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Question asked by Choudhary Mr. Krishna Singh Nain (Kaithal / Kurukshetra, Haryana & London, UK) in BRVF – Followers – 1 group on WhatsApp  —

Acarya Sri, sri-rama-krsna-gaurahari!
Sir, one query — The dvotion of Gopis had lust or not?

आचार्य श्री श्रीरामकृष्णगौरहरिः
श्रीमान जी एक प्रश्न – गोपियों की भक्ति में काम भाव था या नही?

Reply by Bhaktirasavedantapithadhisvara Acarya Sri RKDS ‘AV’ Gurupada —

A) Srimadbhagavata 7.1.31 (‘gopyah kamad bhayad kamso..’) asserts that out of lust or ‘kama’, the cowherd damsels were devoted to Sri Hari.

B) Sri Caitanya-caritamrta 1.4.164-184 (‘…..atmendriya-priti-vancha tara bali kama /  krsnendriya-priti-iccha dhare prema nama //……’) clearly shows the demarcation between the principles of mundane lust (laukika kama) and the divine love of God (bhagavat-prema).

C) According to Sri Bhaktirasamrtasindhu 1.2.285 (‘premaiva gopa-ramanam kama ity agamat pratham..’), just because the external acts of the erotic love of Gopis resembles the lustful affairs of mundane world, sometimes, this divine erotic love is designated as ‘kama’ or lust. However, internally there exists vast difference between the intentions of the mundane lust and those seen in the Gopis’ love.

D) According to the testimony of Krsna-yamala-mahatantram, there are two types of lust and their predominating deities, viz., the prakrta-kama and aprakrta-kama or the mundane and divine lust. The divine lust needed for erotic dalliance occuring between Vrajasundaris and Nandanandana is called alaukika-kamadeva. Its shadow is the laukika-kamadeva.

E) According to the Ujjvalanilamanih of Srila Rupagosvamipada, Sri Krsnabhajanamrtam of Srila Narahari Sarakar Thakur, Sri Gopipremamrtam of Srila Visvanatha Cakravarttipada and Sri Raganuga-vivrttih and Sri Vrajabhaktirasasiddhantasarasangrahah of Srila Rupa Kavisvara Gosvamipada (all classical medieval acaryas of Caitanyaite Vaisnavism), the purest selfless form of divine amorous love exists only in the cowherd milkmaids of Vraja and is named as ‘samartha-rati’. The love bore by Mithileshakumari Sita, Queens of Dvaraka, Laksmis in Golokadhama and Laksmidevi in Vaikuntha — all falls in the technical category of ‘samanjasa-rati’ and its variant affiliates like ‘samanjasa-praya’ etc. Though essentially mundane lust, because of its connection to Krsna, the mood of Kubja is known as ‘sadharani rati’. The first two types of ratis are products of the hladini-vrtti of the internal potency of Krsna. The third one seen in Kubja is mundane lust (arising from rajoguna or mode of passion) transformed to a celestial status.

One thought on “The devotion of Gopis is lust or not?

  1. 1) ‘स्वात्मकृपा’ का तात्पर्य है कि श्रीगुरु, भक्ति, भगवन्त इत्यादियो की कृपा से पहले साधक जब अपने आप पर कृपा कर परमार्थ पर आरूढ होने का अभिलाषी बनकर भक्तिप्रतिकूलविषयो का युगपत् वर्जन करते हुये (भक्त्यङ्ग आचरण के साहचर्य में) कटिबद्धता दीखाता है क्षुर की धार के समान परमार्थपथपथिक बनने के लिये कि जो परमार्थ पथ यदि शास्त्रानुगत होके अपनाया जाये तो अतिसुगम भी हो सकता है गमन जिसपे । चैतन्यचरितामृत के उदाहरण में कालाकृष्णदास स्वात्मकृपा से विहीन थे, अतः श्रीमन्महाप्रभु चैतन्यदेव का नित्य शारीरिक रूप से सेवा का सान्निध्य भी उन्हे कञ्चन व कामिनी के प्रभाव से नही बचा पाया – बहुत बडा सङ्केत गुरुकृपा के फलदायिनी होने में । अतः भक्तिसन्दर्भ: में भी श्रीजीवगोस्वामिपाद ने साधक के निजसङ्कल्प के अनन्तर ही महत्कृपा, भगवत्कृपा, गुरुकृपा, भक्तिकृपा, शास्त्रकृपा आदियो का औचित्य प्रतिपादित किया है ।

