Mahavakyas

 

१) ‘अहम्ब्रह्मास्मि’ (शुक्लयजुर्वेदीया बृहदारण्यकोपनिषद्)

 

नारायण श्रुति में ‘अहं ब्रह्मास्मि’ का व्याख्यान इस प्रकार से दिया गया है –

 

“अहं नामा हरिर्नित्यमहेयत्त्वात्प्रकीर्त्तितः । त्वञ्चासौ प्रतियोगित्त्वात्परोक्षत्त्वात्स इत्यपि ।।

सर्वान्तर्यामिणि हरावस्मच्छब्दविभक्तयः । युष्मच्छब्दगताश्चैव सर्वास्तच्छब्दगा अपि ।।

सर्वशब्दगताश्चैव वचनान्यखिलान्यपि । स्वतन्त्रत्त्वात्प्रवर्त्तन्ते व्यावृत्तेऽप्यखिलात्सदा ।।

तत्सम्बन्धात्तु जीवेषु तत्सम्बन्धादचित्स्वपि । वर्तन्त उपचारेण तिङ्पदान्यखिलान्यपि । तस्मात् सर्वगतो विष्णुरेको भिच्च ततो बहुः ।।“

 

अर्थात् –

 

“क) हरि नित्य ‘अहं’ पदवाच्य है अहेय तथा सर्वोत्तम (समस्त हेयता व दोषो से रहित) होने के कारण । प्रमाण – ‘सर्वोत्तमं सर्वदोषव्यपेतं गुणैः अशेषैः पूर्णमन्यं समस्तात् । वैलक्षण्यात् ज्ञापयितुं प्रवृत्ता: सर्वे वेदाः मुख्यतो चैव नान्यत् ।।‘

 

ख) वे प्रतियोगी अर्थात् सकलसृष्टपदार्थो से आगे / पूर्व में होने के कारण {‘एको ह वै नारायण आसीत् न ब्रह्मा नेशानः’ – ‘निश्चिद्रूपेण एक नारायण ही थे सृष्टि के पूर्व में, न ब्रह्मा थे, न ईशान/शङ्कर’ (महोपनिषद्) तथा  – ‘ब्रह्म वा इदमग्र आसीत्’ (बृहदारण्यकोपनिषद् १.४.१०) – ‘एक ब्रह्म ही इस सृष्टि से पहले था’}  — ‘त्वं’ पदवाच्य है ।

 

ग) और परोक्ष अर्थात् लौकिक इन्द्रियातीत होने के कारण ‘सः’ पदवाच्य है । प्रमाण – ‘यतो वाचो निवर्त्तन्ते अप्राप्य मनसा सह’ — तैत्तिरीयोपनिषद २.९.१

 

‘अस्मद्’ व ‘युष्मत्’ (सर्वनाम) वर्ग की समस्त विभक्तियों (सप्त कारक विभक्तिया) व वचनों (एकवचन, द्विवचन, बहुवचन) के रूप सर्वभूतान्तर्यामी श्रीहरि को ही व्यपदिष्ट (बताते) करते है (औपनिषदिक सन्दर्भ में) । सभी क्रमाङ्क भी उन्हीं परब्रह्म श्रीहरि को ही सूचित करते हैं । ये सभी (अस्मद्युष्मदादि शब्द व क्रमाङ्क) परम अर्थ में केवल श्रीहरि को ही प्रतिपादित करते हैं, उन श्रीहरि के परमस्वतन्त्रत्त्व व परमत्व के कारण । ये सभी पद/शब्द/क्रमाङ्क जीवगण तथा जडसमुदाय के पदार्थों/वस्तुओं को केवल उपचार से (गौण रूप से) सूचित करते हैं । ‘सुप् – तिङ्न्तादि’ धातु व नाम प्रत्यय भी श्री हरि के ही मुख्यरूप से व्यञ्जक (सूचक/वाचक) है (गौण अर्थ में ही अन्य पदार्थों के वे वाचक है) – क्योंकि श्रीविष्णु ही अखिल जगत् में व्याप्त है, उन व्याप्य पदार्थों से (जीवगण तथा जडभूत से) भिन्न है तथा एक होते हुये भी अनेक रूपों में प्रकाशित होते हैं (अनेक भगवत्स्वरूपों के द्वारा यथा राम, कृष्णादि) ।“

