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क) केवल भक्त की कामना पूर्ण करने के लिये परब्रह्म रसास्वादन की पिपासा रखता है, यह आंशिक सत्य है । पूर्ण सत्य यह है कि परब्रह्म में ही रसपिपासा की वाञ्छा है उसके रसब्रह्म होने के कारण (जो कि श्रुतिप्रतिपादित तथ्य है – ‘रसो वै सः’ इत्यादि के द्वारा) । उसी परब्रह्म की रसपिपासावाञ्छा के कारण उसकी निजस्वरूपभूता ह्लादिनीशक्ति की वृत्तिस्वरूपा भक्तिदेवी जब अपना आसन जमाती है किसी सौभाग्यवान् जीव के हृदय में, तो उसी प्रेमस्वरूपिणी भक्ति (स्वरूपशक्त्यानन्द) का आस्वादन करने के लिये भगवान् लालायित हो पडते है एवं भगवत्सुखैकवासना उस जीव के हृदय में जागृता होती है ।

 

ख) ‘स्वात्मकृपा’ का तात्पर्य है उस अनुग्रह से कि श्रीगुरु, भक्ति, भगवन्त इत्यादियों की कृपा से पहले साधक जब अपने आप पर कृपा कर परमार्थ पर आरूढ होने का अभिलाषी बनकर भक्तिप्रतिकूलविषयो का युगपत् वर्जन करते हुये (भक्त्यङ्ग आचरण के साहचर्य में) कटिबद्धता दिखाता है क्षुर की धार के समान परमार्थपथपथिक बनने के लिये — कि जो परमार्थ पथ यदि शास्त्रानुगत होके अपनाया जाये तो अतिसुगम भी हो सकता है गमन जिसपे । चैतन्यचरितामृत के उदाहरण में कालाकृष्णदास स्वात्मकृपा से विहीन थे, अतः श्रीमन्महाप्रभु चैतन्यदेव का नित्य शारीरिक रूप से सेवा का सान्निध्य भी उन्हें कञ्चन व कामिनी के प्रभाव से नही बचा पाया – बहुत बडा सङ्केत गुरुकृपा के फलदायिनी होने में । अतः भक्तिसन्दर्भ: में भी श्रीजीवगोस्वामिपाद ने साधक के निजसङ्कल्प के अनन्तर ही महत्कृपा, भगवत्कृपा, गुरुकृपा, भक्तिकृपा, शास्त्रकृपा आदियों का औचित्य प्रतिपादित किया है ।

 