    2) १) जिस दुःखशृङ्खलाभञ्जन से प्रेरित होकर हरिभक्तिपरायण होने की बात हरिभक्तिविलासादि शास्त्रो में कही गयी, वह केवल आर्त्तश्रेण्यन्तर्गत उपासको की ओर सूचित करती है। श्रीभक्तिरसामृतसिन्धुकार भ.र.सि. १.१.२२-२३ में स्पष्टरूप से आपवादिक श्रेणी (सनकादि, शौनकादि, ध्रुव व गजेन्द्र — आपवादिक मामले है) के अन्तर्गत होने वाले चतुर्धा उपासको की बात उठाकर कहते है कि जब तक उन सभी पर भक्तकृपा, भक्तिकृपा व भगवत्कृपा नही हुयी, तक उनका वह सकाम/मोक्षकाम वाला भाव क्षीण नही हुआ व तब तक वे अकाम/निष्काम/प्रेमकाम नही बने । २) जब किसी शुद्धभक्त्त की हृदयस्थिता पारमार्थिकी निर्गुणा भक्तिश्रद्धा का रत्यङ्कुर/बीज मायाबद्धजीव वा ब्रह्मभूतावस्थापन्न ज्ञानी परमहंस जीव के हृदय में स्वेच्छाचारीणी भक्तिदेवी की स्वतन्त्रेच्छा से संचारित होता है, तभी प्रारम्भिका साधनभक्त्यावस्था से ही वह भक्त भोगमोक्षादिस्पृहा का त्याग कर भजनक्रिया में संलग्न हो जाता है — भले ही उस भोगमोक्षादिस्पृहा का आत्यन्तिक विनाश अनर्थनिवृत्ति की अवस्था के अननात्र ही क्यो न संपन्न हो पाए । अतः यदि किसी भक्यङ्गानुष्ठानकारी के हृदय में भोगमोक्षादिवासनाओ की परिपूर्त्ति की इच्छा (प्रयास भी) दीखायी देती है, तो समझ लेना चाहिये कि उसके हृदय में केवल लौकिकी श्रद्धा का बीज ही संचारित हुआ है किसी लौकिकभक्त के सङ्ग से, अथवा तो अलौकिक शुद्ध निष्काम भक्त के सङ्ग में रहने पर भी उस जीव के अपने उपर ‘स्वात्मकृपा’ का अभाव होने पर उसमे केवल लौकिकी श्रद्धा ही प्रकट हो पायी है । ३) पारमार्थिकी भक्तिश्रद्धा का बीज भावभक्ति या रति का अङ्कुररूप माना गया है श्रीहीवगोस्वामिपाद के द्वारा श्रीमद्भागवत की क्रमसंदर्भ टीका ‘भक्तिस्तु रत्यङ्कुररूपा जायते’, अतः साधनावस्था से ही भक्ति में शुभदत्व व शुभदत्व के अनतर्गत ‘ऐश्वरसुखप्रदत्त्व’ का गुण विद्यमान है जो कि भ.र.सि. १.१.३०-३२ में प्रमाणित होता है । अतः भक्ति साधनावस्था से ही स्वतः आह्लादकारीणी है, उसका वही आह्लाद भाव व प्रेम की अवस्था पर पहुचने पर अत्यधिक घनीभूतता को प्राप्त हो जाता है । क्योकि भक्ति ह्लादिनीशक्ति की ही तो वृत्तिरूपा है न! अत: साधनावस्था के प्रारम्भ से ही भक्त मोक्षभोगादिपिपासा का त्याग — सर्प को दन्तहीन करने के तुल्य (भले ही नाश न हो पाये पूर्णसर्पवध के तुल्य) — करके जब भक्त्यङ्गो का अनुष्ठान करता है, तब वह स्वयं अकाम होने पर भी (उस साधनभक्तिपरायण भक्त में स्वसुखेच्छा का दमन होने पर भी) आह्लादस्वरूपा भक्ति उस भक्त को आह्लाद का अनुभव कराती है — यह तथ्य श्रीविश्वनाथ चक्रवर्तीपाद की श्रीमद्भागवत की सारार्थदर्शिनी टीका में स्पष्ट हुआ है । ४) जहा तक बात अनर्थग्रस्तावस्था में भजन करने की है यथा — तरङ्गिणी, व्यूढविकल्पादि अवस्थाये माधुर्यकादम्बिनी में वर्णिता — तो