Jagannath Prasad - 2nd

आहारशुद्धि मोक्षपथ का प्रवेशद्वार——

१) मानव जैविक पदार्थ के भक्षण के ​बिना जीवित नहीं रह सकता। ‘होमो सेपियन’ अथवा मानव प्रजाति की शारिरिक संरचना ही इस प्रकार की है कि उसे अपने विकास व भरण—पोषण के लिए जैविक पदार्थ उपभोग की आवश्यकता है। इसमें कोई संदेह नहीं है।

२) जीव—वैज्ञानिक अध्ययन के अनुसार शाकभक्षी स्तनपायीयों (स्वभाव व शारीरिक संरचना से शाकाहारी) की अंतड़ियों की संरचना ऐसी है  कि वे मॉॅंसभक्षी स्तनपायीयों (स्वभाव व शारीरिक संरचना से मांसाहारी) की अंतड़ियोॅॅं से कहीें अधिक लम्बी हैं। साथ ही साथ, शाकभक्षियों के दांत व जबड़े मांसभक्षियों के दांत व जबड़ों से भिन्न हैं। मानव शरीर संरचनानुसार शाकभक्षी श्रेणी में स्थित है — सर्वभक्षी श्रेणी (स्वभाव व शारीरिक संरचना से मांसाहारी व शाकाहारी दोनो) में भी नहीें।

३) अत: निरसन/परिशेष प्रक्रिया से, चूॅॅंकि मानव शरीर शाकाहारी होने के लिए रचित है, वनस्पती, धान्य, फलियॉॅं , वृक्ष, फल, पुष्प, पत्रादि का भक्षण उसके लिए अपरिहार्य है। ‘जीवो जीवस्य भोजनम्’ अथवा, ‘एक जीव अन्य जीव पर अपने निर्वाह के लिए निर्भर है’ यह एक प्राचीन लोकोक्ति है।

४) चूॅॅंकि मानव जन्म ८४ लक्ष जीव योनियों में से अत्यंत दुर्लभ है, एवं मानव प्रजाति, विशेषकर आर्य जाति की चेतना अन्य जातियोंकी तुलना में अत्यंत विकसित है (ईश्वर, धर्म/अध्यात्म के सिद्धांत को समझने के लिए), मानव शरीर (विशेषत: आर्य शरीर) को सात्त्विक रहना चाहिए क्योंकि सत्त्व ही आत्म—साक्षात्कार व ईशानुभूति के पथ पर आरूढ़ होने का द्वार है। प्रमाण — हितोपदेश श्लोक ‘धर्मो ही तेषामधिको विशेषो….’, श्रीमद्भागवत श्लोक, ‘…सत्त्वं यद्ब्रह्मदर्शनम्’ + ‘कौमार आचरेत्प्राज्ञो…’, श्रीमद्भगवद्गीता श्लोक — ‘सत्त्वात्सञ्जायते ज्ञानम्…’ एवं आर्य परम्परा में प्रचलित ‘आहारशुद्धौ सत्त्वशुद्धिः’ श्लोक।

५) शाकाहार को सात्त्विक माना गया है व मांसाहार को तामसिक। प्रमाण— श्रीमद्भगवद्गीता १७.८-१०।

६) मांसाहार असहनीय व बर्बर निर्दयता से प्राप्त होता है क्योंकि वृक्षों व वनस्पतियों आदि के अतिरिक्त सभी स्तनपायियों की शारीरिक व मानसिक चेतना कहीं उन्नत है, एवं उनकी भावनाओं के आदान—प्रदान की क्षमता भी वृक्षादि की तुलना में अधिक विकसित है। आधुनिक वैज्ञानिक शोधानुसार, जब वृक्षादि को काटा अथवा चोट पहुॅॅंचायी जाती है, वे उतनी ही पीड़ा अनुभव करते हैं जितनी एक मानव सुई के चुभोने से करता है।

७) तथापि वनस्पती आदि भी जीव हैं जिनके भीतर भी आत्मा का निवास है व जिनकी चेतना आच्छादित है । अत: उनको नष्ट करने से भी मानव को पाप होता है। क्यों? क्योंकि मानव योनि कर्म व मोक्ष योनि है व अन्य समस्त यानियॉॅं सुख—दुख भोग योनियॉॅं हैं। अत: नवीन कर्म व कर्म—फल केवल मानव जीवन में ही निश्चित होता है। इसी कारण मानव अपने समस्त शुभाशुभ कमोॅॅं के लिए उत्तरदायी है। ऐसा अन्य प्रजातियों में नहीं है। इसी कारण आहार हेतु वृक्ष, वनस्पतियों को नष्ट करने के लिए किया गया अल्प अपराध भी पापकर्म ही है। यद्यपि इसको यह कहकर उचित सिद्ध किया जाता है कि मानव जीवन वृक्षादि के जीवन की तुलना में अधिक महत्त्वपूर्ण है क्योंकि मानव ईशवर को प्राप्त कर सकता है, वृक्षादि नहीं। तथापि पाप का प्रायश्चित आवश्यक है।

८) वैदिक कर्ममार्गियों के लए प्रायश्चित्त हेतु प्रतिदिन पंचमहायज्ञों के संपादन की विधि है । ज्ञान व योगमार्गियों के लिए उनका ब्रह्म—ज्ञान व योग—साधना ही गौण रूप से प्रायश्चित्त है । भक्ति—मार्गियों के लिए श्रीहरि को तुलसी दल सहित भोग अर्पण करके अवशिष्ट महाप्रसाद ग्रहण करना पर्याप्त है।

श्रीमद्भगवद्गीता का ‘यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो…’ श्लोक व पद्म—पुराण का ‘महाप्रसादे गोविन्दे नामब्रह्मणि वैष्णवे। स्वल्पपुण्यवतां राजन् विश्वासो नैव जायते ।।’ श्लोक भी प्रमाण हैं।

—— भक्तिरसवेदान्तपीठाधीश्वर आचार्यश्री गुरुपाद

(अनुवादक — श्री समर्थ सिंह कंक जी वा सुन्दरानन्ददास अधिकारी जी — पञ्जाब व जयपुर, राजपूताना, भारत)

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