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आत्मपूजोपनिषद् आचार्य शङ्कर के केवलाद्वैत को पुष्ट नही करता है । / Ātmapūjopaniṣad does not entertain the Absolute Monism of Ācārya Śaṅkara. (Only Hindi version)

 

 

केवलाद्वैतीयों का मुख्य पूर्वपक्ष –

 

“सर्वनिरामयपरिपूर्णोऽहमस्मीति मुमुक्षूणां मोक्षैकसिद्धिर्भवति ।“

 

अनुवाद –

 

“समस्त आधिव्याधियों से रहित मैं पूर्ण ब्रह्म हूँ, ऐसा भाव रखने से ही मुमुक्षुओं की मोक्ष प्राप्त करने की जिज्ञासा सिद्ध होती है ।“

(आत्मपूजोपनिषद्)

अनुवादक – परलोकगत श्रीराम शर्मा आचार्य जी ‘आगरावाले’ (गायत्री परिवार के संस्थापक व मूलतः आर्यसमाजी)

 

 

मुख्य उत्तरपक्ष  –

 

१) अथर्ववेदीय गोपथब्राह्मण के १.१.१.१५ में – “ परोक्षप्रिया इव हि देवा भवन्ति प्रत्यक्षद्विषः ।“ अर्थात् “देवगण परोक्षरूप से की गयी प्रस्तुति के चाहक होते हैं व प्रत्यक्षरूपेण की गयी प्रस्तुति के अनिच्छुक रहते हैं ।“

 

इसी कारण से श्रुतियाँ (उपनिषद्निचय) प्रायः गूढतम सत्य का अप्रत्यक्षरूप से ही कथन करती है । अतः प्रायः श्रौत वाक्यों का प्रायः जो अर्थ आपाततः (पहली/स्थूल/बाह्य द्रष्टि में) दीखता है वह होता नही है ।

 

२) ‘ब्रह्म’ शब्द मूल उपनिषद्वाक्य में जो कि उपर उद्धृत है, उसमे नही है । अनुवादक के द्वारा वहा ‘ब्रह्म’ शब्द जोडा गया है ।

 

३) पर यदि ‘अनुवर्त्तन’ (कोई शब्द/पद बार बार उल्लेख को प्राप्त न होकर भी उस शब्द को बीच में लाकर ही वाक्य की सङ्गति बैठाना – अनुवर्त्तन कहा जाता है) को स्वीकार करके वहा ‘ब्रह्म’ शब्द का योग कर भी दिया जाता है, तो उस परिस्थिति में कुछ बातो का ध्यान रख कर ही उस औपनिषदिक वाक्य का वास्तविक आशय प्रकट हो सकता है ।

 

४) मान लिया कि ‘समस्त आधिव्याधियो से रहित मेैं पूर्णब्रह्म हूँ’ और यह भी मान लिया कि ‘इस प्रकार का चिन्तन ही मुमुक्षुओं (मोक्ष की इच्छा रखने वाले) के मोक्ष का एकमात्र सिद्धिकारक है’ – पर यदि इस प्रकार से चिन्ता करने वाला व्यष्टि जीवात्मा स्वयं ही समस्त आधिव्याधियों से पूर्णतया विनिर्मुक्त पूर्णब्रह्म है, तब तो वह पहले से ही (अनादि काल से) नैसर्गिक तौर पर ‘सिद्ध’ तथा ‘मुक्त’ होना चाहिये, क्योंकि परब्रह्म तो ‘नित्य-शुद्ध-बुद्ध-मुक्त-स्वरूप/स्वभाव’ है कि जो शास्त्रों में अनेकानेक स्थलों पर वैसे प्रतिपादित हुये है!