उस अनर्थग्रस्तावस्था में भी साधक भोगमोक्षादि कामनाओ के प्रभाव की पूर्णतःकोशिश करता है — यद्यपि पूर्वसंस्कारवशात् कभी कभी उनके प्रभाव में आ जाता है — पर उनसे प्रभावित होने पर भी उन इच्छाओ के दमन व उनके पूर्णविनाश की उसमे बलवती इच्छा रहती है — ये एक बहुत बडी बात है जो उसे संसारीओ से पृथक् करती है । ५) श्रीमद्भागवत की रासपञ्चाध्यायी के अन्तिम श्लोक — ‘विक्रीडितं व्रजवधूभिरिदं च विष्णोः….भक्तिं परां भगवति प्रतिलभ्य कामं….’ की टीका में श्रीविश्वनाथ के अनुसार जैसे जैसे भगवत्प्रेम वृद्धि को प्राप्त होता है साधक के अन्तःकरण में, वैसे वैसे व उस उस परिमाण में वह काम (उपलक्षण के द्वारा भोग/मोक्षादि कामनाये) से विरहित होता जाता है । पर यदि श्रीरूपगोस्वामिचरण की बात माने तो भ.र.सि. १.२.२२-२३ के अकाट्य साक्ष्य के आधार पर (श्रीजीवचरण तो भ.र.सि. १.२.२२ की दुर्गमसङ्गमन
    टीका में यहा तक बता देते है कि — ‘तदेवमनया कारिकया साधकानामपि भुक्तिमुक्तिस्पृहा न युक्तेत्युक्तं, ततः सुतरामेव सिद्धानां नास्तीत्यभिप्रायस्तु परत्रोभयविधतत्तदुदाहारणेषु ज्ञेयः…’ — जब साधकावस्था में भुक्तिमुक्ति की स्पृहा को असङ्गता माना गया है तो सिद्धि की अवस्था में तो उन स्पृहाओ का होना सर्वथा असङ्गत है) अतिस्पष्ट है की भोगमोक्षादि वाञ्छाओ के हृदय में सुप्त, गुप्त, दमित, अदमित, निष्क्रिय वा सक्रिय — इन किसी भी रूप में रहते — भगवत्प्रेम की प्राप्ति व भगवत्सेवासुखजनित आनन्द की अनुभूति सर्वथा असंभव है । उपर से भ.र.सि. १.१.३७ में भाव व प्रेम-भक्ति के सूदूर्लभत्व की बात को उठाते समय श्रीरूपचरण ने श्रीमद्भागवत ५.६.१८ का उद्धरण देते हुये पुनः यः सिद्ध करने का प्रयास किया है कि जब तक भोगमोक्षादि वाञ्छाओ का समूल नाश (केवल दमन ही नही) नही हो जाता भक्तहृदय से, तब तक प्रेमभक्ति की प्राप्ति नही होती ! तो अब प्रश्न यह उठता है कि श्रीरूपचरण व श्रीविश्वनाथ के इन परस्पर विरोधाभासी मतो का क्या समाधान है? समाधान यह है कि — यद्यपि कामरूपी हृदयरोग तो साधनावस्था में संघटिता होने वाली अनर्थनिवृत्ति अवस्था में ही समूल नाश को प्राप्त हो जाता है (उस काम का दमन तो भजनक्रिया के प्रारम्भ से ही अपेक्षित है — उपदेशामृतम् के प्रारम्भिक श्लोको के आधार पर व चैतन्यदेव के द्वारा श्रीरूपशिक्षा में दिये गये मालाकार के उदाहरण के द्वारा), तथापि उस काम के बीज के पुनःउगने की आशङ्का बनी रहती है — वह आशंका उस उस परिमाण में समाप्त होती जाती है — जिस जिस परिमाण में भगवत्प्रेम का अभ्युदय होता है साधक के हृदय में — जिस प्रकार से वृक्ष के बीज को भस्म कर देने से वह पुनः कभी उगने की संभावना से रहित हो जाता है वैसे । यह समाधान प्राप्त होता है आचार्यपादो की वाणी का गहनचिन्तनात्मक मनन करने से — श्रुतार्थापत्तिप्रमाण के अवलंबन से ।