 

– नारायण श्रुति

 

 

निष्कर्ष –

 

‘अहं’ शब्द का परम अर्थ (गौण अर्थ नही) – श्रीहरि है, तथा ‘अस्मि’ क्रियापद (तिङ्न्तपद) का भी परम अर्थ (श्रुति के सन्दर्भ में – लोकव्यवहार में नही) श्री हरि होते है, नारायणश्रुति के उपरुद्धृत वचनों के आधार पर । इस प्रकार ‘अहं ब्रह्म अस्मि’ का तात्पर्य निकलता है – ‘अहेयस्वरूप (अहं) नित्य हरि (ब्रह्म) है (अस्मि)’ – ‘मै जीव (अहं) परब्रह्म (ब्रह्म) हूँ (अस्मि)’ – ये अर्थ नारायणश्रुति के द्वारा परिभाषित ‘अहं ब्रह्मास्मि’ के अर्थ से विरोध में होने के कारण काल्पनिक है ।

 

 

 

 

२) ‘तत्त्वमसि’ (सामवेदीया छान्दोग्योपनिषद्)

 

श्रीमद्भगवद्गीता के ‘ॐ तत्सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृतः’ के आधार पर परब्रह्म श्रीहरि ‘ॐ’, ‘तत्’ व ‘सत्’ – इन तीन संज्ञाओं से जाने जाते है सूत्ररूप में । तब तो ‘तत्त्वमसि’ में प्रयुक्त ‘तत्’ पद श्रीहरि का ही मुख्यरूपेण (श्रुति/उपनिषद् के सन्दर्भ में) अभिव्यञ्जक है । तथा उपर में ‘अहं ब्रह्मास्मि’ के व्याख्यान के उपलक्ष्य में दिये है नारायणश्रुति के साक्ष्य पर ‘त्वं’ पद भी श्रीहरि का ही सूचक है मुख्यार्थ में  । उसी नारायणश्रुति के साक्ष्य पर समस्त क्रियापद व सर्वनाम यथा – ‘असि’, ‘अस्मि’ – आदि भी श्री हरि की ही सत्ता के सूचक है श्रुतिसन्दर्भ में । अतः ‘तत् त्वं असि’ का अर्थ ‘तुम जीव (त्वं) वह परब्रह्म (तत्) हो (असि)’ – ऐसा न निकलकर, यह निकलता है कि ‘परब्रह्म (तत्) ही विष्णु/हरि (त्वं) है (असि)’ ।

 

 

 

 

३) ‘अयमात्मा ब्रह्म’ (अथर्ववेदीया माण्डूक्योपनिषद्)

 

नारायणश्रुति के आधार पर ‘अयं’ शब्द भी श्रुति/उपनिषद् के पारिभाषिक सन्दर्भ में सर्वनामान्तर्गत होने के कारण श्री हरि का द्योतक है व वेदान्तादि शास्त्रों में ‘आत्मा’ शब्द की भी मुख्यवृत्ति (अर्थ) परमात्मा से ही है, न कि जीवात्मा से । प्रमाण –

 

“चेतनस्तु द्विधा प्रोक्तो जीव आत्मेति च प्रभो । जीवा: ब्रह्मादयः प्रोक्ता आत्मैकस्तु जनार्दनः ।।

इतरेष्वात्मशब्दस्तु सोपचारः प्रयुज्यते । तस्यात्मनो निर्गुणस्य ज्ञानान्मोक्ष उदाहृतः ।।

सगुणस्त्वपरे प्रोक्ताः तज्ज्ञानान्नैवमुच्यते । परे हि पुरुषो विष्णुः तस्मान्मोक्षस्ततः स्मृतः ।।“ (पद्मपुराणे)

 

अर्थात् –

 

“दो प्रकार के चेतन पदार्थ है – क) जीव व ख) आत्मा । जीव तो ब्रह्मा आदि है व आत्मा केवल जनार्दन है (श्रौतरूढी में) । श्री वासुदेव के अतिरिक्त अन्यत्र किसी पदार्थ के लिये  (जीवों के सन्दर्भ में) ‘आत्मा’ शब्द का प्रयोग देखा जाता है तो वैसे प्रयोग को केवल उपचार अर्थात् गौण अर्थ में लेना चाहिये (मुख्य अर्थ में आत्मा शब्द केवल वासुदेव का परिचायक है, जीवो का नही).. ।“