 

तो यदि इस प्रकार से स्वयं को पूर्णब्रह्म मानकर चिन्तन करने वाला जीव स्वभाव से मुक्त तथा सिद्ध है उसके परब्रह्म होने के कारण, तब फिर उसी श्रौत वाक्य के अग्रिम चरण में ये क्यो कहा गया है कि — “वह मोक्ष की इच्छा रखने वाला अर्थात् मुमुक्षु है” और “ऐसे मुमुक्षुओं को मोक्ष प्राप्त होता है या उनके मोक्ष की सिद्धि होती है”? क्या जो पूर्णब्रह्म/परब्रह्म स्वाभाविक रूप से तथा अनादि काल से नित्यमुक्त हो, उसके फिर मुमुक्षु बनने की (अर्थात् मोक्ष का आकाङ्क्षी बनने की) कोई आवश्यकता रह जाती है? और फिर तब उसी उपनिषद्वाक्य का ऐसा कहना भी कैसे बन सकता है कि उस पूर्णब्रह्मस्वरूप जीव को ‘मोक्ष की सिद्धि/प्राप्ति’ होती है? अरे! जब वह पहले से ही पूर्णब्रह्म है तो उसके पूर्णब्रह्मत्व की सिद्धि भला कालसापेक्षा कैसे हो सकती है? ‘भवति’ क्रियापद के द्वारा तो उस जीव के पूर्णब्रह्मत्व व मोक्षत्व की सिद्धि कालसापेक्षा ही रह जाती है न! ‘भवति’ का अर्थ है ‘होता है’ अर्थात् ‘मुमुक्षुओं के मोक्ष की सिद्धि होती है’ – यहाँ सिद्धि/मुक्ति का कालसापेक्षत्व अति स्पष्ट रूप से प्रकटित है ।

 

अतः निष्कर्ष यह निकलता है कि जीवात्मा जो कि मोक्ष का इच्छुक (मुमुक्षु) है, वह उस पूर्णब्रह्म/परब्रह्म से पृथक् है जो कि नित्य-शुद्ध-बुद्ध-मुक्त-स्वरूप है, क्योंकि यदि वह जीवात्मा वही परब्रह्म होता, तब तो उसके नित्यमुक्त होने के कारण उसका मोक्ष का आकाङ्क्षी होना तथा उसके मोक्ष की कालसापेक्ष सिद्धि का होना – ये दोनों ही बातें असङ्गत सिद्ध होतीं हैं!

 

पर अब प्रश्न यह उठता है कि श्रुतिवाक्य का कोई भी अंश मिथ्या तो नही हो सकता, नहीं तो श्रौत वाक्य के एक अंश का स्वीकार करने से तथा अन्य अंश का अस्वीकार करने से तो ‘अर्द्ध-कुक्कुटी-न्याय’ का प्रवेश हो जाएगा! श्रुति साक्षात् भगवत्स्वरूपा है अतः, उसका कोई भी अंश मिथ्या नही हो सकता । और यदि ऐसा है, तो आत्मपूजा श्रुति (उपनिषद्) के उपरोद्धृत वाक्य का प्रथमांश जो कि – “सर्वनिरामयपरिपूर्णोऽहमस्मीति” {“मै सर्वनिरामय परिपूर्ण (ब्रह्म) हु”} है – उसकी सङ्गति कैसे बैठेगी?

 

समाधान –

 

१) “सर्वनिरामयपरिपूर्णोऽहमस्मीति” {“मै सर्वनिरामय परिपूर्ण (ब्रह्म) हु”} – ऐसा यदि मान लिया जाता है, तो उसका अर्थ वैसे ही लेना पडेगा जैसे कि अन्य औपनिषदिक तथा वैदिक वाक्यों का लिया जाता है  यथा  – “ब्रह्मैव सन् ब्रह्माप्येति” तथा “देवो भूत्वा देवं यजेत्”! “ब्रह्मैव सन् ब्रह्माप्येति” {“(जीवात्मा) ब्रह्म होकर ही ब्रह्म को प्राप्त करता है”} । ‘आप्य’ – क्रियापद का अर्थ ‘प्राप्त करना’ होता है । प्राप्त उस पदार्थ/वस्तु को किया जाता है जो प्राप्तिकरता से भिन्न हो अर्थात् प्राप्य (प्राप्त करने योग्य वस्तु) प्राप्तिकारक (प्राप्ति करने वाला) से भिन्न हो तभी ‘प्राप्ति’ शब्द का औचित्य बना रहता है, क्योंकि यदि प्राप्य ही प्राप्तिकारक है, तब तो प्राप्य तथा प्राप्तिकारक – दोनों एक होने के कारण कौन किसकी प्राप्ति करेगा तथा कौन किस का प्राप्य बनेगा? अतः सिद्ध होता है कि ‘प्राप्य’ परब्रह्म तथा ‘प्राप्तिकर्त्ता’ जीवब्रह्म – दोनों में भेद है ।

