Śrīpāda Anandatīrtha Madhvācārya - The founder of Tattvavāda Philosophy

अध्यात्मोपनिषद् ६९+७० आचार्य शङ्कर के केवलाद्वैत के समर्थक नही है । / Adhyātmopaniṣad 69+70 do no support Absolute Monism of Ācārya Śaṅkara.

 

पूर्वपक्ष –

 

शिष्य अध्यात्मोपनिषद् में ऐसा कह रहा है:

 

असङ्गोऽहमनङ्गोऽहमलिङ्गोऽहमहं हरिः । प्रशान्तोऽहमनन्तो परिपूर्णश्चिरन्तन: ।।६९।।…केवलोऽहं सदाशिवः।।

 

मैं सङ्गरहित हूँ, अङ्गरहित हूँ, चिह्नरहित और स्वयं हरि हूँ। मैं प्रशान्त हूँ, अनन्त हूँ, परिपूर्ण और चिरन्तन अर्थात प्राचीन से प्राचीन हूँ ।….मैं केवल सदाशिव हूँ ।

 

अतः यहा जीवात्मा व परमात्मा का ऐकात्म्य सिद्ध हो रहा है ।

 

 

खण्डन —

 

१) अध्यात्मोपनिषद् का कथन कि जहाँ पर आत्मा को असङ्ग बताया गया है, केवल मुक्तात्मा की स्थिति की ओर सङ्केत करता है, क्योकि केवल जीवनमुक्तावस्था/ब्रह्मभूतावस्था में ही आत्मा प्रापञ्चिक आसक्ति से विनिर्मुक्त होता है, मायाबद्धावस्था में नही । अन्यथा श्रीमद्भगवद्गीता ४.२० व १५.३ में क्रमशः ‘त्यक्त्वा कर्मफलासङ्गम्’ तथा ‘असङ्गशस्त्रेण दृढेण छित्त्वा’ – इन प्रमाणों से स्पष्ट हो जाता है कि मायाकवलग्रस्तावस्था में जीव ‘सङ्ग’ अर्थात् त्रिगुणों से संश्लिष्ट रहता है ।

 

२) आत्मा (जीव) को जो ‘अनङ्ग’ बताया गया है वह इसीलिये क्योंकि जीव स्वरूप से लौकिक/भौतिक/मायिक/जड/प्राकृत/त्रिगुणात्मक अङ्गों से रहित है अपनी विशुद्ध तटस्थावस्था में । नहीं तो मायावद्धावस्था में तो प्रकृति के त्रिगुणों से निर्मित सूक्ष्म व स्थूल शरीरों से आत्मा आवृत्त रहता है ।

 

३) आत्मा को जो ‘लिङ्ग’ कहा गया है, वह इसीलिये क्योंकि आत्मा चिदानन्दस्वरूप होने के कारण भौतिक लक्षणों का लक्ष्य कदापि नही बन सकता ।

 

४) जीवात्मा को जो ‘हरि’ कहा गया है, वह केवल इसीलिये क्योकि जीवात्मा परमात्मा का अधिष्ठान है – परमात्मा जीवात्मा के हृदय में निवास करता है । अतः अधिष्ठान व अधिष्ठाता में द्वैत होने पर भी जैसे एक दृष्टि से दोनो में ऐक्य स्वीकृत होता है, ठीक वैसी ही जीवात्मा को हरि बताना है । जैसे हिमवान् पर्वत अधिष्ठान है हिमदेव नामक अधिष्टाता का, वैसे । परन्तु यदि अधिष्ठान सर्वथा अधिष्ठाता है पूर्ण अद्वैत होने के कारण, तब तो बृहदारण्यक उपनिषद् का यह कथन मिथ्या हो जायेगा कि जहाँ पर जीवात्मा को परमात्मा/परब्रह्म का शरीर कहा गया है व जहाँ यह कहा गया है कि आत्मा (जीव) के भीतर परमात्मा का निवास होने पर भी जीवात्मा जिस परमात्मा को नही जान सकता – “य आत्मनि तिष्ठन् आत्मनः अन्तरो यं आत्मा न वेद” ।

 

५) जीवात्मा को जो ‘प्रशान्त’ कहा गया है – वह ‘प्रशान्तत्व’ केवल तभी सिद्ध होता है जब जीव हरिपादपद्म के सेवाजनित भक्तिरसमकरन्द में सराबोर हो जाता है । प्रमाण – श्रीमद्भागवत ६.१४.५ – ‘सुदूर्लभ: प्रशान्तात्मा कोटिश्वपि महामुने’ ।

 