 

वैसे ही ‘ब्रह्म’ शब्द का भी मुख्य श्रौत/औपनिषदिक रूढी अर्थ केवल श्रीहरि से है जो कि अर्जुन की श्रीमद्भगवद्गीतोक्ति (गीता १०.१२) से भी स्पष्ट है – “परम् ब्रह्म परम् धाम पवित्रं परमं भवान्….” ।

 

निष्कर्ष –

 

अतः ‘अयमात्मा ब्रह्म’ का अर्थ ‘यह जीवात्मा (अयमात्मा) ही परब्रह्म है (ब्रह्म)’ – ऐसा न होकर, यह है कि – ‘यह विष्णु (अयं) रूपी परमात्मा/वासुदेव (आत्मा) ही ब्रह्म है (ब्रह्म) ।

 

 

 

 

४) ‘प्रज्ञानम्ब्रह्म’ (ऋग्वेदीया ऐतरेयोपनिषद्)

 

श्रीमद्भागवत १.२.११ (‘.यज्ज्ञानमद्वयम्…’) के आधार पर ‘ब्रह्म’, ‘परमात्मा’, ‘भगवान्’ – इन तीन संज्ञाओं का धारक परतत्त्व (हरि) ही अद्वयज्ञानस्वरूप (ज्ञान, ज्ञाता व ज्ञेय का भेद जहा विलुप्त है क्योंकि वे श्रीहरि ही श्रीमद्भागवत ७.११.७ ‘…सर्ववेदमयो हरिः…’ के आधार पर सर्वज्ञानमय है – वेद शब्द का अर्थ ज्ञान होने के कारण । वे श्री हरि ही ज्ञातृ/ज्ञाता स्वयं होने के कारण –श्रीमद्भगवद्गीता के ‘वेदविदेव चाहम्’ के आधार पर जहाँ वे अपने को वेदों का अर्थात् ज्ञान का ज्ञाता बता रहे है । तथा वे श्री हरि वेदज्ञेय अर्थात् वेद/ज्ञान के द्वारा जानने योग्य होने के कारण जो के उसी गीताशास्त्र के ‘…वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो…’ – के आधार पर ।) है क्योकि वेदरूपी ज्ञान वह स्वयं है ‘सर्ववेदमय’ होने के कारण, वेदरूपी ज्ञान के द्वारा ज्ञेय भी वही है तथा वेदरूपी ज्ञान का ज्ञाता भी वही परब्रह्म हरि है । अतः जहाँ ज्ञान, ज्ञाता व ज्ञेय – तीनों एक ही पदार्थ हो, तो उसे ‘अद्व्यज्ञानतत्त्व’ कहा जाता है जो कि श्री हरि है । और ऐसे अद्वयज्ञानतत्त्वस्वरूप प्रज्ञानात्मक ब्रह्म श्रीहरि ही है – अखिल आम्नाय के प्रतिपाद्य होने के कारण । जीव को कहीं भी अखिलवेदवेद्य नहीं कहा गया, प्रत्युत श्री हरि को ही कहा गया है – प्रमाण – “वेदे रामायणे चैव पुराणे भारते तथा । आदावन्ते च मध्ये च हरिः सर्वत्र गीयते ।।“ (हरिवंशपुराण) ।

 

निष्कर्ष –

 

अतः ‘प्रज्ञानं ब्रह्म’ का अर्थ जीवात्मा (प्रज्ञानं) ही परब्रह्म है (ब्रह्म) – यह न होकर ‘वासुदेवात्मक अद्वयज्ञानतत्त्व (प्रज्ञानं) ही ब्रह्म है (ब्रह्म)’ – ऐसा मानना है ।

 

 

शङ्का व उसका समाधान —

 