ग) १) जिस दुःखशृङ्खलाभञ्जन से प्रेरित होकर हरिभक्तिपरायण होने की बात हरिभक्तिविलासादि शास्त्रों में कही गयी, वह केवल आर्त्तश्रेण्यन्तर्गत उपासकों की ओर सूचित करती है। श्रीभक्तिरसामृतसिन्धुकार भ.र.सि. १.१.२२-२३ में स्पष्टरूप से आपवादिकी श्रेणी (सनकादि, शौनकादि, ध्रुव व गजेन्द्र — आपवादिक मामले हैं) के अन्तर्गत होने वाले चतुर्धा उपासकों की बात उठाकर कहते है कि जब तक उन सभी पर भक्तकृपा, भक्तिकृपा व भगवत्कृपा नही हुयी, तक उनका वह सकाम/मोक्षकाम वाला भाव क्षीण नही हुआ व तब तक वें अकाम/निष्काम/प्रेमकाम नहीं बने । २) जब किसी शुद्धभक्त्त की हृदयस्थिता पारमार्थिकी निर्गुणा भक्तिश्रद्धा का रत्यङ्कुर/बीज मायाबद्धजीव वा ब्रह्मभूतावस्थापन्न ज्ञानी परमहंस जीव के हृदय में स्वेच्छाचारिणी भक्तिदेवी की स्वतन्त्रेच्छा से सञ्चारित होता है, तभी प्रारम्भिका साधनभक्त्यावस्था से ही वह भक्त भोगमोक्षादिस्पृहा का छेदन/त्याग (पर समूल नाश उस समय सम्भव नही होता उन अन्याभिलाषाओं का) कर भजनक्रिया में सङ्लग्न हो जाता है — भले ही उस भोगमोक्षादिस्पृहा का आत्यन्तिक विनाश अनर्थनिवृत्ति की अवस्था के अनन्तर ही क्यों न सम्पन्न हो पाए । अतः यदि किसी भक्यङ्गानुष्ठानकारी के हृदय में भोगमोक्षादिवासनाओं की परिपूर्त्ति की इच्छा (प्रयास भी) दिखायी देती है, तो समझ लेना चाहिये कि उसके हृदय में केवल लौकिकी श्रद्धा का बीज ही सञ्चारित हुआ है किसी लौकिकभक्त के सङ्ग से, अथवा तो अलौकिक शुद्ध निष्काम भक्त के सङ्ग में रहने पर भी उस जीव के अपने उपर ‘स्वात्मकृपा’ का अभाव होने पर उसमें केवल लौकिकी श्रद्धा ही प्रकट हो पायी है । ३) पारमार्थिकी भक्तिश्रद्धा का बीज भावभक्ति या रति का अङ्कुररूप माना गया है श्रीजीवगोस्वामिपाद के द्वारा श्रीमद्भागवत की क्रमसन्दर्भ टीका में — ‘भक्तिस्तु रत्यङ्कुररूपा जायते’, अतः साधनावस्था से ही भक्ति में शुभदत्व व शुभदत्व के अन्तर्गत ‘ऐश्वरसुखप्रदत्त्व’ का गुण विद्यमान है जो कि भ.र.सि. १.१.३०-३२ में प्रमाणित होता है । अतः भक्ति साधनावस्था से ही स्वतः आह्लादकारिणी है, उसका वही आह्लाद भाव व प्रेम की अवस्था पर पहुचने पर अत्यधिक घनीभूतता को प्राप्त हो जाता है । क्योंकि भक्ति ह्लादिनीशक्ति की ही तो वृत्तिरूपा है न! अत: साधनावस्था के प्रारम्भ से ही भक्त मोक्षभोगादिपिपासा का त्याग — सर्प को दन्तहीन करने के तुल्य (भले ही नाश न हो पाये पूर्णसर्पवध के तुल्य) — करके जब भक्त्यङ्गों का अनुष्ठान करता है, तब वह स्वयं अकाम होने पर भी (उस साधनभक्तिपरायण भक्त में स्वसुखेच्छा का दमन/छेदन होने पर भी) आह्लादस्वरूपा भक्ति उस भक्त को आह्लाद का अनुभव कराती है — यह तथ्य श्रीविश्वनाथ चक्रवर्तीपाद की श्रीमद्भागवत की सारार्थदर्शिनी टीका में स्पष्ट हुआ है । ४) जहाँ तक बात अनर्थग्रस्तावस्था में भजन करने की है यथा — तरङ्गिणी, व्यूढविकल्पादि अवस्थायें माधुर्यकादम्बिनी में वर्णिता — तो उस अनर्थग्रस्तावस्था में भी साधक भोगमोक्षादि कामनाओं के प्रभाव की पूर्णतःकोशिश करता है — यद्यपि पूर्वसंस्कारवशात् कभी कभी उनके प्रभाव में आ जाता है — पर उनसे प्रभावित होने पर भी उन इच्छाओं के दमन व उनके पूर्णविनाश की उसमे बलवती इच्छा रहती है — ये एक बहुत बडी बात है जो उसे संसारीयों से पृथक् करती है । ५) श्रीमद्भागवत की रासपञ्चाध्यायी के अन्तिम श्लोक — ‘विक्रीडितं व्रजवधूभिरिदं च विष्णोः….भक्तिं परां भगवति प्रतिलभ्य कामं….’ की टीका में श्रीविश्वनाथ के अनुसार जैसे जैसे भगवत्प्रेम वृद्धि को प्राप्त होता है साधक के अन्तःकरण में, वैसे वैसे व उस उस परिमाण में वह काम (उपलक्षण के द्वारा भोग/मोक्षादि कामनायें) से विरहित होता जाता है । पर यदि श्रीरूपगोस्वामिचरण की
ात माने तो भ.र.सि. १.२.२२-२३ के अकाट्य साक्ष्य के आधार पर (श्रीजीवचरण तो भ.र.सि. १.२.२२ की दुर्गमसङ्गमनी टीका में यहा तक बता देते है कि — ‘तदेवमनया कारिकया साधकानामपि भुक्तिमुक्तिस्पृहा न युक्तेत्युक्तं, ततः सुतरामेव सिद्धानां नास्तीत्यभिप्रायस्तु परत्रोभयविधतत्तदुदाहारणेषु ज्ञेयः…’ — जब साधकावस्था में ही भुक्तिमुक्ति की स्पृहा को असङ्गता माना गया है तो सिद्धि की अवस्था में तो उन स्पृहाओं का होना सर्वथा असङ्गत ही प्रतीत होता है) अतिस्पष्ट है की भोगमोक्षादि वाञ्छाओं के हृदय में सुप्त, गुप्त, दमित, अदमित, निष्क्रिय वा सक्रिय — इन किसी भी रूप में रहते — भगवत्प्रेम की प्राप्ति व भगवत्सेवासुखजनित आनन्द की अनुभूति सर्वथा असम्भव श्रीरूपचरण के मत में है । उपर से भ.र.सि. १.१.३७ में भाव व प्रेम-भक्ति के सूदूर्लभत्व की बात को उठाते समय श्रीरूपचरण ने श्रीमद्भागवत ५.६.१८ का उद्धरण देते हुये पुनः यह सिद्ध करने का प्रयास किया है कि जब तक भोगमोक्षादि वाञ्छाओं का समूल नाश (केवल दमन ही नही) नही हो जाता भक्तहृदय से, तब तक प्रेमभक्ति की प्राप्ति नही होती ! तो अब प्रश्न यह उठता है कि श्रीरूपचरण व श्रीविश्वनाथ के इन परस्पर विरोधाभासी मतों का क्या समाधान है? समाधान यह है कि — यद्यपि कामरूपी हृदयरोग तो साधनावस्था में सड्घटिता होने वाली अनर्थनिवृत्ति अवस्था में ही समूल नाश को प्राप्त हो जाता है (उस काम का दमन तो भजनक्रिया के प्रारम्भ से ही अपेक्षित है — उपदेशामृतम् के प्रारम्भिक श्लोकों के आधार पर व चैतन्यदेव के द्वारा श्रीरूपशिक्षा में दिये गये मालाकार के उदाहरण के द्वारा), तथापि उस काम के बीज के पुनःउगने की आशङ्का बनी रहती है — वह आशङ्का उस उस परिमाण में समाप्त होती जाती है — जिस जिस परिमाण में भगवत्प्रेम का अभ्युदय होता है साधक के हृदय में — जिस प्रकार से वृक्ष के बीज को भस्म कर देने से वह पुनः कभी उगने की सम्भावना से रहित हो जाता है वैसे । यह समाधान प्राप्त होता है आचार्यपादों की वाणी का गहनचिन्तनात्मक मनन करने से — श्रुतार्थापत्तिप्रमाण के अवलम्बन से ।

 

 

 

 

  • भक्तिरसवेदान्तपीठाधीश्वर आचार्य श्री गुरुपाद

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