 

तथापि उस श्रुतिवाक्य में यह जो कहा गया है कि ‘ब्रह्म होकर ब्रह्म की प्राप्ति की जाती है’ – तो यहाँ यदि ‘ब्रह्मैव सन्’ (‘ब्रह्म होकर’) वाले ब्रह्म को (जो कि प्राप्तिकर्ता जीवब्रह्म है) ‘ब्रह्माप्येति’ (‘ब्रह्म को प्राप्त करता है’) वाला ब्रह्म (प्राप्यब्रह्म/परब्रह्म) मान लिया जाता है, तब वैसा अर्थ एक अन्य कारण से भी ठीक इसीलिये नही क्योंकि एक बार जो ब्रह्म हो गया (ब्रह्मैव सन्), वह दुबारा ब्रह्म की प्राप्ति क्यों करेगा (ब्रह्माप्येति) – जबकि वह स्वयं ही ब्रह्म हो चुका है तब (ब्रह्मैव सन्)?

 

अतः इससे स्पष्ट सूचित होता है कि –

 

(क) जीवात्मा जो ‘ब्रह्म’ बनता है ब्रह्म की प्राप्ति करने के लिये, वह उसका ब्रह्म होना भी ‘पर/पूर्ण-ब्रह्मत्त्व’ कदापि नही!

 

ख) और दूसरा तथ्य यह भी प्रकाशित होता है कि उस जीव का ब्रह्म होना (परब्रह्म की प्राप्ति के लिये) – एक कालसापेक्षा घटना है, क्योंकि यदि जीव वैसा ब्रह्म (परब्रह्म तो वह है ही नही जो कि उपर प्रदर्शित विश्लेषण से स्पष्ट है, पर यदि साधारण ब्रह्म भी उसे मान लिया जाये – तब भी) कि जिसका स्पष्ट सङ्केत ‘ब्रह्मैव सन्’ में ‘सन्’ शब्द के द्वारा सूचित है (‘सन्’ का अर्थ है होकर या होना) – भी है, तब भी वह जीव एक समयविशेष में वैसा ब्रह्म बनता है । अतः जीव स्वाभाविकरूप से या अनादिकाल से वैसा ‘सामान्य जीव-ब्रह्म’ भी नही है, क्योकि वैसा जीवब्रह्मत्त्व भी उस जीव को एक काल विशेष में (साधना के द्वारा) अर्ज्जित करना पडता है – यदि ऐसा नही माना जाता तो ‘ब्रह्मैव सन्’ (ब्रह्म होकर/बनकर) — यह श्रौतोक्ति निरर्थका हो जायेगी! फिर तो ‘ब्रह्म होकर ब्रह्म की प्राप्ति करता है’/ ‘ब्रह्मैव सन् ब्रह्माप्येति’ – कहने के स्थान पर कुछ ऐसा कथन समुचित प्रतीत होता कि – ‘स्वाभाविक(जीव)ब्रह्म ही (पर)ब्रह्म की प्राप्ति करता है’ / ‘स्वभाव(जीव)ब्रह्म (पर)ब्रह्माप्येति’!

 

ग) और यदि जीवात्मा के ‘ब्रह्म होने को’ (ब्रह्मैव सन्) ही परब्रह्मत्त्व मान लिया जाता है, तब तो वैसे ब्रह्म होने के पश्चात् (ब्रह्मैव सन्) उस ब्रह्म के लिये पुनः ब्रह्म की प्राप्ति करना (ब्रह्माप्येति) सर्वथा अयौक्तिक होने के कारण श्रुति को कुछ ऐसा कहना चाहिये था कि – ‘ब्रह्मैव सन् सर्वमिति/सर्वम्भवति’ अर्थात् ‘ब्रह्म होकर सब कुछ है / हो जाता है’!

