi // arcayanti sura-śreṣṭha deva nārāyaa harim / bhaviyatāṁ vartatāṁ ca bhūtānāṁ caiva bhārata // sarveṣām agraṇīr viṣṇu sevya pūjyaś ca nityaśa / namasva havyada viṣṇu tathā śaraada nama //

 

Along with Brahmā, his associates, Rudra/Śiva, his associates, Indra, other demigods/devatās and all types of sages (ṛsis) – these all worship the topmost of all Gods viz., Nārāyaṇa Hari. Among all beings of the past, present and future, O scion of Bharata (Arjuna), Viṣṇu is foremost and hence, He is to be worshiped and devoted to at all times. Our obeisance to that Viṣṇu Who is the bestower of asylum…

 

 

 

  • भक्तिरसवेदान्तपीठाधीश्वर आचार्य श्री गुरुपाद / Bhaktirasavedāntapīṭhādhīśvara Ācārya Śrī Gurupāda

 

सूत्रम् / Link — https://goo.gl/nXJfhM

 

 

 

 

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