६) जीवात्मा को जो ‘अनन्त’ कहा गया है, वह केवल आत्मा की अविनाशिता के कारण है । अन्ततोगत्त्वा जीव भी तो परब्रह्म की तरह अविनाशी (अन्तरहित) है – गीताशास्त्र के दूसरा अध्याय जीवात्मा को अविनाशी कहता है ।

 

७) जीवात्मा परिपूर्ण तभी बन सकता है जब वह हरिपादपद्मों की भक्ति करे, अन्यथा उसकी अपरिपूर्णता का द्योतक श्रीमद्भागवत २.३.२० “बिले बतोरुक्रमविक्रमान ये..” श्लोक है ।

 

८) जीवात्मा के लिये ‘चिरन्तन:’ शब्द का प्रयोग केवल उसकी प्राचीनता को लक्षित करता है । क्योकि जीवात्मा परमात्मा के ही समान अनादि व प्राचीन है – शास्त्रों के आधार पर जीवात्मा परमात्मा की तरह अनादि तो है परमात्मा का सनातन अंश होने के कारण, पर फिर भी परमात्मसत्तासापेक्ष जीव की सत्ता है – श्रीमद्भगवद्गीता ७.७ “मत्तः परतरं……सूत्रे मणिगणा इव” व गीता १५.७ “ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातन:” ।

 

९) मुक्तजीव ‘केवल:’ है क्योकि वह मायाप्रदत्त त्रिगुणात्मक देहों से पूर्णतया रहित हो जाता है मुक्त्यावस्था में । गौडीय वैष्णव आचार्यों ने तो श्रीमद्भागवत १२.१३.१२ में “..कैवल्यैकप्रयोजनम्” का तात्पर्य ‘प्रेमरूपी पञ्चम पुरुषार्थ’ से लिया है अनेक प्रकार की दार्शनिकी विश्लेषणा के पश्चात् ।

 

१०) भगवद्भक्त जीवात्मा ‘सदाशिव’ है क्योकि जब परममङ्गलस्वरूप शम्भु/महादेव/शङ्कर/शिव (‘शिव’ व ‘शङ्कर’ – शब्दों का अर्थ ही ‘मङ्गल’ व ‘मङ्गलकारी’ है – ‘शं करोति इति शङ्करः’ ।) जो कि विष्णुपादपद्मप्रसूता भगवती गङ्गा के जल को अपने मस्तक पर धारण करने से पहले से भी और अधिक मङ्गलकारी बन गये (प्रमाण –  श्रीमद्भागवत ३.२८.२२ — “…तीर्थेन मूर्ध्न्यधिकृतेन शिवः शिवोऽभूत्..”) – तब तो जीवात्मा भी श्रीभगवान् हरि के पादपद्मों का भजन करने से तीर्थों को भी पवित्र करने वाला मङ्गलाधिष्ठान (मङ्गलस्वरूप) वा शिवस्वरूप (शिव का अर्थ यहा मङ्गल लेना है –पार्वतीपति नही – अर्थात् रूढि को न लेकर यौगिक अर्थ लेना है) क्यों नही बन सकता? प्रमाण – श्रीमद्भागवत १.१३.१० ‘..तीर्थभूता: स्वयं विभो..तीर्थीकुर्वन्ति तीर्थानि..’ व श्रीमद्भागवत १.१८.२१ “…सेशं पुनात्यन्यतमो मुकुन्दात्..” ।

 

प्रश्न – यदि जीवन्मुक्त व भगवद्भक्त जीवात्मा के लिये उपरोक्त सभी विशेषण अध्यात्मोपनिषद् में व्यवहृत हुए है, तो जो शिष्य निजगुरु के साथ संवाद में उन विशेषणों को निजात्मा के लिये व्यपदिष्ट कर रहा है (बता रहा है), वह तो कदाचित् साधना कि प्रारम्भावस्था में होने के कारण जीवन्मुक्ति की अवस्था तक पहुचा नहीं है । तब फिर वह अपने लिये उन विषेषणों का प्रयोग कैसे कर सकता है?

 

उत्तर – भले ही वह साधकशिष्य अब तक सिद्धवस्था को प्राप्त न हुआ हो, तथापि वह सिद्धास्था में भावि निजस्थिति (होनेवाले अपनी स्थिति) को लक्ष्य कर ऐसी उक्ति को प्रदर्शित कर रहा है (ऐसा कह रहा है) ।

 

 

निष्कर्ष – उपर प्रदर्शित विश्लेषण के आधार पर अध्यात्मोपनिषद् जीव व ब्रह्म के भेदाभेद सम्बन्ध को ही मान्य रखता है, केवलाद्वैत को नहीं ।

 

 

भक्तिरसवेदान्तपीठाधीश्वर आचार्य श्री गुरुपाद

(आणन्द, गुजरात, भारत)

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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