कृष्णयजुर्वेदीय शुकरहस्योपनिषद् में (२६, २८ व ४२ मन्त्रो में विशेषरूप से) जिस जीव व ब्रह्म के ऐक्य की बात की गयी है इन चतुः औपनिषदिक वाक्यों के व्याख्यान के समय, वहाँ जीव का अर्थ मर्त्यधर्मा प्राणी को लेने से सन्दर्भ का विरोध उपस्थित होगा, क्योंकि वहाँ चित्त तथा अहङ्कार के नियन्ता तथा सर्वभूतों/सर्वप्राणियों में जीवनस्वरूप पदार्थ को ‘त्वं’ पद का वाच्य जीव माना है । अर्थात्, वहा अधिष्ठानस्वरूप मर्त्यधर्मा मायाकवलबद्ध जीव की ओर सङ्केत न होकर समष्टि अहङ्कार तथा समष्टि जीवों के अधिष्टातृस्वरूप भगवान् सङ्कर्षण को ‘जीव’ शब्द के द्वारा उपलक्षित किया गया है (महाभारत में भीष्मकृत पाण्डवों के प्रति उपदेश में चतुर्व्यूह की विवेचना में भी सङ्कर्षण को जीवों का अधिष्टातृ माना गया है) – व समष्टिजीवतत्त्व के अधिष्ठाता सङ्कर्षण से नारायणस्वरूप परब्रह्म की एकता बतायी गयी है, तथा ईश्वर को वासुदेव मानते हुए उन्हे सङ्कर्षण का मूलतत्त्व मानकर सङ्कर्षण को ‘जीव’ शब्द से व्यपदिष्ट (बताते हुए) करते हुए व वासुदेव को ‘ईश्वर’ शब्द से अभिहित (सूचित) करते हुए उपदेश दिया गया है । वासुदेव कारणस्वरूप है, व सङ्कर्षण उनके कार्यस्वरूप है । तथा नारायण वासुदेव के भी मूल होने के कारण कार्यस्वरूप सङ्कर्षण (जीव) तथा कारणस्वरूप (वासुदेव) से भी परे होने के कारण ‘परब्रह्म’ के नाम से वहा कथित हुए है ।  इन तीनों परमात्मतत्त्व को ही वहा क्रमश: ‘जीव’, ‘ईश्वर’ व ‘ब्रह्म’ माना गया है ।

 

अन्यथा ऐसा न मानकर साधारण त्रिगुणकवलग्रस्त मर्त्यधर्मा प्राणी को शुकरहस्योपनिषद् में कथित ‘जीव’ मानने पर तो उसी शुकरहस्योपनिषद् के ३३वें श्लोक के ‘अहं’ (जो जीव का सूचक है) के साथ विरोध उपस्थित होता है कि जहाँ जीव के सूचक पद  ‘अहं’ को ‘बुद्धि वृत्ति का साक्षी’ माना गया है । बुद्धिवृत्ति के साक्षी तो परमात्मा/अन्तर्यामी ही समस्त शास्त्रों में स्वीकृत हुए है! अतः वहाँ वासुदेव, संकर्षण व नारायण के पारस्परिक (आपसी) सम्बन्ध को ‘ईश्वर’, ‘जीव’ व ‘ब्रह्म’ – इस परोक्ष गूढ शैली से बता गया है, न कि त्रिगुणात्मिका माया में आबद्ध जीव को वहा ‘जीव’ माना गया है! प्रमाण – महाभारत के अन्तर्गत आने वाले विष्णुसहस्रनाम में विष्णु का ५३०वां नाम ‘जीव:’ है, ९३०वां नाम ‘जीवनः’ तथा ९६२वां नाम है ‘प्राणजीवनः’! इस प्रकार का ‘वासुदेव/सङ्कर्षण/नारायणात्मक’ अर्थ स्वीकार करने पर नारायण श्रुति के उपर उद्धृत व्याख्यान के साथ भी विरोध घटित नही होता है!

 

 

 

  • भक्तिरसवेदान्तपीठाधीश्वर आचार्य श्री गुरुपाद

 

3 thoughts on “औपनिषदिक चतुःवाक्यों का प्रकृत अर्थ व शुकरहस्योपनिषद की उक्तियों का समाधान / Actual meaning of the quadruple assertions of Upaniṣads and clarification on Śukarahasyopaniṣad (Only Hindi version).

  1. Dear CA Mr. Kamal Kothari Ji (Gujarat, Bharata & Pune, MH, IN),

    Blessings. We have given these Vedanta-related Hindi essays to be rendered in English to some of our scholarly followers. Within few days, they shall be ready for public appearance.

    – Bhaktirasavedantapithadhisvara

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