 

२) “देवो भूत्वा देवं यजेत्” (“देव होकर/बनकर देव की उपासना की जाती है”) – ऐसा जो वेदो में कथित हुआ है – उससे भी दो बातें प्रकाशित होती है –

 

क) उपासक स्वभाव से देव नही है, प्रत्युत सद्गुणों के अर्ज्जन से तथा अन्य उपायों के द्वारा वह देवत्त्व वाले शील/प्रकृति को प्राप्त करता है, एवं जब वह देवप्रकृति का हो जाता है, तब उसके द्वारा इष्ट/उपास्य/आराध्यदेव की उपासना वास्तव में सम्भवपरा हो पाती है । आसुरी स्वभाव वा मानव स्वभाव के रहने तक वह देव की उपासना नही कर सकता यथार्थ दृष्टि में ।

 

ख) पर यदि ‘देवो भूत्वा’ (देव होकर) का अर्थ यह मान लिया जाये कि उपासक देव ही उपास्य देव बन चुका है, तब तो फिर वैसे उपासक देव को उपास्य देव की उपासना करने का कोई औचित्त्य प्रमाणित नही होता! और तब तो ‘देवं यजेत्’ – पद निरर्थक हो जायेगा! अतः उपासक देव का देवत्त्व तथा उपास्य देव का देवत्त्व – दोनों एक नही है – यह स्पष्ट हो चुका है ।

 

गौण पूर्वपक्ष –

 

बृहदारण्यक उपनिषद् २.४.१४ में दृश्य, द्रष्टा, रस्य, रसिक, श्राव्य, श्रोता आदि के मध्य द्वैत निरसन/खण्डन के द्वारा स्पष्ट अद्वैत का सङ्केत है!

 

गौण उत्तरपक्ष –

 

उसी प्रकरण के उपर तत्त्ववादी माध्व सम्प्रदाय के भाष्य/टीकाओं/उपटीकाओं को देख ले तो सब नीर/क्षीर-विवेक की भाँति स्पष्ट हो जायेगा!

 

सार –

 

“सर्वनिरामय से रहित मै परिपूर्ण ब्रह्म हू” / “सर्वनिरामयपरिपूर्णोऽहमस्मीति” – इस आत्मपूजोपनिषद् के वाक्य का तात्पर्य जीवात्मा की उस ‘ब्रह्मभूतावस्था’ या ‘जीवनमुक्त्यवस्था’ या ‘स्थितप्रज्ञावस्था’ या ‘योगारूढावस्था’ या ‘समत्त्वावस्था’ से है जिसका निरूपण श्रीमद्भगवद्गीता १८.५४ (‘ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा…’), १८.७१ (‘..सोऽपि मुक्तः….’), २.५५ (‘..स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते..’), ६.३ (‘..योगारूढस्य तस्यैव….’) व ६.४ (‘…योगारूढस्तदोच्यते..’) व २.४८ (‘..समत्त्वं योग उच्यते..’) – आदि में हुआ है । ऐसी ब्रह्मभूतावस्था / जीवनमुक्त्यावस्था (पार्थिव देह के रहते) को प्राप्त साधक ही वास्तव में परब्रह्म के परमपद (श्री हरि का धाम) की प्राप्ति कर सकता है । प्रमाण – “ॐ तद्विष्णोः परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरयो दिवीव चक्षुराततम्…” (ऋग्वेद १.२२.२० – द्रष्टा ऋषि – मेधातिथि कण्व मुनि) – “ॐकारस्वरूप उन विष्णु के परम धाम (वैकुण्ठ) को सदा सूरी/मुक्त/सिद्ध/ब्रह्मभूत महात्मागण चिदाकाश में निहारते रहते हैं ।“

 

 

  • भक्तिरसवेदान्तपीठाधीश्वर आचार्य श्री गुरुपाद

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