aham-brahmasmi

पूर्वपक्ष – “अत्रापि मया शैवेन “शिवोSहं शिवोSहम्” इत्येव उच्यते । ॐ नमः शिवाय । शिव एव शरणं मम । — मै शिव हु । मै शिव हु । ॐकार स्वरूप शिव को नमस्कार । शिव ही मेरे शरण है ।“

Prima Facie Contention – “I am Śiva. I am Śiva. Prostration unto Śiva who is Oṁ. Śiva is my shelter.”

खण्डनम्/Refutation – “यदि तुम स्वयं ही शिव हो तो तुम्हे शिव की शरण में जानेकी क्या आवश्यकता है? If you are Siva, what is the need for you to go in Siva’s shelter? यदि त्वमेव शिवोSसि, तर्हि शिवस्य शरणागति: व्यर्थ: त्वत्पक्षे । संसार की समस्त समस्याओ से झूजता हुआ जीव अपने आप को ईश्वर समझे इससे बड़ी और कोई मूर्खता नहीं देखी जा सकती । A person being devoured by mundane calamities considering himself as God – there cannot be any bigger example of rascaldom than this. क्या परब्रह्म इतने असहाय है कि उन्हें त्रितापकवलित होना पड़े? Is the Absolute so much destitute that He has to be confined in the clutches of triple mundane miseries?”

पूर्वपक्ष – “तो फिर ‘अहं ब्रह्मास्मि’ (मै ही ब्रह्म हु) जैसे वाक्यो का क्या?”

Contention – “Then what about the Upaniṣadic assertions such as ‘ahaṁ brahmāsmi’ or that ‘I am brahma’?”

समाधान – “वैसे तो पौराणिक कथा के अनुसार दैत्यराज विरोचन ने भी गुरु-उपदेश – ‘तुम आत्मा हो’ – उसका अर्थ ले लिया था स्थूल पञ्चायतन/शरीर के रूप में! पर क्या आत्मा कभी ये पाञ्चभौतिक शरीर हो सकता है सही मायने में, भले ही ‘आत्मा’ शब्द का एक अर्थ ‘शरीर’ होता हो! उसी प्रकार क्या जीव परब्रह्म हो सकता है, भले ही ‘ब्रह्म’ शब्द का एक अर्थ परब्रह्म से हो? जीव का केवल कुछ अंशो में परब्रह्म से सादृश्य होने के कारण वह ‘ब्रह्म’ अभिधा/संज्ञा को प्राप्त है । इन्द्रदेव ने ‘आत्मा’ शब्द का अर्थ स्थूल देह से न लेकर चित्कणस्वरूप व ईश्वर के विभिन्नांशस्वरूप जीव से लिया था कि जिसका जीवत्व सनातन है ।

ठीक वैसे ही ‘अहं ब्रह्मास्मि’ का सही अर्थ है कि ‘नित्यत्व एवं चेतनत्व के सन्दर्भ में जीव का ईश्वर के साथ सादृश्य है’! नही तो मायापति ईश्वर कदापि त्रिगुणात्मिकामायाकवलित हो ही नही सकता (क्योकि इस प्रकार का मायावश्यत्व उसके स्वरूप के विरुद्ध है और यहा पर विरुद्धधर्माश्रयित्व भी लागु नही क्योकि शास्त्रो में स्पष्टरूपेण माया को भगवत्स्वरूप से बाहर उनके अपाश्रय में अर्थात् पृष्ठभूमिस्थिता निर्देशित किया गया है) श्रीमद्भागवत १.७.४-६ के आधार पर जहा परब्रह्म (कभी कभे ‘ब्रह्म’ के रूप में निर्देशित होने वाला), माया एवं जीव (कभी कभी ‘ब्रह्म’ के रूप में निर्देशित होने वाला) – तीनो का स्पष्ट भेद बताया गया है ‘वश्य’ एवं ‘वशीकारी’ के रूप में! यदि वशीकारी स्वयं वश्य बना होता (यानी यदि परब्रह्म स्वयं जीव बना होता), तब तो वेदव्यास को समाधिभाषा में यह कहना चाहिये था (जो कि उन्होने नही कहा है) कि ईश्वर की अपाश्रिता माया ने ईश्वर को प्रत्युपस्थापित कर जीवत्व को प्रकट किया! प्रत्युत वेदव्यास कह रहे है कि ईश्वर की अपाश्रिता माया ने जीवो को सम्मोहित किया – यहा स्पष्ट सनातन भेद जीव एवं ईश्वर के मध्य द्रष्टव्य है ।”

Harmonious conclusion – “If the style of the above contention is taken into account, in a similar way, even the Demon Virocana had wrongly taken the meaning of the following statement issued by his Gurudeva – ‘You are ātmā’ – to mean or indicate ‘the gross mundane body made of five elements! But, can ‘ātmā’ (soul) ever be this mundane body in the true context, though the Sanskrit term ‘ātmā’ may have the gross material body as one of its many meanings! Similarly, can the jīva (living entity) ever become parabrahma (Absolute Truth), though one of the meanings of the word ‘brahma’ is ‘para-brahma’? Jīva is designated as brahma due to his similarity in some perspectives with the parabrahma. Indradeva did not take the meaning of ‘ātmā’ in the context of gross material body, but rather, to indicate the jīva who is a sentient spark and an eternally separate expansive portion of the Absolute (parabrahma).

In a similar way, the true meaning of ‘ahaṁ brahmāsmi’ (I am brahma) is that in the context of eternality and consciousness, jīva shares similarity with Absolute or para-brahma. Or else, parabrahma, the Lord of the triguṇātmikā māyā can never Himself be subjugated to that māyā(because, to be subjugated by māyāis contrary to the nature, identity and constitution of the Absolute and herein, the concept of simultaneously harmonizing the apparently contradictory qualities i.e. ‘viruddha-dharmāśrayitva’ can, also, not be applied because the scriptures have explicitly stated the existence of the trigunātmikā māyā to be outside the svarūpa or identity of the parabrahma and have revealed the mayā’s position to be located in the back-facing side of the Absolute.) based on the concrete evidence of Śrīmadbhāgavata 1.7.4-6, wherein, the difference prevalent between parabahma (addressed as brahma, at times), māyā and jīva (addressed as brahma, at times) is clearly depicted by showing the difference prevalent between the principles of subjugator (vaśikārī) and subjugated (vaśya). If the subjugator Himself would have become the subjugated principle (i.e. if parabrahma would have become jīvātmā), then Vedavyāsa, in his language of trance, should have rather asserted (which He hasn’t asserted) that the māyā, which stays in the backside of parabrahma, projected parabrahma in the state (phase) of jīvātmā(s)! However, on the contrary, Vedavyāsa is asserting the subjugation of the jīvas done by māya, wherein, māyā rests in the backside (not facing the parabrahma) of the Absolute – herein, a clear difference between the jīvatva and parabrahmatva is seen.”
 भक्तिरसवेदान्तपीठाधीश्वर आचार्य श्री वा गुरुपाद
 Bhaktirasavedāntapīṭhādhīśvara Ācārya Śrī Gurupāda

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