    – भक्तिरसवेदान्तपीठाधीश्वर आचार्य श्री गुरुपाद

    Refutation of the views of Rādhāgovinda Svāmī —

    According to Gaudiya Principle (siddhanta), in an impure heart, right from the beginning of sadhana (devotional practice), all the desires of sense gratification and liberation averse to the service of SriKrsna, are to be ignored as one does a fangless serpent (see 1st verse of Sri Rupa Gosvamipad’s Upadeshamrtam), rather than being in their control and endeavoring to fulfill them. With time, at the stage of anartha-nivrtti, the desires of sense-gratification and liberation which are residing in the heart like fangless serpents are completely destroyed. This is akin to killing of the serpent.

    If one accepts the wrong principle that one will eventually gain nishkam bhakti, with desires existing in the heart and performing sakaam bhakti along with engaging in the fulfillment of such desires, we would like to assert that this happens only in the case of certain very few extraordinary great souls on account of exceptional mercy of Sri Bhakti Maharani. Dhruv remained, for a long time, a sakam devotee despite associating with the supremely nishkam Narada. Moreover, even demi-gods like Indra remain sakaam despite having interview of the Lord multiple times. To conclude, only in the case of exceptional devotees like Dhruva, by the independent will of bhakti maharani (in which there cannot be any interference of SriBhagavan, Pure Devotee and the Sakaam devotee. If Sribhagvan could interfere, Indra and others would have become niskaam after having His darsana. If the pure devotee could interfere, Dhruva would have become niskaama by associating with Narada. When Sribhagwaan cannot influence the independent will of SrimatiBhaktidevi, how can a sakaam bhakta do the same? In the first chapter of SriMadhurya Kadambini according to Srila Vishwanath Chakravartipad, it is due only to the independent will/mercy of BhaktiMaharani that one gains entrance into the first step of uttama (pure) bhakti viz. sadhana bhakti. Sadhana Bhakti begins after the manifestation of Parmarthiki or Nirguna shraddha (faith). Sakaam bhakti has never been considered sadhana bhakti.) will special devotees like Dhruva become niskaam from sakaam. Not all types of Sakaam devotees become Nishkaam. The matter is exceptional and not general.

    Sri Chaitanyadev has, in the Chaitanya Charitamrita in the context of Sanatan Shiksha, shown that the general rule is that, if a practitioner of pure devotion maintains material desires (or the desire for liberation) in his heart, even the irrigation of the seed of the creeper of Shuddha Bhakti (pure devotion) cannot make it grow. On the contrary, just as the wild Shyama weed growing along with the paddy plant consumes all the nutrients, fertilizer, water etc., and doesn’t let these get to the plant, the water and nutrients of the 9 kinds of devotional service beginning with Shravana, Kirtana etc. will be consumed and wasted for the achievement of material sense enjoyment and liberation (bhog and moksha) and the seed of pure devotion sitting in the heart will dry up. That is why the verse of the Srimadbhagavatam, “rajanpatirgururalam……..astvevamang bhagvanbhajatammukundo muktim dadati karhichitsma na bhaktiyogam” (also quoted in the purva vibhag, ch1 of SriBhaktiRasamritsindhu) says that SriBhagvan allures the practitioner with sense enjoyment and liberation but doesn’t bestow prema. This is the general rule. To cite an exception as a general rule is against principle (apasiddhanta).

    — — Bhaktirasavedantapithadhisvara Acarya Sri RKDS ‘AV’ Gurupada
    (BRVF – Anand, Gujarat, India)

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